Monday, 23 January 2017

अमानत-

 माँ को मरे पांच साल हो गए थे। उनकी पेटी खोली तो उसमें गहनों की भरमार थी। पापा एक-एक गहने को उठा उसके पीछे की कहानी बताते जाते|
जंजीर उठा पापा हँसते हुए बोले- "ये तुम्हारी माँ मेरे चोरी पड़ोसी के साथ जा बनवाई थी।"
"आपके चोरी, पर इतना रुपया कहाँ से आया? "
"तब इतना महंगा सोना कहाँ था!! बहुत सस्ता था। एक हजार रुपये तोला। मेरी जेब से रुपये निकाल इकट्ठा करती रहती तेरी माँ। उसे लगता मुझे पता नहीं चलता|  उसकी ख़ुशी के लिए मैं अनजान बना रहता। बहुत छुपाई ये जंजीर मुझसे ,पर कोई चीज छुपी रह सकती है भला !"
तभी श्रुति की नजर बड़े से झुमके पर गयी।
"पापा, मम्मी इतना बड़ा झुमका पहनती थीं क्या ?" आश्चर्य से झुमके को हथेलियो के बीच लेकर बोली|
"ये झुमका, ये तो सोने का नहीं लग रहा। तेरी माँ नकली चीज तो पसन्द ही न करती थी , फिर ये कैसे इस बॉक्स में ।"
"इसके पीलेपन की चमक तो सोने जैसी ही लग रही !!"
" कभी पहने तो उसे मैंने न देखा। और वो इतल-पीतल खरीदती न थी।"
तभी भाई ने -"पापा ले आइये सोनार को दिखा दूंगा" कह झुमका हाथ में ले लिया।
बड़े भाई की नजर गयी तो वह बोला -"हाँ ले आइए पापा कल जा रहे सुनार के यहाँ दिखा लायेंगे।"
दोनों भाईयों के हाथों में झुमके का जोड़ा अलग- अलग हो अपनी चमक खो चूका था। दोनों बेटों की नजर को भाँपने में पिता को देर न लगी।
बिटिया के हाथ में गहने देते हुए पिता ने झट से कहा- "बिटिया बन्द कर दे माँ की अमानत वरना बिखर जायेगी।"

भूख -


"तू फिर आ गयी!! कहती थी मुनेश का कोई नहीं है जो तुझे निकलेगा| बहुत प्यार से रखेगा तुझे ! क्या हुआ जो दो महीने ही इस डेहरी पर फिर से सर पटकने आ गयी ?"
"प्यारी बातों में फंस गयीं थी मौसी! सच कहती हूँ अब कभी भी तेरा दर न छोड़ के जाऊँगी|" मौसी के पैरों में पड़ी बिलखती आँखों में पुराना सारा वाक्या चलचित्र की भांति तैरता रहा |

वह थैली से पाउडर लिपस्टिक निकाल कर सृंगार कर रही थी कि मुनेश कोठे पर आ गया| थैली जबरजस्ती छिनकर उसने बाहर फेंक दी थी|
"ये क्या कर रहे हो?"
"तुमसे कितनी बार कहा ये रसिको के लिए सृंगार-पटार छोड़| चल मेरे साथ रानी बना के रखूँगा|"खूबसूरत चेहरे पर हाथ फिराते हुए बोला|
"कैसे विश्वास करूं, तुम मर्द सब एक जैसे होतें हों! यहाँ आराम से रह रहीं हूँ| मौसी मेरे हर एक शौक हों, तकलीफ हों सबका ध्यान रखतीं बिलकुल बेटी की तरह|
दो साल पहले ऐसा ही कुछ कहके ले गया था रौनक| जैसे ही परिवार वालों को बताया मेरे बारें में| घर से निकाल दिया कुलटा कहके ससुर ने| वह सिर झुकाये खड़ा रहा| वह तो मौसी भली औरत है मुझे फिर से अपने आंचल में छुपा लीं| वरना कहाँ जाती मैं! बाप ने तो गरीबी से तंग आकर बेच दिया था मुझे|" जख्म आँखों से रिस आए|
"मैं तेरे साथ ऐसा कुछ न करूंगा, विश्वास कर मेरा!"
"दो बार धोखा खा चुकी हूँ, तिबारा धोखा खाना मुर्खता है| मुनेश तू जा मैं न आऊँगी तेरे साथ|" अपनी सृंगार की पोटली उठाने बढ़ी जमुना|
"सच्ची कह रहा हूँ, बड़े प्यार से रखूँगा! कोई भी तकलीफ न दूंगा तुझे| मेरे तो माँ बाप भी नहीं हैं जो तुझे निकालेंगे घर से|" उसे पकड़ते हुए बाहें पसार कर बोला|
सुनकर जमुना उसकी खुली बाहों में सिमटकर रौनक से मिला दर्द भूल गयी|

जैसे ही मौसी ने अपने पैरों पर से उसे उठाया वह कराह उठी मुनेश द्वारा की पिटाई के दर्द से|

सिसकते हुए बोली-"मौसी तू बुरे काम में भी कितना ख्याल रखती है और वह जानवर रोज चार को ले आता था| रूपये कमाने की मशीन बना छोड़ा था मुझे| एक थैला रख रखा था उसने| रोज ही जब तक उसका थैला नोटों से न भर जाता वह मुझे कुत्तों के सामने डालता रहता था |
स्साला कुत्ता कहीं का| आss थू मर्दों पे| स्साले कहते रहते औरत औरत की दुश्मन हम औरतों के असली दुश्मन तो ये है साले |" मौसी की दहलीज पर गिडगिडाते हुए उसकी जबान ही न आंखे भी अंगार बरसा रही थीं|

उसके दुःख से व्यथित होकर मौसी ने बाहें पसारी तो मौसी की बाँहों में सिमटकर अपना सारा ही दर्द वह भूल गयी| सविता मिश्रा

