Saturday, 28 February 2015

~~खिलाफत की सजा ~~

रूमी सजी धजी ही अदालत में पहुँच गयी | अभी उसके हाथों की मेहँदी भी न उतरी थी | आँखों से आंसू भी रुक नहीं रहे थे | चपरासी ने रोका , पर वेदना भरी चीख कमरे में बैठे जज के दिल को चीर रही थी |
जैसे ही अन्दर केबिन में जज के सामने आई | हाथ
जोड़े फफकते हुए बोली- "जज साहब अभी दस दिन हुए शादी को | आज आने को कहें थे पर रास्ते में किसी ने...| एक बार उनकी शक्ल दिख जाये बस | कृपा करिए जज साहब मुझ अभागन पर |"
यहाँ कहाँ है ? कौन है तेरा पति ? यहाँ क्यों आई ?"
साहब आपके निर्णय के खिलाफ दो दिन पहले बोला था उन्होंने और आज ...|"

"गुलाब की कली "

"अम्मा जी आपने तो पालपोस बड़ा किया है |ऐसा अनर्थ मत करिये |" रूढ़ियो की बलि चढ़ने जा रही मन्नो हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रही थी अपनी मृत दीदी की सास के सामने |
"जीजा जी आप कुछ कहिये | मेरे माँ- बाप तो है नहीं | जो है आप सब ही है मेरे लिय | ऐसा ना कीजिये मेरे साथ |"
" तुम्हारी दीदी के मौत के बाद उसकी जगह तुम्हें बच्चों की माँ बनना ही होगा |यहीं सदियों से परम्परा रही है हमारे समाज की |" माँ हाथ पकड़ बैठा ली भगवान की कथा में |
अब असहाय सी निमग्न हो भगवान् के सामने आँखे बंद किये दया की भीख मांगती रही मन्नो |
" दादी, लीजिये "गुलाब के फूल" भगवान को चढ़ाने के लिय |"
"अरे मूरख कलियाँ क्यों तोड़ लाया | बाजार से ले आता दौड़ के |"
" दादी , एक कली को बाबा भी ..| मैंने तो एक तोड़ी दूजी आ जायेगी कल तक, पर यह कली तो ...| "
"बहुत बोलने लगा है |" दादी गुस्सा होते हुए बोली
"माँ लाड लड़ाते हुए मौसी को "गुलाब की कली " ही तो कहती थी |"
बेटे की बात सुन पिता को झटका सा लगा | धीरे-धीरे अपनी शादी की पगड़ी उन्होंने सर से उतार दी |
"अरे ये क्या कर रही हैं 'मन्नो मौसी' |"
" 'देवता' को प्रणाम कर रही हूँ |"
"अरे मैं .."
"मेरे लिए तो देवता ही हो | एक कली को भले पौध से अलग कर दिया पर दूसरी कली को मुरझाने से तुमने बचा लिया |" सविता मिश्रा


~~भ्रम ~~


दादी के घर माँ-बेटी सालो बाद पहुंचे तो दादी खुश तो खूब हुई । पर थोड़ी ही दिनों में उनकी ख़ुशी काफूर हो गयी, जब नन्ही बच्ची पुरानी तस्वीरों से एक तस्वीर पर अटक गयी |
"एक तीज व्रत रखने को कहा, तो देखो तुम्हारी मम्मी कैसे आंसू बहाती हुई पूजा में बैठी है | "
"पर दादी , मम्मी तो अब ना जाने कौन-कौन से व्रत रखती है | एक व्रत में इतना क्यों रोयेगी भला |"
"क्यों नहीं रखेगी अब , पहले रखा होता तो शायद अब इतने व्रत न रखने पड़ते |" दादी , माँ की तरफ घृणा भरी तिरछी  निगाहों से देखती हुई बोली | .सविता मिश्रा

Friday, 27 February 2015

~~मौकापरस्त ~~

जनता से ठसाठस भरे पांडाल में कद्दावर नेता गला फाड़ भाषण देने में मशगुल थें |
तभी एक चमचा कान में फुसफुसाया- "अरे जनाब क्या कह रहें हैं | 'धर्मान्तरण' कहाँ  हुआ | न्यूज पेपर वाले तो शगूफ़ा छोड़े थे बस |"
" चुप करो ! राजनीति नहीं समझते क्या ?
आग न्यूज वालों  ने लगायी | फूंक मार उसे प्रज्ज्वलित करते रहेगें हम |"
"जी " चमचा आँख नीची कर बोला
"जनता को कब बरगला है, कब फुसलाना | यही गुर सीख जाओ बस |
चिंगारी को हवा दोंगे तभी तो आग भड़केंगी | और जब आग भड़केंगी तभी लोहा गरम होगा |" समझाया कद्दावर नेता ने धीरे से

"और गर्म लोहे पर
हथौड़े के प्रयोग में आप माहिर ही है| " चमचा कान में फुसफुसा मुस्करा दिया |
"अब सही समझे | लगे रहो | राजनीती के धुरंधर एक दिन बन ही जाओंगे, यही स्पीड रही तो |"

