Tuesday, 25 October 2016

खुलती गिरहें (गिरह ) -

पत्नी और माँ के बीच होते झगड़े से आज़िज आकर बेटा माँ को ही नसीहतें देने लगा | सुनी-सुनाई बातों के अनुसार माँ से बोला - "बहू को बेटी बना लो मम्मा, तब खुश रहोगी |"
"बहू ! बेटी बन सकती है?" पूछ अपनी दुल्हन से |"  भौंहों को चढ़ाते हुए पूछा |
"हाँ, क्यों नहीं ?" आश्वस्त हो, बेटा ही बोल पड़ा |
"ठीक से एक बहू तो बन नहीं पा रही है, बेटी क्या खाक बन पायेगी वह |" गुस्से से माँ ने जवाब दिया |
"कहना क्या चाहती हैं आप माँजी, मैं अच्छी बहू नहीं हूँ ?" सुनते ही तमतमाई बहू कमरे से निकलकर बोली |
"बहू तो ठीक-ठाक है, पर तू बेटी नहीं बन सकती |"
"माँ जी, मैं बेटी भी अच्छी ही हूँ | आप ही सास से माँ नहीं बन पा रही हैं |"  बहू ने अपनी बात कही। 
"जब मेरे सास रूप से तुम्हारा यह हाल है, तो अगर मैं माँ बन गयी तो तुम तो मेरा जीना ही हराम कर दोगी।" सास ने नहले पर दहला मारा | 
"कहना क्या चाह रही हैं आप?"  अब भौंहें तिरछी करने की बारी बहू की थी | 
"अच्छा ! फिर तुम ही बताओ, मैंने तुम्हें कभी बेटी सुमी की तरह मारा, कभी डांटा, या कभी कहीं जाने से रोका !" सास ने सवाल किया |
"नहीं तो !" छोटा-सा ठंडा जवाब मिला |
बेटा उन दोनों की बहस से आहत हो बालकनी में पहुँच गया था |
"यहाँ तक कि मैंने तुम्हें कभी अकेले खाना बनाने के लिए भी नहीं कहा | न ही तुम्हें अच्छा-खराब बनाने पर टोका, जैसे सुमी को टोकती रहती हूँ |" बहू को घूरती हुई सास बोली।
"नहीं माँ जी, नमक ज्यादा होने पर भी आप खा लेती हैं सब्जी !"  आँखे नीची करके बहू बोली।
"फिर भी तुम मुझसे झगड़ती हो ! मेरे सास रूप में तो तुम्हारा ये हाल है।  यदि माँ बनकर कहीं मैं तुमसे सुमी जैसा व्यवहार करने लगूंगी तो तुम तो मुझे शशिकला ही साबित कर दोगी !" कहकर सासू की बहू पर टिकी सवालिया निगाहें जवाब सुनने को उत्सुक थीं।
कमरे से आती आवाजों के आरोह-अवरोह पर बेटे के कान सजग थे | चहलकदमी करता हुआ वह सूरज की लालिमा को निहार रहा था |
"बस करिए माँ ! मैं समझ गयी | मैं एक अच्छी बहू ही बन के रहूँगी|" सास के जरा करीब आकर बहू बोली।
"अच्छा!"
बहू आगे बोली- "मैंने ही सासू माँ नाम से अपने दिमाग में कँटीली झाड़ियाँ उगा रखी थीं | सब सखियों के कड़वे अनुभवों ने उन झाड़ियों में खाद-पानी का काम किया और मेरे मन में ज़हर भारत गया |"
सास बोलीं- "उनकी बातों को तुमने सुना ही क्यों ? यदि सुना तो गुना क्यों ?"
बेटे ने बालकनी में पड़े गमले के पौधे में कली देखी तो उसे सूरज की किरणों की ओर सरका दिया |
"गलती हो गई माँ ! आज से उन पूर्वाग्रह रूपी झाड़ियों को नेस्तनाबूद करके, अपने दिमाग में प्यार का उपवन सजाऊँगी | आज से क्यों ! अभी से। अच्छा बताइए, आज क्या बनाऊं मैं, आपकी पसंद का ?" बहू ने मुस्कराकर कहा |
"दाल भरी पूरी ..! बहुत दिन हो गए खाये हुए।" कहते हुए सास की जीभ, मुँह से बाहर निकल ओंठों पर फैल गई |
धूप देख कली मुस्कराई तो, बेटे की उम्मीद जाग गयी | कमरे में आया तो दोनों के मध्य की वार्ता, अब मीठी नोंकझोक में तब्दील हो चुकी थी |
सास फिर थोड़ी आँखे तिरछी करके बोली- "बना लेगी..?"
"हाँ माँ, आप रसोई में खड़ी होकर सिखायेंगी न !!" बहू मुस्करा के चल दी रसोई की ओर |
बेटा मुस्कराता हुआ बोला, "माँ, मैं भी खाऊँगा पूरी |"
माँ रसोई से निकल हँसती हुई बोली, "हाँ बेटा, जरुर खाना ! आखिर मेरी बिटिया बना रही है न |"
बालकनी के साथ सोंधी खुशबू से रसोई भी महक उठी |
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Saturday, 22 October 2016

