Sunday, 17 December 2017

टूटती मर्यादा -

"लो! फिर शुरू हो गया झगड़ना ! फिर माँ को पीटना।" पापा के कमरे से आती माँ की रोने की आवाज को सुनकर बेटे ने झल्लाहट में बोला।
"यही देखते हम लोग बड़े हो गए। बहुत हो गया अब, जाकर कहती हूँ पापा से।"
"नहीं दीदी! पापा फिर तुम्हें भी मारेंगे।"
"तुझे गांधी जी के तीन बन्दर बने रहना है तो बैठा रह !" कहकर बिजली सी कमरे से बाहर हो गयी।
"तू जा बिटिया!" माँ ने बेटी को देखते ही रुंधे गले से कहा।
"आँख दिखा रही मुझे! बिटिया को यही शिक्षा दी हो!" कहकर पत्नी को एक तमाचा और जड़ दिया |
"बस..S करिये पापा..S..S !"
"तू मुझे रोकेगी !" कहते हुए पिता ने हाथ उठाया ही था कि बिटिया ने हाथ पकड़कर झटक दिया।
"माँ तुम्हीं तो शिक्षा दी हो न कि अन्याय के खिलाफ बोलना चाहिए !"
"अच्छा..S..! तो आग इसी ने लगाई है।" कहकर फिर से तैस में आगे बढ़े पिता।
"हम दोनों जवान हो गए हैं पापा । आप भूल रहें, आप बूढ़े और कमजोर हो गए हैं। माँ भी पलटकर एक लगा सकती है, लेकिन वह रूढ़ियो में जकड़ी हैं, पर हम नहीं...।" क्रोध और आवेश
से भरा स्वर कमरे में गूँज गया |
"चुपकर बेटा !" खुद की दी हुई शिक्षा अपने ही पति पर न लागू न हो जाये, बच्चों के पास आकर माँ, उन्हें बाहर जाने को कहने लगी |
बेटी के हरकत से पिता आहत हुआ ही था कि बेटे ने भी चुटीले शब्दों की आहुति डाल दी। सुनकर पिता का चेहरा तमतमा गया |
सामने बिस्तर पर पड़े हुए अखबार में "पत्नी के साथ घर में गर्लफ्रैंड रख सकते" हेडिंग देखकर बेटी ने हिम्मत बटोर पिता से कहा - "माँ को जिस कानून की धमकी दे रहे हैं आप, जाकर उन आंटी से कभी यही कहके देखियेगा। माँ के साथ आप जो करते हैं न, वही आपके साथ वह करेंगी।"

शर्मिंदगी के बोझ से पिता का सिर झुक गया |
"कानूनी आदेश का सहारा लेकर जो आप धौंस दे रहे हैं ! माँ कानून की राह चली होती तो आप न जाने कब के जेल में होते। घरेलू हिंसा भी अपराध है पापा, वकील होकर भी आपको यह नहीं पता ।" बेटा बिना पूर्णाहुति किए कैसे चुप रहता |
"चुप करो बच्चों, कानून का डर दिखाकर रिश्तों की डोर मजबूत नहीं हुआ करती है, हाँ टूट जरुर जाती है |" कहकर रोने लगी| मार खाने से भी ज्यादा तेज, बुक्का फाड़कर |
पत्नी, बच्चों के मुख से निकले एक, एक शब्द हवा में नहीं बल्कि पिता के गाल पर पड़ रहे थे | थप्पड़ पड़े बिना ही अचानक पिता को दोनो गाल पर जलन महसूस हुई, अपने गालो को सहलाता हुआ वह वही रखी कुर्सी पर धराशायी हो गया।

नया लेखन - नए दस्तखत ग्रुप में थप्पड़ चित्र पर १६/१२/२०१७ 

Friday, 15 December 2017

बेबसी -

"किसका इंतजार हो रहा ..नैहर या ससुरालियों का !" पत्नी को चहलकदमी करते देख पति ने आवाज लगा के चुटकी ली |

"कुछ साल पहले, यही सूना घर कितना गुलजार रहता था न। कभी बच्चों के दोस्त, कभी आपके महकमे दोस्त, कभी मेरी अपनी पहचान के लोग या फिर पड़ोसी, जुटे ही रहते थे |" पास बैठकर मायूसी से बोली |

"हाँ, और मोबाईल नम्बर तो मांग ही लेते थे |" कहकर मुस्करा पड़ा पति, कुछ याद आ गया था |
"मोबाईल तो न दिन देखता था न ही रात | जब मन होता था घनघना उठता था। नये-नये बने रिश्तेदारों के फोन तो हर दूसरे दिन आ ही जाते थें।" पत्नी ने समर्थन में आगे कहा |
"पर अपने बच्चे !"
"बच्चें भविष्य की राह पर गये तो पलटकर आना तो था नहीं | लेकिन उनके फोन ...!" लम्बी ठंडी साँस छोड़कर पत्नी बोली |
"मेरा फोन भी जल्दी ही काट देती थी तुम! कहकर कि बच्चों के फोन आने का समय हो रहा।" पति ने ठुड्ढी पकड़ते हुए कहा।
"हाँ, शुरू में उनका भी तो फोन सुबहों -शाम कानों में सुरीली बाँसुरी सा बजाता रहता था। लेकिन...!" बच्चों को यादकर आर्द्र कंठ से बोली |

"लेकिन, बाद में फोन आने कम हों गये, धीरे-धीरे फिर तो लगभग बन्द ही हो गए।" स्वर की निराशा दुःख बयाँ कर रही थी|

"हाँ, कभी कभार मिलाओ तो थोड़ी सी बात करके "विजी हूँ माँ " कहकर काट देतें थे। अब तो महीनों से यह मुआ मोबाईल गुनगुनाया ही नही।"

"पहले तुम अपना मोबाईल रोज ही फिर हफ्ते भर में उठा के देख लेती थी ! अब महीनों से छुआ ही नहीं तुमने उसे |" कोने में दुबके हुए मोबाईल पर अछूत सी दृष्टी डालकर पत्नी से कहा |

"हाँ, सब के नम्बर निहारती रहती थी | किसको मिलाऊँ..S..S .देखती थी ! कोई रिश्ता जेहन में आता न था जिसने मुझे याद करके फोन किया हों।"

पति ने ठंडी श्वास छोड़ते हुए कहा - "मेरे मोबाईल से अपने ही नम्बर को जब-तब डायल करके सुन लेती थी न ! मुझसे छिपी नहीं है यह बात |"

बात करते-करते हाथ में मोबाईल उठायी और एक-एक करके सारे नम्बर दोनों मोबाईल से डिलीट कर दी। अब मोबाईल में सिर्फ एक दुसरे का नम्बर चमक रहा था।

दोनों मियां-बीवी अपने ही नम्बर को जब-तब डायल करके घंटी सुन लेते थे और हँसकर एक दुसरे से कहते - "देखो! तुम्हें कोई, तुम्हारा अपना याद कर रहा है |"
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Thursday, 14 December 2017

"ज़िन्दा है मन्टो" लघुकथा संग्रह

दूसरा भाग ---

कुछ चीजें नहीं लिखे, चित्र के जरिये बता रहे...असल में सब कथाओं का नाम क्यों लिखे ऐसा सोचने पर यह तरीका बेस्ट लगा हमें ..:)

