Saturday, 16 June 2018

क्षितिज लघुकथा सम्मेलन के लिए इंदौर यात्रा --३

गतांक के आगे...भाग -३

क्षितिज तक पहुँची सविता --

अपने कमरे में तैयार हो ही रहे थे कि शोभना दीदी आकर बोली- आई-लाइनर है क्या ? हमने कहा दीदी हम तो ज्यादा मेकअप करते नहीं | हमारे पास मेकअप के नाम पर विको क्रीम और लिपस्टिक ही है तो वह हंसकर बोली तुम तो सुंदर हो ! तुम्हें मेकअप की क्या जरूरत | दो-एक और बात हुई फिर वह चली गयीं | कमरे से निकलने में लगभग 12:00 तो बज ही चुके थे। और सफ़र की थकावट से चेहरे पर भी | लेकिन हॉल में प्रवेश करते समय अभेद्य किले को भेदने की खुशी थी या लघुकथा- सम्मेलन हॉल के सजावट की खूबसूरती को निहारने की खुशी या फिर इतने अधिक संख्या में लघुकथाकारों को एक साथ देखने की ख़ुशी थी, जो भी हो हॉल में प्रवेश करते ही मन गदगद हुआ जा रहा था | अपने इंदौर नगरी अकेले ही सही आने के निर्णय पर अचानक से गर्व हो आया |
 लाल कुशन वाली कुर्सियां और कुर्सियों पर काबिज़ भिन्न-भिन्न स्थानों से आयें हुए लोग | वहां का उस समय वो पूरा दृश्य ही बहुत मनोरम लग रहा था । हमारी नज़र पहले अपनी कुर्सी पकड़ने की थी। ये कुर्सियों की चाहत भी बड़ी अजीब चीज होती है, हमारी भी चाहत थी कि आगे की कुर्सी मिले, जिससे हर गतिविधि को हम ढंग से देख-सुन सकें | दूसरे पीछे वाली कुर्सियों से वार्तालाप की आवाज़ें कानों के सुकून को हर न पाए। लेकिन बहुत देर से पहुँचने के कारण खाली सीट दिख नहीं रही थी।
फिलहाल बीच में एक कुर्सी दिखी तो चौथी- पांचवी लाइन की लाल कुर्सी का मोह भी त्याग हम सातवीं-आठवीं में ही जो कुर्सी मिली उसी से चिपक लिए। आगे सफेदपोश सोफ़े पर टिकने का मोह तो मन में बिलकुल न था। लेकिन पीछे बैठने की भी मंशा न थी | पर मरता क्या न करता बैठना पड़ा | सामने मंच इकोफ्रेंडली का अहसास करा रहा था और मन को यह भी अहसास कराने में कोई कसर न थी कि इस समारोह में महिला-कार्यकर्ताओं का वर्चश्व है| मंच की सजावट से यह साफ़-साफ परिलक्षित हो रहा था | खजूर के सूप सजाकर मंच को सजाया गया था ऐसे सूप हमारे उत्तर-प्रदेश में हमने नहीं देखे थे|
दो वृक्ष की हाथों जैसी आकृति में सूरज समाया हुआ था |
हम जब तक पहुँचे थे तब तक सांझा-संकलन और एकल- संकलन और अखबार का विमोचन हो चुका था । अध्यक्ष अपना वक्तव्य दे रहे थे ।
सबके हाथों में हम जूट का फ़ोल्डर देखे तो लगा यह भी लेना पड़ेगा। कहाँ मिलेगा ! पूछने पर पीछे बैठे लोगों की ओर इशारा कर दिया गया।
अपना नाम दर्ज करवाकर हम फ़ोल्डर और परिचय पत्र प्राप्त करके अपना नाम सविता मिश्रा 'अक्षजा' आगरा लिखकर फिर से आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गए। फिर उसे अपनी साड़ी पर क्लिप से लगा लिए। लगाते ही गर्वान्वित-से हुए कि इस लघुकथा महाकुम्भ का हम भी हिस्सा हैं | भले ही घर से इतने दूर निकलने का जोख़िम उठाए |
सब कुछ सुनने में जितना हम कान दे रहे थे उतना ही पीछे से आती आवाज़ परेशान कर रही थी। घूमकर दो तीन बार हम पीछे देखे लेकिन कौन समझता है, समझता भी है तो कोई गौर नहीं करना चाहता था।
अध्यक्ष वक्तव्य के बाद documentary film फिल्म की उद्घोषणा हुई आवाज सुनते ही हमें यह आभास हो गया कि यह इंदौर की

