Wednesday, 5 October 2016

~स्त्रीत्व मरता कब है~


१२/७/२०१४में लिखी =============

नक्सली लड़कियाँ जंगलो में भटक भटक थकान से टूट चुकीं थीं| थोड़ा आराम करना चाहती थीं | तभी संगीत की मधुर आवाज सुन ठिठक गयीं| ना चाहते हुए भी वे मधुर आवाज की ओर खींचती हुई चलीं गयीं| गाने की मधुर आवाज की ओर बढ़ते-बढ़ते, वह गाँव के बीचोबीच आ पहुँचीं| एक सुरक्षित टीले पर चढ़ 'कुछ सुकोमल सुसज्जित लड़कियों को देख' ग्लानी से भर उठी|

"देश भक्ति के गीत पर थिरकती युवतियाँ कितनी सुन्दर लग रही है|"उसमें से एक बोली|
"हाँ बालो में गजरा, सुन्दर साड़ी, चेहरे पर एक अलग ही लालिमा छायी है इनके |" दूसरी ने हुंकारी भरके बोला |
पहली बोली -" हमें देखो, बिना शीशा कंघी के, कसकर बांधे हुए बाल, लड़को से लिबास, कंधे पर भारी भरकम राइफल, दमन कारी अस्त्र शस्त्र लादे, जंगल जंगल भटक रहीं हैं |"
सरगना बोली- "हम भी तो इन्ही की तरह थे सुकोमल अंगी, पर आज देखो कितने कठोर हो गय हैं| समय ने हममें बहुत परिवर्तन कर दिया है| एक भी त्रियोचरित्र गुण नहीं रह गया हममें|"
दूसरी ने भी हाँ में हाँ मिला कर कहा- "जिसे देखो हमें रौंदकर आगे बढ़ जाता है| सारे सपने चकनाचूर हो गये| कहने को कोई अपना नहीं इन हथियारों के सिवा|"
सबसे छोटी वाली ने कहा- " ये हथियार भी हमारी अस्मिता की रक्षा कहाँ कर पाए, हाँ खुनी जरुर बना दिए हमें|
सरगना मायूस होकर बोली- "हाँ, अब तो बदनाम ही है नक्सलाईट के नाम से| हम सब से ये गाँव वाले डरते है| यह क्या जाने असल में डरते तो हम सब हैं इनसे| तभी तो बन्दूक लेकर चलते| छुप-छुपकर रहते जंगलों में कि इनकी नजर न कहीं हम पर पड़ जाये और यह हमारी ख़बर पहुँचा दे| सरकार तो हम सब के खून की प्यासी है ही|"

सरगना की सहमती से सभी नक्सली लड़कियाँ एक दूजे की आँख में देख कर, एक कड़ा फैसला लेने का निश्चय कर लिया | कठिन निर्णय लेते ही, धीरे-धीरे ऐसे स्थान पर आ गयीं, जहाँ से पुलिसवालों की नजर उन पर पड़ सकें|

आज शायद १५ अगस्त था, अतः पूरी लाव लस्कर के साए के तले, गाँव वाले जश्न मना रहे थे| किसी पोलिस वाले की निगाह उन नक्सली लड़कियो पर पड़ गयीं जो मग्न थी जश्न देखने में| लेकिन यह भी चाहतीं थीं कि पुलिस वालें उन्हें देखे |

सभी गाँव वाले और पुलिसवालें मिलकर, नक्सली लड़कियों को धर दबोचे| यहीं तो चाहतीं थीं सब की सब | पुलिस अपने कामयाबी पर फूले नहीं समा रही थीं और नक्सली लड़कियां मंद मंद मुस्करा, त्रियोचरित्र के सपने बुन रहीं थीं| उन चंद क्षणों में हजारों सपने देख डाले होंगे उन्होंने|

सभी मुख्यधारा में शामिल होने का, मन ही मन जश्न मना रहीं थीं| सब एक दूजे की ओर देख ..जैसे कह रहीं थीं- "स्त्रीत्व मरता कब है, देखो आज इतने सालों बाद आखिर जाग ही गया| आज भटकाव के रास्ते से लौट आने की ख़ुशी भी उन सबके चेहरे पर साफ़ झलक रही थीं | ........सविता मिश्रा

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