लिखना था अतः पूरी हिम्मत बटोरी फिर पढ़ा हमने यह संग्रह। केदारनाथ "शब्द मसीहा" भैया का पहला लघुकथा संग्रह है | पूरे ९८ तरह के फूलों का तीखा-मनमोहक-सुगन्धित गुलदस्ता | दो तीन कथाएं पढ़ते ही मन्टो साहब (अभी हाल ही में ६-७ कथाएँ पढ़कर ही जिन्हें हमने जाना) की लिखी कथाओं का जायका लें सकते हैं |
पान भले आप दिल्ली में खाये या आगरा में या फिर लखनऊ में, लेकिन बनारसी पान सुनते ही बनारस का स्वाद-रस तन-मन में समाने लगता है, वही हाल किताब के शुरूआती कथाओं पढ़कर और कवर पेज को देखकर महसूस होगा, गारंटी |
फिर भटक रहे ! नहीं ! नहीं ! हम भटक कतई नहीं रहे, सीधे विषय पर ही हैं | पहली कथा "माँ हूँ" आपकी शांत पड़ी भावनाओं में उथल-पुथल मचा देगी फिर आप अगली फिर अगली कथा पढ़ते ही जायेंगे | यह देखने के लिए कि कौन सी कथा में कितना जहरीला-तीक्ष्ण तीर आपकी सोयी पड़ी अंतरात्मा को कितना अधिक भेदता है, जगाता है |
शानदार लेखन शैली में समाज की विडंबनाओं, दीमक की तरह खोखला करते अन्धविश्वासों, और इंसानी जीवन को नर्क के द्वार तक ले जाते रूढ़ियां-मान्यताओं को उजागर किया गया है | बेहतरीन शिल्प ने कथाओं में चार चाँद लगा दिया है | अपने विचारों का कथा माध्यम से सम्प्रेषण इतनी सरलता से हुआ है कि बात पाठक तक आसानी से पहुँच जाती है |
''चुनाव आने वाले हैं'' नेताओं द्वारा दंगे कराने की कड़वी सच्चाई बयान करती है तो ''अदा'' के माध्यम से औरतों को मुफ्त में मिली उपलब्धियों पर तीर भी कसती है।
"बिना जड़ों के पेड़" अपने बच्चों के बिना चहक उठते हैं तो ''बच्चा'' में माँ का प्यार बेटे के प्रति दिखता है। अपने स्वार्थ के वशीभूत हो गिरता चरित्र में परिलक्षित होता है। ''नीच" में मानसिकता की नीचता दिखती है तो "ताजमहल" में बुजुर्गों और अपनी जड़ों से बेरुखी उजागर होती है।

"खून के आँसू" नाकामयाब रही संवेदना को जगाने में। हमें लगता है जो दर्द दिखाना चाहा वह सम्प्रेषित नहीं हुआ । अंत झटका देती है लेकिन बीच में बेटी को लाना सही नहीं लगा।
"एडिटर" हर तरफ नागफनियाँ हैं यदि साहित्यिक समाज की रत्ती भर भी यह सच्चाई है तो घिन आती है ऐसी कलम से और ऐसे कलम के मसीहों से। जिस कालखण्ड की लघुकथा में बात की जाती है उससे भी अछूती न रही यह।
अब पूरे पेड़ की बात करते हैं हम। अलग-अलग डालियों के चित्रण में लंबी कहानी लिख दी जाएगी मेरे द्वारा। और सबको पढ़ने में दिक्कत होगी। वैसे भी इतना बड़ा ही शायद कोई पढ़ना चाहे, शायद इस संग्रह के लेखक खुद भी ।
शायद पढ़ी जाय इस उम्मीद पर लिखे जा रहे। उम्मीद पर दुनिया कायम है। और अपनी उम्मीद जिन्दा रखने के लिए हम संक्षेप में सब कथाओ की बात करते हैं।
चुटीली भाषा शैली का उपयोग करते हुए आम जीवन से उठाये गये विषय हैं। बिल्कुल अपने ही आसपास से। जो एक आम इंसान देखकर छोड़ देता है लेकिन एक लेखक उस वाकयों को पकड़कर कलम के द्वारा शब्दों में बांध लेता है।


कुल मिलाकर हमारी नजर में तो लेखक भी एक शातिर चोर की तरह है, जो आपके नजरों के सामने ही किसी क्षण को चुराकर, उसमें शब्दों के औजारों द्वारा सेंध लगाता हुआ साहित्यिक सुरंग बना लेता है और जब पढ़ते समय आपको पता चलता है कि यह तो आपके साथ ही घटित हुआ था तो आप दाँतो तले ऊँगली दबाए बिन नहीं रह पाते हैं।

मसीहा भैया का कथा संग्रह पढ़ते हुए ऐसा ही लगा हमें, क्षण- क्षण की घटना की कथाएँ भरी हुई हैं उनके इस संग्रह में।
सबको पढ़कर लगा अपने ही पास बिखरें घटित घटनाओं के तीर तो हैं जो मसीहा भैया के धनुष पर चढ़ते ही सीधे हमारे दिल में जा लगें हैं।
संग्रह पढ़ते हुए फेसबुक पर भी कथा और टिप्पणी पढ़ते रहें। जिसे पढ़कर यह बात समझ आयी कि कथा-कहानी अच्छी खराब नहीं होती, हमारे मन को भायी तो अच्छी और नहीं भायी तो खराब | माने हमारे विचार, मन, पसन्द के दायरे से कथानक बाहर की निकली तो पसन्द नहीं आती। लेकिन कथा-कहानी के नियम - शिल्प- शैली जानते हैं तो कथा के उसमें फिट बैठने पर बिन मन के भी कहना पड़ता कि अच्छी है।

सविता मिश्रा 'अक्षजा'


लघुकथा संग्रह--"ज़िन्दा है मन्टो"
 
लेखक-- केदारनाथ "शब्द मसीहा"
प्रकाशक-- के. बी. एस. प्रकाशन, नयी दिल्ली
मूल्य---- 300 रु (जो की हमें ज्यादा लग रहा, पाठक की पहुँच में रहनी चाहिए) 
संपर्क-- मकान न. 46-ए, अनारकली गार्डन, जगत पुरी
नजदीक शिव साई हनुमान मंदिर
दिल्ली -- 110051
मोबाईल -- 9810989904
ईमेल -- kedarnath151967@gmail.com

Tuesday, 12 December 2017

किताब पढ़ते हुए--"ज़िन्दा है मन्टो" नामक संग्रह



"ज़िन्दा है मन्टो" नामक संग्रह को पढ़ते हुए सबसे कष्टप्रद बात हमारे लिए हुई, वह है पेज की बर्बादी। दो -तीन लाईन की कथाएँ और पूरा खाली पेज मुँह चिढ़ाता रहा। ऐसे प्रकाशकों से खास गुज़ारिश है हमारी कि मेहरबानी करके पन्ने को खाली नहीं छोड़िये।
धरती-आकाश दोनों ही अपना कोई कोना सादा रंगहीन नहीं छोड़ते। यह सादापन हद से ज्यादा खलता है। रेगिस्तान को भी ध्यान से देखे तो वलय द्वारा उसमें मनोरम दृश्य दिखेगा।
यदि यह विनती प्रकाशक स्वीकार कर लेंगे तो कृतज्ञ होंगे हम।
अब आते हैं मन्टो पर। गुढ़ लघुकथाओं को समझना हमारे लिए बड़ा ही कठिन काम होता है। मसीहा भैया ने जब हमें 'एक लम्हा जिंदगी' के विमोचन के स्टेज पर इस संग्रह को भेंट किया तो बहुत खुशी हुई थी। लेकिन घर आकर जब पन्ने पलटे तो एकबारगी हमारी नानी ही मर गयी।

इस संग्रह की कथाओं को पढ़कर समझ लेना हमारे लिए चींटी का पहाड़ चढ़ने जैसा था। बहुत छोटी, छोटी थीं अतः 20-30 पढ़ डाली, पढ़ना और समझना यानी जमीन और आसमान का अंतर था। यह अंतर पढ़कर तय करना बड़ा कठिन लगा । अतः न चाहते हुए भी मेज से उछलकर संग्रह अलमारी में बंद हो गया।
लेकिन किताब पढ़कर कुछ कहना और उस कहन को लेखक द्वारा सुनना, यही तो एक गांठ है जो किताब भेंट में देने और लेने की कड़ी को मजबूत करता है।

इस आपसी लेखन और समझन की सम्बन्ध से बनी गांठ फूल की भी होती है और कांटे की भी। किताब लेकर उसे इधर-उधर फेंक देना या रद्दी में दे देना, कांटो का बीज रोपित करता है। गलती से भी लेखक कहीं अपने मन में कांटों की रोपाई न कर लें, इस कारण दो शब्द तो कहना बनता है।