अब तो चमचा मूंछो पर ताव दे सपनों में ही गुलाटी मारने लगा|
कद्दावर नेता उसे देख समझ गये कि गर्म लोहे पर हथौड़ा यहाँ भी पड़ गया है|..सविता मिश्रा

Tuesday, 24 February 2015

~~ प्यार दो ,मुझे प्यार दो ~~


शिखा को जीवो से बहुत लगाव था |परन्तु अब यही लगाव मुसीबत बनने लगा था |
वैसे तो कुत्ता ,बिल्ली , मछली , तोता और खरगोश कई जानवर पाल रखे थे |
पर मुसीबत का कारण उनमें से दो ही थी |
कुत्ते को पुचकारती , तो बिल्ली म्याऊ-म्याऊ कर गोद में घुसने लगती | कुत्ते को यह देख जलन होती, वह  भौऊ-भौऊ कर पूरा घर सर पर उठा लेता | दोनों को शिखा जब पास बैठा लेती , तो तोता टेरता रहता -- " प्यार दो ,मुझे प्यार दो | "
जाहिर है ऐसा गाना सुन शिखा खिलखिला पड़ती | मिटठू  मेरा
मिटठू कह वह तोते को प्यार जताने लगती | तो तोता नाच जाता अपने पिंजड़े में |
शिखा का किसी को भी प्यार देते देख, कुत्ते की भौऊ-भौऊ और तोते की टेर तो देखते ही बनती थी |
मछली और खरगोश की भी उछल-कूद देख , शिखा समझने की कोशिश करने लगी थी अब कि कही त्रिकोणीय प्रेम की जगह षट्कोणीय प्रेम का एंगल तो नहीं बन रहा |....सविता मिश्रा

~~बहू बनाम कामवाली ~~


"उम्र हो गयी बेटा , शादी कर ले |"
"अच्छी लड़की तो मिले! तब तो करूँ ना मम्मी !!"
"बेटा ४० की बढती उम्र में अब तुझे अच्छी लड़की कहा मिलेगी | थोड़ा अडजस्ट कर |"
"तो क्या माँ ! आप चाहती है ये टेढ़े मुहं वाली से या ये ऐसा लग रहा है जैसे सदियों से बीमार है , और इस तस्वीर को देखिये -हाथ ऐसे लग रहे जैसे घरों में बर्तन मांजने वाली के | इनमें से किसी एक से शादी कर लूँ ?"
"बुढ़ापे में मुझसे अब होता नहीं| काम वाली भी मिलना मुश्किल है | जो मिलती है वह महीने भर भी नहीं टिकती | कैसे करेगा , क्या खायेगा तेरे भविष्य की चिंता में घुली जा रही हूँ मैं | कब बुलावा आ जाये मेरा, पता नहीं | तेरी देखरेख करेगी , यही समझ कर कर ले !!! "
"तो क्या मम्मी आप बहू नहीं ..|"...सविता मिश्रा

साहित्य का नशा ~


घर-परिवार -समाज सब भूल नेट में खोयी रहती हो | ये कैसा नशा पाल लिया रितु | मैं कहता रहता हूँ , नशेणी न बनो | नेट पर रहो पर एक नार्मल यूज़र की तरह ,एडिक्ट की तरह नहीं | कब से आव़ाज लगा रहा हूँ | पर तुम्हारे कान पर जूं नहीं रेंग रही | हद है यह तो |"
"नशा , ये नेट का नशा , मेरी बात यारो मानो, नशे में नहीं हो तो करो ये 'नशा' जरा । " खिलखिला पड़ी रितु |
"तू पगला गयी है रितु । मेरे पास और भी नशे है करने को इस नशे के सिवा | "

"हाँ जी, पागल हो गयी हूँ मैं | महीने दो महीने में घर आते हो फिर चिल्लाते हो ये कहाँ है वो कहाँ है ! व्यस्त थी कुछ लिखने में, नहीं सुना | नशा जब दर्द की दवा बन जाये तो फिर उस नशे को अपनाने में बुराई ही क्या है जी | साहित्य पढ़ने-लिखने का नशा है, जो अब तो बढ़ेगा ही |"
".......!"
 "देखो आज पत्रिका
 में मेरी कविता छपी है |"
"तो, कौन सा तीर मार ली ! इतनी पढाई पहले करती तो आज आईएएस-पीसीएस होती! खाना लगा दोगी या वो भी मैं खुद ले लू?" सविता मिश्रा 'अक्षजा'