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चिरपरिचित सुंदरी अंतरा सखी की आवाज है | इंदौर की ऐतिहासिक इमारतें मंदिरों से परिचित होते हुए, खाने की सराफा गलियों में घुमाकर फिर महेश्वरी की साड़ियां दिखाई गई | जिस पर हमारे ख्याल से सारी औरतों की नजरें जम गई होंगी और सारी इंद्रियों के बीच आपस में ही लड़ाई छिड़ गयी होगी | उस साड़ी को छूने और पहनने की इच्छा बलवती हो पर्स और मन भी आपस में गुत्थम-गुत्थी करने लगे होंगे| और कमोवेश यही हालात चटोरे पुरुषों के साथ भी हु-ब-हू हो रहें होंगें |
खनकती हुई आवाज़ के बंद होते ही उद्घोषणा हुई थी कि दोपहर का भोजन प्रांगण में लग चुका है कृपया भोजन के लिए आप सभी लोग पधारें |
हमारे घंटे भर बैठने के बाद ही खाने का समय हो गया था | अनाउंस होते ही सब बाहर ऐसे भागे जैसे बांधकर अभी तक रखा गया हो । बाहर निकलते ही कुछ लोग एक दूसरे से वार्तालाप में मशग़ूल हो गए कुछ खाने के लिए प्लेट उठाकर अचार-सलाद लेने में तो कई खाना लेने की लाइन में लग चुके थे |
खाना खाते-खाते लोग गुटों में बट चुके थे | सब आपस में वार्तालाप करते हुए दूसरे को निहार रहे थे व्यंजन की वैराइटी भले कम थी लेकिन सब व्यंजन लाजवाब थे | भले ही बुफे सिस्टम था लेकिन कई बंदे पूछ-पूछकर खाना परोस भी रहे थे | यानी कि भारतीय संस्कृति भी भोजन प्रांगण में विराजमान थी | इस कारण से भीड़ में घुसकर खाना लेने से हम तो बच गये थे | वो बच्चे मुस्कराते हुए जो मांगो वहीं हाजिर कर दे रहें थे | उन्हीं बच्चों की वजह से हम कस्टर्ड खा पाए वर्ना तो इतना लजीज पकवान हमसे छूट ही गया था | कैरी का रस बहुत स्वादिष्ट था |
पुनः दो बजे चर्चा सत्र शुरू हुआ | सभी हॉल में एकत्रित हो गए थे| अचानक मंचासीन विभूतियों का सम्मान करने हेतु हमारे नाम की उद्घोषणा हुई | जिसे सुनकर एक बारगी हम सकपका गये | अब तक बहुत से छोटे-बड़े कार्यक्रम अटेंड कर चुके थे लेकिन कभी ऐसे हमें नहीं बुलाया गया था | जब तक होश में आकर उठते तब तक दूसरे का नाम ले लिया गया | उसके बाद फिर हमें बुलाया गया सम्मान करने हेतु | हमने देखा हमारा नाम उद्घोषिका के पीछे खड़ी अंतरा सखी ने उनके कान में फुसफुसाया था | धीरे-धीरे ऐसे सम्मान करना भी सीख ही लेंगे |
सम्मान के बाद मंचासीन विभूतियों द्वारा वक्तव्य दिए गए | वक्तव्य का विषय था -- "लघुकथा कितनी पारंपरिक कितनी आधुनिक"
फिर दस लघुकथाकारों द्वारा लघुकथाओं का पाठ हुआ | और दो समीक्षकों के द्वारा समीक्षा की गयी |
साढ़े-तीन बजे सत्र का समापन हुआ और हाई-टी की उद्घोषणा हुई।
एक बार फिर से सभी जल्दी से जल्दी बाहर निकल गये | हमने हाई टी में से हाई को छोड़कर सिर्फ टी का दामन पकड़ा | हमें यूँ दो घंटे में ही खाने की आदत नहीं हैं | चाय-कॉफ़ी के जगह पर भी बार-बार भीड़ की वजह से पीछे हट जाते थे | चाय पर वार्ता करते हुए आधे घंटे सेकेंडो में बीते |
फिर चर्चा सत्र प्रारंभ हुआ | मंचासीन विभूतियाँ उद्घोषणा के होते ही मंच पर विराज उठी थी |  हमें फिर से विभूति का सम्मान करने हेतु बुलाया गया | सम्मान जिनका किया वह शायद हमारे ही कथा के समीक्षक थे | जिन्हें लगता है समझ आ गया था कि लेखन के क्षेत्र में यह अनाड़ी-और अड़ियल है और उन्होंने हमारी कथा की खटिया खड़ी कर दी | लेकिन वह "श्वास" नामक कथा अब भी हमारी प्रिय कथाओं में ही रहेगी |
इस बार वक्तव्य का विषय था- "हिंदी लघुकथा बुनावट और प्रयोगशीलता" | वक्तव्य और चर्चा के बाद दस लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथाएं पढ़ीं जिसमें हम भी अपनी कथा श्वास के साथ शामिल थे | और उन पर समीक्षा की श्री अश्विनीकुमार दुबे जी और श्री राजेन्द्र वामन काटदरे जी ने।
समीक्षा के उपरांत फिर चाय के लिए एक छोटा-सा ब्रेक दिया गया |
चाय मीठी-फीकी के साथ आपसी वार्ता भी जारी रही | और आजकल की आधुनिक संस्कृति सेल्फी को कोई कैसे भूल सकता है भला | वह भी अपने-अपने चहेतों के साथ जारी ही रही | हमारे मोबाइल का कैमरा ख़राब होना भी एक बार फिर बहुत ही खला |कई लोग बड़े प्यार से मिलें जिन्हें चेहरे से हम नाम के साथ न पहचान पा रहे थे। जैसे कि नयना ताई जो पहचानने पर जोर डाली लेकिन अपनी यादाश्त का क्या कहें हम!! बाद में उनके साथ हमने कहकर फोटो ली कि जैसे भूले न अब।
पुनः बाहर की गर्मी से अन्दर की ठंडक में प्रवेश हुआ |
इस बार तृतीय चर्चा सत्र में वक्तव्य का विषय था- "लघुकथा आलोचना, मानदंड और अपेक्षायें"।
फिर से दस लघुकथाकारों द्वारा लघुकथाओं का पाठ हुआ | और दो समीक्षकों के द्वारा उनकी कथाओं की समीक्षा की गयी |
इसके बाद चतुर्थ सत्र लघुकथाओं के वाचन का ही होना था लेकिन समयाभाव के कारण उद्घोषणा हुई कि कल सुबह साढ़े नौ बजे किया जायेगा अभी लघुकथाओं पर आधारित लघुनाटिकाओं का मंचन होगा |
इधर मंचन हो रहा था उधर बादलों ने अपना मंचन शुरू कर दिया था | सोंधी खुशबू की महक अहसास दिला रही थी कि बाहर बूंदाबांदी शुरू है |
शुरू के कई नाट्य रूपांतर खूब लुभाए | नाटककारों ने नाटकों में जान डाल दी थीं | लेकिन कुछ लाइट के जाने से अवरोध हुआ और कुछ स्वर के कमतर होने से मजा किरकिरा हो रहा था | कुछ एकाकार होने के कारण और संख्या भी अधिक होने के कारण बोझिल हो गयी थीं या फिर हम सब की थकान ने अपना सिर उठा लिया था इस कारण कुछ नाट्य-रूपांतरण मन को भिगोनें में अक्षम रहीं |
उसके बाद फिर खाने का समय हो लिया | सब अपने- अपने जानकारों के बीच खाने की प्लेटें लेकर बातचीत में मशगुल हो गये | खाने में पुनः बड़े ही लजीज पकवान थे | खा-पीकर सब अपने-अपने कमरे का रुख किए | हम भी पानी ऊपर कहीं रखा हुआ है यह जानकारी लेते हुए राठी भैया से पानी के लिए कहा तो उन्होंने एक कैन रखने का फरमान जारी कर दिया | फिर हम भी अपने कमरे में चल दिए |
कपड़ा बदलते-बदलते संध्या दीदी को बताया कि पानी आपको चाहिए तो कैन रखी है बाहर | वह पानी लेने बाहर निकलीं फिर अंदर आयीं तो कहने लगी पानी तो जमीन पर रखा है, बोतल में कैसे लेंगे!  तब तक हम भी अपना नाईट-गाउन पहन चुके थे | थोड़ी बातचीत इधर-उधर की हो ही रही थी कि नीचे की आवाज़े ऊपर कमरे में पहुँचकर मन को नीचे ले आ दे रही थीं | पानी लेना ही था, हमने संध्या दीदी से कहा चलिए चलते हैं | उन्होंने कहा अब हमने तो घर वाला सलवार-शूट डाल लिया कैसे चलें! हमारे यह कहने पर कि हम तो गाउन में ही चल रहे वह उठकर नीचे आ गयीं | क्योंकि उनका भी मन मोर महुआ और नजर बुसौले पर थी |
थोड़ी देर बाद हम भी बोतल लेकर उतरे और उनकी और अपनी बोतल भरने को चल दिए | इधर गोल घेरे में कुर्सियों पर विराजे दस-बारह लोगों का ग्रुप गाने के तान को छेड़ रखा था | हम पानी लेकर आये तो भाटिया भैया बोलें कि घेरा बड़ा कर लो | छिटपुट वार्ता के बीच सभी लोग गाने ही गुनगुनाए जा रहे थे | कमाल तो तब हुआ जब मेजबान ने भी सपत्निक वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी | उन्होंने ने भी सुर छेड़ने में देरी न की |
एक शायद हमी उस गोल में अगायिका थे | सुभाष भैया ने कहा सविता तुम भी गाओ कुछ , लेकिन हमें बिलकुल नहीं आता कहकर हम चुप रहे | एक गाँठ ही लगा दो हमने मजे लेते हुए हवा में हाथों से गाँठ लगा दी | शायद गाने में ऐसा कोई शब्द होता होगा हमें समझ कम आया हो | या फिर हम सुनने में गलती किये हो | कुल मिलाकर मुझ अनाड़ी को भी लोगों के सुर खूब भा रहे थे | गाने सुनते-सुनाते वक्त बीच में भाटिया भैया ने बड़े मार्के की बात की कि कभी जमाना था आदमी-औरत ऐसे एक साथ बैठ हंसी-ठठ्ठा नहीं कर सकते थे |
सच ही तो कहा उन्होंने जिस वातावरण से हम सभी आते हैं ऐसे कौन बैठता था महफ़िल लगाकर | वह भी आभासी दुनिया के लोगों के साथ आज से तीन चार पहले तक तो  सोच भी नहीं सकता था | लेकिन यह आभासी दुनिया से निकले रचनाकारों की कलम का ही कमाल है कि रिश्ते भी पाक बनने लगे और अजनबी शहरों में अजनबियों के बीच भी कईयों  में अजनबीपन न दिख रहा था | ट्रेन में चार परिवारों के बीच का विशवास यहाँ भी बहुत से अजनबियों के बीच तारी ही रहा | हम कई लोगों से कई-कई बार मिल चुके थे इसलिए हमें तो सब अपने से लगे | गाने का दौर खत्म हुआ तो सब अपने-अपने बिस्तर पर पसरने को बेताब हो उठे क्योंकि सफर की थकान, फिर दिनभर कार्यक्रम की थकान और कल फिर कार्यक्रम चलेगा इस बाबत सोच की थकान भारी पड़ रही थी | पलंग पकड़ते ही निंद्रा माई ने जल्दी ही हमें अपने आलिंगन में भर लिया, और शायद सभी को भी! उस दिन सभी ही थकान के कारण अनुमानतः सभी ही घोड़ा बेचकर सोये होंगे | क्रमशः

दो जून को लघुकथाकारों द्वारा की गयी लघुकथाएँ ...
सत्र-- 1
समीक्षाकार:-- श्री श्यामसुंदर दीप्ति / श्री संतोष सुपेकर

1- कपिल शास्त्री-- पंगत
2- नयना कानिटकर-- बापू का भात
3- शोभना श्याम-- इंसानियत का स्वाद
4- मधूलिका सक्सेना-- अगली पीढ़ी
5- मधु जैन-- अंतिम पंक्ति
6- ड़ॉ लीला मोरे धुलधोए-- श्रवण कुमार
7- डॉ मालती बसंत-- भाग्यशाली
8- कविता वर्मा-- नालायक
9- अंतरा करवड़े-- शाश्वत

सत्र- 2

समीक्षाकार: -- श्री अश्विनीकुमार दुबे / श्री राजेन्द्र वामन काटदरे

1-डॉ रंजना शर्मा-- ममत्व
2-सीमा भाटिया-- आईना बोल उठा
3-कोमल वाधवानी-- खाली थाली
4-नीना छिब्बर-- उदास घर
5-उषा लाल मंगल-- संस्कार
6-सविता मिश्रा 'अक्षजा'-- श्वास
7-डॉ वर्षा ढोबले-- ढोल
8-डॉ संध्या तिवारी-- चिड़िया उड़
9-मनोज सेवलकर-- नियति
10-पवन जैन-- वैवाहिकी

