Friday, 26 May 2017

बाज़ी

"वाह भई, क़लम के सिपाही भी मौजूद हैं," पीडब्‍ल्‍यूडी के चीफ़ इंजीनियर साहब ने पत्रकार पर चुटकी ली।
"काहे के सिपाही। क़लम तो आप सब के हाथ में है, जैसे चाहें घुमायें," पत्रकार सबकी तरफ़ देखता हुआ बोला।
"पर पत्रकार भाई, आजकल तो जलवा आपकी ही क़लम का है। आपकी क़लम चलते ही, सब घूम जाते हैं। फिर तो उन्हें ऊँच-नीच कुछ नहीं समझ आता है। आपकी क़लम का तोड़ खोजने के लिए जो बन पड़ता है, हम सब वो कर गुज़रते हैं," डाक्टर साहब व्यंग्य करते हुए बोल उठे।
"सही कह रहे हो आप सब। वैसे हम सब एक ही तालाब के मगरमच्‍छ हैं। एक-दूजे का ख़्याल रखें तो अच्छा होगा। वरना लोग लाठी-डंडे लेकर खोपड़ी फोड़ने पर आमदा हो जाते हैं," लेखपाल ने बात आगे बढ़ाई।
"पर ये ताक़तवर क़लम, हम तक नहीं पहुँच पाती है," ठहाका मारते हुए बैंक मैनेजर बोला।
"क्यों? आप कोई दूध के धुले तो हैं नहीं," गाँव का प्रधान बोला।
"अरे कौन मूर्ख कहता है हम दूध के धुले हैं। पर काम ऐसा है जल्दी किसी को समझ नहीं आता है हमरा खेल," फिर ज़ोर का ठहाका ऐसे भरा जैसे इसका दम्भ था उन्हें।
सारी नालियाँ जैसे बड़े परनाले से मिलती हैं, वैसे ही विधायक महोदय के आते ही, सब उनसे मिलने उनके नज़दीक जा पहुँचे।
"नेता जी मेरे कॉलेज को मान्यता दिलवा दीजिये, बड़ी मेहरबानी होगी आपकी," कॉलेज संचालक विनती करते हुए बोला।
"बिल्कुल, कल आ जाइये हमारे आवास पर। मिल बैठकर बात करतें हैं," विधायक जी बोले।
"क्यों ठेकेदार साहब, आप काहे छुप रहे हैं। अरे मियाँ, यह कैसा पुल बनवाया, चार दिन भी न टिक सका। इतनी कम क़ीमत में तो मैंने तुम्हारा टेंडर पास करवा दिया था, फिर भी तुमने तो कुछ ज़्यादा ही ...।"
"नेता जी आगे से ख़्याल रखूँगा। ग़लती हो गयी, माफ़ करियेगा," हाथ जोड़ते हुए ठेकेदार बोला।
विधायक जी ठेकेदार को छोड़, दूसरी तरफ मुख़ातिब हुए, "अरे एसएसपी साहब आप भी थोड़ा.., सुन रहें हैं सरेआम खेल खेल रहे हैं। आप हमारा ध्यान रखेंगे, तो ही तो हम आपका रख पाएँगे।" विधायक साहब कान के पास बोले।
"जी सर, पर इस दंगे की तलवार से, मेरा सिर कटने से बचा लीजिए। दामन पर दाग़ नहीं लगाना चाहता। आगे से मैं आपका पूरा ख़्याल रखूँगा," साथ में डीएम साहब भी हाथ जोड़ खड़े थे।
सुनकर नेता जी मुस्करा उठे।
सारे लोगों से मिलने के पश्चात उनके चेहरे की चमक बढ़ गई थी। दो साल पहले तक, जो अपनी छटी कक्षा में फेल होने का अफ़सोस करता था। आज अपने आगे-पीछे बड़े-बड़े पदासीन को हाथ बाँधे घूमते देख, गर्व से फूला नहीं समा रहा था।
तभी सभा कक्ष के दरवाज़े पर खड़ा हुआ एक नौजवान सबसे मुख़ातिब हुआ। उसने विनम्रता से कहा, "और मैं एक किसान परिवार का बेटा हूँ। जिसकी पढ़ाई करवाते-करवाते पिता कर्ज़े से दबकर आत्‍महत्‍या कर बैठे। परिवार का पेट भरने के लिए मुझे चपरासी की नौकरी करनी पड़ रही है। पर मुझे आज समझ आया कि मेरे पिता की आत्‍महत्‍या और मेरे परिवार को इस स्थिति में लाने में आप सबका हाथ है। आपका कच्‍चा चिठ्ठा अब मेरे पास है।"
बाज़ी पलट चुकी थी! विधायक से लेकर ठेकेदार तक, सब एक-दूसरे का मुँह ताक रहे थे।
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

Friday, 12 May 2017

सहयोगी-


अपनी लाड़ली बिटिया की शादी निश्चित न होने की वजह से परेशान सुमन अपने पति से कह उठी, "न जाने लाडली का भाग्य कहाँ सोया है |" भाग्य यह सुनते ही गदगद हो गया|
"वर खोजने के लिए एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता हैं ; पर तुम तो पंडितों के बातों में आ जाती थी| घर बैठ कर लड़का थोड़े ही मिल जाता !" कोने में खड़ा कर्म ठठाकर हंस पड़ा|

अब देखो वर खोजने निकला हूँ तो कहीं वर अच्छा मिलता तो घर नहीं, घर अच्छा तो परिवार संस्कारी नहीं | बहुत भटकने पर एक अच्छा लड़का मिला है, परिवार भी बहुत ही सुसंस्कारी हैं| लेकिन वही रहने की समस्या ! अपना घर नहीं है उनके पास| किराए के दो छोटे-छोटे कमरे में रहते हैं सब|
सुनकर भाग्य ने व्यंग दृष्टि कर्म पर डाली |

"क्या अपनी लाडो वहां अडजस्ट कर लेगी ? जितना बड़ा उनका एक कमरा है, उतना बड़ा तो लाडली का स्टडीरुम है !" पति से सारा वितांत सुन सुमन भी चिंतित हो बोल उठी|
सुनते ही भाग्य की स्तिथि देखकर कर्म मुस्करा पड़ा|

"मैं भी सोच रहा हूँ, कैसे रहेगी अपनी लाडो वहां? कहो तो मना कर दूँ ?" पति, सुमन की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टी डालते हुए बोला|
यह सुन भाग्य,कर्म की ओर देखकर कुटिल हंसी हंस पड़ा |

"चिंता न करो 'जजमान', रह लेगी और ख़ुशी से रह लेगी |" सुनते ही भाग्य सीना तान खड़ा हो गया|

"पंडित जी बड़े अच्छे मौके पर आए हैं, आपको फोन करने ही वाले थे| कहाँ- कहाँ नहीं गए परन्तु कोई घर-वर सही से न मिल पा रहा है|" पति प्रणाम करता हुआ पंडित जी से बोला|

कर्म शांत था पर भाग्य हँस उठा| भाग्य और कर्म दोनों पति-पत्नी की बातें सुनकर तनातनी कर रहें थे घर के एक कोने में | पंडित जी की आवाज़ पर चुप्पी साध सुनने लगें दोनों |