Sunday, 22 February 2015

~~धूर्तता ~~~

दोनों ही आम रास्ते से होकर ख़ास की कुर्सी पर आमने-सामने बैठे थे |अपने अपने तरीके से खूब उल्लू बनाये भीड़ को |
एक कहता तो दूजा हा में हा मिला हंस पड़ता |
पहला नेता - "भीड़ के न आँख होते है न कान और न अपना दिमाग | जो समझाओ समझती है ,जो सुनाओ सुनती है और जो दिखाओ वही देखती है |"
दूसरा नेता - "सही कह रहें हैं आप | भीड़ होती ही है मुर्ख |आपने हिंदुत्व का नारा सुनाया सबके विकास का रास्ता दिखाया ,दिमाग में ब्लैक मनी को लौटा लाने के साथ सबमें बाँट देने को कह उल्लू बनाया | तो मैंने भी- फ्री वाई-फाई , बिजली का सब्जबाग दिखाया और दिमाग में भीड़ के ऐसा घुसाया की देखिये एक बार मैंदान छोड़ भाग जाने के बावजूद आपके सामने बैठा हूँ |" दोनों ही अपनी अपनी नीतिया बता , ठहाका मारते नजर आये |
गेट पर खड़ा दरबान सब सुन ठगा महसूस कर रहा था पर वह ना अपनी बेबसी पर मुस्करा सकता था और ना नेताओं की धूर्तता पर क्रोध जता सकता था |
मुलाकात ख़त्म हो चुकी थी पर दरबान की आँखों में लालिमा जम गयी थी | ...सविता मिश्रा

Friday, 20 February 2015

~~बदलाव ~~

"पिछले जन्म में कोई न कोई पाप किया होगा जो किन्नर रूप में जन्म हुआ | " अपनी पड़ोसी की बेटी निशी को जब तब कोसती रहती शीला | निशी की परछाई भी अपने बेटे पर ना पड़ने देती |

यही सुन -देख बड़ा हुआ था बंसी | आज चारपाई पे पड़ा गाने पर मटक रहा था तभी माँ बाहर से आते ही उस पर चिल्लाने लगी |

" जिसकी किस्मत में नाचना गाना लिखा था वह देश सँभालने की बात रही है ,और तू जिसके लिय क्या-क्या सपने सजाये थे निठल्ला बैठा गानों पर मटक रहा है |
जरुर पिछले जन्म में कोई पुन्य किये होगें उसके माँ-बाप ने | जो किन्नर ही सही निशी जैसी बेटी जन्मी | हिंजड़ा है तो क्या हुआ , है तो इंसान ही | नाम रोशन कर रही है| कुछ सीख उससे |" गुस्से में  बोलती जा रही थी शीला

"आज फिर भाषण सुन के आई हो ना अम्मा मेयर निशी महारानी का " कह व्यस्त हो गया गाने सुनने में | ..सविता मिश्रा

~~बदलाव ~~


आज सही से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था फिर भी पति को काम पर जाता देख अपने निठल्ले जवान बेटे पर बरस ही पड़ी |
" मुए तू बैठा रोटी तोड़ रहा और तेरे अशक्त बाबा काम पर चले, तू क्यों नहीं जाता | तुझसे तो वह हिंजड़ा लक्ष्मी भली जो हर काम में आगे है | नाम रोशन कर रही है उस माँ-बाप का जो पैदा होते ही उसे त्याग दिए थे| और तूझे पाल पोश बड़ा किया इसके लिय क्या की हाड़ें-गाढ़े भी हमारी लाठी ना बने | सारा दिन पड़ा रहे ये मुआ बक्शा (लैपटाप)लेकर | आज अफ़सोस हो रहा है कि मैं हिंजड़े की माँ क्यों ना हुई | माथा पिटती हुई सरला बोलती ही रही थी
कल तक खुश होती थी पड़ोसी निर्मला की किस्मत पर | परन्तु आज लक्ष्मी को देख उनसे इर्ष्या हो रही है | ये लक्ष्मी मेरी कोख से क्यों न जनी | तेरी साथ की ही जन्मी है उप्पर से ऐसी, फिर भी देख तू गाँव में आवारागर्दी करता है और वह गाँव की प्रधान है|
"आज भाषण सुन आई हो ना अम्मा लक्ष्मी का " कह व्यस्त हो गया अपने लैपटाप में |....सविता मिश्रा

Sunday, 15 February 2015

~~इंसान ऐसा क्यों नहीं ~~

"बिट्टू बैंडेज लेता आ बेटा जल्दी से | सब्जी काटते वक्त चाक़ू से ऊँगली कट गयी |" जोर की आवाज लगायी मीरा ने
तभी एक कातर ध्वनी मीरा को विचलित कर गयी |
"ये कैसी आवाज है" कह जैसे ही मीरा ने भड़ से दरवाज़ा खोला
बिस्तर पर पड़ा मीरा का पति आवाज़े सुन सुन झल्ला गया |
" बंद कर दो खिड़की |सुबह-सुबह घर-बाहर चिल्लपो शुरू हो जाती है| " गुस्से से बोला
"बहुत मार्मिक ध्वनी है , अभी देखती हूँ किसकी है |"
"अरे छोड़ो न , तुम भी हर आव़ाज क्यों है, किसकी है, यही जानना चाहती हो |
ये पक्षी की आव़ाज है, इन्सान की नहीं | उसका साथी बिछड़ गया होगा या फिर मर गया होगा | हर जगह तो नंगे बिजली के तार लटक रहें है | बंद कर दो खिड़की-दरवाज़ा, आव़ाज नहीं आएगी | और कर भी क्या लोगी...सुन के.." झुंझलाहट में बोला
"कर तो कुछ नहीं पाऊँगी जी, पर उन्हें देख यह जरुर महसूस करना चाहती हूँ कि इंसान ऐसा क्यों नहीं ? " ...सविता मिश्रा