~~ठंडा लहू ~~



हिंदी साहित्य डेढ़ सौ रूपये किलो का बैनर देख एक व्यक्ति दुकानदार से बोला "परशुराम जी की किताब मिलेगी क्या ?"
दुकानदार की आँखों में चमक आ गयी | हाँ साहब क्यों नही मिलेगी | उनकी किताब तो कई है मेरे पास| आपको कौन सी चाहिए ?"
'दूर के परिंदे' लघुकथा संग्रह ! और भी जो उनकी कथा संग्रह तीन-चार किलो भी हों जाए तो भी दे दो सब |"
"लगता है आप पढ़ने के शौकीन है लघुकथाओं तथा कहानियों के |"
"नहीं ऐसा कुछ नहीं है| मैंने सुना है वो शायद चल बसे | दसियों साल से किसी साहित्यिक कार्यक्रम या गोष्ठी में नहीं दिखे वह | आज की नई जनरेशन उनको भूल गयी हैं |"
"तो आप उनको पढ़-जानकर उन्हें खोजना चाहते है !" ख़ुशी चेहरे पर छुपाए न छुप रही थी | उनकी कथाओं का प्रचार कर उन्हें प्रसिद्धि दिलाना चाहते हो!" अनगिनत ख्बाब आँखों में जैसे पलने को आतुर हो उठे |
"तुम्हें क्या करना इससे? और हाँ ध्यान रहें ऐसे प्राकशक की तौलना जो हलके पेज वाली पुस्तक छापता हो | भले किसी और कथाकार की एक दो रखनी पड़े तराजू पर |"
थोड़ा मायूस हुआ दूकानदार कि सस्ते में भी और सस्ता माल चाहिए इन्हें | लगता हैं सच में मुझे कोई नहीं पढ़ना चाहता है|
"पर साहब आपको चाहिए क्यों ?" पैसा हाथ में लेता हुआ दूकानदार फिर चिहुँक कर पूछ बैठा | कान शायद सुनना चाहते थे कि कोई तो है जो परशुराम यानि मुझे पढ़ना चाहता है |
"बस उनकी कथाओं के कथ्य में हल्का फेरबदल कर अपनी लघुकथा संग्रह छपवाऊँगा| उनको इस जमाने के लोग जानते भी नहीं और न पढ़े ही है कभी उनकी कथाएँ |"
"तो आप कैसे जानते है उन्हें ?" रोष छुपाते हुए दूकानदार बोला |

"पिताजी कहते थे बहुत अच्छे लघुकथाकार थे वह | लिखना है तो उनकी कथाएँ गहराई से पढ़ो | आजकल तो तुम जानते ही हो सब ऐसे ही खेल चलता है| साहित्य बेचते-बेचते इतना अनुभव तो तुम्हें भी हो ही गया होगा | आखिर ये बाल धूप में तो सफेद नही ही हुए होंगे तुम्हारें|" व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ ग्राहक बोला |

"हाँ साहब,बस लहू न सफ़ेद हो रहा |"



