Wednesday, 5 March 2014

==कमतर ना समझना==

विवाह बंधन तोड़ दूँ क्या
अकेला तुझे छोड़
दूँ क्या ?

हर महीने रख पगार हाथ
मायके ओर दौड़
दूँ क्या ?

स्नेह-मोहब्बत का है रिश्ता
टकराहट में मोड़
दूँ क्या ?

रमेश जी खूब कमाते हैं
तुमको भी यह होड़
दूँ क्या ?

दिल दुखा रहा बहुत मेरा
ये व्रत चौथ का तोड़
दूँ क्या ?

मान लो सर्वोपरि हूँ मैं ही
समाज में तुझे गौड़
दूँ क्या ?

दर्ज करा दी तुम्हारी रिपोर्ट
सास-ननद को जोड़ दूँ क्या ?


कमतर ना समझना सविता
कही-कभी भी ठौड़
दूँ क्या ?

क्रोध में बेलन हाथ लगा
तुम्हारा सर फिर फोड़ दूँ क्या ?..सविता मिश्रा

8 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

अच्छी है :)

Savita Mishra said...

आभार सुशील भैया

संजय भास्‍कर said...

सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

Savita Mishra said...

संजय भाई आभार आपका

vibha rani Shrivastava said...

लाजबाब बहना ......
हार्दिक शुभकामनायें

Digamber Naswa said...

कुछ गुस्से ला इज़हार करती हुई रचना है आज .. पर अच्छी लगी ...

Savita Mishra said...

@vibh दी आभार आपका

Savita Mishra said...

नहीं दिगंबर भैया ..यह एक ग्रुप के टापिक विवाह पर बस ऐसे ही लिख डाली ....गुस्से का कोई औचित्य ही नहीं है ......आभार दिल से जो आपको अच्छी लगी ...नमस्ते भैया