प्रसन्नता से दी गई भेंट हमें खुशी देती है। पढ़कर दो शब्द ही सही बोलना था लेकिन बात कल पर टालने की भयंकर बीमारी के चलते चाहकर भी नहीं लिख पाए थे ।
गर्म तवा पर रोटी सेंकने के ही हम अनुयायी। ठंडा होने पर लगता है भूखे ही सो जाएं | अब फिर तवा को गर्म क्यों किया जाय।
लेकिन उपहार देते समय हमें ऐसा याद आता रहा कि भैया ने कहा था इसको पढ़कर बताना।
तो लीजिए हमने महीनों बाद तवा गरम किया यानी फिर से पढ़ा "ज़िन्दा है मन्टो"। हाँ इस बीच मन्टो की चार- छः कथाएँ पढ़ चुके थे, उसपर आये कमेंटों से समझ चुके थे गूढ़ता। जिसमें से "खोल दो" को पढ़कर सीधे आज की तस्वीर अपने सामने चस्पा हो गयी। जो शायद कल की भी हकीकत रही होगी। मतलब कि यह कहा जा सकता है कि जमाना औरतों के लिए न कल बदला था न आज बदला है। महिलाएं कल भी घटियापना और शोषण की शिकार थी आज भी है।
खैर बात करनी है हमें "ज़िन्दा है मन्टो" लघुकथा संग्रह की और हम हैं कि यहाँ वहाँ भटक रहे हैं। असल में मसीहा भैया की कथाओं को पढ़कर अपनी छोटी सी बुद्धि चाहकर भी बड़ी नहीं हो पा रही। इसलिए मुद्दे की बात पर आने में कोताही कर रहे हैं।
अच्छा छोड़िये, सच में आते हैं हम, मुद्दे पर ही। अतः पूरी हिम्मत बटोरी फिर पढ़ी हमने यह संग्रह। और लिखेंगे भी ..क्रमश : ---सविता मिश्रा 'अक्षजा'

Saturday, 9 December 2017

मुठ्ठी भर अक्षर में छपी...अपनी छ: लघुकथाएँ ....:)

इन तीस बाक्सों में बंद एक शक्ल अपनी भी और 'मुट्ठी भर अक्षर' में चंद अक्षर के माध्यम से अपनी भी भावनायें व्यक्त हैं लघुकथा रूप में ...| हम तो हम बाकी २९ रचनाकार और भी हैं | आप सब पढ़ रहे हैं न ?
हमारी लिखी हुई लघुकथा न पसंद आये तो और सब अच्छे लेखक हैं | पैसा पानी में नहीं जायेगा 
...| गारंटी ..न न वो तो संभव नहीं 
30 संभावनाशील लघुकथाकारों की प्रतिनिधि लघुकथाओं के संग्रह 'मुट्ठीभरअक्षर'  का संपादन किया है विवेक कुमार और नीलिमा शर्मा निविया ने। 

 दिल्ली ..लघुकथा ..'मुठ्ठी भर अक्षर' के विमोचन के वक्त अपनी दो कथाओं का पाठ करते हुए हिंदी भवन के प्रांगण में ..24 April 2015
https://www.youtube.com/watch?v=mm7KcQ981i4...



सालो से मन था कि sheroes जाके मिलकर आये । 
वर्ण पिरामिड और मुट्ठी भर अक्षर' उन्हें भेंट भी करके आये।😊


मुट्ठी भर अक्षर में निहित अपनी छ: लघुकथाएँ ....

१) "हस्ताक्षर"


हर बात पर उबल पड़ती थी शिखा, पर आज वही ज्वालामुखी शांत हो चुका था | तबाही का मंजर आज भी उसकी आँखों के सामने रह-रह के तैर जाता था | दो बूँद आँसू उस शांत ज्वालामुखी के लिए भी काफ़ी कहाँ थे | जानती थी शिखा फिर भी आँसू थे कि झर-झर बहते ही रहते |
कभी माँ-बाप की कमी खलती, कभी भाई बहनों की याद में रो पड़ती | बाढ़ में खंडहर हो चुके घर को देखकर शिखा बार-बार बेहोश हो जाती| अचानक मोबाईल की घंटी सुनसान वातावरण को झंकृत कर गई |
मोबाईल उठाकर शिखा बोल भी न पाई थी कि दूसरी ओर से आवाज आई, "कल तक तलाक के पेपर पहुँच जायेंगे, हस्ताक्षर कर देना|"
 सब कुछ पता होने पर भी वह निढाल हो वहीँ ज़मीन पर गिर पड़ी | गर्व से सिर उठा चलने वाली शिखा के सिर पर हाथ फेंरने वाला आज कोई न था |
उसकी मौत की ख़बर पता चलते ही पति को फोन कर वकील ने कहा, ''अब इस तलाकनामे पर हस्ताक्षर की कोई जरूरत नहीं |''...सविता मिश्रा
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२) "हाथी के दांत"

लोगों से साल में सौ घंटे सफाई की मोदीजी की अपील से उत्कर्ष की जान सांसत में थी | वह पिछले दो दिन से बुझा-बुझा सा था| आज बहुत खुश देखकर उसकी पत्नी ने पूछा .. "क्यों जी! बड़े खुश हो क्या बात हैं?"
उत्कर्ष बोला -"ख़ुशी की ही बात है न कि नौकरी से निकाले जाने का कोई खतरा नहीं रहा | इतनी मुश्किल से नौकरी मिली है | डबल एम.ए. करने के बाद भी कितने साल नौकरी के लिए भटका हूँ, तुम्हें पता ही है | वह तो भला हो बाबू कृपा शंकर जी का कि उन्होंने ले-देकर यह नौकरी पक्की करवा दी | वर्ना भूखों मरते या फिर चोरी कर रहे होते और तेरे पिता, तेरा हाथ भी ना देते मेरे हाथ में...|"
कहकर ठहाका लगाकर हँस पड़ा उत्कर्ष और कहना ज़ारी रखा - "मुझे लगा मोदीजी के आह्वान से लोग सफाई खुद ही कर लेंगे ! सड़क पर गंदगी नहीं करेंगे! यह सोचकर मैं थोड़ा उदास था | पर आज सड़क पर कूड़ा बिखरा देख दिल खुश हो गया | और जानती है, मजे की बात यह है कि कल जो फोटो में थे झाड़ू लिए हुए थें, उन्ही की सोसायटी के सामने ज्यादा कूड़ा बिखरा था |
आज सच में बहुत खुश हूँ | जान बची लाखों पाए | बड़े-बड़े लोग सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए ही हैं ! सफाई तो हम जैसे जरूरत मंदों की ही मज़बूरी है |
आज उन्हीं सोसायटी वालों ने अच्छे से सफाई करने को कह पूरे हजार का नोट दिया | कह रहे थे कि कोई चैनल वालें कवरिंग करने, किसी बड़े नेता के साथ आ रहे हैं |.....सविता मिश्रा
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३) "जन्मदाता"


"आज तो आपने माँ दुर्गा और गणेशाजी की मूर्तियाँ बेचकर काफी पैसे इकट्ठे कर लिए |"
"हाँ इमली, कर तो लिया |"
"अरे, तो फिर ये उदासी क्यों? "
"देख रहा हूँ कि लोग मूर्ति खरीदते समय वह भाव नहीं रखते, जो पहले रखते थे|"
" तुम्हें कैसे पता चला कि ओग अब वैसा भाव नहीं रखते ?"
उसने आँख दिखाते हुए कहा, "तुम्हीं बताओ, तुम्हें कैसे पता चलता है कि किसने तुम्हारे बच्चों को किस नजर से देखा ? रोज ही शिकायत करती हो कि वह हमारे बबुआ को बड़ी जलन के भाव से देख रही थी या वह हमारी बिटिया को ललचाई हुई गिद्ध नजरों से घूर रहा था ?"
"ये भी कोई बात हुई ! मैं माँ हूँ उनकी | मैंने उन्हें जन्म दिया है |"
"तो फिर ये मूर्तियाँ भी तो मेरे लिए मेरे संतानों जैसी ही हैं!" वह आस भरी निगाहों से देखते हुए बोला |
इमली उसकी झील सी निगाहों में झाँकती ही रह गयी | .....सविता मिश्रा
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४)"आस"