चित्र पर आधारित लघुकथा..नया लेखन ग्रुप में विजेता बनी

Tuesday, 18 October 2016

रीढ़ की हड्डी

बेहोशी से उबरी बीनू ने देखा कि बच्चे सब्जी-रोटी खा रहे हैं।
उसे संतोष हुआ कि बच्चे उसकी बीमारी की वजह से कम से कम भूखे नहीं रह रहे | खाना खत्म करके वे जैसे ही उसके पास बैठे, वह पूछ बैठी - "पिंकी, खाना किसने बनाया ? पड़ोस वाली आंटी ने ?"
"नहीं, पापा ने बनाया |"
"पापा ने !"
"हाँ, पापा ने! सुबह उन्होंने नाश्ता भी बनाया था ! फिर बर्तन धोए | झाड़ू-पोंछा भी किया आपकी तरह | और दोपहर में दाल-चावल भी बनाये थे पापा ने |"
"तुम दोनों ने मदद न की पापा की?"
"नहीं, पापा ने कहा आज मैं करता हूँ | तुम दोनों हस्पताल में रहो, अपनी मम्मी के साथ | "
"कहाँ है तेरे पापा ?"
"डॉक्टर ने आपकी दवा लाने के लिए भेजा है।" पिंकी ने बताया |
तभी, दरवाजे पर पापा को देखते ही टिंकू बोला- "लो, आ गए पापा |"
"बीनू उठो, दवा खा लो| टिंकू एक गिलास पानी दे बेटा |" निकट आकर पति ने कहा।
"आप ! परन्तु आप कैसे आ गये? छुट्टी मिल गयी क्या?" सवालों की बौछार लगा दी उसने।
"हाँ, मिल गयी | पूरे पन्द्रह दिन अब मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा |"
"इत्ते दिन !"
"हाँ..!"
"मुझे तो समझ ही न आ रहा था कि कैसे होगा... ये बीमारी भी अचानक | कोई रिश्तेदार भी तो नहीं जो महीना- पन्द्रह दिन आ जाए...। "
"चिंता न कर बीनू, सब हो जायेगा| मैं हूँ न!"
"इतनी बार परेशानी आई | हास्पिटल के चक्कर अकेली ही लगाती रही थी | इस बार कैसे आपके अफ़सर की मेहरबानी हो गई ?"

"पुलिस अधिकारी भी जानते है कि बच्चों पर कोई समस्या आएगी तो बीवी झेल लेगी, परन्तु बीवी ही बीमार हो जाएगी तो फिर कौन संभालेगा | इसलिए फटाफट सेंक्शन कर दी छुट्टी |"
"यानि रीढ़ की हड्डी हूँ मैं आपकी |"
"हाँ, वो तो हो ही बीनू | बिना किसी शिकायत के अकेली ही सब- कुछ सम्भालती रही हो |"
"पर पन्द्रह दिन तो आप हो, हमारी रीढ़ की हड्डी |" कहते हुए मुस्करा दी बीनू |
"हाँ भई, अभी तक सरकारी नौकर था, पन्द्रह दिन 'नौकर बीवी का' हूँ |
दोनों ही खिलखिला पड़े |
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सविता मिश्रा

प्रदत्त विषयाधारित लघुकथा: (पति का एक दिन) नया लेखन ग्रुप में लिखी १८/२०१६ में |
'सपने बुनते हुए' साँझा संग्रह में प्रकाशित जुलाई २०१७ में 

Monday, 17 October 2016

सबक ~


भोर सी मुस्कराती हुई भाभी साज सृंगार से पूर्ण अपने कमरे से निकली।
"अहा भाभी, आज तो आप नयी नवेली दुल्हन सी लग रही हैं, कौन कहेगा शादी को आठ साल हो गए हैं।" ननद ने अपनी भाभी को छेड़ा।
"हाँ! आठ साल हो गए पर खानदान का वारिस अब तक न जन सकी।" सास ने मुँह बिचका दिया।
"माँ, भी न ! जब देखो भाभी को कोसती रहती हैं। सोचते हुए वह भाभी की और मुखातिब हुई- "भाभी मैं आपके कमरे में बैठ जाऊँ? मुझे 'अधिकारों की लड़ाई' पर लेख लिखना है।"
"सुन सुधा, सुन तो! तू माँ के ....|" भाभी की बात अधूरी रह गयी थी और वह कमरे में जा पहुँची थी।
"भाभी यह क्या ? आपका तकिया भीगा हुआ है। किसी बात पर लड़ाई हुई क्या भैया से !"
"वह रात थी सुधा, बीत गयी। सूरज के उजाले में तू क्यूँ पूरी काली रात देखना चाह रही है।"
"काली रात का तो पता नहीं भाभी! परन्तु रात का स्याह अपनी छाप तकिये पर छोड़ गया है और इस स्याह में भोर सा उजास आप ही ला सकती हैं।"
सुधा अनायास ही गंभीर हो गयी थी और इधर उसका लेख 'अधिकारों की लड़ाई' भाभी के दिमाग में सबक बन कौंध रहा था।
--००---
#सविता
रात विषय आधारित इस लिंक पर
https://www.facebook.com/groups/540785059367075/permalink/991128497666060/