"अभी तक आप घर बैठे 'हर तरह से अच्छा रिश्ता मिल जाए' चाह रहे थे; इस लिए नहीं मिल रहा था! अब देखिए आप बाहर निकले, खोजे चारों तरफ तो अच्छा रिश्ता मिल ही गया न| भाग्य कितना भी बढ़िया हो पर बिना कर्म के अर्थहीन है और कर्म कितना भी किया जाय पर भाग्य में हो ही न तो कैसे मिलेगा कुछ| बिटिया और इसका होने वाला पति दोनों कर्मशील प्राणी है| कुंडली के हिसाब से इसके भाग्य पर भरोसा रखिए आप! घर को बंगला बनते देर न लगेगी|
यह सुनते ही भाग्य और कर्म दोनों एक दूसरे के गले मिलकर मुस्करा उठे ।

इज्‍जत-

"काकी,ओ काकी कहाँ हो ?"
"अरे बिटिया आओ-आओ बईठो | बड़े सालों बाद दिखी | ये तेरी बिटिया है न कित्ती बड़ीहो गयी हैं | "
"हाँ काकी दसवीं में पढ़ रही ।"
"सुना ही होंगा तेरे काका और भाई एक्सीडेंट में ...मुझे तो एक ही चिंता खाय जा रही ,सुंदर मेहरिया जमाने में कैसे जियेगी, मैं कब तक रहूंगी ,आज गयी कि कल |" कह सुबकने लगी |
"काकी क्या कहूँ इस दुःख की घड़ी में ,सुनी तो दौड़ी आई |"
"पहाड़ सी जिनगी कैसे काटेगी उसकी, वह भी इस दुधमुहें के साथ |"
"मैं कुछ कहूँ काकी ?"
"हाँ बोल बिटिया !"
"इसकी शादी मेरे बेटे से करवा दो | मेरा बेटा अभी तक कुंवारा है , शायद किस्मत को यही मंजूर हो |"
" पर यह बच्चा ?"
"पर-वर छोड़ काकी ,मेरा बेटा अपना लेगा इस बच्चे को ।"
"पर समाज क्या कहेगा ?"
"कोई कुछ न कहता काकी , कित्ता दूर का रिश्ता है अपना | कोई नजदीकी रिश्ता तो है न कि समाज बोलेगा | और समाज का क्या हैं ,कुछ न कुछ बोलता ही हैं | और दूजी बात हम यहाँ कौन सा रहते, रहते तो शहर में हैं न | कुछ कहेंगा भी तो कौन सुनने आ रहा |"
"बहू से पूछ लूँ |"
"हाँ काकी समझा उसको ।"
थोड़ी देर में ही काकी ने लौटकर अपनी सहमति की मुहर लगा दी |
घर वापिस जाते हुऐ बेटी माँ से बोली "मम्मी, ये क्या कर रही हैं आप |एक तो ये वैसे ही दुखी हैं ऊपर से आप काँटों का ताज पहना रही हैं |"
"चुप कर मुई |कोई सुन लेगा | समाज में इज्जत बनी रहें इसके लिए बहुत कुछ करना होता | और फिर मैं तो उसे एक छाँव दे रही हूँ |"
" मर्द के नाम की छाँव , भले ही वह नामर्द है।"
========================================= .Savita Mishra​

Thursday, 11 May 2017

लघुकथा--तड़प-

"कुछ साल पहले तुमने मुझसे कहा था कि कुछ भी चित्रकारी करना परन्तु मासूमियत को अपने चित्रों में मरने मत देना | फिर यह सब क्या है सुरेखा ?" नाराजगी जताते हुए आज का अख़बार डायनिंग टेबल पर पटक दिया|
"क्या तुम्हारे अंदर की वह तड़प मर गयी | kya hmare bchche n hone se तुम्हारा दिल पत्थर का हो गया |  कुछ बोलो तो सही!"
chay use ek najr dekhi par moun rahi |
"चित्र भी बनाने से मना करने वाली मेरी सुरेखा मेरे सामने आज ये कैसा चित्र उपस्थित कर रही है ! दो नन्हें मासूम ठण्ड में सिकुde एक दूजे से लिपटकर आसमान के नीचे रात गुजारे | उनका आशियाना तुमने क्यों टूटने दिया|"
चुप्पी अचानक टूटी - "तुम खामख्वाह क्रोध कर रहे हो | इस चित्र के साथ अख़बार की भड़काऊ हेडिंग नहीं, बल्कि कुछ अंदर का भी पढ़ लो पहले |" चाय कप में निकालती हुई सुरेखा बोली | चाय की भाप और तल्ख भाषा से वातावारण में गर्माहट फैल गयी |
"दो मासूम को ये अख़बार वाले दिखाकर हम पर कीचड़ नहीं उछाल सकते | इन्हें इतनी ही हमदर्दी थी तो अपने घर की छत क्यों नहीं मुहैय्या करवा दिए | सरकारी जमीन पर गलत तरीके से अतिक्रमण कर रखा था | महीनों नहीं बल्कि सालों से आगाह किया गया था | दुसरे इन लोगों को पता नहीं था क्या कि जो कर रहें वह गलत है !!" आँखे संजय से भी कुछ याद दिलाते हुए जैसे सवाल पूछ रहीं थीं |
"जब अतिक्रमण की एक ईट भी लगती है तो सम्बन्धित विभाग सोता रहता है क्या ?"
"देखता तो है, लेकिन भावनाएं जाग्रत रहती हैं | इस लिए चुप रहता है|"
"अब भावनाएं कैसे मर गयी ?"
"मरी नहीं लेकिन अति होने से जाग्रत भी न रह पायीं | पहले टेंट, फिर मिट्टी, फिर सीमेंट के मकान बना लेते लोग |"
" कमी तो तुम्हारे विभाग की भी थी न !! "
"हाँ थी , किन्तु हमारी कमी को अपनी ताकत कैसे समझ लेतें लोग |" तिरक्षी नजर डाली संजय पर|
संजय को उसकी आँखों में विद्रोह की चिंगारी साफ़ दिख रही थी |
पिता के दबाव में एक रिश्ते के लिए बस हामी भरने के अपराधबोध से उसकी नजरें नीची हों गयीं | उसने अख़बार उठाया और उसके चीथड़े चीथड़े करके डस्टबिन में डाल आया | सविता मिश्रा

