Tuesday, 14 April 2015

कागज का टुकड़ा

"तुम्हारी जेब से यह कागज मिला! आजकल यह भी शुरू है?" प्रभा बोली।

"तुम समझती नहीं प्रभा! एक दोस्त का ख़त है। उसने कहा कि पोस्ट कर देना तो मैंने कह दिया, कर दूँगा।"
"वह नहीं कर सकता था?" शक भरी निगाह डालती हुई वह बोली।

"अब दिमाग न ख़राब करो! कहा न कि दोस्त का है।" बिना कोई सफाई दिए वह गुस्से से बाथरूम में घुस गया।
भुन-भुनाती हुई प्रभा अतीत की गहराइयों में खो गयी। जब ऐसे ही एक कागज के टुकड़े को लेकर उसे न जाने कितनी सफ़ाई देनी पड़ी थी।

'मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली थी, पर तुम बेवफ़ा निकले। भाग निकले जिम्मेदारी के डर से। आज स्टेशन पर गाड़ी का इंतजार करते मेरी नजर तुम पर पड़ गयी। मैं भी अपने पति और बच्चों के साथ जा रही थी मसूरी घूमने। जब तक खड़ी रही तब तक मन बेचैन रहा। दिल मिलने को बेताब हो उठा था। सोचा कई बार कि बेवफाई के कारण घुमड़ते हुए रुके काले बादल, जाके तुम पर ही बरसा दूँ। तुम बह जाओ उस बहाव में। पर पति और बच्चों के कारण तुमसे कुछ कहना उचित न समझा।'

कई महीने बाद पति के हाथों में अपना खुद का लिखा हुआ पन्ना देख प्रभा बहुत खुश हुई थी |
पति के हाथ से छीनती हुई बोली थी, "कहाँ मिला ये कागज का टुकड़ा…? मुझे पूरा करना था इसे।"

जवाब में लंकाकाण्ड हो गया था घर में। उस एक कागज के टुकडे ने दोनों के बीच पले विश्वास के टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे। कितनी सफाई दी थी प्रभा ने, साहित्य से दूर रहने वाले अपने पति को। लेकिन वह तभी माना जब एक साहित्यकार सहेली ने फोन करके बोला था—"जीजा जी, यह कथा तो इसने फेसबुक पर डाली थी। हम सब हँसते-हँसते लोटपोट हो गए थे।"

आज यह पुराना वाकया हू-ब-हू उसकी आँखों में नाच गया।
पलंग पर धम्म से बैठ गयी वह। किसी सुधा का पति के नाम लिखा हुआ लव लेटर उसके हाथ में लहरा रहा था। पति से सफाई की उम्मीद में सच और झूठ के पलड़े में अब भी झूल रही थी वह।
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सविता मिश्रा'सपने बुनते हुए' साँझा संग्रह में प्रकाशित २०१७

1 comment:

Kailash Sharma said...

बहुत रोचक लघु कथा..