बदलाव-




"चलो सुमीss! चलो भई!!"
"......."
"अरे कहाँ खो गयी, चलो घर नहीं चलना क्या?"
"मैं कौन?
"अरे सुमी, तुम मेरी पत्नी, इन बच्चों की माँ और कौन?"
"नहीं मैं रावण हूँ" सुमी ने आँखे बड़ी करते हुए बोला|
"कैसा मजाक है सुमी| रावण का पुतला तुम्हारे ही सामने खड़ा है !!"
"मजाक नहीं कर रही हूँ , मैं रावण हूँ| देखो रावण के दस नहीं, नौ सिर है..|"
"वह गलती से बना दिया होगा, बनाने वाले ने |"
"नहीं ..., वह दसवाँ सिर मैं हूँ|"

"तुम रावण ! फिर मैं कौन हूँ?"मज़ाक जान के बात को आगे बढ़ाते हुए बोला|
"तुम राम हो, हमेशा से मैं तुम्हारें द्वारा और तुम्हारें ही कारण मरती आई हूँ | परन्तु अब नहीं, मैं अब जीना चाहती हूँ| अपने छोटी छोटी गलतियों की ऐसी भयानक सजा बार बार नहीं भुगतना चाहती हूँ !!" आवेग में आकर सुमी बोलने लगी |

"मैंने तो तुमसे कभी तेज आव़ाज में बात भी नहीं की सुमी|" लोगों की भीड़ को देख सहमता हुआ बोला |
"तुम बिना वजह सीता की परीक्षा लिए| निर्दोष होते हुए भी वनवास का फरमान सुना दिए | फिर भी मर्यादा पुरुष रूप में तुम्हारी पूजा होती हैं| और मैं, मैंने तो कुछ भी न किया| मैं मर्यादित होकर भी इस तरह से कई युगों से अपमान सहती रहीं हूँ |"
"पागल हो गयी है! जाकर किसी मनोचिकित्सक को दिखाइए इन्हें !" पुरे पंडाल में कुछ ऐसे ही शब्दों का शोर उठने लगा|
अपने पक्ष में शोर सुनते ही राहुल का सीना चौड़ा हो गया।

रावण का पुतला जलने लगा था, सब भयभीत हो पीछे हटने लगे थे| उधर सुमी का ललाट दीप्तिमान हो उठा था| क्योंकि कई स्त्रियाँ भीड़ से निकलकर उसके समर्थन में खड़ी हों गयीं थीं| सब की आवाज दबने लगी। स्त्रियों के स्वर चीखने लगे! धीरे धीरे आगे-आगे चलने वाले पति अब अपनी-अपनी पत्नियों के हमकदम हों वहां से जाने लगें थे|sm

आहट -


"बाबा उठो खाना खा लो |"
"अरे बिटिया तू कब आयी ?"
"हल्की सी आहट भी होती थी तो आप उठकर बैठ जाते थे| आज मैं कितनी देर से खटपट कर रही आप सोते रहें| दरवाज़ा भी खुला रख छोड़ा था| दो महीने की मजूरी बचाकर ये पट्टों वाला तो दरवाज़ा लगवाया था|"
"अरे बिटिया याद है, पर अब यह दरवाज़ा बंद करके भी क्या फायदा| और खुला रहने से तनिक धूप आ जाती है| मेरे जीवन की धूप तो तेरे संग ही चली गयी| अब यह धूप ही सही |"
"फिर भी बाबा बंद रखना चाहिए न, कोई जानवर घुस आये तो ?"
"अँधेरे में दम घुटता था बिटिया, देख तू आ गई तो पूरा कमरा जगमगा उठा|"
"क्यों बाबा, अब आपको डर नहीं लगता है क्या?"
"डर, किस बात का डर बिटिया| जब से तू विदा होकर गई है, डर भी चला गया| गरीब के पास अब क्या बचा है डरने के लिए| अब तो यह खुला दरवाज़ा भी मेरे संग तेरी राह देखता रहता है|"
"बाबा, यह दरवाज़ा फिर से अब बंद रखने का वक्त आ गया|" आँसू से आँखे डबडबा आयीं|
"क्या कह रही है बिटिया!!"
"सही कह रही हूँ बाबा!! आपने मेरे लिए तो दरवाजा खुला रख छोड़ा पर आपने यह न देखा कि आपके जवाई के दिल का दरवाज़ा मेरे लिए खुला है या बंद?"  सवालियाँ आँखे बाबा के पथराये चेहरे पर जम गई थीं| सविता मिश्रा

Friday, 23 December 2016

मूल्य - (लघुकथा)


छुट्टी की बड़ी समस्या है दीदी, पापा अस्पताल में नर्सो के सहारे हैं! भाई से फोनवार्ता होते ही सुमी तुरन्त अटैची तैयार कर बनारस से दिल्ली चल दी|
अस्पताल पहुँचते ही देखा कि पापा बेहोशी के हालत में बड़बड़ा रहें थे| उसने झट से उनका हाथ अपने हाथों में लेकर, अहसास दिला दिया कि कोई है, उनका अपना |
हाथ का स्पर्श पाकर जैसे उनके मृतप्राय शरीर में जान सी आ गयी हो |
वार्तालाप घर-परिवार से शुरू हो न जाने कब जीवन बिताने के मुद्दे पर आकर अटक गयी |
एक अनुभवी स्वर प्रश्न बन उभरा, तो दूसरा अनुभवी स्वर उत्तर बन बोल उठा -"पापा पहला पड़ाव आपके अनुभवी हाथ को पकड़ के बीत गया | दूसरा पति के ताकतवर हाथों को पकड़ बीता और तीसरा बेटों के मजबूत हाथों में आकर बीत गया |"
"चौथा ..., वह कैसे बीतेगा, कुछ सोचा ?? वही तो बीतना कठिन होता बिटिया |"
"चौथा आपकी तरह !"
"मेरी तरह !! ऐसे बीमार, निसहाय !"
"नहीं पापा, आपकी तरह अपनी बिटिया के शक्तिशाली हाथों को पकड़, मैं भी चौथा पड़ाव पार कर लूँगी |"
"मेरा शक्तिशाली हाथ तो मेरे पास है, पर तेरा किधर है?" मुस्करा कर बोले |
तभी "नानाजी'" अंशु का ऊँचा स्वर कानों में घंटी सा बज, पूरे कमरे में गूँज उठा| समवत दो और स्वर गूँजे ! आवाज़ पहचानकर, भावातिरेक में सुमी उठी तो लड़खड़ा गयी | दोनों बेटे आगे बढ़कर दोनों हाथ पकड़, उसे सम्भाल लिए|
सुमी के पिता बुदबुदाये- "संस्कारित जमीन में खरपतवार कैसे पनपती !!" सविता मिश्रा