Wednesday, 10 May 2017

जद्दोजहद-

"क्या हो गया था यार तुझे?" फोन उठाते ही सवाल दागा गया।
"क्या हुआ मुझे!" अचकचा गयी इस सवाल से।
"अब तू छुपा नहीं मुझसे ..! तेरा वीडियो वायरल हो गया है।"
"कुछ नहीं यार वह..!"
"अरे तू तो हममें सबसे तेज तर्रार थी। ऐसे ही तुझे झांसी की रानी बुलाते थे क्या हम सब!"
"यार ऐसे लोगों से पाला नहीं पड़ा था न अब तक..!"
बीच में ही बात काटते हुए फोन की आवाज कानों में लगी- " हाँ पता है ! तू कुछ तो सुना रही थी। पर रोई क्यों, क्या कमजोर पड़ गयी थी..?"
"नहीं , नहीं ! कमजोर नहीं पड़ी थी।"
"वीडियो में दिख रहा है कि जैसे ही सर तेरी ढ़ाल बने, तू उनके पीछे खड़ी हो रो पड़ी!"
"मैं उसे कानून की भाषा में अच्छे से समझा देती। तू तो जानती है न, मैं कमजोर नहीं हूँ। बस दीवार की आत्मियता से भावुक हो गयी थी।" लरजती आवाज में कहा।
"अच्छा ख्याल रखना अपना। और जो ट्रेनिंग नहीं दी गयी तब, अब वो भी सीखना समझना शुरू कर दे।"
"हाँ सही कह रही तू, यह तो शुरुआत है! पर क्या करती औरत हूँ न।"
"अब भीतर की औरत को मार डाल, मेरे साथ भी एक छोटी सी घटना हुई थी। मैंने उसी क्षण अपने अंदर की औरत को खत्म कर दिया।" आवाज जैसे ही कानों में पड़ी दिमाग ने सोचा और फोन रखते ही ओंठ बुदबुदा उठे "सच में औरत को मरना ही पड़ता है!" सविता मिश्रा

Sunday, 30 April 2017

प्रैक्टीकल-

प्रैक्टीकल-
"जंगलराज क्या होता है दीदी ?"
" जब कोई किसी की भी बात को नहीं सुने और न ही कानून का पालन करे ! समझ आया?" उसका कान पकड़ते हुए बोली।
"नहीं दीदी, प्रैक्टीकल या फिर उदाहरण देकर समझाओ न !" अपनी किताब बन्द कर दी सोनू ने।

"टीचर कहतीं है कि उदाहरण रूप में समझाने पर ज्यादा अच्छी तरह समझ आता है!" सोनू शरारत करते हुए बोला।"अच्छा !"थोड़ी देर सोचने के बाद उसने मोबाईल निकालकर अपना फ़ेसबुक अकाउंट खोला।एक पेज पर पहुंचकर बोली- "यह स्टेटस पढ़!"
"दीदी, आप यह सब मुझे क्यों पढ़ने को कह रहीं, आप तो पढ़ा रहीं थीं न !"
तुझे उदाहरण देकर समझा रही हूँ। इस समय इससे अच्छा उदाहरण कहाँ मिलेगा!
"दीदी यह तो एक धर्म के विरुद्ध स्टेटस है, और इस पर गाली-गलौज से भरे हजारों कमेन्ट।"
"आगे देख!"
"यहाँ तो धमकी दे रहे एक दूजे को !
आरोप-प्रत्यारोप करते हुए कई राजनेताओं की कितनी भद्दी भद्दी तस्वीरें डाल रहे हैं दीदी !"
"यही तो है जंगलराज का जीता जागता उदाहरण! इन सब को किसी भी कानून का कोई डर नहीं।
बस तू विरोध में बोल तो फिर प्रैक्टीकली भी तुझे यहीं दिख जायेगा जंगराज।" रूखी आवाज में बोलकर अपनी किताब पढ़ने लगी।
पेजों को सर्च करते हुए वह खो गया। रह रह क्रोध में भरकर कमेन्ट करता फिर बड़बड़ाता।
अचानक वह क्रोध से भरकर फेसबुक बन्द करके चीख पड़ा, "मुझे प्रैक्टीकल रूप में नहीं पढ़ना और न ही समझना।" अपनी बन्द की हुई किताब फिर से खोलकर बैठ गया। #सविता

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Wednesday, 26 April 2017

मन का डर

उमेश रोज प्रिया से निधि की बड़ाई करता और हर बार की तरह उसकी आँखों में ईर्ष्या देखने की कोशिश करता था। पर अफ़सोस कि प्रिया की आँखों में कहीं कुछ नजर नहीं आता था। जैसे मेरी पिछली जिन्दगी कोई मायने ही न रखती हो उसके लिए। मैं जिस लड़की के बारे में बता -बता कर उसे उद्धेलित करने की चेष्टा करता, वह पलटकर उसका नाम तक नहीं पूछती थी कभी भी।

सुना था स्त्रियाँ बहुत ईर्ष्यालु होती हैं। शायद गलत सुना था मैंने। कभी कभार तो वह मेरी बातों पर खिलखिला पड़ती और तुनक कर कहती, "उसी से शादी कर घर ले आते ? तब आटे-दाल का भाव पता चल जाता तुम्हें।''
हर पल, हर जगह नाम लेते ही हाज़िर रहती निधि। माँ तो मेरी हंसी उड़ाते हुए कहती, "पत्नी नहीं तेरी परछाई है, परछाई। कितनी सुघड़ और संस्कारी बहू है मेरी।" माँ को देखकर, पत्नी का मुस्कराना मुझे जैसे चुभ जाता। लगता जैसे प्रिया जता रहीं हो कि माँ मुझसे ज्यादा उससे प्यार करतीं है।

दिन ऐसे ही हंसते-खिलखिलाते हुए बीत रहे थे, एक दूजे के गुण-अवगुण गिनाते। जो बीत गया सो बीत गया। दस साल का समय बहुत होता है घाव भरने के लिए। सूखी पौध अब मेरे जीवन में पुनः हरीभरी होकर नहीं लौट सकती। ऐसा लग रहा था, अपना जीवन शांत नदी की तरह बीत जाएगा। इसमें ब्रह्मा,विष्णु,महेश भी चाहे तो तूफ़ान क्या थोड़ी हलचल भी नहीं ला सकते। अपने खुशमय संसार के बारे में सोच सोच उमेश हमेशा गदगद होता रहता।

आँफिस से लौटते वक्त उम्फिऐश ने फिल्म की दो टिकट ले ली। सोचा प्रिया को बहुत दिन हो गए कोई भी फिल्म नहीं दिखायी टिकट देखते ही वह खुश हो जाएगी | घर पहुंचते ही सामने निधि को सोफ़े पर बैठा पाया। उसको देखते ही उसके साथ बीता समय जैसे आँखों के सामने से क्षण मात्र में ही गुजर गया। एक अजीब सा डर घर कर गया उसके मन में। ऐसा लगा मानों पैरों के नीचे से सहसा किसी ने जमीन खींच ली हो| प्रिया के साथ निधि बैठी हुई मुझे देखकर मुस्करा रही थी। उन पलों में मैं खुद को एक ऐसा चोर महसूस कर रहा था जिसकी दाढ़ी में तिनका हो।

अब तक तो मैं अपनी पत्नी की अच्छाई का फायदा उठाते हुए हंस-हंस कर उसे निधि के बारे में कुछ सच बता रहा था तो बहुत कुछ छुपा रहा था। परन्तु लगा कि अब तो पोल पूरी तरह खुल ही जाएंगी। उस समय मुझे निधि किसी खतरनाक आतंकवादी सी लग रही थी। पुरानी प्रेम कहानी कहीं हवा हो गयी थी।
प्रिया ने आवाज़ दे कर कहा, "अरे, आओ न, आकर बैठो भी। क्या आज आँफिस से आने पर थकान नहीं हो रही क्या ? खड़े-खड़े ही मिलोगे निधि से?"