(जिंदगीनामा:लघुकथाओं का सफर में रात विषय पर आधारित करके लिखा १६ अक्तूबर २०१६ में )

Wednesday, 5 October 2016

स्त्रीत्व मरता कब है

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जंगलो में भटक-भटककर नक्सली लड़कियाँ थकान से पूरी तरह से टूट चुकी थीं | थोड़ा आराम करना चाहती थीं | भारी कदमो से ऐसे स्थान की तलाश में थीं, जहाँ वो थोड़ी देर बिना किसी भय के आराम कर सकें | तभी एक तरफ से संगीत की मधुर आवाज कानों में पड़ते ही सभी ठिठक गयीं | न चाहते हुए भी वे मधुर आवाज की ओर खींचती हुई चली गयीं | जैसे शहद की ओर मक्खी खिंची चली आती है वैसे ही वो आवाज़ की ओर बढ़ते-बढ़ते गाँव के बीचोबीच आ पहुँची थीं | वहां पहुँचकर एक सुरक्षित टीले पर चढ़कर आव़ाज कि दिशा में निगाहें दौड़ा दीं | दूर एक स्कूल में 'कुछ सुकोमल सुसज्जित लड़कियों को देख' ग्लानी से भर उठी |
उधर सुसज्जित लड़कियां संगीत की धुन पर थिरक रही थीं, इधर नक्सली भेष में वो सभी अपनी स्थिति पर अफ़सोस कर रही थीं।
"देश भक्ति के गीत पर थिरकती युवतियाँ कितनी सुन्दर लग रही है |" उसमें से एक बोली |
"हाँ ! बालो में गजरा, सुन्दर साड़ी, चेहरे पर एक अलग ही लालिमा छायी है इनके |" दूसरी ने हुंकारी भरकर उन नाचतीं हुई लड़कियों को फटी आँखों से देखते हुए कहा |
पहली बोली - "हमें देखो, बिना शीशा कंघी के ! कसकर बांधे हुए बाल, लड़को से ये लिबास, कंधे पर भारी भरकम राइफल, दमन कारी अस्त्र शस्त्र लादे, जंगल-जंगल भटक रही हैं |"
सरगना हुलसकर बोली- "हम भी तो इन्हीं की तरह थे, सुकोमल अंगी-खूबसूरत | किन्तु आज देखो कितने कठोर हो गये हैं | समय ने हम सब में बहुत--सा परिवर्तन ला दिया है | एक भी त्रियोचरित्र गुण नहीं रह गया हम सब में |"
दूसरी ने भी हाँ में हाँ मिला कर कहा- "जिसे देखो हमें रौंदकर आगे बढ़ जाता है | सारे सपने चकनाचूर हो गये | कहने को कोई अपना नहीं इन हथियारों के सिवा |"
उस नक्सली ग्रुप की सबसे छोटी सदस्य ने वितृष्णा से भरकर कहा- "ये हथियार भी तो हमारी अस्मिता की रक्षा कहाँ कर पाए, हाँ खूनी जरुर बना दिए हमें |
सरगना मायूस होकर बोली- "हाँ, अब तो बदनाम ही है नक्सलाईट के नाम से | ये गाँव वाले भी हम सब से डरते हैं | यह क्या जाने असल में डरते तो हम सब हैं इनसे | तभी तो बन्दूक लेकर चलते हैं | छुप-छुपकर रहते हैं जंगलों में कि कहीं हम पर इनकी नजर न पड़ जाये और यह हमारी ख़बर पहुँचा दें पुलिस तक |"
पहली उचटती हुई बोली - "हाँ, सरकार तो हम सब के खून की प्यासी है ही | वह यह थोड़ी देखेंगी कि हमें फंसाया गया है | हमारा अपरहण करके हमें इस दलदल में धकेल दिया गया | और जब बुरी तरह फंस गये, तो इन हथियारों को पकड़ाकर हमें झोंक दिया ! अपनों को ही मारने के लिए | हम सबका शौक थोड़ी था खूनखराबा करना | "