Friday, 18 November 2016

श्वास-लघु कथा


मुंगेरी अपने सामने धू धूकर जलती इमारत को देख फफक कर रो पड़ा| सारे मजदूर दुखी थे पर आंसू किसी ने न बहाए| लेकिन मुंगेरी ऐसे रो रहा था जैसे उसकी अपनी कमाई जलकर ख़ाक हो रही हो |
"तू इतना काहे रो रहा रे !" एक बुजुर्ग बोला|
"मेरी मेहनतss"
" मेहनत तो सबने की थी न, तेरी तरह तो कोई न रो रहा| और कौन सी अपनी मेहनत की कमाई लगी इसमें| हम तो राजगीर है, मजदूरी मिली तो दीवार से रिश्ता ख़त्म|"
"मेरा तो सपना जल रहा| अपना तन जलाकर कितने मन से बनाया था मैंने| जो देखता वह मुझे ही याद करता|" मुंगेरी आंसू पोंछते हुए बोला|
"अरी ! ताजमहल थोड़े ही बनाया था| कहकर एक मजदूर युवक ठहाका मार के हंसा|
"मेहनत से मैंने मंदिर बनाया था| जिसमें सुकून बसाया था| दीवारें भी बोलती हुई सी थीं इसकी | रहने वाला मकान या तल्ले में नहीं बल्कि घर में रहना महसूस करता|"
"ऐसा क्या किया था रे तूने !!
आह के श्वास से नहीं बल्कि मैंने मेहनत और उल्लास से भर खड़ी करीं थीं दीवारें | सविता

Sunday, 13 November 2016

कीमत-(लघुकथा)

 -
माँ कैसे लाऊँ तेरे लिए पैरासिटामॉल! पांच सौ , हजार की नोट बंद हो गयीं, वही पर्स में हैं |"
"सुनिए जी .."
"अब तू क्या आर्डर करेगी| देख नहीँ रही है परेशान हूँ| इस बुखार को भी आज ही होना था|"
चिल्लाते ही झेपता हुआ बुदबुदाया -- "बड़ी नोट रखने का शौकीन तो मैं ही था! छोटी नोट तो घर में रहने ही न दिए मैंने। चिल्लाता था कि भिखारियों की तरह क्या चिल्लर जमा करके रखा है। अब मैं तुम पर क्यों खीझ रहा हूँ!!"

"समाचार में तो सुना था कि हास्पिटल, केमिस्ट वाले लेंगे यह नोट|"
"पर ले तो नहीं रहें हैं न!! वह इसका फायदा उठाकर अपना ब्लैकमनी ठिकाने लगाएंगे या हमारा दर्द समझकर हमारी सहायता करेंगे। सबकी लंका जली है इस समय।"
"अच्छा सुनिये!!"
"अब क्या?? ढूढ़ने देगी दस बीस रुपये।"
"वहीँ दे रही हूँ! लीजिए।"
"कहाँ से मिला! मैं तो कब से खोज रहा हूँ। पर यह पॉलीथिन में क्यों रख के दे रही है ! ऐसा लग रहा दस रुपये नहीं बल्कि सैकड़ो पकड़ा रही है!!"
"इस जरूरत में तो यह सैकड़ो से भी ज्यादा है। पॉलीथिन में इस लिए दे रहीं हूँ क्योंकि फटा हुआ है। यदि जेब में और फट गया तो यह भी हज़ार की नोट की तरह दो कौड़ी का हो जायेगा।"
हाँ सही कह रही है , हजार की नोटो से भरे हुए इस बटुए पर आज यह फटा हुआ दस का नोट भी भारी है| सविता

'प्रतियोगिता के लिए' चित्र पर आधारित

Wednesday, 9 November 2016

खोटा खज़ाना-

"500/१००० की नोटें बंद हो गयीं माँ |" फोन पर बेटे से यह सुनते ही माँ का चेहरा पीला पड़ गया|
फोन कटते ही वह बदहवास सी अलमारी की सारी साड़ियाँ निकालकर पलंग पर फेंकने लगी| पुरानी रखी हर साड़ी की तह खोल-खोलकर रूपये ढूढ़ने लग पड़ी|
फिर अचानक कुछ याद आते ही रसोई में चावल-दाल के सारे ड्रम पलट डाली| ड्रम और डिब्बों से निकले नोट इक्कट्ठा करके रखे| फिर साड़ियों और अलमारी में बिछे अख़बार के नीचे से दबे नोट निकाले| पूरी रात रसोई और अलमारी से सारे नोट इक्कट्ठे होते ही उसे आश्चर्य हुआ इतना रुपया था उसके पास|
"दस दिन पहले तो पतिदेव से यह कह पैसे मांगे थे कि पैसे नहीं हैं| दो तारीख हो गयी आपने पैसे न दिए महीने खर्च के| अब क्या कहूँगी मैं उनसे?" बुदबुदाई दीप्ती|
"बिल्ली के जैसे दबे पाँव यह खेल खेला सरकार ने| इस भूचाल की आहट ही न होने दी| महीने दो महीने पहले थोड़ी भी सुगबुगाहट मिलती तो धनतेरस पर मैं जंजीर बनवा लेती|" कड़क नोट देख आंखे नम हो गयीं|
रूपये बार बार गिनती हुई अपना माथा पकड़ के पूरी रात बैठी रही दीप्ती| सविता मिश्रा