~~मजबूरन~~


"पोस्टमार्टम होगा , आप हस्ताक्षर कर दे ।"
"कीजिये साहब ! रिश्तों का पोस्टमार्टम तो कर ही चुकी है ।"
"दूसरी लाश का वारिश कौन है?"
"मैं ही हूँ साहब !"
"आप ! इसका पिता कहाँ है ?"
"मैं ही हूँ !"
"ओह ! मतलब ये दोनों प्रेमी भाई.बहन ...!"
"हा साहब ! बेटे को बचपन में ही मैंने अपने साले को गोद दे दिया था ।"
"बहुत समझाया पर...., जवानी के जोश में रिश्तों का होश नहीं रख पाये दोनों | मजबूरन ..." (मजबूरन शब्द) बोल कर भी नहीं बोला पुलिस के डर से

Friday, 13 February 2015

~~शिक्षा~~

"आज रिटायर हो गया सुगन्धा | "
"अरे कैसे-क्यों ? तबियत तो ठीक है न ! अभी आपकी नौकरी के तो चार साल बाकी है |" "नहीं रे 'पगली' 'प्यार' से रिटायर हुआ | आज बहू बराम्दे से मेरी गोद से चिक्कू को लगभग छीन के ले गयी| बड़बड़ा रही थी कि प्यार तो देते नहीं , बस गुजरे जमाने की शिक्षा देते है | 'अंग्रेजी स्कूल ' में पढ़ रहा है | आपकी तरह कोई खैरात वाले में नहीं| "
सविता मिश्रा

~~~काँटो भरी राह ~~~


टिहरी में आये जलजले में सब कुछ तबाह हो गया था । कौशल का मनोबल फिर भी ना टुटा था । रह-रह उसके पिता की बात उसके दिमाक में गूंजती थी कि विद्यादान सबसे बड़ा दान है ! और इस दान को प्राप्त करके ही सब आगे बढ़ेंगे। दान देने बाले को भी अभूतपूर्व संतोष का धन प्राप्त होता है ।इस दान में वह सुख है जो कभी कहीं भी नहीं मिल सकता ।
बस फिर क्या था उसने अपने गाँव के सारे बच्चों को इकठ्ठा किया और लग गया विद्या का दान देने एक टूटे फूटे खंडहर में ।
खंडहर भले ही खंडहर ही था  ,पर बच्चों के मष्तिष्क खण्डहर होने से मुक्त हो गये थे | कौशल अपनी मेहनत को अँकुरित, पल्लवित , पुष्पित देख फूले न समा रहा था ।
आज कई साल बाद खँडहर को पिता के नाम से ज्ञान के मंदिर रूप में स्थापित देख कौशल के आँखों से आँसू श्रधान्जली के रूप में लुढ़क गए । पिता को आभार प्रकट करता हुआ बोला -"ये सब आपकी शिक्षा का ही प्रताप है 'पिता जी' जो मैं
काँटो भरी राह में फूल उगा पाया । "
  Savita Mishra

Thursday, 12 February 2015

~~बेकदरी का डर ~~

रीना , ऋतू को एक फ्लावर पाट टूट जाने पर मारते-मारते गलियारे में आ गयी |
दो पड़ोसी महिलायें धूप सेंक रही थी वही | यह देख फुसफुसाने लगी आपस में |
पहली महिला- "बाँझ है न क्या समझेगी कोख का दर्द, बच्चे की ममता |"
दूसरी महिला -"लेकिन वह तो ऋतू की माँ है न, तो बाँझ ...."
पहली महिला -"नहीं रे वह प्रेगनेंसी का झूठ बोल बनारस चली गयी थी | वही का जन्म बताती रही परिवार वालो से | वह तो मेरे दूर के रिश्तेदार ने बताया कि ऋतू इसकी ममेरी बहन की बेटी है | जिसे मरते-वक्त वह एक महीने की ऋतू को इसकी गोद में डाल गयी थी| इसने परिस्थितियों का फायदा उठाया और दो साल बाद जब आई तो सभी से खुद को ऋतू की माँ बताने लगी| जैसे सास की नजरों में उठ जाये| इसकी जेठानी को भी कोई औलाद नहीं है , उसकी बेकदरी यह देख ही रही थी |"
दूसरी महिला- "तो तुमने इसकी सास से खुलासा नहीं किया ?"
पहली महिला -" नहीं , क्यों खुलासा कर इसका जीवन नरक बनाऊं, यही सोच चुप हूँ | सास-जेठानी का गुस्सा इस पर उतारती भले है , पर प्यार भी खूब करती है, ऋतू को खिलाये बगैर एक दाना भी मुहं में नहीं डालती |"
.दूसरी महिला - "आखिर माँ जो है | देखो अब आंसू बहाते हुये मलहम लगा रही है ।"