सत्र --3
समीक्षाकार: --श्रीमति मालती बसंत / श्री प्रताप सिंह सोढ़ी

1-कल्पना भट्ट-- धरती पुत्र
2-अनघा जोगलेकर-- जज्बा
3-कुमकुम गुप्ता-- फूलों का झरना
4-सेवा सदन प्रसाद-- बेशर्मी
5-शेख शहजाद उस्मानी-- भूख की सेल्फी
6-मधु सक्सेना-- माँ ही तो है ना
7-नीना सोलंकी-- पछतावा
8-आशा सिन्हा कपूर-- प्रीत पराई
9-अनन्या गौड़-- शक्ति
10- गरिमा संजय दुबे-- घर की मुर्गी
समयाभाव के कारण चौथा सत्र तीन जून के लिए कर दिया गया |




Monday, 11 June 2018

क्षितिज लघुकथा सम्मेलन के लिए इंदौर यात्रा --2

गतांक के आगे...भाग -2

मन में अनजाना-सा डर लेकर अंततः ट्रेन आने का इंतजार शुरू हो गया। ट्रेन देहरादून-इंदौर साढ़े चार बजे आने को थी | देर होते-होते आयी 7:15 पर। पतिदेव एक कांस्टेबल को फोन कर दिए कि डिब्बा देख लें कि किधर लगा है | जैसे कि डिब्बा ढूढ़ने में समय बर्बाद न हो। मथुरा से चलते ही कांस्टेबल ने फोन कर दिया। पतिदेव बिटिया से कहकर सैंडविच बनवा दिए। बिटिया ने बनाकर पैक करके बैग में रख दिया। पतिदेव कैंट स्टेशन पर तैनात अपने मित्र से बात करके पानी-चाय देने के लिए बोल दिए। हम पानी दो बोतल लिए थे, लेकिन उन्हें अंदेशा था कि ट्रेन लेट पहुँचेगी, अतः और पानी को अपने मित्र से बोल हमें हिदायत दी कि ट्रेन से पानी या चाय के लिए उतरना मत। हर हिदायत पर बच्चों-सा हम हामी भरते रहें।
10 मिनट पहले ही कांस्टेबल ने खबर किया तो पतिदेव हमें लेकर घर से चल दिए स्टेशन तक छोड़ने । हमारी सीट पर कांस्टेबल बैठकर अधिग्रहण कर ही चुका था। पतिदेव के साथ स्टेशन पर पहुँचते ही ट्रेन आ गयी। कांस्टेबल बाहर आकर एयर-बैग लेकर अंदर हो लिया । जैसे ही हम अंदर घुसकर  केविन के गेट पर पहुँचे कि शोभना श्याम दीदी दिख गयीं। कई बार मुलाकात हो चुकी थी इसलिए साइड से देखने पर भी पहचान लिए। उन्हें देखते ही अपना डर रफ्फूचक्कर हो गया ।  पतिदेव अपनी सन्तुष्टि के लिए चढ़ लिए थे मेरे साथ, लेकिन ट्रेन चलने को हो गयी तो तुरन्त उतर गए।
हमें कांस्टेबल ने सीट बताकर सामान सीट के नीचे रख दिया। तभी शोभना दीदी उसी केविन में आ गयीं। हमें लगा वाह क्या संजोग है डिब्बे में नहीं बल्कि हम दोनों तो आमने-सामने नीचे वाली ही सीट पर हैं। पतिदेव ने भी पूछा कि जो मिली थी वह वहीं जा रहीं । हमारे हां कहते ही वह चिंतामुक्त होकर बोले तब तो ठीक है न। ध्यान रखना कहकर फोन काट दिया। कैंट पर पानी-चिप्स-और फ्रूटी एक वर्दीधारी दे गए। वर्दी ही काफी थी इसलिए चेहरा देखना जरूरी न लगा। जब ट्रेन चली तो पतिदेव को भी बता दिए कि ट्रेन कैंट से चल दी है और कोई दे गए हैं चीजें। 
ट्रेन चलती रही और चलती रही हम दोनों और एक और महिला की बातें। एक नटखट बच्चा भी ध्यानाकर्षण कर रहा था। टिफिन निकालकर सैंडविच खाया हमने एक दीदी को बढ़ाया एक उस बच्चे को। उधर मिडिल सीट वाली महिला नमकीन ऑफर करीं। लगा कितना भी आदमी डरे लेकिन विश्वास पर फिर भी चलता है। विश्वास पर ही तो चंद घण्टों की मुलाक़ात के कारण ही तो हम चार परिवार एक दूजे की दी हुई चीज खा रहे हैं। 
ट्रेन की केविन काफी गंदी थी लेकिन उसमें बैठे सभी लोगों का स्वभाव अच्छा था। बातों बातों में यह भी अजब संजोग था कि कइयों के नाम उस केविन में s से थे। केविन से ज्यादा गंदा था हमेशा की तरह बाथरूम। लग ही नहीं रहा था कि यह एसी थ्री टियर है। पहले बाथरूम में दो बार जाकर देख चुके थे गंदगी तो दूसरे वाले में चले गए। और कर बैठे गलती। चटकनी बड़ी टाइट थी जिसे हमने लगा तो दिया था लेकिन खुलने में मशक्कत करनी पड़ी। हमारे घबरा जाने के कारण भी शायद नहीं खुल रही थी। ऐसे तैसे न जाने कैसे तो खुली लेकिन अँगूठे को चोटिल कर गयी। उस समय तो हल्का-सा मीठा-मीठा दर्द था। लेकिन घर आने पर पता चला कि नाखून फट गया था |जिसे नेलकटर से काटकर हटाये।
उधर बाथरूम से निकलकर चुपचाप फिर सीट पर बैठ लिए इधर खाना-पीना सबका चला फिर थोड़ी देर बाद में उस बच्चे का परिवार किसी और केविन में बैठ गया। एक लड़की थी जिसे शिवपुरी उतरना था। उस कारण हम मीडियम वाली सीट को खोलकर लेट नहीं सकते थे। वह ऊपर से आकर नीचे बैठी थी। शोभना दीदी के सीट खोल लेने पर वह हमारे ही बगल बैठ गयी थी। जिस ट्रेन को लेट होने के बावजूद दस बजे उस लड़की के स्टेशन पर पहुँच जाना चाहिए था लेकिन नहीं पहुँची। अब-अब करते-करते बारह बज गए। पीट अकड़ने लगी थी क्योंकि घर में ये भी करना वो भी काम करना के चक्कर में आराम न कर पाए थे। शोभना दी तो पसर चुकी थी लेकिन वार्ता में शामिल रही।
तभी बगल वाली महिला ने कहा कि आने वाला है। उसका लगेज काफी था तो हमने कहा गेट के पास रख लो क्योंकि ट्रेन रुकेगी दो मिनट को ही।
बड़ी-सी अटैची, दो तीन छोटे-मोटे बैग। पूछने पर उसने कहा कि कमरा छोड़ दिया इसलिए सारा सामान उठा लाये जो बेचने के बाद बचा। 
उसको अकेली देख हमने उसके साथ उसका सामान गेट तक पहुँचवाया । फिर अकेली लड़की रात में अकेले गेट पर खड़ी रहे, यह बात इस जमाने के अनुसार हजम न हुई इसलिए हमें लगा साथ ही खड़े रहें हम भी। एक से भले दो सही है। 
लेकिन ट्रेन को तो खच्चर बनना था तो बनी। दस मिनट के बजाय आधे घण्टे उसके साथ वही खड़े रहें।  स्टेशन नहीं आना था तो नहीं आया।  गेट खोलने पर हर बार गुप्प अंधेरा दिखता। रुकती भी तो जंगल में। उसने बताया कि उसके पापा और बहन स्टेशन पर खड़े हैं। बच्ची को भी चिंता हो रही थी कि रात में बहन एक घण्टे से स्टेशन पर खड़ी है। हमने उससे कहा बेटा छोटा बैग लेकर और यही छोड़ सीट पर बैठते हैं। 
अततः 1:15 या 1:20 पर ट्रेन पहुँची। वह उतर गई तो मीडिल वाली सीट खुली, हमने नीचे वाली पर अपना विस्तर लगाया और लेटकर सो गए।
सुबह नींद खुली तो चाय की इच्छा हुई। दीदी चाय ले आयी तो हमने भी सोचा पी लें। उनसे पूछा तो उन्होंने कहा दस की दे रहा लेकिन चाय ठीक-ठाक है। हम गेट पर गए तो सामने ही स्टाल थी, उतरकर ले लिए। शोभना दीदी द्वारा दिया बीस का नोट उसे पकड़ाया तो उसने हमें तेरह रुपये लौटाए। दीदी को पूरे पैसे दिए तो वह आश्चर्य चकित हुई। हमें दस में दिया, बगल वाली से पूछा तो उन्हें भी दस में दिया। तुन्हें कैसे सात रुपये में दे दिया। खूब हंसे हम तीनों इसपर। अब यह तो राम ही जाने की उसने किसी को दस और किसी को सात में क्यों दिया। 
बातचीत का दौर फिर शुरू हो गया। गाड़ी खच्चर फिर हो चुकी थी। अंततः हम लोग दस बजे इंदौर के स्टेशन पर पहुँच गए। हमें कुछ करने की जरूरत ही न पड़ी दीदी ने फोन पर सूचित कर दिया था कि 10 बजे तक पहुँच जाएगी गाड़ी।
स्टेशन पर उतरकर जिधर दीदी चली उधर चल दिए। स्टेशन से बाहर निकलते ही सतीश राठी भैया द्वारा भेजी गई कार थी। हम दोनों को न पहचानने की वजह से ड्राइवर बगल में ही खड़ा होने पर भी समझ न पाया । लेकिन दीदी के फोन करने पर वह बोला लाता हूँ गाड़ी। गाड़ी वहीं आयी और हम दोनों को बैठाकर कार्यक्रम स्थल तक पहुंचा दी।
इस तरह अभेद्य किले का अंतिम दरवाज़ा बेधते हुए क्षितिज के मैदान पर सविता ने कदम रख दिया था। यानी की कहाँ जा सकता है जब ठान लो कोई चीज तो सारी कायनात जुट जाती है आपकी इच्छापूर्ति हेतु। हमारे साथ भी यही हुआ। पहले क्षितिज लघुकथा सम्मेलन का समय बढ़ना फिर ट्रेन की सीट येन वक्त पर कन्फ़र्म होकर मिलना, फिर ट्रेन में शोभना दीदी का मिलना । जहां चाह वहाँ राह बनाते हुए हम सम्मेलन स्थल के गेट से अंदर कदम बढ़ा दिए।
 जहां जितेंद्र गुप्ता भैया द्वारा हमें थोड़ा भटकाया गया। लिफ्ट से ऊपर नीचे फिर बाहर हॉल में खड़े हुए तो थकान के कारण पारा हाई होना ही था लेकिन ऐसे बड़े कार्यक्रम में छोटी-छोटी बातें हो जाती हैं सोचकर हम शांत रहें लेकिन शोभना दीदी भड़क गई थीं। खैर 111 कमरा नम्बर जो कि संध्या तिवारी दीदी के साथ शेयर था उसकी चाबी के लिए हॉल से बाहर उन्हें बुलवाकर चाबी उनके द्वारा हमें मिली। कमरे में जाते हम इससे पहले ही राठी भैया की बहू ने नाश्ते की प्लेट पकड़ा दी क्योंकि नाश्ते का समय खत्म हो चुका था। सारा सामान लगभग समेटा जा चुका था। पोहा-साबूदाने के नमकीन लड्डू और जलेबी का नाश्ता करके चाय पी, फिर कमरे में चले गए स्नानादि करके लघुकथा सम्मेलन समारोह में शामिल होने के लिए। जिसके लिए 15 घण्टे का सफर करके आये थे। क्रमशः