उमेश आकर सोफ़े पर बैठ गया तो प्रिया निधि से बोली, "निधि, ये मेरे पति उमेश हैं। और उमेश, ये निधि हैं, हमारी नयी पड़ोसन। दो घर छोड़ कर तीसरा जो खाली मकान था न, उसमें रहने आई है |"

उमेश के दिल का चोर अपनी पत्नी से आंखे चुराने पर मजबूर कर रहा था। उमेश के मन में डर बैठा था कि कहीं निधि ने बता तो नहीं दिया प्रिया को सब कुछ। ऐसा हुआ तो प्रिया बाद में मेरी खूब ख़बर लेगी।

निधि जल्दी ही चली गई। उसके जाने के बाद उमेश थोड़ा सामान्य हुआ। प्रिया ने अगले दस-पन्द्रह मिनट तक कुछ न कहा। सोते समय प्रिया पलंग के साइड टेबल पर रखे फिल्म की टिकट देख बोली, "अरे, मेरी पसंदीदा फिल्म की टिकट लाये और बताए भी नहीं। फालतू चार सौ रुपए बर्बाद हो गए। तुम भी न बहुत लापरवाह हो।" कह कर वह उमेश की बाँहों में झूल गयी। परन्तु उमेश अभी भी गहरे ख़यालों में खोया हुआ था।

प्रिया जब-जब पूछती, "तुम्हें क्या हुआ है ? आजकल बुझे-बुझे से रहते हो !" उमेश आँफिस की टेंशन का बहाना बना कर टाल जाता था।
एक हफ्ते ऐसे ही गुजर गए। हर दिन उमेश डरा-डरा सा रहने लगा था। जब जब वह निधि को प्रिया के साथ देखता, अपने अपराधबोध से सहम जाता।

एक दिन दरवाजे पर ही निधि से उसका सामना हो गया। निधि उसकी ओर देख मुस्करा कर निकल गयी। उसे निधि का मुस्कराना ऐसा लगा जैसे वह कह रही हो, बच्चू आज भी बच गए हलाल होने से। पर कब तक बचते रहोगे ? पर यह उमेश के मन का चोर था जो उसे चैन से रहने ही नहीं दे रहा था।


महीनों बाद जब उमेश ने चेहरे पर ख़ुशी लिए घर में प्रवेश किया तो उसके चेहरे पर रौनक़ देख प्रिया भी मुस्कराती हुई पूछ बैठी, "क्या बात है जनाब, आज तो दमक रहे हो ?" उमेश खुश होते हुए बोला, "जानती हो, मेरा ट्रांसफर हो गया है; यहाँ से बहुत दूर, बैंगलूर के लिए। दो दिन के अंदर ही वहां जाकर ज्वाइन करना है।"
ट्रांसफर की बात सुनकर प्रिय के चेहरे की ख़ुशी काफूर हो गयी। उसे ऐसा लगा मानो तूफ़ान आ गया हो | उसकी बसी-बसाई गृहस्थी तहस-नहस होती हुई महसूस हुई। उसने जैसे अपने आप से ही पूछा, "दो दिन में ? दो दिन में कैसे हो पायेगा सब ? यहाँ जमी-जमाई गृहस्थी, मिंटी का स्कूल , माँ जी के डाक्टर...और तो और निधि जैसी सहेली और अच्छी पड़ोसन।"

पड़ोसन शब्द सुन उमेश ने मन ही मन सोचा- 'वही तो मूल कारण है इस ट्रांसफर की। हमारी गृहस्थी में भूचाल भले आए पर हमारे संबंधों में भूचाल न आने पाए। इसीलिए यह ट्रांसफर बहुत जरुरी था। निधि को लेकर मजाक करना अपनी जगह था पर उसको सामने देख हर बार लगता कि मेरे चेहरे का मुखौटा अब उतरा कि तब उतरा।


सोच से बाहर आकर प्रिया से उमेश बोला, "अरे डार्लिंग, तुम चिंता क्यों करती हो। सब कुछ अरेंज कर दूंगा, तुम्हें जरा भी दिक्कत नहीं होगी। वहां तो स्कूल और डाक्टर सब यहाँ से अच्छे ही मिल जाएँगे।"


निधि को जब पता चला तो वह प्रिया से मिलने आई, परन्तु उसे मिल गया अकेला उमेश। दोनों ही एक दूजे को एक टक थोड़ी देर तक देखते रहे। दोनों के ही ख्यालों में पुराने मीठे दिनों की रिमझिम फुहार सी हुई। जल्दी ही निधि सहज होती हुई बोली, "उमेश, मैं तुमसे जबसे दुबारा मिली हूँ, देख रही हूँ तुम मुझसे कटे-कटे से रहते हो। क्या मुझे देख तुम्हें पुराने हसीन लम्हें ज़रा भी याद नहीं आते ? तुम्हारी आँखों में मैंने हमेशा डर ही देखा है, जबकि मैं प्यार देखना चाहती हूँ। मुझे लगा था कि तुम मुझसे मिल कर बहुत खुश होगे। पर नहीं, मैं गलत थी।


मुझे पता चला तुम अपनी पत्नी के साथ बहुत खुश हो। तुम्हारी पत्नी बता रही थी तुम हमेशा उसे हंसाते रहते हो। परन्तु मैंने महसूस किया है कि मुझे देख कर तुम्हारी हंसी विलुप्त सी हो गयी है। मैं समझ सकती हूँ। तुम डर रहे होगे कि कहीं मैं तुम्हारा राज फ़ाश न कर दूँ ?"


उमेश मंत्रमुग्ध सा सुनता रहा। वह न रो सकता था न अपनी सफाई में कुछ कह सकता था। बस सिर झुकाए सुन रहा था निधि की बैटन को।


उमेश की तरफ देखती हुई निधि फिर बोली, "तुम मुझे समझे ही नहीं, उमेश ! यदि सब कहना होता तो कब का कह देती। जब तुम्हें देखा, उसी दिन बता देती कि तुम ही मेरे पति हो, जिसने मंदिर में मुझसे शादी की थी। तुमने मुझे छला है। मैं तुम्हारें परिवार और ख़ासकर प्रिया के व्यवहार के कारण चुप रह गयी। सोचा जैसे दस साल तुम बिन अकेले बिता दिए, वैसे बाक़ी भी बिता दूंगी। तुम्हारी हंसती-खेलती गृहस्थी में आग नहीं लगाउंगी। पहले दिन तो तुम्हें देख कर बहुत क्रोध आया था, क्योंकि तुम बिना बताये मुझे मझधार में छोड़ आए थे। सोचा उसका बदला ले लूँ।


परन्तु बातों-बातों में माँ जी से पता चला कि तुम्हारी मज़बूरी थी प्रिया से शादी करना। तुमने अपने माता -पिता के सम्मान के लिए हमारे प्यार को ही भुला दिया था। माँ के कहने पर तुमने उनकी दूर की गरीब रिश्तेदार की बेटी से शादी कर ली। माँजी और प्रिया के अपनेपन के कारण मैं अपना बदला भूल चुकी थी। तुम्हारी मज़बूरी समझ में आ गयी थी। बस एक ही शिकायत थी कि कम से कम एक ख़त ही डाल देते मेरे नाम का। उमेश जहाँ कहीं रहो खुश रहो। अच्छा हुआ तुमने जानबूझकर ट्रांसफर ले लिया। हो सकता था मेरे सब्र का बांध एक न एक दिन टूट जाता और तुम्हारी गृहस्थी बह जाती।"