पहली महिला - कह रही थी मैं न , बहूत प्यार करती है। जान छिड़कती है जान । तभी तो राज फास नहीं कर रही। वर्ना खूसट सास अनाथ ऋतू का जीना हराम कर देंगी इसके साथ-साथ। ........सविता मिश्रा

Monday, 9 February 2015

~~आत्मग्लानी ~~लघुकथा

"चप्पल घिस गयी बेटा एक लेते आना , मैं थक गया, अब सोऊंगा|"
" पापा दे दीजिये न बाबु को हजार रूपये, दो साल से प्रमोशन रुका पड़ा है| बिना दाम के काम कहीं होते है क्या ? आप खामखां सिद्धांतो में अब तक अटके है| "
"बेटा गाढ़े की कमाई है, ऐसे कैसे दे दूँ | और कोई गलत काम भी तो नहीं करा रहा |"
अच्छा पापा -"वो सरकारी कालेज में एडमिशन हो गया हैं| पर वो बाबू तीस हजार रूपये मांग रहा था|"
"काहे के तीस हजार... "
"वो कह रहा था, थोड़ा तो मेहनताना देना पड़ेगा | दिन भर लगा रहा तुम्हारे ही फार्म में|"
"मैंने मना किया | कहा उनसे कि पापा बड़े 'सिद्धांत वादी' है |"
"फिर .."
"हंसने लगा, और कहाँ कि बबुआ , पिता 'सिद्धांत वादी' है तब पढ़ना लिखना भूल ही जाओ| जाओ मूंगफली बेचो |"
"अच्छा" - लम्बी सांस छोड़ते हुये बोले- "जाओ माँ से लेकर कल दे आना | "
मैं तो अपना वर्तमान उसूलों में उलझाये रहा पर तुम्हारा भविष्य कैसे बर्बाद होते देख सकता हूँ | बुदबुदाते हुय लेटते ही चिरनिद्रा में चले गये |
सविता मिश्रा

~~आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता~~

"अरे विनोद, क्या हुआ बीमार से लग रहे हो |आजकल टहलने भी नहीं आते|"
"क्या बताऊं यार, 'कौन' सा 'रोग' लग गया है|"
"अरे बताओ तो सही शायद मैं मदद कर सकूँ !"
" यार, वो दैनिक में जो एडिटर है न, उससे प्रेम सा हो गया है|"
"वो जवान और तुम 'पिलपिले आम' आज गये कि कल ..."
ये बात व्यंग सी चुभी तीखे स्वर में विनोद बोले कि - "आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता, सुना नहीं कभी क्या? और वह भी कोई जवान नहीं है ४०-४२ की तो होंगी ही "
"सुना है सुना है, मैं तो यूँ ही मज़ाक कर रहा था | कैरियर बनाने के चक्कर में शादी नहीं की उसने और जब करनी चाही तो लड़के ही ना मिले| कुँवारी मरने से तो अच्छा है मेरे यार की होके मरे|"
"बात करो फिर, तुमसे तो घुली-मिली है न | आखिर तुम उसके सहकर्मी रहे हो |"
"कल ही करता हूँ |"
तड़के ही विनोद पहुँच गये दोस्त के यहाँ , बिना किसी भूमिका के पूछ बैठे - "क्या कहा उसने ?"
अरे 'उम्रदराज प्रेमी' महोदय, बताते ही झट तैयार हो गयी वो तो, कह रही थी दसियों घातक नजरों से अच्छा है एक जोड़ी आँखे 'प्यार भरी' नजर से देखे | नजर बूढी है तो क्या हुआ |" दुःख छलक रहा था उसकी वाणी से|
एकाएक "उम्रदराज प्रेमी" जवान हो उठा| दोस्त को बाहों में भर, ख़ुशी से कमरे में नाच गया| ..सविता मिश्रा

~~हुनर~~

"वाह ! क्या गजब की हारमोनियम बजाते हो बेटा| कहाँ से सिखा ?"
कोई जबाब नहीं |
"किस कक्षा में पढ़ते हो |"
कोई जबाब नहीं ..|
तभी एक बूढ़ा सा व्यक्ति आकर उसे उठाने लगा |
"ये बच्चा जबाब क्यों नहीं दे रहा |"
"बेटा ये गूंगा-बहरा है| भगवान ने कमियाँ सारी दी है, पर ये हुनर दे दिया है| जिससे भरण-पोषण हो रहा है | ले-देके ये बूढ़ा दादा ही अब इसका सहारा है|"
"इसके पिता ..."
"वह एक हादसे का शिकार हो गया | मरते समय उसने, इसकी हथेली को छूकर ना जाने क्या किया कि 'हारमोनियम' पर हाथ रखते ही 'सातो सुर' गुंजायमान हो गये | सविता मिश्रा

Sunday, 8 February 2015

~~गर्म खून~~