सब के मन की पीड़ा सुनकर सरगना ने आपसी सहमती से निर्णय लिया | सभी नक्सली लड़कियाँ एक दूजे की आँखों में देखकर उस निर्णय पर अवलम्ब क़दम बढ़ा दीं | धीरे-धीरे सब ऐसे स्थान पर आ गयीं, जहाँ पर पुलिसवालों की नजर उन पर पड़ सकें |
आज शायद १५ अगस्त था, अतः पूरे लाव-लश्कर के साए के तले गाँव वाले आज़ादी का जश्न मना रहे थे | आखिरकार किसी पुलिस वाले की निगाह उन नक्सली लड़कियों पर पड़ ही गयीं, जो मग्न थी जश्न देखने में | लेकिन यह भी चाहती थीं कि पुलिस वाले, या गाँव के मुखबीर उन्हें देखें |
सभी गाँव वाले, पुलिसवालों के साथ मिलकर नक्सली लड़कियों को चारो तरफ से घेरकर धर दबोचे | अपने को घिरा हुआ देखकर भी उनके चेहरे पर तनिक भी शिकन नहीं थी | यहीं तो चाहती थीं सब की सब | पुलिस अपने कामयाबी पर फूले नहीं समा रही थीं और नक्सली लड़कियां मंद- मंद मुस्करा, त्रियोचरित्र सपने बुन रही थीं | उन चंद क्षणो में हजारों सपने देख डाले होंगे उन्होंने |
स्वतंत्रता के दिन समर्पण या अपने हथियार डाल देने वालें नक्सली, मुख्यधारा में शामिल कर लिए जायेंगे | ससम्मान समाज में उन सबके रहने की व्यवस्था की जाएगी | शहर में चीफ़ मिनिस्टर के सामने पहुँचने पर जैसे ही यह ज्ञात हुआ तो वो सब अपने निर्णय पर गर्वान्वित हों उठीं |
सभी मुख्यधारा में शामिल होने का, मन ही मन जश्न मना रही थीं | आज भटकाव के रास्ते से लौट आने की ख़ुशी भी उन सबके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी | बिना किसी साज सृंगार के कालिख पूते चेहरे पर स्त्रियोचित लालिमा इतराने लगी थी | आँखों का भय कहीं कोने में दुबककर बैठ गया था, अब उन्हीं आँखों में हया तैर रही थी | नाचती हुई स्त्रियों के चूड़ियों की खनखन उन्हें अपनी कलाइयों पर महसूस होने लग रही थी |
सब एक दूजे की ओर देखकर मुस्करा पड़ी | आँखों ही आँखों से जैसे कह रही थीं - "स्त्रीत्व मरता कब है ! देखो आज इतने सालों बाद आखिर जाग ही गया | आज भटकाव के रास्ते से लौट आने की ख़ुशी भी उन सबके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी | बिना किसी संगीत के और बिना नृत्य की किसी भावभंगिमा के उनका पूरा तन-मन थिरक रहा था | उन सबने अपने अंदर पनपे मर्दानेपन को पल भर में ही थपकी देकर सुला दिया था और उनमें स्त्रीत्व काली घनी रात के बाद आयें भोर की भांति अंगडाई ले चुका था | लाल-नीले-पीले परिधानों में सजी सभी बहुत सुंदर दिख रही थीं .!.....सविता मिश्रा
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12 July 2014 को नया लेखन - नए दस्तखत में स्त्रीत्व मरता कब है कथा लिखी थी बाद में कहानी बना दिए

