Sunday, 1 September 2013

स्वार्थ पूर्ति -


बेटा शादी के चार साल बाद
अपने ही घर आया था
उसे देख माँ फूले नहीं समाई
ढेर सारे पकवान बना लाई |

देख रहा था बेटा उसे बड़े गौर से
फिर प्यार जता बोला उससे ठौर के
माँ ! थक जायेगी इतना क्यों कर रही है ?
आराम किया कर तू अब बूढी हो गयी है
माँ का एक प्यारी सी थपकी देकर कहना
बुड्ढा होगा तेरा बाप !
अभी तो मुझ में हिम्मत है
इन बूढी हड्डियों में अभी बड़ा दम है
तेरे जैसे जवानों पर मैं भारी हूँ
मेहनत से मैं कभी नहीं हारी हूँ |

बस फिर क्या था
बेटे के चेहरे पर आई
एक रहस्यमयी मुस्कराहट
बेटे ने करते-करते भोजन
कहा पिता से छुपाकर घबराहट
आप दोनों रहते हैं यहाँ अकेले
जमाना खराब है ये चिंता क्यों झेले
सदैव हमारा मन रहता है अटका
सशंकित और लगा रहता है खटका
आप दोनों चलिए न हमारे साथ
बेच दीजिये ये सारी जमीन-जायदाद
वहाँ बड़ा-सा तीन कमरों का घर है
आपकी बहू और पोते-पोती भर हैं
अच्छे से आप दोनों वहाँ रहेगें
और हम भी चिंता में नहीं घुलेगें |

बेटा माँ-बाप को घर अपने लाया
उन्हें देख पत्नी का चेहरा उतर आया
नाराजगी जताते हुए वह बोली
उठा लाये क्यों इस महंगाई में
कौन दो को और झेलेगा
बुड्ढे-बुड्ढी की तानाकसी और
टोका-टाकी दिन-रात ही सहेगा |

बेटे ने बड़े प्यार से समझाया
पत्नी को थोड़ा तब समझ आया
आज खुशहाल परिवार है
न कामवाली की चिकचिक
न भोजन-वाली की झिकझिक
आया जो की महत्वपूर्ण है उसे क्यों भूलें
अब तो दादी के गोद में उनके बच्चें झूले |

दोनों नौकरी पर निकल जाते हैं
थके हारे घर आ आराम पाते हैं
प्यार से भोजन करके सो जाते हैं
दो बोल बोलने से भी जी चुराते हैं |

माँ-बाप भी खुश हैं कि
चलो कोई बात नहीं
पोता-पोती के सुख के आगे
इस छोटे से दुःख की औकात नहीं
अपने ही तो कलेजे के टुकड़े हैं
जब तक हिम्मत है किये जाते हैं
एक दूजे की स्वार्थ पूर्ति की ख़ुशी
एक दूजे में ही बाँटकर जिए जाते हैं |

आखिर हमें भी तो नन्हें बच्चों को देख
दुनिया भर की ख़ुशी मिल जाती है
इस ख़ुशी के लिए ही तो
दादी-दादा तरस जाते हैं
थोड़ी से समझदारी से ही
उजड़े घर सँवर जाते हैं ||.

.सविता मिश्रा 'अक्षजा'

2 comments:

Abhay Mishra said...

बहुत हि सुन्दर और उम्दा रचना सविता बहन

Savita Mishra said...

बहुत बहुत आभार अभय भैया