Monday, 23 January 2017

अमानत-

 माँ को मरे पांच साल हो गए थे। उनकी पेटी खोली तो उसमें गहनों की भरमार थी। पापा एक-एक गहने को उठा उसके पीछे की कहानी बताते जाते|
जंजीर उठा पापा हँसते हुए बोले- "ये तुम्हारी माँ मेरे चोरी पड़ोसी के साथ जा बनवाई थी।"
"आपके चोरी, पर इतना रुपया कहाँ से आया? "
"तब इतना महंगा सोना कहाँ था!! बहुत सस्ता था। एक हजार रुपये तोला। मेरी जेब से रुपये निकाल इकट्ठा करती रहती तेरी माँ। उसे लगता मुझे पता नहीं चलता|  उसकी ख़ुशी के लिए मैं अनजान बना रहता। बहुत छुपाई ये जंजीर मुझसे ,पर कोई चीज छुपी रह सकती है भला !"
तभी श्रुति की नजर बड़े से झुमके पर गयी।
"पापा, मम्मी इतना बड़ा झुमका पहनती थीं क्या ?" आश्चर्य से झुमके को हथेलियो के बीच लेकर बोली|
"ये झुमका, ये तो सोने का नहीं लग रहा। तेरी माँ नकली चीज तो पसन्द ही न करती थी , फिर ये कैसे इस बॉक्स में ।"
"इसके पीलेपन की चमक तो सोने जैसी ही लग रही !!"
" कभी पहने तो उसे मैंने न देखा। और वो इतल-पीतल खरीदती न थी।"
तभी भाई ने -"पापा ले आइये सोनार को दिखा दूंगा" कह झुमका हाथ में ले लिया।
बड़े भाई की नजर गयी तो वह बोला -"हाँ ले आइए पापा कल जा रहे सुनार के यहाँ दिखा लायेंगे।"
दोनों भाईयों के हाथों में झुमके का जोड़ा अलग- अलग हो अपनी चमक खो चूका था। दोनों बेटों की नजर को भाँपने में पिता को देर न लगी।
बिटिया के हाथ में गहने देते हुए पिता ने झट से कहा- "बिटिया बन्द कर दे माँ की अमानत वरना बिखर जायेगी।"

2 comments:

Digamber Naswa said...

ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाई को सहज लिखा है ... और कितना सच लिखा है ...

Kavita Rawat said...

आज के लालची होते इंसानो का कटु सच