यह कहते-कहते निधि की आँखों में आंसू आ गए। वह चाहते हुए भी उमेश से अपने आंसुओं को छुपा न सकी।
उमेश का मन ग्लानि से भर कर बोला, " कितना गलत था मैं औरतों के बारे में । सच हैं, औरतों को समझ पाना, मर्दों के बस की बात नहीं। समुद्र से ज्यादा गहरी होती हैं ये औरतें।


तभी बाहर से प्रिया आ गयी। माँ को सोफ़े पर बिठा कर निधि से गले लग कर बोली, "तुम कब आई ? मैं जरा डाक्टर के पास चली गयी थी माँ को दिखने। सॉरी यार, तुम्हें छोड़ कर जाना पड़ रहा है। पर मैं फ़ोन करती रहूंगी और जब भी दिल्ली आउंगी, तुमसे जरुर मिलूंगी। पक्का, क्यों उमेश ?" उमेश ने भी मुस्करा कर हामी भरते हुए कहा, "हाँ, बिलकुल पक्का।"


अब उमेश के दिल से डर खत्म हो चुका था। वह कभी निधि को पहले प्यार करता था पर अब उसका सम्मान करने लगा था। उसके दिल में औरतों के प्रति इज्जत बढ़ गयी थी। एक तरफ माँ ,जो कि उसकी नजरो में सबसे अच्छी और प्यारी माँ थी। एक प्यारी पत्नी जो उसकी हर सही-गलत बात को भी हंसी में उड़ाकर खिलखिलाती रहती थी। एक प्रेमिका जो उसकी नजरो में पत्नी ही थी, भले समाज की नजर में न हो। जिसकी अच्छाई अब वह ताजिंदगी भूल ही नहीं सकता था।


और हाँ, एक नन्ही बेटी जो उसे दुनिया का सबसे अच्छा पिता बताते हुए, अपनी सहेलियों से लड़ पड़ती थी। आज उमेश खुद को दुनिया का सबसे ख़ुशनसीब इन्सान समझ रहा था।


नियत समय पर निधि से पूरा परिवार अनमने स्नेहिल शब्दों से विदा ले निकल पड़ा अपने नए गंतव्य बंगलौर की ओर। प्रीति और निधि दोनों उदास थीं। उमेश ने भी महसूस किया कि निधि से बिछड़ते हुए वह भी भीतर से बहुत उदास था।
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Saturday, 11 March 2017

भरा घाव -


"तुम भी न ,कैसे कैसे चित्र बनाते रहते हो !!"
"क्यों, अच्छा नहीं बना ?"
"नहीं बना तो अच्छा है! किन्तु नन्हें बच्चों के हाथ में इतनी मोटी किताब !! और अगल-बगल किताबों का पहाड़ | किसी बालिग छात्र की तस्वीर के साथ इतनी किताबें बनाते तो समझ भी आता कुछ |"
"अरे मेरी भोलीभाली एकमेव पत्नी , तू नन्हें नन्हें बच्चों के हाथों में किताब देख इतना परेशान हो गयी तो फिर वास्तव में बस्ते का बोझ अपने बच्चे पर कैसे लादेगी |"

यह सुनते ही सुरेखा की आँखे नम हो गयी | संजय को अपनी गलती का अहसास हुआ वह तुरंत बात बदलता हुआ बोला- " देख आजकल बच्चों पर उनके नन्हें से मन और सामर्थ्य से अधिक पढाई का बोझ है| मोटी किताबों को दिखाकर यह समस्या उठायी है मैंने | और ध्यान से देख चित्र में लड़के की तरफ रखी किताबों के ऊपर तोता बैठा है| और लड़की की तरफ किताब ज्यादा है पर तोता नहीं है!
समझी कुछ अब ?"

"हाँ , आपके कहने का मतलब है लड़की एक किताब ज्यादा पढ़ेंगी समझेंगी लेकिन र
ट्टू तोता नहीं बनेंगी | और लड़का ...!"
"लड़के मेरी तरह खुराफाती होते हैं किताब कम से कम पढ़ना चाहते हैं | सिर्फ इम्तहान में क्याँ क्याँ आयेगा उसे ही रट्टू तोते की तरह रटकर इम्तहान पास कर लेतें हैं |"
"अच्छा आप खुराफाती थे तभी चित्रकार बन गये !"
"और तू दिमागी थी तभी आज जिला सम्भाल रही है, और बीस साल से एक माँ की तरह मुझे भी |" कहकर पलंग पर बैठी अपनी पत्नी की गोद में सिर रखकर लेट गया |
"आप में अब भी बच्चा जिन्दा है फिर मुझे किस चीज की कमी है भला |" उसकी नम आँखों में प्यार का समुन्दर उमड़ पड़ा | संजय उसको बड़ी ध्यान से देखने लगा |
"ऐसे क्या देख रहे आप ?"
"एक दूसरे चित्र की रुपरेखा दिख रही मुझे तेरी इन आँखों में |" सविता मिश्रा

Monday, 23 January 2017

अमानत-


माँ को मरे पांच साल हो गए थे। उनकी पेटी खोली तो उसमें गहनों की भरमार थी। पापा एक-एक गहने को उठाकर उसके पीछे की कहानी बताते जा रहे थे|
जंजीर उठाकर पापा हँसते हुए बोले- " तुम्हारी माँ मेरे से छुपाकर यह जंजीर पड़ोसी के साथ जाकर बनवाई थी।" 
"आपके चोरी, पर इतना रुपया कहाँ से आया था ? " 
"तब इतना महंगा सोना कहाँ था! एक हजार रुपये तोला मिलता था। मेरी जेब से रुपये निकालकर इकट्ठा करती रहती थी तेरी माँ। उसे लगता था कि मुझे इसका पता ही नहीं चलता । किन्तु उसकी ख़ुशी के लिए मैं अनजान बना रहता था। बहुत छुपाई थी यह जंजीर मुझसे, पर कोई चीज छुपी रह सकती है क्या भला !" 
तभी श्रुति की नजर बड़े से झुमके पर गयी। 
"पापा, मम्मी इतना बड़ा झुमका पहनती थीं क्या ?" आश्चर्य से झुमके को हथेलियो के बीच लेकर बोली|
"ये झुमका, ये तो सोने का नहीं लग रहा। तेरी माँ नकली चीज तो पसन्द ही न करती थी , फिर ये कैसे इस बॉक्स में सोने के गहनों के बीच रखी है।" 
"इसके पीलेपन की चमक तो सोने जैसी ही लग रही है पापा !!"
" कभी पहने तो उसे मैंने नहीं देखा। और वह इतल-पीतल खरीदती न थी कभी।" 
तभी भाई ने -"पापा ले आइये सुनार को दिखा दूंगा" कहकर झुमका हाथ में ले लिया। 
बड़े भाई की नजर गयी तो वह बोला -"हाँ ले आइए पापा कल जा रहा हूँ सुनार के यहाँ, दिखा लाऊँगा ।" 
दोनों भाईयों के हाथों में झुमके का जोड़ा अलग- अलग होकर अपनी चमक खो चूका था। दोनों बेटों की नजर को भाँपने में पिता को देर नहीं लगी। 
बिटिया के हाथ में सारे गहने देते हुए पिता ने झट से कहा- "बिटिया बन्द कर दे माँ की अमानत वरना बिखर जायेगी।" 
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भूख -

भूख -


" अब क्या हुआ जो तू दो महीने  में ही इस डेहरी पर फिर से सर पटकने आ गयी ? कहती थी बहुत प्यार से रखेगा वह ! कितना समझाया था तुझे, पर तू एक भी बात न सुनने को तैयार थी !"