 कृषकाय भीखू एक तोंदधारी सेठ के अनाज-गोदाम में काम कर रहा था |
गोदाम में बिखरे दानों पे सेठ को चलता देख भीखू को माँ की सीख याद आ गयी - 'अन्न का अपमान नहीं करना चाहिए |'
"...ये अमीर लोग क्या जाने इन दानों की कीमत? यह तो कोई मुझसे पूछे, जिसके घर में हांड़ी में अन्न नहीं, पानी पकता है |" अपनी बेबसी पर खीझ उठा भीखू |
दोस्त ने कहा था कि मोटा गैंडा काम खूब कराता है | मजदूरी की जगह वहाँ पर गिरे अनाज घर ले जाने को बोल देता है | रूपये के बदले अनाज में तो फायदा है, बस इसी आस में आज इस सेठ के गोदाम में आ गया था वह |
उसने नजर दौड़ाई आज गोदाम में कुछ ज्यादा ही अनाज फैला था । विद्रूप हँसी, हँसा ! फिर बोरे को सरकाते हुए जान-बूझकर उसने और अनाज गिरा दिया। गिरे हुए ढेर को देख भीखू खुश हो मन ही मन बोला- "आज माँ भूखी नहीं सोयेगी..|"
झाड़ू मार ही रहा था कि कानों में भीमकाय सेठ की कर्कश आवाज गूँजी - "अब्बे छोरे जल्दी-जल्दी हाथ चला, खाया नहीं है क्या?"
सुनते ही भीखू सकपका कर थम गया | उसके भयभीत चेहरे पर टिकी सूनी आँखें पनीली हो उठी |
"अरे क्या हुआ...काम नहीं होता तो फिर आया क्यों ?"
"सेठ जी ! सुबह से कुछ नहीं खाया हूँ | माँ कल रात में चावल का माड़ पिला के सुला दी थी ..|" भीखू मिमियाया |
"ओह ! तो ये बात है | ले, तू ही खा ले | आज सेठाइन ने ज्यादा ही खाना भेजा है..! तू भी भरपेट खा ले | और हाँ, खाकर अच्छे से साफ़-सफाई करना ! भले कितनी भी देर हो जाये |" भीखू की व्यथा सुन उसका ह्रदय नारियल सा हो गया था | अतः आधी टिफ़िन भीखू को दे डाली |
बढ़िया स्वादिष्ट खाना देखते ही भीखू की वर्षो से अतृप्त इन्द्रियाँ तृप्त हों गयी |
"और हाँ, फर्श पर बिखरे अनाज को बीनकर घर लेते जाना, मजदूरी |" गेहूँ की ढ़ेरी देख सेठ मुस्कराया, फिर पलटकर भीखू से बोला।
ख़ुशी-ख़ुशी चहकती आवाज में भीखू बोला- "जी, सेठ जी !" अब उसके हाथ बड़ी फुर्ती से चलने लगे |
, दो चार दिन भरपेट खाना मिलने की आस, और आत्मीयता का भाव जो जग गया |
........#सविता मिश्रा '#अक्षजा'
------------००----(अगस्त २०१७ में उद्गार ग्रुप में उत्कृष्ट रचना सम्मान मिला)------०००---

५)  "बदलते भाव"
"मर गया नालायक! देख, कितना खून पीया था। उड़ भी नहीं पाया ! जबकि खतरा महसूस कर लिया होगा जरूर ही इसने |"
"अरे मम्मी, अपना ही खून देखकर आप दुखी नहीं हैं ?"
"नहीं, क्योंकि मेरा खून आज इसका हो गया था।"
"आप भी न ! उस दिन उँगली कटने से आपका एक बूँद खून बह गया था तो आपके आँसू ही नहीं रुक रहे थे। और आज एक बूँद अपना खून देखकर आप खुश है | आपकी लीला, आप ही जानें।"
''जब कुछ मेरा है, तो बस मेरा ही होता है | तब उसके नष्ट हो जाने पर कष्ट होता है। पर मेरा होकर भी जो मेरा न रहे, तब उसके नष्ट हो जाने पर मन को संतुष्टि होती है। समझा? मेरे ही खून पर पलकर मुझे ही आँख दिखा रहा था यह |''
"बस मम्मी, आप और आपके ये लॉजिक !
अब यह मत कहने लगियेगा कि यह खून पीने वाला मोटा मच्छर कोई ठग व्यापारी या नेता है या फिर कोई भ्रष्ट अफसर ! और इससे निकला खून आपकी कड़ी मेहनत और खून पसीने की कमाई! जिसे पचा पाना सबके बस की बात नहीं!"
"मेरा पुत्तर, कितना समझने लगा है मुझे..! छीन-झपटकर कोई कब तक जिंदा रह सकता है भला। पाप का घड़ा एक न एक दिन तो फूटता ही है।"
"मम्मी! लेक्चर देने के ही फ़िराक में रहती हैं आप। दें डाली न, अब मैं पढ़ लूँ! और हाँ क्वायल जला दीजिए, ऑलआउट से नहीं भाग रहें मच्छर!"
"जला रहीं हूँ, कुछ मच्छर बड़े ढीठ होते हैं..!" #सविता
---००----
६) "बड़ी भूख"

डॉक्टर घर पहुँचते ही, "आज तो थक गया !"
पत्नी के हाथो से पानी का गिलास लेते हुए बोला, "जानती हो वसुधा, लोग कितने निर्दयी होते हैं ! आज एक औरत पाँचवाँ .....| उसका पति पुराने ख्यालात का है, उसे लड़का चाहिए और बार-बार गर्भ में लड़की ही आ रही है |"
"ओह..! तो आज फिर अबार्शन ..!"
"चलो छोड़ो! हमें क्या करना, हमें तो हमारी ख़ुशी मिली, उन्हें उनकी |" लंबी साँस भरते हुए डॉक्टर बोला |
उठकर ब्रीफकेस से अपनी ख़ुशी को निकालकर तिजोरी में बंद कर दिया | भोजनोपरांत डॉक्टर चैन की नींद सो गया |
बिस्तर पर लेटते ही रोज की तरह पत्नी सोचती हुई बुदबुदाई- कहीं यही कारण तो नहीं, जो आज तक हमारी गोद सूनी की सूनी है ! पर इन्हें कौन समझाए, कि रूपये की इनकी ये भूख, सुख की भूख नहीं मिटा सकती कभी | #सविता मिश्रा
---००---

छटवीं थोड़ी शीर्षक सहित बदली है |

Sunday, 3 December 2017

"चिलक"

"यह कैसा संकल्प ले रहे हो रघुवीर बेटा ! गंगाजल अंजुली में भर इस तरह संकल्प लेने का मतलब भी पता है तुम्हें!!"
" पिताजी, आप अन्दर ही अंदर घुलते जा रहे हैं | कितनी व्याधियों ने आपको घेर लिया है | नाती-पोतों की किलकारियों से भरा घर, फिर भी आपके चेहरे पर मैंने आज तक मुस्कराहट नहीं देखी | "
"बेटा, मैं भूलना चाहता हूँ ! पर समाज मेरे नासूर को कुरेदता रहता है | अपने नन्हें-मुन्हें बच्चों को यूँ ही बिलखता छोड़ कोई माँ कैसे जा सकती हैं! यह कैसे-क्यों का प्रश्न मुझे अपने जख्म भरने ही नहीं देता | फिर भी बेटा मैंने संतोष कर लिया है | पच्चीस सालों में परिजनों के कटाक्ष को भी दिल में दफ़न करना सीख गया हूँ | हो सकता है उसके लिए उस व्यक्ति का प्यार मेरे प्यार से ज्यादा हों, इस लिए वो मेरा साथ छोड़कर, उसके साथ चली गयी हो |"
"समाज के कटाक्ष की इसी ज्वाला में जल के तो मैं आज संकल्प ले रहा हूँ | मैं उनका मस्तक आपके चरणों में ले आके रख दूँगा पिता जी, 'परशुराम' की तरह |"
"बेटा! गिरा दो अंजुली का जल | तुम परशुराम भले बन जाओ, पर मैं जन्मदग्नी नहीं बन सकता |"

