Monday, 3 October 2016

पहला इम्प्रेशन (पहली कहानी)

"मम्मी ......... कहाँ हो आप !"
"क्या है छवि ? मैं छत पर हूँ, आ रही हूँ! क्या हुआ, क्यों चीखे जा रही हो?"
"मम्मी मम्मीईईई" छवि बड़ी तेज बोली।
"अरे बाबा क्या हुआ आती हूँ! सीढियों पर गिरकर पैर थोड़े ही तोड़वाने हैं |"
"हाँ, बता क्या हुआ! स्कूल में किसी से लड़कर आई है क्या ?"
"नहीं मम्मी, टीचर ने कहा है पत्र लिखकर ले आना ट्यूशन पर देखूँगी |"
"अच्छा-अच्छा पहले खाना खा ले। फिर लिखवाती हूँ तेरा पत्र..! ट्यूशन तो चार बजे से है न! अभी तो बस ढाई बजे है। हाथ मुहँ धो कर कपड़ें बदल ले पहले । तब तक मैं खाना गरम कर देती हूँ|"
खाना जल्दी-जल्दी ख़त्म करके छवि कापी-पेन लेकर बैठ गयी । "मम्मी जल्दी करिए|" बर्तनों की आवाज सुनकर छवि ने आवाज लगाई।
रूपा ने विषय को देखकर बोला - "अरे इतना तो सरल विषय दिया है ! पापा को ही तो पत्र लिखना है। वह भी तू खुद से नहीं लिख सकती!"
"अरे मम्मी अब लेक्चर मत दीजिए, लिखवा दीजिए ना। आप लिखवाएंगी तो पहले दिन ही मेरा इम्प्रेशन अच्छा जमेगा|" बिटिया की बात सुनकर रूपा जोर से हँसी और लिखवाने लगी पत्र |

बिटिया को सहेजकर ट्यूशन भेजते ही रूपा अपने पुराने दिनों में खो गयी। जब वह अपने पापा को ख़त लिखती थी। वह भी क्या दिन थे। पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्र खूब चलते थे| आजकल के बच्चे तो जानते ही नहीं ये किन बलाओं के नाम हैं | बस विषय के एक भाग के रूप में पत्र लेखन करते हैं। असलियत में तो पत्र लिखना जैसे भाता ही नहीं, बस फेसबुक और ह्वाट्स एप्स पर खूब लिखवा लो स्टेट्स- मैसेज वगैरह |
हमारे जमाने में ये सब कहाँ थे! पत्र ही चलते थे । खूब लिखे पत्र रिश्तेदारों को, पति महोदय को । पति का ख्याल आते ही मन ही मन मुस्करा उठी रूपा |

पति को लिखे गये पत्र तो सहेजकर रखे भी हैं इतने सालो तक। ये आज की पीढ़ी इन भावो को क्या-कैसे संभालेगीं! कम्प्यूटर और मोबाईल मैमोरी में क्या !! जमाना कितना बदल गया। सोचते ही अनमनी होकर, अतीत और भविष्य में तालमेल बैठाने लग गयी|
पत्र के विषय में सोचते-सोचते रूपा अचानक अलमारी में सहेजे पति के पत्र निकालकर, पढ़ते-पढ़ते खो सी गयी थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी। जल्दी-जल्दी पुराने पर्स में फिर से पत्रों को सहेज अलमारी में छुपाकर रख दिया और दरवाजा खोलने चली गयी|
बिटिया दरवाजा खोलते ही चहक उठी, "मम्मी, मम्मी" रूपा बोली, "अरे बता तो क्या हुआ?"
"मम्मी टीचर ने कहा तुम्हारी हिंदी तो बहुत अच्छी है, बहुत सुन्दर लिखा है तुमने| सारे बच्चों ने खूब ताली बजायी मेरे पत्र को सुनकर और हाँ टीचर ने भी|"
"अच्छा तब तो तुम्हारा इम्प्रेशन खूब अच्छा पड़ा न?" रूपा मुस्करा कर बोली |
"हाँ मम्मी पर"
"..पर क्या?" रूपा थोड़ा आश्चर्य से बोली
"..मम्मी मैंने टीचर को सच भी बता दिया बाद में, कि पत्र आपने लिखवाया है। उन्होंने आपका मोबाइल नंबर माँगा मुझसे। पता नहीं वो मेरी शिकायत शायद आपसे करेंगी ! मम्मी आप संभाल लेना | मैं अब खेलने चली। ठीक जाऊ न?" खिलखिलाती हुई छवि बोली..।
रूपा आशंका से भर गयी । मुस्कराहट का लबादा ओढ़कर कहा - "अच्छा ठीक है जाओ, पर आधे घंटे में आ जाना अच्छा! आधे घंटे मतलब आधे घंटे ही समझी |"
रूपा भी अपने काम में लग गयी तभी मोबाइल बज उठा, उठाते ही आवाज आई- "आप छवि की मम्मी बोल रही हैं?"
रूपा समझ गयी कि ये छवि की टीचर ही होंगी । वह सफाई देना ही चाहती थी कि उधर से आवाज आई-
"आपकी बिटिया बहुत प्यारी और साफदिल की है। उसकी यह साफगोई बनी रहे इसका आप ख्याल रखियेगा। आजतक बहुत बच्चों को मैंने पढाया है, पर ऐसे बच्चें आज के जमाने में कहाँ मिलते हैं ! वह चाहती तो नहीं बताती, किन्तु उसने बताया की आपने उसकी मदद की है। पढ़ने में भी खूब अच्छी है। मेहनती है, खूब आगे बढ़ेगी।"
रूपा ने सकुचाते हुए कहा कि "आप उसका ख्याल रखियेगा।" उन्होंने भी भरोसा दिलाया .."आप चिंता ना करें, मैं अपने बच्चों को खूब मेहनत से पढ़ाती हूँ।"
"बस भेजने में डर रहीं थी कि आने जाने में..!"
"आप डरिये नहीं। मैं बच्चों को समय से छोड़ भी देती हूँ। जिस दिन भी देर हो, या आपको लगे कि मैं अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रही हूँ आप निसंकोच फोन कर सकती हैं।"

मोबाईल पर टीचर से बात करने के बाद रूपा गदगद और आश्वस्त हो चुकी थी कि एक अच्छी शिक्षक मिल गयी है बिटिया को | वर्ना आज कल के शिक्षकों को तो पैसों की ही भूख है, बच्चें के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की भूख कहाँ दिखती है किसी शिक्षक मेँ !! और न ही आजकल के शिक्षक अपने कार्य में हस्तक्षेप पसंद करते हैं | ये तो सामने से खुद कह रही हैं कि टोंक दीजियेगा हमें, यदि पढ़ाने में कोई कमी दिखें |

फोन रखकर बुदबुदाई "शिक्षक हों तो ऐसे"| मन ही मन मुस्कराते हुए फिर अपने काम में लग गयी|...सविता मिश्रा 'अक्षजा'

|जय विजय वेब पत्रिका में छप चुकी

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