Monday, 3 October 2016

पहला इम्प्रेशन (पहली कहानी)

"मम्मी ......... कहाँ हो आप !"
"क्या है छवि ? मैं छत पर हूँ, आ रही हूँ! क्या हुआ, क्यों चीखे जा रही हो?"
"मम्मी मम्मीईईई" छवि बड़ी तेज बोली।
"अरे बाबा क्या हुआ आती हूँ! सीढियों पर गिरकर पैर थोड़े ही तोड़वाने हैं |"
"हाँ, बता क्या हुआ! स्कूल में किसी से लड़कर आई है क्या ?"
"नहीं मम्मी, टीचर ने कहा है पत्र लिखकर ले आना ट्यूशन पर देखूँगी |"
"अच्छा-अच्छा पहले खाना खा ले। फिर लिखवाती हूँ तेरा पत्र..! ट्यूशन तो चार बजे से है न! अभी तो बस ढाई बजे है। हाथ मुहँ धो कर कपड़ें बदल ले पहले । तब तक मैं खाना गरम कर देती हूँ |"
खाना जल्दी-जल्दी ख़त्म करके छवि कापी-पेन लेकर बैठ गयी । "मम्मी जल्दी करिए|" बर्तनों की आवाज सुनकर छवि ने आवाज लगाई।
रूपा ने विषय को देखकर बोला - "अरे इतना तो सरल विषय दिया है ! पापा को ही तो पत्र लिखना है। वह भी तू खुद से नहीं लिख सकती!"
"अरे मम्मी अब लेक्चर मत दीजिए, लिखवा दीजिए ना। आप लिखवाएंगी तो पहले दिन ही मेरा इम्प्रेशन अच्छा जमेगा |" बिटिया की बात सुनकर रूपा जोर से हँसी और फिर लिखवाने लगी पत्र |
बिटिया को सहेजकर ट्यूशन भेजते ही रूपा अपने पुराने दिनों में खो गयी। जब वह अपने पापा को ख़त लिखती थी। वह भी क्या दिन थे। पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्र खूब चलते थे| आजकल के बच्चे तो जानते ही नहीं ये किन बलाओं के नाम हैं | बस विषय के एक भाग के रूप में पत्र लेखन करते हैं। असलियत में तो पत्र लिखना जैसे भाता ही नहीं, बस फेसबुक और ह्वाट्स एप्स पर खूब लिखवा लो स्टेट्स- मैसेज वगैरह |
हमारे जमाने में ये सब कहाँ थे! पत्र ही चलते थे । खूब लिखे पत्र रिश्तेदारों को, पति महोदय को । पति का ख्याल आते ही मन ही मन मुस्करा उठी रूपा|
पति को लिखे गये पत्र तो सहेजकर रखे भी हैं इतने सालो तक। ये आज की पीढ़ी इन भावो को क्या-कैसे संभालेगीं ! कम्प्यूटर और मोबाईल मैमोरी में क्या !! जमाना कितना बदल गया। सोचते ही अनमनी होकर, अतीत और भविष्य में तालमेल बैठाने लग गयी |
पत्र के विषय में सोचते-सोचते रूपा अचानक अलमारी में सहेजे पति के पत्र निकालकर, पढ़ते-पढ़ते खो सी गयी थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी। जल्दी-जल्दी पुराने पर्स में फिर से पत्रों को सहेज अलमारी में छुपाकर रख दिया और दरवाजा खोलने चली गयी|
बिटिया दरवाजा खोलते ही चहक उठी, "मम्मी, मम्मी" रूपा बोली, "अरे बता तो क्या हुआ?"
"मम्मी टीचर ने कहा तुम्हारी हिंदी तो बहुत अच्छी है, बहुत सुन्दर लिखा है तुमने| सारे बच्चों ने खूब ताली बजायी मेरे पत्र को सुनकर और हाँ टीचर ने भी|"
"अच्छा तब तो तुम्हारा इम्प्रेशन खूब अच्छा पड़ा न?" रूपा मुस्करा कर बोली|
"हाँ मम्मी, पर..!"
"..पर क्या?" रूपा थोड़ा आश्चर्य से बोली
"..मम्मी मैंने टीचर को सच भी बता दिया बाद में, कि पत्र आपने लिखवाया है। उन्होंने आपका मोबाइल नंबर माँगा मुझसे। पता नहीं वो मेरी शिकायत शायद आपसे करेंगी ! मम्मी आप संभाल लेना | मैं अब खेलने चली। ठीक जाऊ न?" खिलखिलाती हुई छवि बोली..।
रूपा आशंका से भर गयी । मुस्कराहट का लबादा ओढ़कर कहा - "अच्छा ठीक है जाओ, पर आधे घंटे में आ जाना अच्छा! आधे घंटे मतलब आधे घंटे ही समझी|"
रूपा भी अपने काम में लग गयी तभी मोबाइल बज उठा, उठाते ही आवाज आई- "आप छवि की मम्मी बोल रही हैं?"
रूपा समझ गयी कि ये छवि की टीचर ही होंगी । वह सफाई देना ही चाहती थी कि उधर से आवाज आई-
"आपकी बिटिया बहुत प्यारी और साफदिल की है। उसकी यह साफगोई बनी रहे इसका आप ख्याल रखियेगा। आजतक बहुत बच्चों को मैंने पढाया है, पर ऐसे बच्चें आज के जमाने में कहाँ मिलते हैं ! वह चाहती तो नहीं बताती, किन्तु उसने बताया की आपने उसकी मदद की है। पढ़ने में भी खूब अच्छी है। मेहनती है, खूब आगे बढ़ेगी।"
रूपा ने सकुचाते हुए कहा कि "आप उसका ख्याल रखियेगा।" उन्होंने भी भरोसा दिलाया .."आप चिंता ना करें, मैं अपने बच्चों को खूब मेहनत से पढ़ाती हूँ।"
"बस भेजने में डर रहीं थी कि आने जाने में..!"
"आप डरिये नहीं। मैं बच्चों को समय से छोड़ भी देती हूँ। जिस दिन भी देर हो, या आपको लगे कि मैं अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रही हूँ आप निसंकोच फोन कर सकती हैं।"
मोबाईल पर टीचर से बात करने के बाद रूपा गदगद और आश्वस्त हो चुकी थी कि एक अच्छी शिक्षक मिल गयी है बिटिया को | वर्ना आज कल के शिक्षकों को तो पैसों की ही भूख है, बच्चें के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की भूख कहाँ दिखती है किसी शिक्षक मेँ !! और न ही आजकल के शिक्षक अपने कार्य में हस्तक्षेप पसंद करते हैं | ये तो सामने से खुद कह रही हैं कि टोंक दीजियेगा हमें, यदि पढ़ाने में कोई कमी दिखें |
फोन रखकर बुदबुदाई- "शिक्षक हों तो ऐसे |" मन ही मन मुस्कराते हुए फिर अपने काम में लग गयी |...सविता मिश्रा 'अक्षजा'
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जय विजय वेब पत्रिका में छप चुकी