सविता मिश्रा 'अक्षजा'

on November 30, 2015 at 5:55pm 
ओबीओ में 

Wednesday, 29 November 2017

मन का बोझ-


अस्पताल के कॉरिडोर में स्ट्रेचर पर विवेक कराह रहा था | डॉक्टर से उसके जल्द इलाज करने की मिन्नतें करता हुआ एक अजनबी, बहुत देर तक डॉक्टरों और नर्सों के बीच फुटबॉल बना रहा। बड़ी मुश्किल से कागजी कार्यवाही करने के बाद, विवेक को आपरेशन थियेटर के अंदर ले जाया गया | अजनबी अपना दो बोतल खून भी दे चुका था। एक-दो घंटे में ऑपरेशन खत्म हुआ तो विवेक को वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया | अजनबी लगातार विवेक की खिदमत में लगा हुआ था | 
तभी विवेक के बदहवास माता-पिता वार्ड में दाखिल हुए | विवेक को देखते ही माँ तो बेहोश हो गयी | अजनबी पानी लेने बाहर चला गया |
विवेक के माथे पर हाथ फेरते हुए काँपती आवाज में पिता ने पूछा - "कैसे हुआ? मुझे लगा तू दोस्त के यहाँ, देर रात हो जाने से रुक गया होगा।" 
"पापा, मैं तो रात...ग्यारह बजे ही ..आहs..मुकेश के घर से चल दिया था..उह.. अह ह..लेकिन रास्ते में...!"
पत्नी की तरफ देखने के बाद पिता ने विवेक से फिर कहा - "चहलकदमी करती हुई तेरी माँ चिल्ला रही थी कि 'जन्मदिन, इतनी देर तक कोई मनाता है क्या भला' ! शाम को तेरा फोन भी बंद आ रहा था !!"
"आराम करने दो ! बाद में पूछताछ कर लेना, मेरे बच्चे को कितनी तकलीफ ..!" कहते हुए फिर बेहोश सी हो गयी |
"एक सहृदय भले आदमी की नजर...उहs मुझपर सुबह पड़ी, तो वह मुझे आह..अस्पताल ले आये।... पापा ! रातभर लोगों से भीख मांगकर ऊहंss निराश हो गया था मैं तो..और मोबाईल की बैटरी भी ...।" किसी तरह विवेक ने टूटे-फूटे शब्दों में पिता से अपनी व्यथा बयान की |
'सहृदय' शब्द अंदर आते हुए अजनबी के कानों में गया, तो वह बिलबिला पड़ा। जैसे उसके सूखे हुए घाव को किसी ने चाकू से कुरेद दिया हो।
अजनबी खुद से ही बुदबुदाया - "चार साल पहले, मेरी सहृदयता कहाँ खोई थी। सड़क किनारे खड़ी भीड़ की आती आवाजें- चीखें अनसुनी करके निकल गया था ड्यूटी पर अपने। दो घण्टे बाद ही फोन पर तूफान की खबर मिली थी।" 
सहसा अपने सिर को झटक के वर्तमान में लौटकर अजनबी बोला- "बेटा, मैं सहृदय व्यक्ति नहीं हूँ, बनने का ढोंग कर रहा हूँ। यदि मैं सहृदय व्यक्ति होता तो मेरा बेटा जिंदा होता।" चुप होते ही आँसू अपने आप ढुलक गए, जिसे अजनबी ने रोकने की कोई कोशिश नहीं की।
ओबीओ में पोस्ट
२८/११/२०१७ को लिखी

Monday, 27 November 2017

"संवर्धन"

डोरबेल बजी जा रही थी। रामसिंह भुनभुनाये "इस बुढ़ापे में यह डोरबेल भी बड़ी तकलीफ़ देती है।" दरवाज़ा खोलते ही डाकिया पोस्टकार्ड और एक लिफ़ाफा पकड़ा गया।
लिफ़ाफे पर बड़े अक्षरों में लिखा था 'वृद्धाश्रम'।
रुंधे गले से आवाज़ दी-"सुनती हो बब्बू की अम्मा, देख तेरे लाडले ने क्या हसीन तोहफ़ा भेजा है!"
रसोई से आँचल से हाथ पोछती हुई दौड़ी आई - "ऐसा क्या भेजा मेरे बच्चे ने जो तुम्हारी आवाज भर्रा रही है। दादी बनने की ख़बर है क्या?"
"नहीं, अनाथ!"
"क्या बकबक करते हो, ले आओ मुझे दो। तुम कभी उससे खुश रहे क्या!"
"वृद्धss शब्द पढ़ते ही कटी हुई डाल की तरह पास पड़ी मूविंग चेयर पर गिर पड़ी।
"कैसे तकलीफों को सहकर पाला-पोसा, महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ाया। खुद का जीवन अभावों में रहते हुए इस एक कमरे में बिता दिया।" कहकर रोने लगी
दोनों के बीते जीवन के घाव उभर आये और बेटे ने इतना बड़ा लिफ़ाफा भेजकर उन रिसते घावों पर अपने हाथों से जैसे नमक रगड़ दिया हो।
दरवाज़े की घण्टी फिर बजी। खोलकर देखा तो पड़ोसी थे।
"क्या हुआ भाभी जी ? आप फ़ोन नहीं उठा रहीं है। आपके बेटे का फोन था। कह रहा था अंकल जाकर देखिये जरा।"
"उसे चिन्ता करने की जरूरत है!" चेहरे की झुर्रियां गहरी हों गयी।
"अरे इतना घबराया था वह, और आप इस तरह। आँखे भी सूजी हुई हैं। क्या हुआ?"
"क्या बोलू श्याम, देखो बेटे ने.." मेज पर पड़ा लिफ़ाफा और पत्र की ओर इशारा कर दिया।
श्याम पोस्टकार्ड बोलकर पढ़ने लगा। लिफ़ाफे में पता और टिकट दोनों भेज रहा हूँ। जल्दी आ जाइये। हमने उस घर का सौदा कर दिया है।"
सुनकर झर-झर आँसू बहें जा रहें थे। पढ़ते हुए श्याम की भी आँखे नम हो गई। बुदबुदाये "इतना नालायक तो नहीं था बब्बू!"
रामसिंह के कन्धे पर हाथ रख दिलासा देते हुए बोले- "तेरे दोस्त का घर भी तेरा ही है। हम दोनों अकेले बोर हो जाते हैं। साथ मिल जाएगा हम दोनों को भी।"
कहते कहते लिफ़ाफा उठाकर खोल लिया। खोलते ही देखा - रिहाइशी एरिया में खूबसूरत विला का चित्र था, कई तस्वीरों में एक फोटो को देख रुक गए । दरवाजे पर नेमप्लेट थी सिंहसरोजा विला। हा हा जोर से हँस पड़े।
"श्याम तू मेरी बेबसी पर हँस रहा है!"
"हँसते हुए श्याम बोले- "नहीं यारा, तेरे बेटे के मज़ाक पर । शुरू से शरारती था वह।"
"मज़ाक..!"
"देख जवानी में भी उसकी शरारत नहीं गयी। कमबख्त ने तुम्हारे बाल्टी भर आँसुओं को फ़ालतु में ही बहवा दिया।" कहते हुए दरवाजे वाला चित्र रामसिंह के हाथ मे दे दिया।
चित्र देखा तो आँखे डबडबा आईं।
नीचे नोट में लिखा था- "बाबा, आप अपने वृद्धाश्रम में अपने बेटे-बहू को भी आश्रय देंगे न।"
पढ़कर रामसिंह और उनकी पत्नी सरोजा के आँखों से झर-झर आँसू एक बार फिर बह निकलें । सविता मिश्रा 'अक्षजा'