Sunday, 10 June 2018

क्षितिज लघुकथा सम्मेलन के लिए इंदौर यात्रा --1

पहला भाग---

कहीं की भी यात्रा करने का मतलब है कि एक औरत का अभेद्य किला को फतह करने के अभियान पर चलना |
औरत को घर की दहलीज लांघने से पहले एक युद्ध लड़ना पड़ता है | घर की जिम्मेदारियों से मुक्ति का युद्ध! अपनी जिम्मेदारियाँ किसी के कन्धों पर टांगने का युद्ध | फिर कहीं जाना कितना जरूरी है या नहीं इस मुद्दे को साबित करने का युद्ध |
पुरुष वर्ग को कहीं जाना होता है तो घर में फ़रमान जारी कर देता है,लेकिन एक स्त्री के साथ ऐसा बिलकुल नहीं होता है | उसे घर से बाहर निकलने से पहले बहुत कुछ सोचना-समझना पड़ता है | हमें भी इस यात्रा से पहले बहुत ज्यादा मशक्कत करनी पड़ी और हिम्मत भी | क्योंकि अकेले जाने के नाम से ही भय दिलो-दिमाग पर तारी हो जा रहा था |
लघुकथा सम्मेलन में सबसे जाकर मिलना और सभी के विचारों से अवगत होने की महत्ता जाहिर करके पतिदेव से अनुमति और बच्चों से अपने जाने का आदेश-सा सुनाकर हमने इंदौर यात्रा के किले का पहला दरवाज़ा भेद दिया था | 
अब मामला दूसरे दरवाजे पर आकर अटक गया था | अंतरा करवड़े सखी से वार्ता करके पता किया कि कौन परिचित आ रहा है ! लेकिन संध्या तिवारी दीदी के अलावा किसी का पता न चल पाया | फिर दिमाग ने निर्णय लिया कि इंदौर नहीं जाना | अकेले जाना फिर वहाँ अकेले ही घूमना सम्भव ही नहीं है | लेकिन एक दिन पता चला कि नामिनेशन पांच अप्रैल तक बढ़ गया है, जो की पहले बीस मार्च था शायद | बस उसी दिन दिल ने निर्णय लिया कि जाना है और तुरंत ही रात ग्यारह बजे के आसपास हमने कविता वर्मा दीदी को मेसेज कर दिया | फिर दूसरे दिन सतीश राठी भैया से बात करके अपने आने की सूचना प्रेषित कर दी | इस तरह दिल पर कब्ज़ा करके हमने दूसरा दरवाज़ा फतह कर लिया |
अब तीसरा दरवाज़ा मजबूती से अड़ा हमें मुँह चिढ़ा रहा था |
चार दिन बिटिया से विमर्श करके तय हो गया कि बिटिया आगरा आकर मेरे कन्धों का भार अपने कन्धों पर ले लेगी | इस तरह तीसरा दरवाज़ा भी फतह हुआ | 
अब चौथे दरवाजे पर जोर आजमाइश चालु हो गयी | बड़े बेटे ने टिकट करा दी | और नामिनेशन के दो-हजार रूपये भी जमा कर दिए | पन्द्रह मई तक जाने की सीट में तीन वेटिंग (rac) ही जा रही थी | तो लगा कि शायद ईश्वर को हमारा इंदौर जाना नहीं मंजूर है | अंतिम डेट के हफ्ते भर पहले सतीश राठी भैया ने पता कन्फर्म करने के लिए फोन किया तो हमने कहा कि सीट कन्फर्म ही नहीं हुई है तो शायद न आना हो हमारा | लेकिन उन्होंने आश्वत किया कि हो जाएगी चिंता न करें | आपका नाम हमने अपने एक परिचित को दे दिया है आप उन्हें लघुकथा सम्मेलन में जा रहे हैं बता दीजिएगा | लेकिन समय बीतता जा रहा था और सीट थी कि तीन वेटिंग पर ही अटकी पड़ी थी | हमें इंदौर दौरा स्थगित होता ही दिख रहा था कि पतिदेव ने दो दिन पहले अपने एक जानने वाले से बात करके हमारी टिकट की सारी डिटेल देते हुए रिजर्ब कोटा लगवा दिया | दूसरे दिन पता चल गया कि कोटा लगा दिया गया है फिर हमने रात में आश्वत होकर तैयारी फटाफट कर ली | दो बजे रात तक हर सामान यादकर के रख लिया | प्रोग्राम और मंदिर दर्शन करने में साड़ी ही पहनना इस कारण साड़ी की संख्या सलवार-सूट से जयादा रख ली हमने |
सुबह साढ़े दस बजे खुशखबरी मिली कि B-१ में सीट नम्बर ५२ हमें प्राप्त हो गयी है इस तरह मजबूत चौथा दरवाज़ा भी बड़ी जदोजहद के बाद हमारे कब्जे में आ गया था |
पतिदेव हिदायतें देते हुए हर जरुरी चीज रखने की याद दिलाते रहें और फोन-पर-फोन करके ट्रेन की लोकेशन पता करते रहे तो बिटिया चुहल करती हुई बोली ऐसा लग रहा है जैसे पापा मम्मी को विदेश भेज रहे हैं | 
इतना ध्यान हमारे आने-जाने पर नहीं देते हैं | ऐसी ही होती हँसी-ठिठोली में एक पिता अपने बच्चों को कितना प्यार करता याद दिलाते रहे और यह कहकर बचते रहें कि मम्मी पहली बार अकेले जा रही है न ! 
हमारे अंदर भी सोया बैठा डर रह-रहकर जाग रहा था | ऐसा लग रहा था मानो कि कोई बच्चा अपनी माँ की गोदी से निकलकर चाची की गोदी में जा रहा हो | क्या जा लेंगे ! भूलेंगे तो न ! क्या अच्छे से पहुँच जाएंगे फिर वापस आ लेंगे | क्योंकि हमारे आने का तो प्रोग्राम खत्म होने के बाद था | अतः कैसा होटल होगा, आने में कैसे स्टेशन तक आयेंगे, ट्रेन पर चढ़ लेंगे इसका ज्यादा डर था | आगे क्रमशः ...
savita मिश्रा 'अक्षजा'

