Wednesday, 9 April 2014

कुछ तो नेक काम कर रहे नेता

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दर बदर फिर वोट की भीख नहीं मांग रहे नेता
बल्कि हम सबके कर्तव्यों को जगा रहे नेता|

आलसी निठल्ले होकर, बैठे रहते उस दिन घर
हमारी अंतरात्मा को झकझोर के उठा रहे नेता|

धन्नासेठों को दो कदम भी नहीं चलने की आदत होती
कर्तव्य पालन करें पैदल चल-चल खुद सिखा रहे नेता|

लालीपाप लेकर दे आते हो अपना महत्वपूर्ण वोट
समझो उसके दूरगामी परिणाम समझा-दीखा रहे नेता|

जातिवाद का फैला कितना भयंकर मकड़जाल है
इसकी भयावहता से परिचित तुम्हें करा रहे नेता|

निष्क्रिय जन उठो कुम्भ्करनी नींद से अब जागो
इतना चीख -चीखकर तो तुमको जगा रहे नेता|

वोट देने के अधिकार की लाठी सशक्त हो तुम पकड़ो
तुमको यह अधिकार भी तो अधिकार से दिला रहे नेता|

आलसपन-पव्वा-रूपया-मिठाई का लोभ तुम त्यागो
वोट की वज्र चोट दो दागियों को समझा-बुझा रहे नेता|

ना जाने कितने जाति-धर्म में बंट रहे हो तुम सब
परिणाम भुगत रहे हो उसका यह जता रहे नेता|

जातिवाद-राज्यवाद-व्यक्तिवाद का जहर थूकों
घुट्टी की तरह तो तुम्हें राष्ट्रवाद पिला रहे नेता|..सविता मिश्रा

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत खूब !

Savita Mishra said...

नमस्ते भैया ..बहुत बहुत आभार ..

Savita Mishra said...
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