Sunday, 6 November 2016

संगत -


तनुज अपनी बड़ी बहन की शादी के पांच-छ साल बाद उनकी ससुराल आया था| पता चला छठ पूजा के लिए सब पोखर की तरफ गए हैं| वह अपनी बहन से मिलने वहीं आ गया| छोटे से गंदे पोखर में छठ मैया की पूजा करने वालों की भीड़ लगी थी|
तनुज हतप्रभ होकर अपनी बहन को पूजा करते एक टक निहारने लगा| दीदी को पूजा में ऐसे मग्न देखकर वह बरबस ही पुरानी यादों में घिरता जा रहा था|
सोचने लगा- यह वही दीदी हैं जो कभी भी गंदे पानी में किसी को भी नहाते देखती थीं तो दस नसीहतें देने लगती थीं, खुद नहाना तो बहुत दूर की बात थी|
बुआ जब घर आ जाती थीं तो चप्पल पहनकर रसोई में जाने को मनाही हो जाती थी| तो दीदी रसोई में कदम नहीं रखतीं थीं| मंदिर के साफ़ सुथरे फर्श पर भी बिना चप्पल के पैरों को अजीब सा मोड़कर चलती थीं| माँ की हर बात पर दसियों तर्कवितर्क करतीं थीं|
वही दीदी आज नंगे पैरों से इस कंक्रीट भरे रस्ते पर चलकर आई हैं| ऊपर से कीचड़युक्त तालाब में डुबकी लगाकर, इतनी देर से खड़ी भी हैं|
दीदी पूजा निपटाकर भाई को देखकर, खुश होते हुए जैसे ही पास आई|
तनुज अपनी चप्पल आगे करके बोला- "दीदी चप्पल पहन लीजिए, कंकड़ चुभेंगे पैरों में|"|
"नहीं बाबू, श्रद्धा और भक्ति की शक्ति हैं मेरे पास| चल लूँगी|"
तनुज आश्चर्य से बोला- "दीदी क्या है ये सब, आप और ये !!"
"पूरा नगर ही छठ का उपवास इसी तरह करता हैं| यह संगत का असर है बाबू|" सविता मिश्रा

(चित्र आधारित)

Tuesday, 1 November 2016

तरीका (लघुकथा)


=====

"क्या हुआ बड़े उदास दिख रहे हो| दूकान से भी इतनी जल्दी वापस आ गये?" कहते कहते रसोई में चली गयी |
पानी देते हुए बोली -"आजकल हो क्या गया है तुम्हें ? त्यौहार में तो खूब बिक्री हो रहीं होगी, फिर भी यह मायूसी क्यों चेहरे पर ?"
"कुछ नहीं संजू लुट गया मैं |"
"अरे! कैसे, बदमाश पीछे पड़ गए थे क्या?"
"नहीं संजू, ये साले समाजसुधारक रोजी-रोटी डुबाने पर तुले हुए हैं|"
"क्या कह रहे हो जी, ऐसा क्या कर दिया उन लोगों ने, जो आपकी दूकान बन्द होने की कगार पर आ गयी |"
"हर गली, हर मुहल्ले में चायनीज सामान के खिलाफ़ लोगों के दिमाग में चिंगारी लगा दी इन नासपिटों ने | वह चिंगारी ऐसी भड़की कि इस त्यौहार में रोटी के भी लाले पड़ने के आसार दिख रहें हैं|
"चायनीज!! चायनीज सामान के तो आप भी विरोधी थे| रखे ही क्यों ?"
"क्या बताऊ संजू , ज्यादा मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में कहीं का न रहा| सोचा था उस मुनाफ़े से दीपावली में एक फ़्लैट खरीदूंगा| परन्तु अब तो न घर का रहा न घाट का | वह साला राजेश, जो अपनी दूकान में रखे हुए तिरंगे का अपमान करता है, वह भी पीठ पीछे मुझे देशद्रोही कह रहा है|"
"अच्छा..! कल के अख़बार को पढ़ वही राजेश, सबके सामने आपको देशभक्त और दयालु व्यक्ति कहेगा! कहकर कुछ सोचते हुए वह एक नामचीन एनजीओ का नम्बर घुमा के बात करने लगी |सविता मिश्रा
(चिंगारी विषय पर लिखी गयी लघुकथा )

Tuesday, 25 October 2016

गिरह

पत्नी और माँ के बीच होते झगड़े से आज़िज आकर बेटा माँ को ही नसीहतें देने लगा| सुनी-सुनाई बात को आकर माँ से बोला - "बहू को बेटी बना लो मम्मा, तब खुश रहोगी|"
"बहू, बेटी बन सकती है?" पूछ अपनी दुल्हन से |"
"हां , क्यों नहीं ?" आश्वस्त हो बेटा बोला |
"बहू तो बन न पा रही, बेटी क्या खाक बन पायेगी वह |" गुस्से से माँ ने जबाब दिया|
"कहना क्या चाहतीं हैं आप माँ जी, मैं अच्छी बहू नहीं ?" सुनते ही तमतमाई बहू कमरे से निकल कर बोली |
"बहू तो अच्छी है, पर बेटी नहीं बन सकती|"
"माँजी, मैं बेटी भी अच्छी ही हूँ | आप ही सास से माँ नहीं बन पा रहीं हैं |"
"मेरे सास रूप से तुम्हारा यह हाल है, माँ बन गयी तो तू मेरा जीना ही हराम कर देगी।"
"कहना क्या चाह रहीं हैं आप?"