Friday, 27 April 2018

तीसरा- (लघुकथा)

शोर शराबा पहले भी होता रहा था, अब भी हो रहा था। मेरा मन बहुत व्यथित था। शब्दों की कतारे चटक-चटक के फैल रही थीं।
एक कठोर शब्द चटका- "हमारी कथा 2014/15 की है।"
"मेरी अभी कुछ दिन पहले लिखी हुई है, लेकिन चोरी! चोरी मेरा स्वभाव कतई नहीं है।"
बीच-बचाव में भी कई लोग अपनी-अपनी कथा चोरी का बही-खाता लिए पेश हुए। कई लोग पूरी घटना को चुपचाप बैठे देखकर हँस रहे थे। कई अपने-अपने खेमे के लिए सिपाही तड़ रहे थे।
तभी एक आकाशवाणी हुई - "बच्चों! जिन कथाओं को लेकर आपस में लड़ रहे हो! दरअसल वो कथाएं तो कथाएं हैं ही नहीं।"
अब चारो तरफ असीम शान्ति छा गयी, लगा जैसे कोई अचानक प्रगट हो उनके हाथ से कलम को छीन लिया हो । दूसरी कलम को खोजकर सब अब बदहवास से उस जादूगर के पीछे हो लिए।
जादूगर मुस्कराता हुआ मौन धारणकर अपनी नई कथा के जन्म की तैयारी में लग गया। शोरऔर चुप्पी के मध्य मेरे मन में 'दो बिल्लियों की लड़ाई' कहानी गुंजायमान हो रही थी।
बाहर प्रांगण में ''मेरी कथा बनी! मेरी कथा हुई क्या?'' का गंभीर स्वर कोलाहल कर रहा था। लेकिन शब्दों के जादूगर ने दो शब्द हवा में उछालने के बाद से अपना मौनव्रत नहीं तोड़ा तो नहीं ही तोड़ा। #सविता मिश्रा '#अक्षजा'
आगरा (इलाहाबाद)
Savita Mishra
24 April २०१८

Friday, 20 April 2018

कथा है !!

"इस विषय पर कितनी कोशिश की मैंने, लेकिन लिख नहीं पा रही हूँ। यह कथा भी झन्नाटेदार लघुकथा नहीं बन पा रही है!!" अपनी सखी को कथा सुनाती हुई रूबी बोली |
"अरे क्यों !! तुम कितना अच्छा तो लिखी हो रूबी। हमें तो तुम्हारी लेखनी में जादू सा अहसास होता है। बहुत दमदार लिखती हो तुम |"
"लेकिन वरिष्ठजन कभी कहते हैं कि कथा का कथ्य कमजोर है! तो कभी कहते हैं कि शिल्प अच्छा नहीं है। कई तो भाषा पर ही ऊँगली उठा देंते हैं |"
"किसी की न सुन तू ! सब आपस में ही एकमत नहीं हैं | तू दिल से लिख, दिल तक जरुर पहुँचेगी |"
तभी बगल में बैठे बुजुर्ग ने कहा, "अच्छा विषय चुना है ! कोशिश करती रहो।"
"ऐसा क्या करूँ कि अपने अच्छे विषय को मैं परफेक्ट कथा में ढाल सकूँ 
अंकल जी ?"
"कुछ नहीं बेटा! बस एक चुनौती की तरह लो फिर देखो कमाल। झन्नाटेदार कथा लिखने की कोशिश के बजाय, अपने दिल पर झन्नाटेदार थप्पड़ महसूस करो।"
'जी अंकल जी !' कहकर दोनों फिर से उसी कथा पर बातें करने में मशगुल हो गयीं | बुजुर्ग पार्क के एक कोने में पत्थर के नीचे से निकलते नन्हें अंकुर को देख मुस्कराने लगे |
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
24 August 2015 ·

Saturday, 24 March 2018

जुड़ाव

"दृश्टि" नामक राजनैतिक लघुकथा अंक में प्रकाशित कथा...सम्पादक -अशोक जैन भैया का आभार 
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गणपति विसर्जन और जुमे की नमाज़ दोनों ही एक साथ पड़ गए थे | सड़क पर दोनों सम्प्रदायों को आमने-सामने टीवी पर दिखाया जा रहा था| इस अव्यवस्था को लेकर पुलिस की किरकिरी होती देख, फोन घुमा दिया एसएसपी साहब ने | 
"जय हिन्द 'सर'|"
"'जय हिन्द' वो इलाका इतना सेंसटिव है | फिर भी सड़क पर नमाज़ पढ़ने करने की इजाज़त क्यों दे दी गयी ?" एसएसपी साहब गुस्से में इंस्पेक्टर से बोले |
" सर जी! भीड़ ज्यादा हो गयी थी | मस्जिद में जगह बची ही न थी | अतः डीएम साहबsss !!" इंस्पेक्टर साहब की आवाज़ हलक में से निकल नहीं पा रही थी, अधिकारी के गुस्से के सामने |
"जुलूस को ही थोड़ी देर रोक लेते, नमाज अदा होने तक कम से कम | राय जाहिर करते हुए बोले |
"जुलूस में भी भारी तादाद में लोग थे सर | रोकने से बवाल कर सकते थे |" अपनी समस्या बता दी इंस्पेक्टर ने |
हल्की सी भी चिंगारी उठी तो आग की तरह फैल जायेगी | सख्ती फिर भी तुम सब ने नहीं दिखाई | कुछ हुआ तो डीएम साहब तो जायेंगे ही, साथ में हम सब को भी डूबा के जायेंगे |" चिंता जताते हुए गुर्राए |
"चिंता की बात नहीं हैं सर।" वह घिघियाया |
"क्यों ? इतना यकीं कैसे है तुन्हें ? जबकि मालूम हैं कि हर छोटी बात पर उस क्षेत्र में दंगा हो जाता है?" चिंतित होकर कहा।
“सर, क्योंकि क्षेत्राधिकारी मंजू खान सर नमाजियों के साथ और एसपी कबीर वर्मा साहब जुलूस के साथ निरंतर लगे हुए हैं | और और दूसरे ख़ुशी की बात यह है कि दोनों के ही तरफ, कोई नेता नहीं दिखाई पड़ा अभी तक |” इंस्पेक्टर साहब ने स्पष्टीकरण दिया |
"ओह, अच्छा! तब तो चिंता की कोई बात नहीं है | किसी नेता का वहाँ न होना ही तुम्हारे यकीं को पुख्ता करता है | फिर भी अलर्ट रहना !" एसएसपी साहब निश्चिन्त होकर बोले |
"जी सर" उनके माथे का पसीना अब सूखने लगा था |
November 14, 2015 at 12:15am ओबीओ पर डालने पर रिजेक्ट हुई | ग्रुप के चित्र पर लिखी कथा

Friday, 9 March 2018

"उद्गार" लघुकथा संकलन -

"उद्गार" लघुकथा संकलन - वनिका पब्लिकेशन
संकलनकर्ता - रश्मि सिन्हा दीदी
प्रकाशित - फ़रवरी २०१८
इस संकलन में मेरी चार कथाओं को स्थान दिया गया है | समूह की संचालिका रश्मि सिन्हा दीदी का आभार। साथ के साथ नीरज शर्मा दीदी का बहुत बहुत धन्यवाद --१--दोगलापन
२--खुलती गिरहें
३--सहयोगी
४-- कृतघ्न
--००---

१--दोगलापन -लघुकथा इस लिंक पर ---
२-- खुलती गिरहें- लघुकथा इस लिंक पर ---
३--सहयोगी- लघुकथा इस लिंक पर ---
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/05/blog-post_27.html
--००--
४-कृतघ्न-
जूता फैक्ट्री में आग लगने से कई जाने चली गयी थीं | जिनकी इस हादसे में मृत्यु हो गयी थी उनके परिवार वालों को लाखों का मुवावजा मिला, ऊपर से एक सदस्य को नौकरी भी मिली |
यह खबर लगते ही आशीष बहुत दुखी हुआ | उसी दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल हुए अपने बापू की तरफ देखकर बुदबुदाया- "मेरी तो किस्मत ही खोटी है |"
खटिया पर पड़ा उसका बाप कन्हैया भी दुखी था कि अब वह काम करके अपने बेरोजगार बेटे-बहू का पालन-पोषण नहीं कर पायेगा |
अभी तक जो बहू खांसने पर भी, पानी लेकर 'बापू क्या हुआ ?' पूछने दौड़ी आती थी, आज खाने की थाली में दो सूखी रोटी और प्याज पटक गयी थी |
कन्हैया पानी मांगता रह गया न आशीष ने सुना और न ही बहू ने ..| सूखी रोटी गले में फँस जाने से उसकी सांस अटक गयी | जब बेटे ने बापू की लाश देखी तो दौड़ा-दौड़ा फैक्ट्री पहुँच गया | मैनेजर से राय-बात करके पीड़ित परिवार में अपना स्थान भी पक्का करा लिया |
घर पहुँचते ही नीतू ने झल्लाते हुए कहा, "अब इनका क्या करें? कितनी देर कर दिए आने में !"
मुवावज़ा मिलने और नौकरी लगने कि ख़ुशी में भूल गया कि मृत बापू की कृपा से है सब | अब तक की 'बेकारी का दर्द' शराब में डुबोकर अपने जमीर को भी मार आया था वह |
खटिया पर गिरते ही बेफ़िक्री से बोला- "सो जाओ सुबह देखेंगे |"
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Sunday, 18 February 2018