"प्यारी शहद भरी बातों में फंस गयीं थी मौसी! सच कहती हूँ अब कभी भी तेरा दर न छोड़ के जाऊँगी|" मौसी के पैरों में पड़ी बिलखती आँखों में पुराना सारा वाक्या चलचित्र की भांति तैरने लगा था |


वह थैली से पाउडर लिपस्टिक निकाल कर सृंगार कर ही रही थी कि मुनेश कोठे पर आ गया था| थैली जबरजस्ती छिनकर उसने बाहर फेंक दी थी|

"यह क्या कर रहे हो?"

"तुमसे कितनी बार कहा  रसिको के लिए सृंगार-पटार छोड़| चल मेरे साथ रानी बना के रखूँगा|" खूबसूरत चेहरे पर हाथ फिराते हुए बोला था वह।

"कैसे विश्वास करूं तुम्हारा, तुम मर्द लोग सब एक जैसे ही होतें हों! यहाँ आराम से रह रही हूँ| मौसी मेरे  शौक हों, कोई तकलीफ हों हर एक चीज का ध्यान रखतीं  है बिलकुल बेटी की तरह|"

"मैं भी रखूँगा तेरा ध्यान..!"

"दो साल पहले ऐसा ही कुछ कहके ले गया था रौनक| जैसे ही परिवार वालों को बताया मेरे बारें में| घर से निकाल दिया था कुलटा कहके ससुर ने| वह सिर झुकाये खड़ा रह गया था|"

"मेरा तो परिवार है ही नहीं ! चल मेरे साथ।" 

फिर ऐसा हुआ तो! मौसी भली औरत है मुझे फिर से अपने आंचल में छुपा लीं| वरना कहाँ जाती मैं! बाप ने तो गरीबी से तंग आकर  मौसी के हाथों बेच ही गया था मुझे|" जख्म आँखों से रिस आए|

"मैं तेरे साथ ऐसा कुछ न करूंगा, विश्वास कर मेरा!"
"दो बार धोखा खा चुकी हूँ, तिबारा धोखा खाना मुर्खता है| मुनेश तू जा मैं न आऊँगी तेरे साथ|" अपनी सृंगार की पोटली उठाने बढ़ी जमुना|

"सच्ची कह रहा हूँ, बड़े प्यार से रखूँगा! कोई भी तकलीफ न दूंगा तुझे| मेरे तो माँ बाप भी नहीं हैं।" उसे पकड़ते हुए बाहें पसार कर मुनेश बोला|

यह सुनते ही जमुना उसकी खुली बाहों में सिमटकर रौनक से मिला दर्द भूल गयी थी|

जैसे ही मौसी ने अपने पैरों पर से उसे उठाया वह कराह उठी मुनेश द्वारा की गयी पिटाई के दर्द से|

सिसकते हुए बोली- "मौसी तू बुरे काम में भी कितना ख्याल रखती है, और वह जानवर रोज चार को ले आता था| रूपये कमाने की मशीन बना छोड़ा था मुझे!"
" मुझे तो पहली ही बार में मक्कारी दिख गयी थी उसकी आँखों में..!" मौसी बोली।
"एक थैला रख रखा था उसने मौसी। रोज ही जब तक उसका थैला नोटों से भर   जाता ह मुझे कुत्तों के सामने डालता रहता था |" सिसकते हुए जमुना बोली।
"ओह, इतना कमीना था !"
"स्साला कुत्ता कहीं का| आss थू मर्दों पे |  स्साले कहते रहते है औरत ही औरत की दुश्मन हैं। हम औरतों के असली दुश्मन तो aise पुरुष है साले |" मौसी की दहलीज पर कराहते हुए उसकी जबान ही न अब आंखे भी अंगार बरसा रहीं थीं|

उसके दुःख से व्यथित होकर मौसी ने बाहें पसारी तो मौसी की बाँहों में सिमटकर अपना सारा ही दर्द वह भूल गयी| सविता मिश्रा

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thaili par  likhi ...kisi  event m

बदलाव-

"चलो सुमीss! चलो भई..!"

"......."

"अरे कहाँ खो गयी, चलो घर नहीं चलना क्या?" चिल्लाते हुए बोला।

"मैं कौन?

"सुमी, तुम मेरी पत्नी, इन बच्चों की माँ और कौन?" भीड़ में खड़े होने का अहसास होते ही धीरे से बोला।

"नहीं मैं रावण हूँ" सुमी ने आँखे बड़ी करते हुए बोला|

"कैसा मजाक है सुमी| रावण का पुतला तुम्हारे ही सामने खड़ा है !"

"मजाक नहीं कर रही हूँ , मैं रावण हूँ| देखो रावण के दस नहीं, नौ सिर है..|" 

"वह गलती से बना दिया होगा, बनाने वाले ने | अब बकवास मत करो, चलो जल्दी घर।" झुंझलाते हुए वह बोला।

"नहीं ..., वह दसवाँ सिर मैं हूँ|" दृणता से बोली वह।

"तुम रावण ! फिर मैं कौन हूँ ?" भीड़ को देखकर थोड़ा असहज हुआ। फिर मज़ाक उड़ाते हुए बात को आगे बढ़ाते हुए वह बोला|

"तुम राम हो, हमेशा से मैं तुम्हारें द्वारा और तुम्हारें ही कारण मरती आई हूँ | परन्तु अब नहीं, मैं अब जीना चाहती हूँ| अपने छोटी छोटी गलतियों की ऐसी भयानक सजा बार बार नहीं भुगतना चाहती हूँ !" आवेग में आकर सुमी बोलने लगी |

"मैंने तो तुमसे कभी तेज आव़ाज में बात भी नहीं की सुमी|" लोगों की भीड़ को अपनी तरफ आता देखकर बोला |

"तुम बिना वजह सीता की परीक्षा लिए| निर्दोष होते हुए भी वनवास का फरमान सुना दिए | फिर भी मर्यादा पुरुष रूप में तुम्हारी पूजा होती है। और मैं, मैंने तो कुछ भी नहीं किया | मैं मर्यादित होकर भी इस तरह से कई युगों से अपमान सहती रहीं हूँ |" व्यथित हुई रुंधे आवाज में बोलती जा रही थी।

"पागल हो गयी है! जाकर किसी मनोचिकित्सक को दिखाइए इन्हें !" पुरे पंडाल में कुछ ऐसे ही पुरुषों के कठोर शब्दों का शोर उठने लगा |

अपने पक्ष में शोर सुनते ही राहुल का सीना चौड़ा हो गया।

सुमी सकपकाई लेकिन जल्दी ही सम्भलकर दृढ़ होकर तीखे स्वर में
बोली- "राम का यह अपना दिखावटी स्वरूप अब त्यागो। हम स्त्रियों में ईष्या, क्रोध, वाचालता आदि दिखता है वह तुम सप्रयास दिखाते हो। लेकिन...."

