Sunday, 23 November 2014

~ बदलाव ~

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ढ़ाबे पर काम करते करते आज पांच साल हो गये थे| बंटी का व्योहार अब बदलने लगा था| मालिक डांट देता  जब तब पर, "क्या लडकियों की तरह शर्माता है| जल्दी जल्दी काम निपटा|"
 बंटी था कि अब आर्डर लेने से बचने लगा था| जब भी किसी नशेबाज को देखता उनकी आवाज सुनी ही नहीं ऐसा अहसास कराता|
मालिक को अब शक होने लगा कि कही यह भाग ना जाये, तो नज़र रखने लगा| एक दिन अचानक उसकी नजर नहाते हुए बंटी पर पड़ गयी वह दंग रह गया|
पास बुला उसकी पगार दें उसे वहां से घर जाने को कहने लगा, क्योकि वह कोई पुलिस का पंगा नहीं चाहता था| अच्छा- खासा उसका ढ़ाबा चल रहा था|
पर बंटी रोने लगा बोला ! "साब मुझे मत निकालो, बाबा दीदी की तरह मुझे भी बेच देंगे| मुझे यहाँ से अपने घर में नौकरी पर रख लो...., बचपन से आपके यहाँ काम किया है आप जानते हो मैं कामचोर नहीं हूँ|"
"अच्छा ठीक" कहते ही बंटी अब खिलखिला पड़ा|
मालिक घर पर फोन लगा अपनी जोरू से बोला -"बिन्नी को भेज रहा हूँ, 'मेहनती' है तेरा हर काम में हाथ बटायेगी, अब खुश न ...कहती है मैं तेरा ध्यान नहीं रखता|"  सविता मिश्रा

Monday, 3 November 2014

*इच्छा-शक्ति*

आंसू चीख-चीख कह रहे थे कि जो हुआ उसके साथ वह बहुत गलत हुआ| पर जुबान थी कि ताला जड़ चुका था|
दीपावली के विहान खुशियों का लेखा-जोखा करते, पर अब गम की नदी में गोते लगा रहे थे| हंसता-खेलता परिवार आज गमजदा हो गया था| रह-रह हर बात को लघुकथा में ढ़ालने वाला शख्स आज आँखे मूदें पड़ा था|

ना जाने कितनी लघुकथायें उसके अवचेतन मन में दफ़न हो रही थी| वह बोलना चाहता था कि मैं लिखूंगा जब उठाऊंगा कलम, खूब ढेर सारी घटनाओं पर लिखूंगा| मैं जो यह यमराज से लड़ रहा हूँ ना, वह भी लिखूंगा देखना तुम| पर पत्नी थी कि दुःख के सागर में डूबी, उसके दिलोदिमाग को नहीं पढ़ पा रही थी|
बस कलम उठने ही वाली हैं, आखिर हजारों दुआओं में अमृत-सा असर जो हैं| सविता मिश्रा Savita Mishra