साँझा-लघुकथा-संग्रह (व्योरा)

इसके लिए हम आभारी हैं आप सभी के ...
आज १८/२/२०१८ तक कुल दस #साँझा-लघुकथा-संग्रह पुस्तक  रूप में आ चुकी हैं | जिनमें #बत्तीस #लघुकथाएँ प्रकाशित हुई हैं | चार आधी रूप में अधर में है, एक की कोई सुचना नहीं मिली | यानी पांच हाथ में आ नहीं पायी हैं | मतलब यह कह सकते हैं कि कुल पंद्रह संग्रह लघुकथा के हो गये ...बहुत हैं न ! अबतक जो संग्रह हाथ में आई है उनमें कोई भी कथा दूसरी संग्रह में रिपीट नहीं हुई है |
१-- 'मुट्ठी भर अक्षर' साँझा-लघुकथा-संग्रह
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_9.html
२--'लघुकथा अनवरत' सत्र २०१६ लघुकथा-साँझा-संग्रह
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_23.html
३--'अपने अपने क्षितिज' साँझा -लघुकथा-- संग्रह -
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_24.html

४-- "लघुकथा अनवरत" साँझा-लघुकथा-संग्रह (२०१७)-
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_25.html

५--‘सपने बुनते हुए' साँझा-लघुकथा-संग्रह -
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post.html

६-- "आधुनिक हिंदी साहित्य की चयनित लघुकथाएँ" साँझा-लघुकथा-संग्रह - http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_78.html

७--"नई सदी की धमक" साँझा-लघुकथा-संग्रह -
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_51.html

८-- 'सफ़र संवेदनाओं का' -साँझा-लघुकथा-संग्रह -
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_93.html

९-- "आसपास से गुज़रते हुए" साँझा-लघुकथा-संग्रह --
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_80.html

१०.'सहोदरी लघुकथा' साँझा-लघुकथा-संग्रह -
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_17.html

लघुकथा.कॉम वेबसाइट के संचयन में

लीजिए खुशी का मटका ऐसे भी फूटता है, एक साथ पांच कथाएँ फेवरेट वेबसाइट लघुकथा.कॉम पर। 
संजोग देखिये fb फरवरी माह का ही अपडेट दिखा रहा ब्रेकिंग न्यूज़ नामक रचना छपने का।😊😊शायद फ़रवरी महिना लकी हमारे लिए ..

बड़ी उत्सुकता थी कौन-कौन सी कथाएं लगीं। पांच लगीं हैं जिनमें उपाय अपनी पसंदीदा रचना । वैसे तो अपनी सारी उँगली बराबर, सबको लिखने में हमें ज्यादा नहीं सोचना समझना पड़ा। 

बस उपाय हमें पसन्द थी | लेकिन दो एक को पसंद नहीं आयीं थी। यादास्त  कमजोर अपनी। अब लिखने में यह याद कि पसन्द नहीं आयी थी लेकिन यह याद नहीं कि कैइसी थी जो पसन्द न आई और क्या कुछ हम परिवर्तन करें उसके बाद । वैसे उपाय obo में लिखी पैंतरा का बिगड़ते बिगड़ते सुधरा रूप है  
खैर कोई न अब खुशियों में शामिल होइए आप सब भी


पढ़कर पञ्च परमेश्वर को ! अरे कथाओं को और बताइये आपको कौन सी बेहतर लगी या नहीं भी लगी |😊
-तोहफ़ा.
.पछतावा
-परिपाटी
--उपाय
--अमानत

तोहफ़ा इस लिंक पर ..
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/11/blog-post_27.html
और  चारों कथाएँ इस लिंक पर ..
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_93.html


आभार सम्पादक द्वय Sukesh Sahni भैया औरRameshwar Kamboj Himanshu भैया का तहेदिल से। बड़े आशीर्वाद बनाये रखे तो मार्ग सहज होता जाता और खुशकिस्मत की सब बड़ो का आशीष बना हुआ है। 
बस एक क्लिक पर पढ़े...😊

http://laghukatha.com/लघुकथाएँ-15/

Saturday, 17 February 2018

लेखन का दुःख (व्यंग्यमुखी)

हाँ तो सब तैयार हैं न? फेसबुक पर हमारे यह कहते ही आश्चर्यचकित हो सब मुँह खोलकर सुनने में लग गये कान लगाकर | कुछ छिपकली की तरह कुछ बन्दर की तरह | कुछ ही थे जिन्होंने हमारे इस वाक्य को सीरियसली लिया | माने हमऊ नेता माफ़िक होई गये चंद मिनट खातिर | शुक्र है आदतन भाइयों-बहनों नहीं बोले थे हम, वरना तो लोग जय-जयकार करने लगतें भई | ऊ क्या है कि हमको ई जयकारा छटांग भर भी नहीं भाता है | इस लिए जुबान को कंटोल करना पड़ा, बटन तो खटखट चल पड़ी थी, चलने के बाद उसे भी डिलीट मारना पड़ा | 
अच्छा हाँ, अपनी भाषा सही रखें हम, नहीं तो सब इसी पर जंग जीत लेंगे | हाँ तो तैयार हैं न बिल्कुल मीडिया के जैसे, कैमरा और माइक लेकर। और हाँ ख़ुफ़िया कैमरा लेकर भी, क्योंकि बहुत से लोग इसी खास कैमरे से देख सकेंगे। अपने विरोधियों की गतिविधियों को देखना इसी कैमरे से तो आसान होता है ! हाँ तो अच्छी तरह से सभी ने अपने-अपने कैमरे, अरे भई सामान्य कैमरे की कौन बेवकूफ बात कर रहा है, ख़ुफ़िये (कुछ और समझते हैं, तो उस आपकी समझ में हमारी लेखनी का कोई दोष नहीं है :P ) कैमरे यथास्थान फीट कर लिए हैं न !
यह अपना भारत भी बड़ा अजीब देश है और भारतवासी उससे भी ज्यादा अजीबो-गरीब |

यहां कोई बस बकरा बन भर जाए, सब उसे हलाल होते देखना चाहते हैं | क्या राजा क्या रंक! क्या अमीर, क्या गरीब! क्या कलम के हस्ताक्षर और क्या अँगूठा छाप। यहाँ तक की, कि बहुत से बकरे भी बकरा को हलाल होता देख मजा लेना चाहते हैं।

तो रहिये तैयार और पढ़िए यह --!
हाँ तो हम बकरा बनने को तैयार क्या हुए, सब हिंगलिश- संस्कृत- हिंदी -अंग्रेजी में दुई के पाँच पढ़ने लगें और हमें "शुभष्य शीघ्रं" की शिक्षा देने लगें | अब क्रोध में हमने शब्दों की तलवार उठायी तो थी, पर सोचे राय ले ली जाय कि सबका दिन ख़राब करें या रात में परी के सपने में आने के तार तोड़ दें |

राय मांगना भर था कि सब बोल उठे कि हंगामा हो तो अभी ही हो | हंगामे के समर्थन में नारे लगाने लगें | माने मजा सबको तुरंत ही चाहिए | कोई हलाल हो इससे किसी को कोई ख़ास मतलब नहीं होता है | हु-हा की लाठी लेकर चल पड़े, माने शांत बैठे गाँधी भक्त भी चूके नहीं ! हिंसा चाहने वाले तो इन मामलों में हमेशा ही सजग रहते हैं भई !