Saturday, 25 November 2017

26वाँ अंतर्राज्यीय मिन्नी लघुकथा सम्मेलन- इधर-उधर की बात- मिर्च-मसालें के साथ ..:)



 

26वाँ अंतर्राज्यीय मिन्नी लघुकथा सम्मेलन पंचकूला में होना निर्धारित हुआ। "लघुकथा साहित्य से संबंधित जो रचनाकार इस सम्मेलन में भाग लेना चाहते हैं, उनसे निवेदन है कि वे दिनांक 11.06.2017 तक अपनी सहमति प्रदान करने की कृपा करें। सम्मेलन के लिये पंजीकरण शुल्क बाद में तय होगा मगर यह किसी भी सूरत में 300/-(तीन सौ रुपये) प्रति लेखक से अधिक नहीं होगा।" यह घोषणा देखकर हमने सहमती दर्ज करवा दी थी |
हरियाणा और पंजाब के सहयोग से कई प्रदेशों के लघुकथाकार दूर-दूर से पधारने थें। अपना नाम हमने भी दे दिया लेकिन बाद में पता चला राम रहीम कांड हो गया है। बेटे ने मनाही कर दी | बात-बात में कहता पापा से कहता हूँ कि मम्मी वहां जाना चाह रही जहाँ दंगा हुआ है | 'चुपकर' डांट के चुप करा देते उसे | वरना बच्चें चिंगारी लगा देते तो आग फ़ैल ही जाती और हमारे वहां जाने की इच्छा उसमें स्वाहा हो जाती | पिछली बार अमृतसर जाने की पतिदेव ने मनाही कर दी थी कि अकेले नहीं जाना, रास्ता तक तो तुम भूल जाती हो | और सबसे बड़ी बात वहां आतंकवादियों का खतरा बना रहता है।
पिछली बार सब जाकर सही सलामत लौट आए एक हमी मारने के लिए मिलेंगे सबको, कहकर किसी तरह इस बार राजी किया गया। फिर भी अकेले जाने की हिम्मत हो नहीं पा रही थी | रास्ता भूल गये तो, वहां स्टेशन पहुँचकर भी आयोजन स्थल पर नहीं पहुँच पाए तो | लेकिन बिना किसी ठोस कारण के हम अपनी बात से पीछे भी नहीं हटना चाहते थे | इसी लिए हमने नीता सखी से 17 AUGUST को बात की मेसेज में | उनसे पूछा कि पंचकूला जाने का टिकट करा लिया आपने? उन्होंने बस से जाने की कहके भरोसा दिलाया कि कोई समस्या नहीं होगी ! स्टेशन से ही पिक करवा लेंगे | आप बस उन्हें फोन करके अपनी ट्रेन का नाम बता देना |
खैर श्यामसुन्दर अंकल से फोनिक वार्ता हुई तो उन्होंने आश्वस्त किया कि हमारी पूरी कोशिश होगी कि स्टेशन से ले लिया जाय | नवम्बर में दिल्ली पुस्तक मेले में लघुकथा आयोजन में नीता सखी से फिर बात करना चाहे कि कैसे जाया जाय तो वह ज्यादा समय नहीं दें पायी और उपमा को खोजते हुए यह कहकर निकली कि कोई असुविधा नहीं होगी उनकी व्यवस्था बहुत अच्छी होती हैं|
लेकिन मन था कि डर रहा था | पहली बार अकेले वह भी दुसरे शहर नहीं बल्कि राज्य में जाना | खैर मन को तैयार कर रहे थे की निकलेंगे तभी तो जानेगें और हिम्मत बंधेगी अकेले चलने की और मन से यह डर निकालने की रास्ता भूलेंगे | अब ओखली में सर दिया था तो डरना कैसा गुनते रहे हम | खैर बात आई गयी हो गई |
नीता सखी का एक दिन (9 SEPTEMBER) मेसेज आया | पहले भी मेसेज में इस बाबत बात हुई थी लेकिन निर्णय नहीं हुआ था कुछ भी | उनका प्लान कुछ और ही था शायद | फिर बात हुई और हमारा, नीता सखी और शोभा दीदी का रेल टिकट हो गया | उपमा का डामाडोल था अतः टिकट साथ में नहीं हुई | पहले शायद उपमा और नीता सखी कार से जा रहे थें |
कुछ दिन बीता तो फिर कहाँ घूमना यह तय करना था, वार्ता पे वार्ता होती रही, रिजेक्ट फिर सेलेक्ट | कई बार मेसेज में आपस में सघन गुप्त वार्ता सम्मेलन होने के बाद तय हुआ कि कसौली-चंडीगढ़ घूमेंगे | लौटने की टिकट पर बात होने पर पता चला नीता सखी चंडीगढ़ रहेंगी, एक दिन बाद आयेंगी और पंचकूला से घूमने निकलने के बाद घूमकर शाम को वह अपने भतीजी के पास रहेंगी | अब समस्या आन पड़ी दो औरतों का अकेले अनजान शहर में रहने का | होटल में रहना हमें न जाने क्यों सही नहीं लग रहा था | दुसरे सबसे बड़ी कमी थी न हमें कुछ पता था न शोभा दीदी को | रहने की बात पर भी सहमती नहीं बन पा रही थी | यहाँ तक की प्रभाकर भैया से भी बात हुई तो उन्होंने भी होटल में नहीं रहने की सलाह दी, कहें मेरे घर आ जाओ बाद में कैंसिल होकर शोभा दीदी के मामा के लड़के के घर रहना तय हो गया येन-केन- प्रकारेण | मन स्थायी हुआ और तैयारी होने लगी पहला भव्य सम्मेलन अटेंड करने की |
सत्ताईस की रात सब तय होने के बाद में अपनी लकुटी-कमरियाँ रखे और २८ की सुबह बस द्वारा आगरा से दिल्ली के लिए चल दिए |
जाने की टिकट पक्की ही थी नीता सखी द्वारा अतः बच्चों के पास दो-तीन घंटे रुककर सवा बजे चल दिए रेलवे स्टेशन की ओर। नीता सैनी दीदी, शोभा रस्तोगी दीदी और उनकी बेटी के साथ यात्रा फिक्स हुई थी डिब्बे में घूसने पर मिलें सब और वहीं मुलाकात हुई विभा रश्मि दीदी से। एक दिन पहले ही पता चल गया था कि वह भी उसी डिब्बे में हैं जिसमें हम सब की टिकट हुई है |
सारे जहां की चर्चा करते हुए अपनी लघुकथा विभा दी को पढ़ाई, उन्होंने सुझाव दिए कई। बीच मे चाभी का गुच्छा देख अंदर बैठा बचपन कूदकर बाहर आ गया। १०-१० रूपये के पांच गुच्छे खरीद डालें।
सुबह सवेरे 6 बजे की बस पकड़कर आगरा से कौशाम्बी फिर 2:45 की ट्रेन पकड़कर पंचकूला चलने में परेशान तो हुए, लेकिन वार्तालाप करते हुए खला नहीं | लेकिन पंचकूला के नजदीक पहुँचते-पहुँचते महसूस हुई थकन। धीरे-धीरे अपने गंतव्य को पहुंच ही गए। स्टेशन पर ही बलराम भैया अपने सहयोगी कार ड्राईवर सहित खड़े हुए दिखे | हम लोगों को उठाने के लिए ही शायद आये थें। गाड़ी में बैठकर स्थान पर पहुँचे जहां सभी आगन्तुकों के खाने की व्यवस्था की गई थी। देखकर लगा कोई आलीशान होटेल है | बाद में पता चला वह श्यामसुंदर अंकल की बिटिया दीपशिखा का घर था। फिर देखकर लगा वाह क्या घर है! हर सजावट का सामान कितनी करीने से रखा हुआ था। घर में लिफ्ट हमने पहली बार ही देखा वहाँ। उनकी बिटिया को सबकी आवभगत करते देख लगा फलदार वृक्ष ऐसे होते हैं । पूरा घर देखकर, देखते ही रह गए। आश्चर्य का ठिकाना न रहा था। दांतों तले ऊँगली भले न दबाई हों लेकिन आप बेफिक्र हो यह कहावत कह सकते हैं |

