Thursday, 11 May 2017

लघुकथा--तड़प-

"कुछ साल पहले तुमने मुझसे कहा था कि कुछ भी चित्रकारी करना परन्तु मासूमियत को अपने चित्रों में मरने मत देना | फिर यह सब क्या है सुरेखा ?" नाराजगी जताते हुए आज का अख़बार डायनिंग टेबल पर पटक दिया|
"क्या तुम्हारे अंदर की वह तड़प मर गयी | kya hmare bchche n hone se तुम्हारा दिल पत्थर का हो गया |  कुछ बोलो तो सही!"
chay use ek najr dekhi par moun rahi |
"चित्र भी बनाने से मना करने वाली मेरी सुरेखा मेरे सामने आज ये कैसा चित्र उपस्थित कर रही है ! दो नन्हें मासूम ठण्ड में सिकुde एक दूजे से लिपटकर आसमान के नीचे रात गुजारे | उनका आशियाना तुमने क्यों टूटने दिया|"
चुप्पी अचानक टूटी - "तुम खामख्वाह क्रोध कर रहे हो | इस चित्र के साथ अख़बार की भड़काऊ हेडिंग नहीं, बल्कि कुछ अंदर का भी पढ़ लो पहले |" चाय कप में निकालती हुई सुरेखा बोली | चाय की भाप और तल्ख भाषा से वातावारण में गर्माहट फैल गयी |
"दो मासूम को ये अख़बार वाले दिखाकर हम पर कीचड़ नहीं उछाल सकते | इन्हें इतनी ही हमदर्दी थी तो अपने घर की छत क्यों नहीं मुहैय्या करवा दिए | सरकारी जमीन पर गलत तरीके से अतिक्रमण कर रखा था | महीनों नहीं बल्कि सालों से आगाह किया गया था | दुसरे इन लोगों को पता नहीं था क्या कि जो कर रहें वह गलत है !!" आँखे संजय से भी कुछ याद दिलाते हुए जैसे सवाल पूछ रहीं थीं |
"जब अतिक्रमण की एक ईट भी लगती है तो सम्बन्धित विभाग सोता रहता है क्या ?"
"देखता तो है, लेकिन भावनाएं जाग्रत रहती हैं | इस लिए चुप रहता है|"
"अब भावनाएं कैसे मर गयी ?"
"मरी नहीं लेकिन अति होने से जाग्रत भी न रह पायीं | पहले टेंट, फिर मिट्टी, फिर सीमेंट के मकान बना लेते लोग |"
" कमी तो तुम्हारे विभाग की भी थी न !! "
"हाँ थी , किन्तु हमारी कमी को अपनी ताकत कैसे समझ लेतें लोग |" तिरक्षी नजर डाली संजय पर|
संजय को उसकी आँखों में विद्रोह की चिंगारी साफ़ दिख रही थी |
पिता के दबाव में एक रिश्ते के लिए बस हामी भरने के अपराधबोध से उसकी नजरें नीची हों गयीं | उसने अख़बार उठाया और उसके चीथड़े चीथड़े करके डस्टबिन में डाल आया | सविता मिश्रा

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