" जितना बोलना हो घर में बोलना सब, यहाँ से चलो अभी!"

"नहीं! मुझे यहीं पर बोलना। पुतला दहन के साथ मुझे अपने आयँ का भय भी दहन करना। तुम्हारे अंदर तो कई दोष विराजमान हैं। पर समाज में हम ही तुम्हारे उन रूपों पर परदा डाल देते हैं।" रोष उभर आया था।

रावण का पुतला जलने लगा था, सब भयभीत हो पीछे हटने लगे थे । राम बने स्वरूप भी पीछे हटते हुए जरा सा लड़खड़ाये। 

उधर सुमी का ललाट दीप्तिमान हो उठा था | क्योंकि कई स्त्रियाँ भीड़ से निकलकर उसके समर्थन में खड़ी हों गयीं थीं । पुरुष आवाज दबने लगी थी। अपराधबोध से 
उबरा दसवाँ सिर अब हर तरफ हुँकार भर रहा था। 
स्त्रियों का 

रावण पुतला जल चूका था। धीरे धीरे सब सामान्य होने लगा। आगे-आगे चलने वाले पति अब अपनी-अपनी पत्नियों के हमकदम हों वहां से जाने लगें थे|
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
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आहट -


"बाबा उठो खाना खा लो |"
"अरे बिटिया तू कब आयी ?"
"हल्की सी आहट भी होती थी तो आप उठकर बैठ जाते थे| आज मैं कितनी देर से खटपट कर रही आप सोते रहें| दरवाज़ा भी खुला रख छोड़ा था| दो महीने की मजूरी बचाकर ये पट्टों वाला तो दरवाज़ा लगवाया था|"
"अरे बिटिया याद है, पर अब यह दरवाज़ा बंद करके भी क्या फायदा| और खुला रहने से तनिक धूप आ जाती है| मेरे जीवन की धूप तो तेरे संग ही चली गयी| अब यह धूप ही सही |"
"फिर भी बाबा बंद रखना चाहिए न, कोई जानवर घुस आये तो ?"
"अँधेरे में दम घुटता था बिटिया, देख तू आ गई तो पूरा कमरा जगमगा उठा|"
"क्यों बाबा, अब आपको डर नहीं लगता है क्या?"
"डर, किस बात का डर बिटिया| जब से तू विदा होकर गई है, डर भी चला गया| गरीब के पास अब क्या बचा है डरने के लिए| अब तो यह खुला दरवाज़ा भी मेरे संग तेरी राह देखता रहता है|"
"बाबा, यह दरवाज़ा फिर से अब बंद रखने का वक्त आ गया|" आँसू से आँखे डबडबा आयीं|
"क्या कह रही है बिटिया!!"
"सही कह रही हूँ बाबा!! आपने मेरे लिए तो दरवाजा खुला रख छोड़ा पर आपने यह न देखा कि आपके जवाई के दिल का दरवाज़ा मेरे लिए खुला है या बंद?"  सवालियाँ आँखे बाबा के पथराये चेहरे पर जम गई थीं| सविता मिश्रा

Friday, 23 December 2016

मूल्य - (लघुकथा)

छुट्टी की बड़ी समस्या है दीदी, पापा अस्पताल में नर्सो के सहारे हैं! भाई से फोनवार्ता होते ही सुमी तुरन्त अटैची तैयार कर बनारस से दिल्ली चल दी|
अस्पताल पहुँचते ही देखा कि पापा बेहोशी के हालत में बड़बड़ा रहें थे| उसने झट से उनका हाथ अपने हाथों में लेकर, अहसास दिला दिया कि कोई है, उनका अपना |
हाथ का स्पर्श पाकर जैसे उनके मृतप्राय शरीर में जान सी आ गयी हो |
वार्तालाप घर-परिवार से शुरू हो न जाने कब जीवन बिताने के मुद्दे पर आकर अटक गयी |
एक अनुभवी स्वर प्रश्न बन उभरा, तो दूसरा अनुभवी स्वर उत्तर बन बोल उठा -"पापा पहला पड़ाव आपके अनुभवी हाथ को पकड़ के बीत गया | दूसरा पति के ताकतवर हाथों को पकड़ बीता और तीसरा बेटों के मजबूत हाथों में आकर बीत गया |"
"चौथा ..., वह कैसे बीतेगा, कुछ सोचा ?? वही तो बीतना कठिन होता बिटिया |"
"चौथा आपकी तरह !"
"मेरी तरह !! ऐसे बीमार, निसहाय !"
"नहीं पापा, आपकी तरह अपनी बिटिया के शक्तिशाली हाथों को पकड़, मैं भी चौथा पड़ाव पार कर लूँगी |"
"मेरा शक्तिशाली हाथ तो मेरे पास है, पर तेरा किधर है?" मुस्करा कर बोले |

तभी "नानाजी'" अंशु का ऊँचा स्वर कानों में घंटी सा बज, पूरे कमरे में गूँज उठा| समवत दो और स्वर गूँजे ! आवाज़ पहचानकर, भावातिरेक में सुमी उठी तो लड़खड़ा गयी | दोनों बेटे आगे बढ़कर दोनों हाथ पकड़, उसे सम्भाल लिए|

सुमी के पिता गर्व से बोले 
"संस्कारित जमीन में चंदन ही महकेगा,कँटीला बबूल नही ।" 
!" सविता मिश्रा

Friday, 18 November 2016

श्वास-लघु कथा


मुंगेरी अपने सामने धू धूकर जलती इमारत को देख फफक कर रो पड़ा| सारे मजदूर दुखी थे पर आंसू किसी ने न बहाए| लेकिन मुंगेरी ऐसे रो रहा था जैसे उसकी अपनी कमाई जलकर ख़ाक हो रही हो |
"तू इतना काहे रो रहा रे !" एक बुजुर्ग बोला|
"मेरी मेहनतss"
" मेहनत तो सबने की थी न, तेरी तरह तो कोई न रो रहा| और कौन सी अपनी मेहनत की कमाई लगी इसमें| हम तो राजगीर है, मजदूरी मिली तो दीवार से रिश्ता ख़त्म|"
"मेरा तो सपना जल रहा| अपना तन जलाकर कितने मन से बनाया था मैंने| जो देखता वह मुझे ही याद करता|" मुंगेरी आंसू पोंछते हुए बोला|
"अरी ! ताजमहल थोड़े ही बनाया था| कहकर एक मजदूर युवक ठहाका मार के हंसा|
"मेहनत से मैंने मंदिर बनाया था| जिसमें सुकून बसाया था| दीवारें भी बोलती हुई सी थीं इसकी | रहने वाला मकान या तल्ले में नहीं बल्कि घर में रहना महसूस करता|"
"ऐसा क्या किया था रे तूने !!
आह के श्वास से नहीं बल्कि मैंने मेहनत और उल्लास से भर खड़ी करीं थीं दीवारें | सविता