"मालूम है तुम जवान हो, खून उबाल मरता है | हर गलत बात का स्वविवेक से प्रतिकार करना चाहते हो | यह सब कर देखो, मार ली न अपने पैरो पर ही 'कुल्हाड़ी' | होती हुई 'प्रोन्नति' रुक गयी|"
"पर पापा, वो नियम विरुद्ध ....|"
"बेटा अनिमितताएं कहाँ नहीं हैं ? कौन चल रहा हैं नियमपूर्वक ? दिल-दिमाक भले ही क्रोध से उबल रहा हो, पर जबान को ठण्डी रखो| ठीक हैं ना ..सुन रहे हो या ..."
"सुन रहा हूँ पापा ..|"
"ऐसा कर सकें तो खुशनसीबी, वर्ना बदनसीबी तो दस्तक देने दरवाज़े पर ही खड़ी रहती है |"
"मतलब पापा, आप चाहते है वीरबहादुर का बेटा चमचा बन जाये |"
"बिल्कुल नहीं बेटा,पर कभी-कभी इस जुबान को दाँतों के अन्दर भींचना होता है| वर्ना मेरी हालत तो देख ही रहे हो| जो तुम्हें सिखा रहा हूँ यदि खुद कर पाता तो आज कहाँ से कहाँ होता| पर अपनी सच्चाई की अकड़ में चापलूसी को पकड़ नहीं पाया |..सांस खींचते हुए से अफ़सोस जाहिर किये फिर बोले -- "तभी तुम्हारी मम्मी ताने मारती रहती है कि 'क्या किये आप ? आपके साथ के कहाँ के कहाँ पहुँच गये|' अब वही साथ वाले साथ उठाना बैठना क्या ! देखना भी नहीं चाहते सामने मुझे |"
बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले - "ये सीख 'विरासत' है बेटा, एक नाकामयाब बाप की ! जो बेटे की कामयाबी की आशा रखते हुए अपने बेटे को सौंप रहा है | पर बेटा यह भी ख्याल रखना कि चापलूसी इतनी भी मत करना कि अपनी ही नजरों में गिर जाओ|"
"जी पापा, आपकी सीख हमेशा याद रखूँगा | थोड़ी जरूरत पर चापलूसी, वर्ना मौन रहूँगा | जब तक 'गर्म खून' का उबाल कम ना हो जाये|"
"कामयाबी कदम चूमेगी बेटा और हर दिल अजीज़ रहोगे फिर|" आश्वस्त हो पिता बोले | सविता मिश्रा

Saturday, 7 February 2015

~~ आशंका ~~

"अरे बेबी इतनी मंहगी ड्रेस फाड़ डाली | कैसे फटी कुछ बताओगी |"
" 'माँ ' वो -वो .."
"क्या वो- वो लगा रक्खी है, दस साल की हो रही है, फिर भी शिशुओ सी हरकत करती है| "
"माँ वो, वो नीचे सोसायटी में ....."
" क्या नीचे ? किसी ने तुझे कुछ किया क्या ? कही टाफी या चाकलेट तो ...?" घबरा कर नीतू अपनी बेटी के पूरे शरीर पर बारीकी से नजर दौड़ाते हुय सवाल पर सवाल पूछती गयी |
"माँ, माँ सुनो तो ....|"
क्या सुनु ? कहा था मैंने न , अकेले कही मत जाना | कुछ हो ....|"
घंटी बजी तो दरवाजा खोलते वक्त भी नीतू डांट ही रही थी बच्ची को |
" 'बीबी जी' मेरी बेटी से गलती हो गयी माफ़ करियेगा |" वो ' बेबी ' नीचे कामवालियों के बच्चो के साथ 'छुक-छुक रेलगाड़ी' खेल रहीं थी | उसी में मेरी बेटी से इनका फ्राक फट गया|" डरती हुई कामवाली बोली|
"ओह ! मेरी तो जान हलक में अटक गयी थी| इतनी देर से 'वो' 'वो' कर रही थी पर यह बात नहीं बताई इसने |"
" मम्मी आप तो डांटती ही जा रही थी, बात कहाँ सुन रही थी मेरी | फ्राक फटने पर ऐसे रियेक्ट कर रही थी जैसे गेम में कपड़े, फटते ही नहीं ...| भैया भी तो पिछले हफ्ते कबड्डी में शर्ट फाड़ के आये थे, उन्हें तो आप ऐसे नहीं डांटी थी |"
"वो, वो ...|"
"देखिए अब 'आप' वो-वो कर रहीं हैं |" तुनक कर अपने कमरे में चली गयी|
बेटी की बात पर नीतू दिल खोल कर हंस पड़ी|  आशंकाओं से पर्दा जो उठ गया था | कामवाली भी स्थिति को भाप हंस पड़ी | सविता मिश्रा

Thursday, 5 February 2015

तमाचा ( लघु कथा )