" अच्छा ! फिर तुम ही बताओ , मैंने तुम्हें कभी सुमी की तरह मारा, कभी डांटा या कभी कहीं जाने से रोका| यहाँ तक कि मैंने कभी खाना अकेले बनाने के लिए भी तुम्हें न कहा| न ही तुम्हें कुछ बनाने पर टोंका जैसे सुमी को टोंकती रहती हूँ|
फिर भी तुम मुझसे झगड़ती हो! मेरे सास रूप में तो तुम्हारा ये हाल है, माँ बन सुमी जैसा व्यवहार तुमसे किया तो तुम तो मुझे शशिकला ही साबित कर दोगी।

"बस करिए माँ! मैं समझ गयी | मैं एक अच्छी बहू ही बन के रहूँगी| मैंने ही सासू माँ नाम से ही अपने दिमाग में कँटीली झाड़ियाँ उगा रखी थी | सब सखियों के कडवे अनुभवों ने उन झाड़ियों में खाद-पानी का काम किया| आज से उन झाड़ियों को नेस्तनाबूद करके उपवन सजाऊँगी | अच्छा आप बताइए आज क्या बनाऊं मैं आपकी पसंद का ?"

"दाल भरी पूरी ..बहुत दिन हो गए खाये हुए ..जीभ मुहँ के बाहर निकल आई कहते कहते| फिर थोड़ी आँखे तिरक्षी करके बोली- बना लेगी..?"
"हाँ माँ जी, आप रसोई में खड़ी होके सिखायेंगी न !!" मुस्करा के चल दी रसोई की ओर|
माँ और पत्नी के मध्य वार्तालाप सुनकर बेटे को उम्मीद की किरण दिखाई पड़ने लगी | वह खुश होकर ऑफिस जाने के लिए निकल पड़ा| सविता मिश्रा

Saturday, 22 October 2016

~~ठंडा लहू ~~



हिंदी साहित्य डेढ़ सौ रूपये किलो का बैनर देख एक व्यक्ति दुकानदार से बोला "परशुराम जी की किताब मिलेगी क्या ?"
दुकानदार की आँखों में चमक आ गयी | हाँ साहब क्यों नही मिलेगी | उनकी किताब तो कई है मेरे पास| आपको कौन सी चाहिए ?"
'दूर के परिंदे' लघुकथा संग्रह ! और भी जो उनकी कथा संग्रह तीन-चार किलो भी हों जाए तो भी दे दो सब |"
"लगता है आप पढ़ने के शौकीन है लघुकथाओं तथा कहानियों के |"
"नहीं ऐसा कुछ नहीं है| मैंने सुना है वो शायद चल बसे | दसियों साल से किसी साहित्यिक कार्यक्रम या गोष्ठी में नहीं दिखे वह | आज की नई जनरेशन उनको भूल गयी हैं |"
"तो आप उनको पढ़-जानकर उन्हें खोजना चाहते है !" ख़ुशी चेहरे पर छुपाए न छुप रही थी | उनकी कथाओं का प्रचार कर उन्हें प्रसिद्धि दिलाना चाहते हो!" अनगिनत ख्बाब आँखों में जैसे पलने को आतुर हो उठे |
"तुम्हें क्या करना इससे? और हाँ ध्यान रहें ऐसे प्राकशक की तौलना जो हलके पेज वाली पुस्तक छापता हो | भले किसी और कथाकार की एक दो रखनी पड़े तराजू पर |"
थोड़ा मायूस हुआ दूकानदार कि सस्ते में भी और सस्ता माल चाहिए इन्हें | लगता हैं सच में मुझे कोई नहीं पढ़ना चाहता है|
"पर साहब आपको चाहिए क्यों ?" पैसा हाथ में लेता हुआ दूकानदार फिर चिहुँक कर पूछ बैठा | कान शायद सुनना चाहते थे कि कोई तो है जो परशुराम यानि मुझे पढ़ना चाहता है |
"बस उनकी कथाओं के कथ्य में हल्का फेरबदल कर अपनी लघुकथा संग्रह छपवाऊँगा| उनको इस जमाने के लोग जानते भी नहीं और न पढ़े ही है कभी उनकी कथाएँ |"
"तो आप कैसे जानते है उन्हें ?" रोष छुपाते हुए दूकानदार बोला |

"पिताजी कहते थे बहुत अच्छे लघुकथाकार थे वह | लिखना है तो उनकी कथाएँ गहराई से पढ़ो | आजकल तो तुम जानते ही हो सब ऐसे ही खेल चलता है| साहित्य बेचते-बेचते इतना अनुभव तो तुम्हें भी हो ही गया होगा | आखिर ये बाल धूप में तो सफेद नही ही हुए होंगे तुम्हारें|" व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ ग्राहक बोला |

"हाँ साहब,बस लहू न सफ़ेद हो रहा| और तो और यह उबलता भी न अब किसी बात पर |"



चित्र पर आधारित लघुकथा..नया लेखन ग्रुप में विजेता बनी

Tuesday, 18 October 2016

~रीढ़ की हड्डी ~


दिनभर बेहोश रही बीनू| होश में आते ही देखा कि बच्चे सब्जी-रोटी खा रहे है|
खाना खत्म कर बच्चें माँ के पास बैठ गये|
"पिंकी, खाना किसने बनाया ? पड़ोस वाली आंटी ने क्या?"
"नहीं, पापा ने बनाया ..|"
"पापा ने !!"
"हां, पापा ने! सुबह उन्होंने नाश्ता भी बनाया था ! फिर बर्तन धुले| झाड़ू-पोछा भी किया आपकी तरह| और दोपहर में दाल-चावल भी बनाये थे पापा |"
"तुम दोनों ने मदद न की पापा की|"

