Saturday, 31 January 2015

~~ इतिहास दोहराता है ~~

दो घंटे की पार्टी का कहके चार घंटे से उप्पर हो गये थे |माँ देहरी पर नज़रें गड़ाये अपनी बेटी के इंतजार में थी पर बेटी थी कि मस्त दोस्तों के साथ पार्टी में| माँ फ़ोन कर-करके परेशान पर दूसरी तरफ से कोई जबाब नहीं| अंततः घबराई सी माँ निकल पड़ी उस होटल की ओर जहाँ पार्टी चल रही थी|
मन में ना जाने कैसे -कैसे  ख्याल लिय जब वह वहां पहुँची तो पार्टी अपने पिक पर थी सभी मस्त थे एक दूजे के साथ डांस करने में|
माँ  सब के पास जा-जा डिस्को लाईट में अपनी बेटी का चेहरा खोज रही थी| तभी एक आव़ाज सुन मुड़ी ही थी कि बेटी लगभग चीख सी रही थी - "क्या मम्मी! आप यहाँ भी मेरी बेइज्जती कराने आ गई| आप घर जाइये आ जाऊँगी मैं, बच्ची नहीं हूँ ! पता नहीं आप समझती क्यों नहीं|"
"हा बेटा समझती ही तो नहीं मैं " कह सिसकते हुए निकल आई तेजी से | तभी आवाज आई - "क्यों ! चोट लगी क्या ?..सीधे दिल पर न "...चकर -बकर देखती माँ के कानो में फिर आवाज गूंजी -"इधर-उधर क्या देख रही  .....तुमने कितना परेशान किया भूल गयी क्या ?" सविता मिश्रा

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