मोबाईल धोखा दे गया था तस्वीरें लेने से चूक गए। असल में आगरा से बस में बैठे थे तभी ही मोबाईल दो बार अपने आप ही बंद हो गया जिससे उसको हिफाजत से इस्तेमाल कर रहे थें कि कहीं येन टाइम पे (कार्यक्रम समय) धोखा न दें दे | मुश्किल से दो एक फोटो ही हमने अपने मोबाईल से ली होंगी। फोटो अच्छी भी नहीं आ रही थीं इस लिए भी मन नहीं किया तस्वीरें लेने का | देखकर, देखते रहे गये थे घर मे बना मंदिर। ऐसा मन्दिर हमने अलीगढ़ में और मथुरा में देखा था सार्वजनिक स्थल पर और वहां घर में था शीशे के टुकड़ों से सजा हुआ मंदिर| भई वाह कहना तो बनता है |

वहीँ पर मुलाकात हुई श्यामसुन्दर अंकल जी से, जिनसे तो मुलाकात होनी ही थी आखिर मेजबान तो वह ही थें, उन्होंने उसी समय एक कागज  पर  सबके हसताक्षर लिय |  हमें  लगा होगा जहाँ ठहरे हैं वहां के  नियम लेकिन बाद में पता चला वह हस्ताक्षर  हमारे खातों में पैसा डालने के लिए है| पहले ही इस बाबत बैंक डिटेल ले ली गयी थी | पवित्रा दीदी, मंजू दीदी, पवन भैया,अंतरा करवड़े सखी, सुषमा गुप्ता, सीमा जैन दीदी, सुकेश साहनी भैया और भाभी, काम्बोज भैया और भाभी, कपिल शास्त्री भैया बलराम भैया और मीरा भाभी से (वैसे जेठानी का भी यही नाम, शायद इसी लिए याद रहा) एक बार ही तो नाम लिया था किसी ने उनका लेकिन दिमाग में घुसकर बैठ गया इसी कारण शायद | वहीं पर क्षितिज पत्रिका बलराम भैया द्वारा लिए हम मांग के, बंट रही थी हमने सोचा हम भी आगे बढ़के ले लें | सबसे मिलकर सफर की थकान दूर हो गयी थी अब तक | चेहरे पर मुस्कान बिखरी थी | पहली बार अकेले अजनबियों के बीच में अजनबीपन तनिक भी नहीं महसूस हुआ | लगा सबको तो (दो-तीन को छोड़कर) हम जानते हैं अच्छे से | लड्डू खिलाते वक्त बलराम भैया द्वारा कपिल भैया की तस्वीर उतारना कहना और हमारे बेवफा मोबाईल द्वारा उतारा  जाना | भले धुंधली आई लेकिन टाइमिंग परफेक्ट थी बिलकुल बलराम भैया लड्डू खाते हुए कपिल भैया का खुला मुँह |

कपिल भैया की पोस्ट की वार्ता हुबहू ..
अच्छा एक बात बताइये भैया...अक्सर कुछ मीठा खिलाते समय खिलाने वाले का मुँह क्यों खुला रहता है😁😁🤔
Balram Agarwal बच्चे के मुंह के आगे चम्मच लाकर मां अपना मुंह खोलकर बताती है--'आ कर आ'। बस वहीं से आदत बन जाती है।

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2 November at 02:46
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Kapil Shastri मैं तो प्रश्न से अचसमभित हो गया था,बलराम जी ने सटीक जवाब दिया।

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2 November at 03:23
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Rakesh Pandya Yadi woh na khaye to main khalunha jaldi se....

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2 November at 17:48
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Savita Mishra बलराम भैया सादर नमस्ते।
शुक्रिया भैया, वरना इस प्रश्न पर शायद कपिल भैया हंसकर, खीजकर फिर बेवकूफ लड़की कह चुप हो गए थे...😊


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2 November at 18:33
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Kapil Shastri खिलाने वाले का मुंह खुल जाए और खानेवाले की आंखे बंद हो जाएं मतलब मज़ा आ गया।
दीपशिखा के घर में बना खाना भी मजेदार, लज्जतदार था। कढ़ी-चावल अपना फेवरेट, थोड़ा चटपटा था लेकिन बढिया था। भरवां करेला और मूँग की दाल का हलवा अपनी पसन्दीदा चीजें पाकर दिल और बागबाग हो उठा | याद नहीं और भी थीं खाने में कई चीजें। बीच मे लालमिर्च मुँह में जाने पर आँखों से नीर बह निकला। बलराम भैया सामने बैठे थे, हँसकर बोले दरोगाजी की याद आ गयी क्या! हमने कहा भैया आप भी मजाक कर रहे हैं आपसे यह उम्मीद तो नहीं थी।
खाकर काम्बोज भैया से बात करते-करते समय का पता ही नहीं चला। सब ठहरने के स्थान पर रवाना होने लगे। अचानक अंकल ने आवाज दी 'जाना नहीं है' सामान उठा के चल दिये बाहर।
'सेक्टर 15 विश्नोई भवन' में ठहरने की व्यवस्था थी अपनी। एक कमरे में हम और शोभा दीदी। सारी सुविधा थी उधर।
बेटा मेट्रो में अटैची से छेड़खानी करके एक तरफ का लॉक लगा दिया था, वह लॉक खुला नहीं था। घण्टे डेढ़ घण्टे मशक्कत होती रही लॉक खोलने की । हम नीता सखी और उनकी बेटी मनीषा लगे रहें पर नहीं खुलना था तो नहीं खुला। दिक्कत बहुत थी न खुलने से लेकिन काम चलाना ही था। शुक्र है एक ही तरफ का लॉक हुआ था दूसरी तरफ से सारे कपड़े किसी तरह खींच कर निकाले और अलमारी में रख दिए।
इसी बीच जगदीश राय कुलरियाँ भैया और कुलविंदर कौशल भैया आकर बैठे। चर्चा होती रही। कैसे क्या होना है कल। लघुकथाओं की भी तनिक बात हुई | इतनी देर लघुकथा की दो हस्तियाँ सामने थी लेकिन तस्वीर लेने की याद ही नहीं रहा |
सुबह 7 बजे चाय आ जायेगी कहकर वह चले गए। बस फिर क्या था हम लोग सोने की तैयारी करने लगे। कपड़े तो बदले ही जा चुके थे बस बिस्तर पर पसरना था सो पानी पीकर पसर लिए |
सुबह वह दिन आ गया जिस दिन के लिए इतनी दूर से अकेले जाने की हिम्मत जुटाए थे। 6 बजे ही नींद खुल गयी। बाहर आकर अंतरा सखी से बात होती रही। महत्वपूर्ण जानकारी मिली कि कहीं होटेल में खाने के बाद चाय या सूप यानी गर्म चीज जरूर पीनी चाहिए। उगते सूरज की तस्वीरे उतारी और वहां की हरियाली पर मोहित होती रही |
फिर चाय और रस्क खाया गया। सामने ही पोलिस पोस्ट यानी चौकी थी जिसके बारे में चर्चा हुई।
उस पोलिस-पोस्ट का दरवाजा शायद सुबह सात बजे खुला | हमें एक बंदे के सिवा कोई चहलपहल नहीं दिखी उस पोस्ट पे दस-ग्यारह बजे तक | बाद में देखा कि पुलिस चौकी का भी बोर्ड लगा था नीचे। हमें लगा हरियाणा में पोस्ट ही कहते क्या चौकी को।
खैर अब नहाकर तैयार होने की बारी थी। 9 बजे नाश्ता आ गया | भरवा कुलचे और मक्खन के साथ छोले। स्वादिष्ट था और हरियाणवी झलक थी। ऐसे कुलचे हमने तो पहली बार खाए। साथ में था इमली के मसालेदार पानी के साथ बारीक कटा प्याज, जो काफी स्वादिष्ट था।
कुछ खाने का जायका तो कुछ मीठी-मीठी बातों का रस्वादन मन प्रफुल्लित था । वही कॉरिडोर में मुलाकात हुई डॉ कृष्ण कुमार आशु भैया से जिन्होंने सृजन-कुंज नामक पत्रिका भेंट की। समारोह स्थल में दोपहर का भोजन ग्रहण करते वक्त उन्होंने बताया कि मैं शब्द निष्ठा प्रतियोगिता में तीन जजों में से एक जज था। बाद में घर में आकर पत्रिका देखी तो उसमें एक सविता और थीं मुँह से निकल पड़ा कितनी सविता हैं भई!!
धीरे-धीरे सारे लोग 'विश्नोई भवन' से कार्यक्रम स्थल पे जाने लगे। तैयार तो साढ़े नौ बजे हम तीन यानी शोभा रस्तोगी दी और नीता सखी थे लेकिन रस्तोगी दी को पूरी तरह से तैयार होने में समय लगा जिससे हम लोग ही बस बचे थे वहां। थोड़ी देर में यानी साढ़े ग्यारह बजे शायद हम लोग भी निकल पड़े उस स्थल पर जहाँ लघुकथाकारों का मेला लगा था।