"नहीं, पापा ने कहा आज मैं करता हूँ| तुम दोनों हस्पताल में रहो मम्मी के साथ अपने| "
"कहाँ है तेरे पापा !"
"डाक्टर ने आपकी दवा लेने के लिए भेजा, वही लेने गये हैं|""बीनू उठो, लो
दवा खा लो| टिंकू एक गिलास पानी दे दे बेटा|"
"आप ! परन्तु आप कैसे आ गये? छुट्टी मिल गयी क्या?" पति के आते ही सवाल की बौझार लगा दी|

"हां, मिल गयी| पुरे पन्द्रह दिन, मैं साथ ही रहूँगा तुम्हारे|"
"इत्ते दिन !!!"
"हां..!"
"मुझे तो समझ ही न आ रहा था कि कैसे होगा| ये अचानक बीमारी भी| कोई भरोसेमंद आदमी गृहकार्य के लिए खोजना तो मुश्किल ही लग रहा | कोई ऐसा रिश्तेदार भी तो न जो महीने- पन्द्रह दिन आ जायें| "
"चिंता न करो बीनू, सब हो जायेगा| मैं हूँ न!"
"इतनी बार परेशानी आई | हास्पिटल के चक्कर अकेले लगाती रही थी| परन्तु इस बार कैसे आपके अफ़सर की मेहरबानी हो गई |
"पुलिस अधिकारी भी जानते है कि बच्चों पर कोई समस्या आएगी तो बीबी झेल लेगी, परन्तु बीबी ही बीमार हो जाएगी तो फिर कौन सम्भालेगा| इसलिए फटाफट सेंसन कर दी छुट्टी|"
"यानि रीढ़ की हड्डी हूँ मैं आपकी|"
"हां, वो तो हो ही बीनू | अकेले बिना किसी शिकायत के हर कुछ सम्भालती रही हो|"
"पर पन्द्रह दिन तो आप हो, हमारी रीढ़ की हड्डी|" कहते हुए मुस्करा दी बीनू |
"हां भई , अभी तक सरकारी नौकर था पन्द्रह दिन नौकर बीबी का हूँ| दोनों ही खिलखिला पड़े|


प्रदत्त विषयाधारित लघुकथा: (पति का एक दिन) नया लेखन ग्रुप में लिखी १८/२०१६ में |

Monday, 17 October 2016

~सबक ~


भोर सी मुस्कराती हुई भाभी साज सृंगार से पूर्ण अपने कमरे से निकली|
"अहा भाभी आज तो आप नयी नवेली दुल्हन सी लग रहीं हैं| कौन कहेगा शादी को आठ साल हो गए|" ननद ने अपनी भाभी को झेड़ा|
"हां, आठ साल हो गए पर खानदान का वारिस अब तक न जन सकी|" सास मुहँ बिचकाते हुए बोली|
 "क्या माँ आप भाभी को ही ऐसे क्यों कोसती रहतीं हैं!!"

अपने छ महीने की बेटी को पलने में झुलाती हुई भाभी ने मुस्कराहट का मुखौटा पहने रखा|
"अच्छा भाभी मैं आपके कमरे में जा रहीं हूँ पढ़ने| मुझे 'अधिकारों की लड़ाई' पर निबन्ध लिखना है| कल सम्मिट करना कॉलेज में| मेरे कमरे में रिद्धि कार्टून देख रही है|" कहते हुए कमरे की ओर चल दी|
"सुन सुधा, सुन तो! तू माँ के ....|" मुस्कराहट चेहरे से हवा हो गयी थी|

"भाभी यह क्या ..! आपका तकिया भीगा सा क्यों है! किसी बात पर लड़ाई हुई क्या भैया से? वैसे आपको देखकर तो लगता नहीं है कि आप दोनों लड़ें-झगड़े होंगे रात में!!"
"वह रात थी सुधा, बीत गयी| सूरज के उजाले में तू पूरी काली रात देखना चाह रही है|"
"काली रात का तो पता न भाभी परन्तु रात का स्याह, अपनी छाप तकिया पर छोड़ गया है| इस स्याह में भोर सा उजास आप ही ला सकतीं हैं|
भाभी के दिमाग में 'अधिकारों की लड़ाई' निबन्ध का शीर्षक जिन्दगी का सबक बन कौंध गया| सविता मिश्रा

(जिंदगीनामा:लघुकथाओं का सफर में रात विषय पर आधारित करके लिखा १६ अक्तूबर २०१६ में )

Wednesday, 5 October 2016

~स्त्रीत्व मरता कब है~


१२/७/२०१४में लिखी =============

नक्सली लड़कियाँ जंगलो में भटक भटक थकान से टूट चुकीं थीं| थोड़ा आराम करना चाहती थीं | तभी संगीत की मधुर आवाज सुन ठिठक गयीं| ना चाहते हुए भी वे मधुर आवाज की ओर खींचती हुई चलीं गयीं| गाने की मधुर आवाज की ओर बढ़ते-बढ़ते, वह गाँव के बीचोबीच आ पहुँचीं| एक सुरक्षित टीले पर चढ़ 'कुछ सुकोमल सुसज्जित लड़कियों को देख' ग्लानी से भर उठी|