~पुरानी खाई -पीई हड्डी~लघुकथा अनवरत में छपी हुई (२०१६)


अस्त्र-शस्त्रों से लैस पुलिस की भारी भीड़ के बीच एक बिना जान-जहान के बूढ़े बाबा और दो औरतों को कचहरी गेट के अन्दर घुसते देख सुरक्षाकर्मी सकते में आ गए |
"अरे! ये गाँधी टोपीधारी कौन हैं ?"
"कोई क्रिमिनल तो न लागे, होता तो हथकड़ी होती |"
"पर, फिर इतने हथियारबंद पुलिसकर्मी कैसे-क्यों साथ हैं इसके ?" गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी आपस में फुसफूसा रहे थे |
एक ने आगे बढ़ एक पुलिसकर्मी से पूछ ही लिया, "क्या किया है इसने? इतना मरियल सा कोई बड़ा अपराध तो कर न सके है |"
"अरे इसके शरीर नहीं अक्ल और हिम्मत पर जाओ !! बड़ा पहुँचा हुआ है| पूरे गाँव को बरगलाकर आत्महत्या को उकसा रहा था |" सिपाही बोला
"अच्छा! लेकिन क्यों ?" सुरक्षाकर्मी ने पूछा
"खेती बर्बाद होने का मुआवज़ा दस-दस हजार लेने की जिद में दस दिन से धरने पर बैठा था | आज मुआवज़ा न मिलने पर इसने और इसकी बेटी,बीबी ने तो मिट्टी का तेल उड़ेल लिया था | मौके पर पुलिस बल पहले से मौजूद था अतः उठा लाए |"
"बूढ़े में इसके लिए जान कैसे आई ?" सुरक्षाकर्मी उसके मरियल से शरीर पर नज़र दौड़ाते हुए बोला|
"अरे जब भूखों मरने की नौबत आती है न तो मुर्दे से में भी जान आ जाती है, ये तो फिर भी पुरानी खाई -पीई हड्डी है |" व्यंग्य से कहते हुए दोनों फ़ोर्स के साथ आगे बढ़ गया |

"गाँधी टोपी में इतना दम, तो गाँधी में ..." सुरक्षाकर्मी बुदबुदाकर रह गया |#सविता
नया लेखन ग्रुप में लिखी हुई
25 September 2015