पहुँचते ही स्टाल पर किताबों को देखते -देखते दो किताब खरीद डाली। वही कइयों से मुलाकात हुई- नीलिमा दीदी, पंकज शर्मा भाई जिन्होंने "शुभ तारिका" नामक पत्रिका भेंट की, सतविंदर भाई, कुमार भाई, कुणाल भाई, कांता दीदी, श्याम दीप्ती अंकल जिन्हें हमने अभिवादन किया लेकिन वह हमें क्या पहचानते और पहचान बताने लायक अपनी पहचान थी भी क्या !! अशोक जैन भैया जिनकी पत्रिका के सदस्य बनने का हमने ऑफर किया, जिससे उनके चेहरे पर प्रकाश पुंज फैल उठा| उन्होंने हाथ बढ़ाया तो हमने हँसी किया कि हाथ मिलाये! फिर हाथ मिलाते हुए हमने बोला "अक्षय कुमार के बाद दुबारा हम अब आपसे हाथ मिला रहे हैं" वह हँसकर बोले "भाई से तो हाथ मिला सकती हो न!" उन्होंने एक बात और कही कि "बोलने में व्याकरण की गलतियां करने वाली सविता लिखते समय जाने क्या हो जाती है।" अब यह राज तो भगवान ही बता सकते हैं!

चाय-नाश्ता के बाद सब हॉल में प्रवेश करने लगे थें। बाहर ही मजमा जमा था कि श्यामसुंदर अंकल ने घोषणा की कि लघुकथा पढ़ने में सब पंजीकृत हुए हैं, सीट की जिम्मेवारी नहीं है। फिर क्या था नीता सखी और हम जाके सीट पर कब्जा करके फिर बाहर आ गए। थोड़ी देर बाद जो जो कब्जा जमाकर बाहर भ्रमण पे थे सब अंदर होने लगे थें।
दोपहर भोज के पश्चात लघुकथा सम्मेलन समारोह शुरू हो चुका था पंजाबी लघुकथाओं का दौर शुरू हुआ, समझ नहीं आ रही थीं लेकिन सुन रहे थे। जब-जब जगदीश भैया पढ़ने के लिए उद्घोषणा करते हमें बड़ा अजीब लगता, सोचते ये सबको 'बेइज्जती करा दा' क्यों बोल रहे हैं। और सब बड़ी शान से बेइज्जती सुनकर भी आ रहें। ऐसा कैसे हो सकता भई। अब तो हमारा ध्यान पूरी तरह से सिर्फ घोषणा करते समय ही लग गया, बाद में जब ज्यादा ध्यान से कई बार सुनें तो सुनने पर समझ आया कि यह वेनती करां दा कुछ इस अंदाज यानि पंजाबी में बोल रहे हैं जो हमें बेइज्जती सुनाई पड़ रहा है।
बाद में भी इस शब्द की चर्चा बनी रही कपिल शास्त्री भैया को भी वही लगा था जो हमें लग रहा था। खैर सब की कथाएं हो चुकी थी अब समीक्षा की बारी थी जो समझ न आने के कारण सुनके भी कुछ नहीं बोल सकते कि किसे उन्होंने अच्छा कहा। लेकिन हमें गाने पर औरतों का बोलना फिर अपने घर की औरत आने पर बन्द कर देने वाली कथा और बाइक वाली मर्दो वाला शायद कुछ ऐसी ही थी, बहुत दिनों बाद लिखने के कारण बहुत कुछ विस्मृत सा हो गया है वैसे भी अपनी यादाश्त फिल्म गजनी के आमिर की तरह ही है | आई गयी, मौके पर आ जाये तो समझ लीजिए कि किला जीत डालें |

२९ हिंदी लघुकथाकारों ने कथाएँ पढ़ीं। सभी ने क्रमवार पढ़ी और दूसरों की कथाएं भी बिना कानाफूसी के सुनी | समीक्षा के समय हँसी ठिठोली होती रही | हँसते-हँसते बलराम भैया ने बातों में ही छड़ी को खूब घुमाया |
आप सब भी समीक्षाएं और हमारी सीमा नामक लघुकथा देख सकते हैं इस लिंक पर जाकर ..
https://www.youtube.com/watch?v=mUv_WAdGIZs&t=342sअशोक भाटिया भैया
https://www.youtube.com/watch?v=Lb6k0h8Nc9s बलराम भैया
और हाँ कहते-कहते यह भी कह दे कि अपनी लघुकथा सीमा भी पसंद आई कई लोगों को ..सभी का शुक्रिया इस माध्यम से भी ..इस पर जाकर आप सुन सकते हैं ...
https://www.youtube.com/watch?v=z8P_hGXrbQQ
फिर चाय और नाश्ता का दौर चला | हमने नाश्ता देखा भी नहीं, खाना तो दूर की बात रही |
दोपहर के खाना से पेट भरा हुआ था | हमारे साइड से बीच में खड़े होकर मांगने पर अशोक भाटिया भैया ने प्लेट में कुछ ज्यादा ही सब्जी चावल दें दिए थे |, न छोड़ने की आदत के कारण खा लिए थे, लेकिन पानी पीने के बाद पता चला ज्यादा हो गया था | अतः दोपहर में बस कॉफ़ी लीं | वैसे थी चाय की तलब, लेकिन वहाँ चाय शायद थी नहीं | काम्बोज भैया ने खाते समय डॉ.शील कौशिक दीदी से परिचय कराया | वीर सिंह मार्तण्ड भैया से भी हल्की सी बात हुई हमारी |
उसके बाद फिर हॉल की ओर उन्मुख हुए सब | लेकिन एक घंटे में ही जब सब एक एक करके बाहर होने लगे थें | उसी बीच हम भी निकल आए | बाहर फोटोग्राफी चालू थी, हम भी शरीक हो लिए | फिर बातचीत और खाना पानी रात का | यही पे मुलाकात हुई कमलेश भारतीय भैया से जिनसे काफी देर तक बात हुई | बीतते शाम में नीरव भैया से वार्ता चली फिर पवित्रा दीदी से भी थोड़ी देर बात हुई |
फिर कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जहाँ ठहरे थे वहां का रुख किया गया | पैदल ही अशोक दर्द भैया उनकी पत्नी, देवराज डडवाल भैया और उनकी पत्नी, नीता सखी, मनीषा और हम सब पैदल सैर करते हुए विश्नोई भवन पहुँचे | कसौली के लिए कार करने के चक्कर में जगदीश भैया को खोजते हुए नीचे आयें तो बैठकी जमी थी हम भी शामिल हो लिए | फिर थोड़ी बहुत वार्ता और सोना सुबह निकलना था भ्रमण पे कसौली | क्रमशः
अट्ठाईस दिन बाद यादाश्त  के आधार पर ...द्वारा-सविता मिश्रा 'अक्षजा'