"देश भक्ति के गीत पर थिरकती युवतियाँ कितनी सुन्दर लग रही है|"उसमें से एक बोली|
"हाँ बालो में गजरा, सुन्दर साड़ी, चेहरे पर एक अलग ही लालिमा छायी है इनके |" दूसरी ने हुंकारी भरके बोला |
पहली बोली -" हमें देखो, बिना शीशा कंघी के, कसकर बांधे हुए बाल, लड़को से लिबास, कंधे पर भारी भरकम राइफल, दमन कारी अस्त्र शस्त्र लादे, जंगल जंगल भटक रहीं हैं |"
सरगना बोली- "हम भी तो इन्ही की तरह थे सुकोमल अंगी, पर आज देखो कितने कठोर हो गय हैं| समय ने हममें बहुत परिवर्तन कर दिया है| एक भी त्रियोचरित्र गुण नहीं रह गया हममें|"
दूसरी ने भी हाँ में हाँ मिला कर कहा- "जिसे देखो हमें रौंदकर आगे बढ़ जाता है| सारे सपने चकनाचूर हो गये| कहने को कोई अपना नहीं इन हथियारों के सिवा|"
सबसे छोटी वाली ने कहा- " ये हथियार भी हमारी अस्मिता की रक्षा कहाँ कर पाए, हाँ खुनी जरुर बना दिए हमें|
सरगना मायूस होकर बोली- "हाँ, अब तो बदनाम ही है नक्सलाईट के नाम से| हम सब से ये गाँव वाले डरते है| यह क्या जाने असल में डरते तो हम सब हैं इनसे| तभी तो बन्दूक लेकर चलते| छुप-छुपकर रहते जंगलों में कि इनकी नजर न कहीं हम पर पड़ जाये और यह हमारी ख़बर पहुँचा दे| सरकार तो हम सब के खून की प्यासी है ही|"

सरगना की सहमती से सभी नक्सली लड़कियाँ एक दूजे की आँख में देख कर, एक कड़ा फैसला लेने का निश्चय कर लिया | कठिन निर्णय लेते ही, धीरे-धीरे ऐसे स्थान पर आ गयीं, जहाँ से पुलिसवालों की नजर उन पर पड़ सकें|

आज शायद १५ अगस्त था, अतः पूरी लाव लस्कर के साए के तले, गाँव वाले जश्न मना रहे थे| किसी पोलिस वाले की निगाह उन नक्सली लड़कियो पर पड़ गयीं जो मग्न थी जश्न देखने में| लेकिन यह भी चाहतीं थीं कि पुलिस वालें उन्हें देखे |

सभी गाँव वाले और पुलिसवालें मिलकर, नक्सली लड़कियों को धर दबोचे| यहीं तो चाहतीं थीं सब की सब | पुलिस अपने कामयाबी पर फूले नहीं समा रही थीं और नक्सली लड़कियां मंद मंद मुस्करा, त्रियोचरित्र के सपने बुन रहीं थीं| उन चंद क्षणों में हजारों सपने देख डाले होंगे उन्होंने|

सभी मुख्यधारा में शामिल होने का, मन ही मन जश्न मना रहीं थीं| सब एक दूजे की ओर देख ..जैसे कह रहीं थीं- "स्त्रीत्व मरता कब है, देखो आज इतने सालों बाद आखिर जाग ही गया| आज भटकाव के रास्ते से लौट आने की ख़ुशी भी उन सबके चेहरे पर साफ़ झलक रही थीं | ........सविता मिश्रा

Monday, 3 October 2016

पहला इम्प्रेशन (पहली कहानी)


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“मम्मी मम्मीईईई कहाँ हो आप ?”
“क्या है छवि?  मैं छत पर हूँ आ रही हूँ! क्या हुआ क्यों चीखे जा रही हो?”
"मम्मीsss" छवि बड़ी तेज बोली ।
“अरे बाबा क्या हुआ? आती हूँ सीढियों पर गिरकर पैर थोड़े ही तोड़वाने है!”
“हाँ बता, क्या हुआ? स्कूल में किसी से लड़कर आई है क्या?”
"नहीं मम्मी, टीचर ने कहा है पत्र लिखकर ले आना ट्यूशन पर देखुगी!!”
“अच्छा, अच्छा पहले खाना खा ले फिर लिखवाती हूँ तेरा पत्र ..| ट्यूशन तो चार बजे से है न अभी तो बस ढाई बजे है । हाथ मुहं धो कर कपड़ें बदल ले| तब तक खाना गरम कर देती हूँ।"
खाना जल्दी जल्दी ख़त्म कर छवि कापी पेन लेकर बैठ गयी|
“मम्मी जल्दी करिए।”
रूपा ने विषय देख बोला- “अरे इतना तो सरल विषय दिया है । पापा को ही तो पत्र लिखना है । वह भी तू खुद से नहीं लिख सकती।”
“अरे मम्मी अब लेक्चर मत पिलाइए, लिखवा दीजिये ना| आप लिखवायेंगी तो पहले दिन ही मेरा इम्प्रेशन अच्छा जमेगा।” बिटिया की बात सुन रूपा हंसी और लिखवाने लगी पत्र।
बिटिया के ट्यूशन जाते ही रूपा अपने पुराने दिनों में खो गयी ; जब वह अपने पापा को ख़त लिखती थी । वह भी क्या दिन थे ; पोस्टकार्ड अंतर्देशीय पत्र खूब चलते थे । आजकल के बच्चे तो जानते ही नहीं , ये किस बला के नाम है। बस विषय के एक भाग के रूप में पत्र लेखन करते है । असलियत में तो पत्र लिखना जैसे भाता ही नहीं है।