Sunday, 13 November 2016

कीमत-(लघुकथा)


"माँ कैसे लाऊँ तेरे लिए पैरासिटामॉल! पांच सौ, हजार की नोट बंद हो गयीं, वही पर्स में है |"
"रहने दे बेटा परेशान न हो, मैं ठीक हो जाऊंगी।"
"आज सुबह ही शनिवार  के कारण  मंदिर के भिखारियों में रेज़गारी सारी बाँट आया मैं।  क्या पता था शाम आठ बजते ही यह नोटबन्दी की दुदुम्भी बज जायेगी।
"सुनिए जी .."
"अब तू क्या आर्डर करेगी| देख नहीँ रही है परेशान हूँ !"
चिल्लाते ही झेंपता हुआ बुदबुदाया -- " छोटी नोट तो घर में रहने ही न दिए मैंने। चिल्लाता था कि भिखारियों की तरह क्या चिल्लर जमा करके रखती हो। अब मैं तुम पर क्यों खीझ रहा हूँ !"
"समाचार में तो सुना था कि हस्पताल और दवा वाले लेंगे यह नोट|" वह धीरे से बोली।
"पर ले तो नहीं रहें हैं न ! वह इस बन्दी का फायदा उठाकर अपना ब्लैकमनी ठिकाने लगाएंगे या हमारा दर्द समझकर हमारी सहायता करेंगे। सबकी लंका जली पड़ी है इस समय।"
"अच्छा सुनिये!!"
"अब क्या? ढूढ़ने देगी दस बीस रुपये कि नहीं!"
"वहीँ दे रही हूँ! लीजिए।"
"कहाँ से मिला! मैं तो कब से खोज रहा हूँ। पर यह पॉलीथिन में क्यों रख के दे रही है ! ऐसा लग रहा है सौ  रुपये नहीं बल्कि हजारों पकड़ा रही है !"
"इस जरूरत में तो यह हजारों से भी ज्यादा है। पॉलीथिन में इस लिए दे रहीं हूँ क्योंकि फटा हुआ है।"

यदि जेब में और फट गया तो यह भी हज़ार की नोट की तरह दो कौड़ी का हो जायेगा।"
"हाँ सही कह रही हजार की नोट से भरे हुए इस बटुए पर आज यह फटा हुआ सौ का नोट भी भारी है|" 
"मैं माँ के माथे पर ठंडी पट्टी रखती हूं। आप जाइये जल्दी से दवा लाइए। कल सब्जी के लिए भी तो पैसे चाहिए !"
"हाँ, जाता हूँ! पांच रुपये की दवा आएगी और जो बचेंगे उनसे सन्डे तक काम चल जायेगा।"
"बड़ी नोट रखने का ख़ामियाजा तो भुगतना ही पड़ेगा कल तक।"
"गूंगी भी बोलने लगी।  सोमवार की सुबह ही इन सारी नोटों को छोटी करा लाऊँगा।"
सविता

'प्रतियोगिता के लिए' चित्र पर आधारित

Wednesday, 9 November 2016

खोटा खज़ाना-

"500/१००० की नोटें बंद हो गयीं माँ |" फोन पर बेटे से यह सुनते ही माँ का चेहरा पीला पड़ गया|
फोन कटते ही वह बदहवास सी अलमारी की सारी साड़ियाँ निकालकर पलंग पर फेंकने लगी| पुरानी रखी हर साड़ी की तह खोल-खोलकर रूपये ढूढ़ने लग पड़ी|
फिर अचानक कुछ याद आते ही रसोई में चावल-दाल के सारे ड्रम पलट डाली| ड्रम और डिब्बों से निकले नोट इक्कट्ठा करके रखे| फिर साड़ियों और अलमारी में बिछे अख़बार के नीचे से दबे नोट निकाले| पूरी रात रसोई और अलमारी से सारे नोट इक्कट्ठे होते ही उसे आश्चर्य हुआ इतना रुपया था उसके पास|
"दस दिन पहले तो पतिदेव से यह कह पैसे मांगे थे कि पैसे नहीं हैं| दो तारीख हो गयी आपने पैसे न दिए महीने खर्च के| अब क्या कहूँगी मैं उनसे?" बुदबुदाई दीप्ती|
"बिल्ली के जैसे दबे पाँव यह खेल खेला सरकार ने| इस भूचाल की आहट ही न होने दी| महीने दो महीने पहले थोड़ी भी सुगबुगाहट मिलती तो धनतेरस पर मैं जंजीर बनवा लेती|" कड़क नोट देख आंखे नम हो गयीं|
रूपये बार बार गिनती हुई अपना माथा पकड़ के पूरी रात बैठी रही दीप्ती| सविता मिश्रा

Sunday, 6 November 2016

संगत -

संगत - तनुज अपनी बड़ी बहन की शादी के पांच-छ साल बाद उनकी ससुराल आया था| पता चला छठ पूजा के लिए सब पोखर की तरफ गए हैं| वह अपनी बहन से मिलने वहीं आ गया| छोटे से गंदे पोखर में छठ मैया की पूजा करने वालों की भीड़ लगी थी| तनुज हतप्रभ होकर अपनी बहन को पूजा करते एक टक निहारने लगा| दीदी को पूजा में ऐसे मग्न देखकर वह बरबस ही पुरानी यादों में घिरता जा रहा था| यह वही दीदी हैं जो कभी भी गंदे पानी में किसी को भी नहाते देखती थीं तो दस नसीहतें देने लगती थीं, खुद नहाना तो बहुत दूर की बात थी| बुआ जब घर आ जाती थीं तब चप्पल पहनकर रसोई में जाने को मनाही हो जाती थी| तो दीदी रसोई में कदम नहीं रखतीं थीं| मंदिर के साफ़ सुथरे फर्श पर भी बिना चप्पल के पैरों को अजीब सा मोड़कर चलती थीं| माँ की हर बात पर दसियों तर्कवितर्क करतीं थीं| 'वही दीदी आज नंगे पैरों से इस कंकडों भरे रास्ते पर चलकर आई हैं| ऊपर से कीचड़युक्त तालाब में डुबकी लगाकर, इतनी देर से खड़ी भी हैं|' आश्चर्यचकित होकर बुदबुदाया| दीदी पूजा निपटाकर भाई को देखकर खुश होते हुए जैसे ही पास आई| तनुज अपनी चप्पल आगे करके बोला- "दीदी चप्पल पहन लीजिए, कंकड़ चुभेंगे पैरों में|"| "नहीं बाबू, श्रद्धा और भक्ति की शक्ति हैं मेरे पास, चल लूँगी|" तनुज आश्चर्य से बोला- "दीदी क्या है ये सब, आप और ये !!" "पूरा नगर ही छठ का उपवास इसी तरह करता हैं| यह संगत का असर है बाबू।" ==============================

(चित्र आधारित)