ऐसा विरोधाभाषी आचरण वाला आश्चर्य तो भारत में ही सम्भव है | कहने का अभिप्राय है कि मन में राम और बगल में छूरी रखने वाले भी हैं कई और कई तो ख़ास रूप से तभी दिखे जब फेसबुक पर यह गलती से अनाउंस हो गया हमारे मुख से | कई गहरे पानी में धक्का देने को आतुर दिखें, बिना यह जाने कि हमें तैरना आता भी या हम ऐसे ही डींग हांक दिए |

शाम को आतंकवादी आक्रमण करते हैं यह आठवाँ अजूबा आज ही पता चला हमें | हमने आव देखा न ताव हाँक दिया कि "चिंता न करा, हम उनहू से भिड़ी जाब, मरब या मारब" लेकिन सच पूछिये तो डर तो लगा | क्योंकि यहाँ तो सब मौके की ताक में ही रहते हैं कि कब कोई किसी को कोई कुछ कहें तो वो भी अपनी रोटी सेंक लें फुर्ती से | रोटी सेंकने वाले इतने उतावले रहते हैं कि सर फुटव्वल भी कर लेते हैं आपस में ही |
फिर चिंतक आगाह किए कि भिड़ना ठीक नहीं ! हम बाज क्यों आते, बोल दिए - ब्रह्मास्त्र है अपने पास | शुक्र है जुकरबर्ग भैया जानते थे कि यह फेसबुक भारत में कत्लेआम मचा देगा | गालियों-धमकियों का एक नया ग्रन्थ लिखवा देगा इसलिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र की व्यवस्था आपातकालीन स्थिति के लिए रख छोड़ी थी | बस उसी ब्रह्मास्त्र के बलबूते पर हम जैसे लोग सर्वाइब कर रहे हैं बंधुओं | हमें भी इस ब्रह्मास्त्र बड़ा गुमान है और जुकरबर्ग से प्रार्थना है कि अपडेट के नाम से भविष्य में हमसे यह हथियार नहीं छीना जाए |

हाँ तो खुफियागिरी वाले ज्यादा ध्यान दें | और यह खबर वाइरल कर दें कि आदमी से जितना सम्भले उतना ही भार उठाए | तैरना न जाने तो  हमारी तरह पानी में जबरजस्ती ही नहीं कूद पड़े, बिना सोचे-समझे | वरना लेने के देने पड़ सकते हैं |

लड़की से शादी वक्त अक्सर सवाल पूछा जाता है बिटिया खाना बना लेती हो ? हाँ कहने पर फिर सवाल उछलता है -बीस-पचास का बना लोगी ? हाँ कहने पर सास ठहर जाती है और पसंद कर लेती है | लेकिन लड़की की माँ तैस में आकार यह कह दें कि हमारी लाड़ो तो पूरी बारात खिला लेगी ! और तो और शादी की पूरी व्यवस्था सम्भाल लेगी | तो भैये यह सही है क्या ? नहीं न |
आदमी हर काम और दस हाथ के सम्भलने वाला काम अकेले नहीं कर सकता | इसलिए उसे उतना ही काम अपने सिर पर लेना चाहिए, जितना वह सुचारू रूप से कर सकें | माने हम खामखाँ ही सीख देने पर उतारू हो गये हैं |
अब मुद्दे की बात पर आते हैं ! जिसके फलस्वरूप ये पांच सौ शब्दों का तानाबाना बुन उठा |
हमारी कथा "बदलाव" छपी है उस "बदलाव' में लिंग ही बदल दिया | उस कथा की ऐसी खटिया खड़ी करी गयी है कि हम पढ़कर क्रोधित हो उठे | घंटो आँख फोड़कर लिखने और गलतियों पर बारीकी से निरिक्षण करने का इतना कष्ट हुआ कि पूछिये ही मत |

उस किताब से सम्बन्धित आठ सम्पादक लोग हैं | किसे सुनाए समझ ही नहीं आ रहा है | इमेल का भी अता-पता नहीं मिल रहा है, घंटो मशक्कत कर लिए  | हम फोन भी करें कि जाने आखिर हमारा असली मुलजिम है कौन ! पर फोन उठा नहीं |  तो क्रोध की सीमा रेखा पार हो गयी, जो फेसबुक पर पोस्ट रूप में चिपकी |

लेकिन फिर देखा कि एक लाइन नहीं पूरा पैराग्राफ ही तहसनहस हुआ है | तो फिर क्या ! उठा लिए कलम और आ गये जनता दरबार में | मेहनत पानी में नहीं जाये इसका ख्याल तो सम्पादकों को अवश्य ही रखना होगा | अपनी टांग अड़ाने से अच्छा है जैसा लेखक दें हुबहू वही छाप दिया जाय | सम्पादन के नाम से कथा रूपी शरीर के पेट का आपरेशन करने के बजाय दिमाग का आपरेशन न कर दिया जाय ! फान्ट बदलने की गलती तो आदमी बर्दास्त कर सकता पर इस तरह की गलती असहनीय है !  असहनीय !! है न !!


देखिये आप सब भी इस कथा को...इतनी गलतियाँ ..पिछली बार के सम्पादक ने पता ही बदल दिया था, इस बार स्त्रीलिंग का पुलिंग में वार्ता कर दिया गया--


सही कथाएँ इस लिंक पर ..

http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_17.html

१०) 'सहोदरी लघुकथा' साँझा-लघुकथा-संग्रह

'सहोदरी लघुकथा' साँझा-लघुकथा-संग्रह प्रकाशन -भाषा सहोदरी हिंदी |
सम्पादक - कुल आठ सदस्य मुख्य सम्पादक श्रीमती कांता राय |
विमोचन- दिल्ली के "हँसराज कॉलेज" में जनवरी २०१८ को हुआ |
---०---
'सहोदरी लघुकथा' साँझा-लघुकथा-संग्रह जनवरी -२०१८ में पांच कथाएँ प्रकाशित हुई हैं |
आठ सम्पादको की देखरेख में कुल ७० नवांकुरो के साथ १५ वरिष्ठ अतिथि लघुकथाकारों के लघुकथाओं से सजी ३८० पेज की किताब .. |
भाषा सहोदरी हिंदी द्वारा लघुकथा अधिवेशन 2018, हँसराज कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिनांक : 15 जनवरी 2018 को सम्पन्न हुआ जिस में सौभाग्य से हम उपस्थिति रहे |
--००--
प्रकाशित पांच लघुकथाएँ-
१..उम्रदराज प्रेमी
२ -रंग-ढंग-
३--बदलाव
४--सबक
५.-सभ्यता के दंश
---००----१--उम्रदराज प्रेमी~


"अरे विनोद ! क्या हुआ बीमार से लग रहे हो | आजकल टहलने भी नहीं आते ?"
"क्या बताऊँ यार ?"
"अरे बताओ तो सही ,शायद मैं मदद कर सकूँ !"
" यार, वह जो कोने वाली बेंच पर बैठी औरत है न, बस उससे प्रेम सा हो गया है |"
"वह जवान और तुम 'पिलपिले आम' आज गये कि कल ..."
यह बात व्यंग-सी चुभी ! तीखे स्वर में विनोद बोल उठा - "आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता, सुना नहीं कभी क्या? और वह भी कोई जवान नहीं है, चालीस से ऊपर की तो होगी ही ! "
"सुना है भाई ! मैं तो यूँ ही मज़ाक कर रहा था | कैरियर बनाने के चक्कर में शादी नहीं की उसने और जब करनी चाही तो लड़के ही ना मिले |"
"फिर बात करने की कोशिश करो न ! तुम्हारी सहकर्मी रही है, तुमसे तो घुली-मिली है न |"
बात क्या करनी है, फाइनल समझो |वह तो खुद कहती है | 'दसियों घातक नजरों से अच्छा है एक जोड़ी आँखे 'प्यार भरी' नजर से देखे | चाहे नजर बूढी ही क्यूँ न हो |"
दोस्त की बात सुनते ही "उम्रदराज प्रेमी" अनायास ही जवान हो उठा |
---००--
इसका बदला हुआ स्वरूप ब्लॉग और फेसबुक के इस लिंक पर ...

https://www.facebook.com/savita.mishra.3994/posts/1716223348415913
इसे 9 February 2015 को इस ग्रुप में लिखा था ..
https://www.facebook.com/groups/364271910409489/permalink/425160117654001/
--००--
---००----
२--रंग-ढंग-

फेसबुक पुरानी यादों को ताज़ा कर रहा था कि अचानक चेतन को वे तस्वीरें दिखी, जो उसने पांच साल पहले पोस्ट की थी। अब ऐसी तस्वीरों की उसे जरूरत ही कहाँ थी। उसने स्क्रॉल कर दिया ।
...कभी समाजसेवा का बुखार चढ़ा था उस पर। 'दाहिना हाथ दें तो बाएं को भी न पता चले, सेवा-मदद ऐसी होती है बेटा।' वह भी ईमानदारी से माँ की दी हुई इसी सीख पर चलना चाहता था |
लोग एनजीओ से नाम, शोहरत और पैसा सब कमा रहें थे और वह, वह तो अपना पुश्तैनी घर तक बेचकर किराये के मकान में रहने लगा था।
पत्नी परेशान थी उसकी मातृभक्ति से | कभी-कभी वह खीझ कर बोल ही देती थी कि 'यदि मैं शिक्षिका न बनती तो खाने के भी लाले पड़ जाते' चेतन झुंझला कर रह जाता था।
यादों से बाहर आ उसने पलटकर फेसबुक पे वही अल्बम खोल लिया। तस्वीरों को देखकर बुदबुदाया- "सोशल साइट्स न होती, तो क्या होता मेरा। यही तस्वीरें तो थी, जिन्हें देखकर दानदाता आगे आये थे और पत्रकार बंधुओ ने अपने समाचार पत्र में जगह दी थी। फिर तो छपता गया, फेसबुक पर शेयर होता रहा। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा ।"
"सच में चुपचाप मदद करने और दिखा कर मदद करने में बहुत फर्क होता है | काम से नहीं, शोर मचाने से शोहरत और पैसा मिलता है। समाज सेवा तो मैं माँ के मुताबिक तब भी कर रहा था, अब भी कर रहा हूँ। बस अब जरा रंग-ढंग बदल दिया है।" बुदबुदाता हुआ माँ की तस्वीर के सामने नजरें झुका के खड़ा हो गया। अफसोस के साथ ख़ुशी भी थी उसके चेहरे पर |
"कोई आया है। अरे! कहाँ खोये हो जी!" पत्नी की आवाज ने उसे आत्मग्लानि से उबारा।
"कहीं नहीं ! बुलाओ उन्हें।"
"जी चेतन बाबू, ये एक लाख रूपये हैं। बस मुझे दान की रसीद दे दीजिए, जिससे मैं टैक्स बचा सकूँ।
"हाँ-हाँ क्यों नहीं मोहन बाबू, अभी देता हूँ।" कुछ ही देर बाद दो लाख की रसीद उनके हाथ में थमा मुस्करा रहा था वह |
---000---
इसे ओबीओ में लिखा था |
http://www.openbooksonline.com/forum/topics/32-5...
---००---
३--बदलाव-