बस फेसबुक और ह्वाट्स एप्स पर खूब लिखवा लो स्टेट्स मेसेज वगैरह। हमारे जमाने में ये सब कहाँ थे? पत्र ही चलते थे। खूब लिखे पत्र रिश्तेदारों को ,पति महोदय को ! सोच मन ही मन मुस्करा उठी रूपा। पति को लिखे पत्र तो सहेज रखे भी है। इतने सालो तक ये आज की पीढ़ी क्या-कैसे संभालेगीं! कम्प्यूटर और मोबाईल मैमोरी में क्या? जमाना कितना बदल गया! सोचकर अनमनी हो अतीत और भविष्य में तालमेल बैठाने लग गयी।
पत्र के विषय में सोचते सोचते रूपा अचानक अलमारी में सहेजे पति के पत्र निकाल पढ़ते-पढ़ते खो सी गयी थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी ।जल्दी जल्दी पुराने पर्स में फिर से पत्रों को सहेज अलमारी में जल्दी छुपा कर रख दिया और दरवाजा खोलने चली गयी।
बिटिया दरवाजा खोलते ही चहक उठी- “मम्मी मम्मी” रूपा बोली- “अरे बता तो क्या हुआ।"
“मम्मी टीचर ने कहा तुम्हारी हिंदी तो बहुत अच्छी है ।बहुत सुन्दर लिखा हैं तुमने। सारे बच्चों ने खूब ताली बजायी मेरे पत्र को सुनकर और हाँ टीचर ने भी।”
“अच्छा तब तो तुम्हारा इम्प्रेशन खूब अच्छा पड़ा ना?” रूपा मुस्करा कर बोली।
“हाँ मम्मी पर ..”
“पर क्या?” रूपा थोड़ा आश्चर्य से बोली।
“..पर मम्मी मैंने टीचर को सच भी बता दिया बाद में कि पत्र आपने लिखवाया है । उन्होंने आपका मोबाइल नंबर माँगा मुझसे ! पता नहीं, वो मेरी शिकायत शायद आपसे करेगी । मम्मी आप संभाल लेना। मैं अब खेलने चली।

ठीक, जाऊ न?” खिलखिलाती हुई छवि बोली । रूपा आशंका से भर गयी पर मुस्करा कर कहा- “अच्छा ठीक है जाओ ,पर आधे घंटे में आ जाना, अच्छा! आधे घंटे मतलब आधे घंटे ही समझी।”
रूपा भी अपने काम में लग गयी तभी मोबाइल बज उठा उठाते ही आवाज आई- “आप छवि की मम्मी बोल रही हैं?”

रूपा समझ गयी कि ये छवि की टीचर ही होगी। वह सफाई देना ही चाहती थी कि उधर से आवाज आई- “आपकी बिटिया बहुत प्यारी और साफदिल है। उसकी यह साफगोई बनी रहे इसका आप ख्याल रखियेगा। आज तक बहुत बच्चो को मैंने पढाया है, पर ऐसे बच्चे आज के जमाने में कहा मिलते है। वह चाहती तो नहीं बताती , पर उसने बताया कि आपने उसकी मदद की है। पढ़ने में भी खूब अच्छी है, मेहनती है, खूब आगे बढ़ेगी।”

रूपा ने यह कहते हुए फोन रखा कि आप उसका ख्याल रखियेगा। उन्होंने भी भरोसा दिलाया- “आप चिंता ना करे मैं अपने बच्चो को खूब मेहनत से पढ़ाती हूँ। समय से छोड़ भी देती हूँ, जिस दिन भी देर हो , या आपको लगे कि मैं अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रही आप निसंकोच फोन कर सकती हैं।”

मोबाईल पर टीचर से बात करने के बाद रूपा गदगद और आश्वस्त हो चुकी थी कि एक अच्छी टीचर मिल गयी है बिटिया को । वर्ना आज कल के शिक्षकों को तो पैसों की भूख है ,बच्चें के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की भूख कहाँ दीखती किसी शिक्षक मेँ !! मन ही मन मुस्कराते हुए फिर अपने काम में लग गयी वह|

|जय विजय वेब पत्रिका में छप चुकी

~पुरानी खाई -पीई हड्डी~लघुकथा अनवरत में छपी हुई (२०१६)


अस्त्र-शस्त्रों से लैस पुलिस की भारी भीड़ के बीच एक बिना जान-जहान के बूढ़े बाबा और दो औरतों को कचहरी गेट के अन्दर घुसते देख सुरक्षाकर्मी सकते में आ गए |
"अरे! ये गाँधी टोपीधारी कौन हैं ?"
"कोई क्रिमिनल तो न लागे, होता तो हथकड़ी होती |"
"पर, फिर इतने हथियारबंद पुलिसकर्मी कैसे-क्यों साथ हैं इसके ?" गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी आपस में फुसफूसा रहे थे |
एक ने आगे बढ़ एक पुलिसकर्मी से पूछ ही लिया, "क्या किया है इसने? इतना मरियल सा कोई बड़ा अपराध तो कर न सके है |"
"अरे इसके शरीर नहीं अक्ल और हिम्मत पर जाओ !! बड़ा पहुँचा हुआ है| पूरे गाँव को बरगलाकर आत्महत्या को उकसा रहा था |" सिपाही बोला
"अच्छा! लेकिन क्यों ?" सुरक्षाकर्मी ने पूछा
"खेती बर्बाद होने का मुआवज़ा दस-दस हजार लेने की जिद में दस दिन से धरने पर बैठा था | आज मुआवज़ा न मिलने पर इसने और इसकी बेटी,बीबी ने तो मिट्टी का तेल उड़ेल लिया था | मौके पर पुलिस बल पहले से मौजूद था अतः उठा लाए |"
"बूढ़े में इसके लिए जान कैसे आई ?" सुरक्षाकर्मी उसके मरियल से शरीर पर नज़र दौड़ाते हुए बोला|
"अरे जब भूखों मरने की नौबत आती है न तो मुर्दे से में भी जान आ जाती है, ये तो फिर भी पुरानी खाई -पीई हड्डी है |" व्यंग्य से कहते हुए दोनों फ़ोर्स के साथ आगे बढ़ गया |

"गाँधी टोपी में इतना दम, तो गाँधी में ..." सुरक्षाकर्मी बुदबुदाकर रह गया |#सविता
नया लेखन ग्रुप में लिखी हुई
25 September 2015