Thursday, 12 September 2013

++दिल की बात ++


उफ़ अपने दिल की बात बतायें कैसे
दिल पर हुए आघात अब जतायें कैसे|

दिल का घाव नासूर बना
अब मरहम लगायें कैसे
कोई अपना बना बेगाना
दिल को अब यह समझायें कैसे|

कुछ गलतफहमी ऐसी बढ़ी
बढ़ते-बढ़ते बढती ही गयी
रिश्तें पर रज जमने सी लगी
दिल पर पड़ी रज को हटायें कैसे|

उनसे बात हुई तो सही पर
बात में खटास दिखती रही
लगा मानों वह हमें ही गलत
ठहरातें रहे अपनी ही बातों में
उनकी बातें लगी बुरी हमें पर
दिल पर पत्थर रख पायें कैसे|

पत्थर रख भी बात बढ़ायें हम
अपनापन जातयें पर टीस सी रही
एक मन में लकीर पड़ती गयी
अब उस लकीर को हटायें कैसे
दर्दे दिल समझाता रहा खुद को
पर इस दर्द को मिटायें कैसे|

अपनों ने ही ना समझा हमें
गैरों की क्या शिकवा करें
घमंडी साबित किया हमें
दुःख हुआ दिल को बहुत ही
फिर बताओं हम इस टूटे हुए
दिल को अब समझाएं कैसे|| सविता मिश्रा

1 comment:

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर सार्थक प्रस्तुति...