"चलो सुमीss! चलो भई..!"
"......."
"अरे कहाँ खो गयी, चलो घर नहीं चलना क्या?" चिल्लाते हुए बोला।
"मैं कौन?
"सुमी, तुम मेरी पत्नी, इन बच्चों की माँ और कौन?" भीड़ में खड़े होने का अहसास होते ही धीरे से बोला।
"नहीं मैं रावण हूँ" सुमी ने आँखे बड़ी करते हुए बोला|
"कैसा मजाक है सुमी | रावण का पुतला तुम्हारे ही सामने खड़ा है !"
"मजाक नहीं कर रही हूँ , मैं रावण हूँ | देखो रावण के दस नहीं, नौ सिर बने हुए है..|"
"वह गलती से बना दिया होगा, बनाने वाले ने | अब बकवास मत करो, चलो जल्दी घर।" झुंझलाते हुए वह बोला।
"नहीं ..., वह कमजोरी का दसवाँ सिर मैं थी |" दृणता से बोली वह।
"तुम रावण ! फिर मैं कौन हूँ ?" भीड़ को देखकर थोड़ा असहज हुआ। फिर मज़ाक उड़ाकर बात को आगे बढ़ाते हुए वह बोला |
"तुम राम हो, हमेशा से मैं तुम्हारें द्वारा और तुम्हारें ही कारण डरती आई हूँ | परन्तु अब नहीं, मैं अब जीना चाहती हूँ | अपने छोटी छोटी गलतियों की ऐसी भयानक सजा बार बार नहीं भुगतना चाहती हूँ !" आवेग में आकर सुमी बोलने लगी |
"मैंने तो तुमसे कभी तेज आव़ाज में बात भी नहीं की सुमी |" लोगों की भीड़ को अपनी तरफ आता देखकर बोला |
"तुमने बिना वजह सीता की परीक्षा ली | निर्दोष होते हुए भी वनवास का फरमान सुना दिया | फिर भी मर्यादा पुरुष रूप में तुम्हारी पूजा होती है और मैं, मैंने तो कुछ भी नहीं किया | मैं मर्यादित होकर भी युगों से अपमान सहती रही हूँ |" व्यथित हो रुंधे आवाज में बोलती जा रही थी।
"....पागल हो गयी है ! जाकर किसी मनोचिकित्सक को दिखाइए इन्हें !" पूरे पंडाल में कुछ ऐसे ही शब्द गूँजने लगे थे |
पुरुष के पक्ष में शोर सुनते ही राहुल का सीना चौड़ा हो गया।
उधर रावण का पुतला जलने लगा था, सब भयभीत हो पीछे हटने लगे थे । राम बने स्वरूप भी पीछे हटते हुए जरा सा लड़खड़ाये।
इधर सुमी का ललाट दीप्तिमान हो उठा था | क्योंकि कई स्त्रियाँ, भीड़ से निकलकर उसके समर्थन में आकार खड़ी हों गयी थीं । पुरुष आवाज दबने लगी थी। अपराधबोध से उबरा कमजोरी का दसवाँ सिर अब हर तरफ हुँकार भर रहा था।
कुछ ही देर में आगे-आगे चलने वाले पति अब अपनी-अपनी पत्नियों के हमकदम हों वहां से जाने लगे थे |
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https://www.facebook.com/events/720778064698355/permalink/723453121097516/
‎ लघुकथा प्रतियोगिता - बदलाव/परिवर्तन ......दिनांक २५/०५/२०१५ से दिनांक ०२/०६/२०१५ तक
25 May 2015
ब्लॉग के इस लिंक पर ..
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/01/blog-post_23.html
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४--सबक-

भोर सी मुस्कराती हुई भाभी साज सृंगार से पूर्ण अपने कमरे से निकली।
"अहा भाभी आज तो आप नयी नवेली दुल्हन सी लग रहीं है, कौन कहेगा शादी को आठ साल हो गए है।" ननद ने अपनी भाभी को छेड़ा।
"हाँ! आठ साल हो गए पर खानदान का वारिस अब तक न जन सकी।" सास ने मुँह बिचका दिया।
"माँ भी न, जब देखो भाभी को कोसती रहती हैं। सोचते हुए वह भाभी की और मुखातिब हुई। "भाभी मैं आपके कमरे में बैठ जाऊँ, मुझे 'अधिकारों की लड़ाई' पर लेख लिखना है।"
"सुन सुधा, सुन तो ! तू माँ के ....|" भाभी की बात अधूरी रह गयी थी और वह कमरे में जा पहुँची थी।
"भाभी यह क्या? आपका तकिया भीगा हुआ है। किसी बात पर लड़ाई हुई क्या भैया से !"
"वह रात थी सुधा, बीत गयी। सूरज के उजाले में तू क्यूँ पूरी काली रात देखना चाह रही है।"
"काली रात का तो पता नहीं भाभी परन्तु रात का स्याह अपनी छाप तकिये पर छोड़ गया है और इस स्याह में भोर सा उजास आप ही ला सकती हैं।" सुधा अनायास ही गंभीर हो गयी थी और इधर उसका लेख 'अधिकारों की लड़ाई' भाभी के दिमाग में सबक बन कौंध रहा था।
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"सबक" 16 October 2016 को इस ग्रुप में ...
https://www.facebook.com/groups/540785059367075/permalink/991128497666060/

https://kavitabhawana.blogspot.in/.../blog-post_17.html...
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५--*सभ्यता के दंश*

''मैं तहजीब़ के शहर लखनऊ से हूँ |" विवेक ने अपना परिचय देते हुए कहा |
"किस तहजीब की बात कर रहे है, जनाब?  तहजीब़ तो अब उस शहर में बेगैरत लोगों के घर में पानी भरती है |" उसकी बात के जवाब से शीला भड़क सी गई |

"रोज-रोज कोई न कोई खबर आपके इस तहजीब़ के शहर से आ ही जाती है | औरत तो मर कर भी नहीं मरती | बड़ी सख्त जान है यह औरत जात | अच्छा करते हैं वे माँ-बाप जो भ्रूण कन्या की हत्या कर देते हैं, वर्ना कमीने भूखे भेड़िये एक दिन ऐसा भी करेंगे कि पैदा होते ही बलात्कार करने की ताक में रहें |"
शीला का पति शैलेश चुप रहने को कह अपने दोस्त से बोला, ''यार, बुरा न मनना, ऐसी घटनाओं पर ये कुछ ज्यादा ही भावुक हो उठती है |"
"अरे नहीं नहीं", विवेक बोला, ''भाभी का गुस्सा जायज है| हम सच में न जाने किस मानसिकता के बशीभूत हो रहे हैं | पहले तो बस औरतों की बेकदरी करते थे पर अब तो आये दिन ऐसी घटनायें चुल्लू भर पानी में डूबने को विबश करती है |''
अपनी बात को जारी रखते हुए वह शीला की ओर मुखातिब हुआ, '' शर्मिंदा हैं भाभी, हम ! आपसे वादा है, कम से कम मैं अपनी जिन्दगी में कभी भी औरतों की बेइज्जती नहीं करूँगा और न ही अपने आस-पास किसी को करने दूँगा |''
"रोटी और लीजिये न भाईसाहब, संकोच मत कीजिए |" कुछ ही देर में सब खाने की मेज पर थे |
मुस्कराता हुआ विवेक सोच रहा था - यह वही भाभी है जो दो मिनट पहले चंडी-सी थी जो अब अन्नपूर्णा बन गयी है | 
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(सहोदरी में सभ्यता के दंश ऐसी छपी है, बाद में इसमें बदलाव करके ब्लॉग पर पोस्ट है)