Friday, 31 October 2014

सच्चा--दीपोत्सव

घर-घर दीप जल रहें थे|बगल ही झुग्गी झोपड़ी में भी दीप जलाने की ललक थी| दीपक-बाती खरीद भी लेते किसी तरह, पर तेल कैसे खरीद पातें| कहाँ था उनके पास इतना पैसा|
बच्चे थे कि जिद किये थे| नहीं मैं तो दीपक जलाऊंगा,और साहब के बेटे की तरह पटाखे भी, शेखर तो यह कह अड़ा था अपनी जिद पर|त्यौहार पर बेबस माँ बस आंसू ही बहाये जा रही थी| और समझाने में लगी थी कि -- "बेटा पढ़-लिख लेगा, बड़ा अफसर बन जायेगा तो हम भी दीपक जलायेंगे और खूब पटाखे भी|"

अब तो जैसे शेखर को जूनून सवार हो गया| किताब पकड़ ऐसे बैठा कि आई-ए-एस टॉप करके ही छोड़ा|
आज फिर दीपावली का दिन हैं| और झुग्गी से वह बड़े से सरकारी घर में आ गया है| पुरे घर-बाहर नौकर-चाकर दीपक जलाने में लगे हैं| पर शेखर के मन का अँधेरा नहीं दूर हो रहा|
एक दीपक जला माँ के तस्वीर के आगे रख रो पड़ा| फिर कार उठाई और ढेर सारे दीपक-बाती, मिठाई,पटाखे लेकर नौकर के साथ चल पड़ा झुग्गीवासियों के बीच| सभी झुग्गी जगमगा रही थी, बच्चे खुश हो पटाखे चलाने में मशगुल हो गये| सच्चा दीपोत्सव तो उसका अब जाके हुआ था| Savita Mishra

2 comments:

vibha rani Shrivastava said...

सार्थक लेखन ..... उम्दा कहानी

Digamber Naswa said...

असल दीप उत्सव तो वही है ...
अच्छी लगी कहानी ...