निष्ठा अपने घर के बरामदे में सहेलियों के संग बैठी थी | जब कभी मंजू तीन चार सहेलियों के साथ होती तो किसी न किसी मुद्दे पर चर्चा गरमा ही जाती थी | लेकिन जल्दी ही हँसी-ठिठोली पर आकर समाप्त हो जाती थी | आज चाय की गर्मागर्म चुस्कियों के साथ ईमानदारी पर बातचीत हो रही थी। अचानक यह बातचीत एक दूसरे पर कटाक्ष में बदलने लगी | मेरा पति ईमानदार तेरा बेईमान साबित करने की मंशा थी जैसे | गर्व पूर्वक स्नेहा ने जैसे ही बोला, "मेरे पति तो बहुत ईमानदार है |" "पति तो मेरा ईमानदार है | वह सब की तरह पद का दुरूपयोग कभी नहीं करता |" कनखियों से स्नेहा की तरफ देखकर व्यंग्यात्मक आवाज में मंजू बोली| स्नेहा को समझते देर नहीं लगी | वह रोष भरी आवाज में बोली , " छोड़ो यार पद का कितना सदुरूपयोग करते हैं यह तो तेरा महल जैसा घर ही चीख--चीखकर गवाही दे देता है। मानो या नहीं मानो ईमानदार तो मेरे ही पति है! " यह सुनते ही निष्ठां ने झट चुटकी ली,, "छोड़ स्नेहा यार ! मलाईदार पद और ईमानदारी!! स्नेहा तुनकती हुई बोली -"तुम्हारे 'वो' की तरह मेरे 'ये' पद का फायदा उठाकर मलाई ही नहीं चाटते रहते है। आठ घंटे कड़ी मशक्कत करते है समझी |" देखो भई ईमानदार तो मेरे पति है! जिस कुर्सी पर है , उस कुर्सी को पाने के लिए खाने वालों की लाइन लगी रहती है| ऐसी कुर्सी पर होकर भी क्या मजाल कि एक पैसे की बेईमानी करें| निष्ठा चाय की चुस्की लेती हुई रोष में बोली | 'मेमसाब', 'साहब' ने ये कम्बल भेजवाये हैं | कहाँ रख दूँ ?" तभी अर्दली की आवाज आई। "क्या जरूरत थी इनकी ?" पास जाकर निष्ठा उसी रोष में बोली। अर्दली सकपकाकर बोला- "कोई जाड़े में बांटने के लिए चार बंडल दे गया था, 'साहब' ने कहा इन बंडलो से दस- बारह निकालकर घर पर रख आओ|" "एसी, टीवी कोई भेजवाता तो ....,!!" रामू को आवाज लगाकर कहा , " रामू इन कम्बलों को ससुरजी वाली अलमारी में रख दो |" फिर बरामदे में पहुँचकर सहेलियों को सुनाती हुई बोली - टीवी खरीदनी मुझे | आजकल मेरे कमरे का टीवी खराब हुआ पड़ा है। कहाँ कितना भ्र्ष्टाचार फैला हुआ है, कोई खबर ही न मिल पा रही है।" कुर्सी पर बैठी ही कि मंजू उठती हुई बोली - "मैं चलती हूँ अब निष्ठा, मेरा भी टीवी ख़राब है, किन्तु भ्र्ष्टाचार की खबरें मिल ही जाती हैं |" खीझते हुए स्नेहा भी उठकर बिच्छू का डंक मार दी। सुनते ही निष्ठा को अपनी कुर्सी चुभने सी लगी | दोनों की बातों का जबाब नहीं बन पड़ रहा था उससे| लेकिन फिर भी ओंठ बुदबुदा उठे - "इस अर्दली के बच्चे को अभी आना था |" #सविता मिश्रा

Tuesday, 3 February 2015

~~पलटी~~

"पलटी"

"का हो लल्लन, कैसन चलतबा तोहार नेतागिरी |"

(क्या हो लल्लन, कैसी चल रही है तुम्हारी नेतागिरी)

"का बताई भईया, इ जब से मोदी आईगा बा न, रच्चिव क रहाईस नाही बा | भागमभाग बा बिल्कुलय, दिन- रात एक करा, पर एक्कव कौड़ी हाथे नाही लागत| और-ता-और केऊ पहिचनबव नाही करत अब| "

(क्या बताये भैया, ये जब से मोदी आयें हैं, थोडा भी आराम नहीं मिल रहा| भागमभाग हमेशा| दिन रात एक करना पड़ रहा, परन्तु एक भी पैसा हाथ नहीं लग रहा| और छोड़िये, कोई पहचान भी न रहा अब|)


"अरे काहे ?" (अरे क्यों ?)

"का बताई, मोदी के पच्छ में, इ न्यूजवा वाले दौड़ लगावत रहथिन न | गवां रहे एक ठनी के दुआरे वोट मांगय, ससुर का नाती कहेस 'के हए तू, हम ता कमल के देब | खबरवा में देखा हम उ मोदी देश के सुधारी दें, ता तोहके दई का आपन वोट ख़राब काहे करी' | आपन अस मोह लेई क रही गये|"

