Thursday, 8 August 2013

===घमंड के चूर चूर होने में देर कब लगती हैं ===

गुरुर था खुद पर
लहलाहते थे पेड़ों की
हर शाखाओं पर
देख हमारी सुन्दरता जब
मोहित होते लोग
तो खूब इतराते थे
गहरे हरे, हलके हरे
रंग में थे सुन्दर पर
ताम्रपत्र कह जब देखते लोग
तो गर्व से सातवे आसमान पर
खुद को पाते थे
तब सब अपने ही संगी-साथी
क्षुद्र नजर हमें आते थे
बड़ा घमंड था हमें
अपने रंग रूप पर
पानी की बूंदों को भी
नहीं देते तनिक देर भी ठहरने
कि भार से कही अपनी ही
कोमलता पर आंच ना आ जाएँ
तेज हवाओं को देख
छुप जाते गहरे पत्तों के बीच
हवाएं बंद होतें ही
हम उन्हें ही आँख दिखाते थे
पर एक दिन वह भी आया
इतराना अपना कम हुआ
हम भी हम गाढे हरे रंग में बदल गए थे
कुछ दिन पहले जो गाढे रंग के पत्ते गिरे थे
उनकी दशा देख अपने पर क्षोभ कर रहे थे
खुद पर खूब इतराएँ भाव ना दिए किसी को
आज खुद को भी उसी हाल में सोच भी काँप रहे हैं
जो अब इतरा कर मुहं हम पर बिचका रहे हैं
अब उन्ही को शिक्षाप्रद किस्से हम सुना रहे हैं
एक दिन वह भी आ गया हम भी शाखा से गिर पड़े
जमीन की गर्द में मिलते-मिलते
खुश हैं कि किसी को सीख दे गयें
घमंड में जो चूर अक्सर रहता हैं
उसके चूर चूर होने में देर ही कितनी लगती हैं | सविता मिश्रा
Photo: शीर्षक गुरूर...घमंड....गर्व....अभिमान

गुरुर था खुद पर लालाहतें थे पेड़ों की हर शाखाओं पर
देख हमारी सुन्दरता जब मोहित होतें लोग तो खूब इतराते थे
गहरे हरे हलके हरे में थे सुन्दर पर ताम्रपत्र कह जब देखते लोग
तो गर्व से सातवें आसमान पर खुद को पातें थे
सब तब अपने ही साथी क्षुद्र नजर आतें थे
बड़ा घमंड था हमें अपने रंग रूप पर
पानी की बूंदों को भी नहीं ठहरने देते तनिक देर भी
कि भार से कही अपनी कोमलता पर आंच ना आ जाएँ
तेज हवाओं को देख छुप जाते गहरे पत्तों के बीच
हवाएं बंद होतें ही हम उन्हें ही आँख दिखाते थे
पर एक दिन वह भी आया इतराना अपना कम हुआ
हम भी हम गाढे हरे रंग में बदल गए थे
कुछ दिन पहले जो गाढे रंग के पत्ते गिरे थे
उनकी दशा देख अपने पर क्षोभ हो रहा था
खुद पर खूब इतराएँ भाव ना दिए किसी को
आज खुद को भी उसी हाल में सोच भी काँप रहें हैं
जो अब इतरा कर मुहं हम पर बिचका रहें हैं
हम अब उन्ही को शिक्षाप्रद किस्से अब सुना रहें हैं
एक दिन वह भी आ गया हम भी शाखा से गिर पड़े
जमीन की गर्द में मिलतें मिलतें खुश हैं कि किसी को सिख दे गएँ
घमंड में जो चूर अक्सर रहता हैं
उसके चूर चूर होने में देर ही कितनी लगती हैं | सविता मिश्रा

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