( "क्या बताये, मोदी के पक्ष में, ये न्यूजचैनेल वाले दौड़ लगाते रहते हैं| एक के घर गए थे वोट मांगने, ससुर का नाती कहा कि "कौन हो तुम? हम तो कमल को देंगे वोट| समाचार में देखा हमने, वह मोदी देश को सुधार देगा| तो फिर तुमको देकर वोट ख़राब काहे करें|

अपना सा मुहँ लेके रह गए हम|")

" 'अरे इसन कहेस उ' वइसे लल्लन इ त सही कहेय तू | चमच बनय , और तलवा चाटय के दौड़ में त आजकल न्यूजवा वाले चितवव से भी तेज हयेन |"

(अरे ऐसा कहा उसने, वैसे लल्लन यह तो सही कहा तुमने| चमचा बनने और तलवा चाटने की दौड़ में आजकल न्यूज वाले चीता से भी तेज दौड़ रहें हैं|" )


"हा भईया गिद्ध नज़र गड़ाये रहथिन ससुरे, हमरे पचन पर| मौका पउतय, मारी देथिन झपट्टा , उघाड़ी देथिन सब हमार छुपा-मुदा| अइसय हाल रहा त हमार नेतागिरी त खतमय समझअ |"

(हां भैया, गिद्ध नज़र गड़ाये रहते है ससुरे, हम सब पर| मौका मिलते ही मार देते है छापा, खोल देतें हैं सब अपना छुपा-मुदा हुआ| ऐसा हाल रहा तो हमारी तो नेतागिरी ख़त्म ही समझिये आप|" )_


"ता आगे अब का सोचय|"
(" तो आगे के लिए अब क्या सोचा हैं ?)

"भईया, का बताई , सोचत हई मारी जाई 'पलटी' ...पंजा छोड़ी पकड़ी लेई कमल |"
("भैया क्या बताये, सोच रहें है पार्टी बदल ही डाले|" ) सविता मिश्रा

Monday, 2 February 2015

~~गुमराह~~

अपने पोते को लड़कियों के साथ घर आया देख दादी ने माथा पीट लिया | बेटे को भला बुरा कहती हुई बोली "मन्नू क्या ऐसे संस्कार दिए थे मैंने, जो तूने अपने बेटे को दिया | गुमराह हो गया है तेरा बेटा| देख कैसे लडकियों से खी-खीकर ,लिपट चिपट कर..बात कर रहा है | मेरे बच्चे कितने संस्कारी थे पर तेरे....छी छी क्या जमाना आ गया है |"
पोता माँ के पास जाकर बोला -" किस जमाने से आई है दादी | जाके बता दूँ क्या कि मैंने तो लडकियों से महज दोस्ती की है, भैया तो बंगलौर में अपनी सहकर्मी के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में है| और 'चाचा जी' वह तो राह ही भटक गये थे मेरी दोस्त पर ही .....
" चुप कर बेटा क्यों लंका-दहन करने पर तूला है| एक दो महीनों के लिय गाँव से आई हैं, हंसी-ख़ुशी बीत जाने दे। "
सविता मिश्रा 

Sunday, 1 February 2015

~~हींग लगे न फिटकरी~~

पिता से देसी गाय नहीं जर्सी लेने को लड़ाई करके चार साल पहले महेश गाँव से भाग आया था | पढ़ा लिखा था नहीं, हुनर के नाम पर गाय भैस दुहना आता था|अतः मजबूर हो किसी तरह दोस्त से कर्ज लेकर जर्सी गाय खरीदी पर बांधे कहाँ| खुद ही सड़क किनारे झुग्गी झोपड़ी में रह रहा था|
उसने देखा शहर में जूसऔर फल की दुकानों के सामने अच्छा ख़ासा फल-छिलका कचरा रूप में फैला होता है| महंगाई में अधिक चारा भी खरीदने के पैसे तो उसके पास थे नहीं| बस उसके दिमाक की घंटी बजी| अब सुबह थोड़ा सा चारा डाल दूध दुहता फिर गाय छोड़ देता सड़क पर| कुछ दिन लोग उस पर चिल्लाये, फिर उन्हें लगा कि आकर वेस्ट(waste) ही तो खाती है गंदगी नहीं होती और पुन्य भी हो जाता है| अब तो महेश के दोनों हाथों में लड्डू थे क्योकि ज्यादातर दुकानदार पुचकार-पुचकार दूकान बंद करते-करते सारा खराब फल, सब्जी और छिलके खिला देते| गाय बिना किसी को परेशान करें रोज वही चक्कर लगाती और सारा कुछ खा चुपचाप अपने मालिक के पास सड़क किनारे बैठ जाती|
पिता को दस हजार भेजते हुय उसने चिट्ठी में लिखा, देखा पिता जी कहता था न देशी गाय में नहीं जर्सी में फायदा है| हमारी चिंता ना करना यहाँ हींग लगे न फिटकरी पर रंग चोखा ....| सविता मिश्रा