Thursday, 28 March 2013

++कुलदीपक बेटी क्यों नहीं ++



जिस घर में जन्म लिया उसी घर में बेटियों का कोई महत्व नहीं होता है| माना आधुनिक युग में पढ़ाते लिखाते है अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाते है| परन्तु कुलदीपक की बात आती है तो बेटे ही आगे होते है| बेटियों का अपने ही घर में कोई भी वजूद नहीं होता है| जन्म से लेकर जवान होते होते न जाने कितनी बार वह उसे उसके भाइयों से कमतर समझा जाता और उसे भी अहसास दिलाया जाता है| पढ़ाई-लिखाई, पहनावा, खानपान सब चीज में भाइयों की बराबरी का दर्जा कहाँ प्राप्त होता है उसे|

बेटी की शादी के लिए जब वर ढूढने निकलते हैं, दो चार घर में ना सुनने पर ही बेटी बोझ लगने लगती है| अक्सर शादी खोजने में परेशानी होने पर यह कह बैठते है कि पता नहीं किस जन्म में क्या पाप किया कि जो बेटी का जन्म हुआ|
कितने धक्के खाने पड़ रहे है| भले ही बाद में बहू आकर कितने भी धक्के मारे| दाना पानी भी देने में मुहं फेरे लेकिन बेटी बोझ ही मानी जाती रही है|

शादी होने के बाद बेटी बनी बहू जब तक सह-सुन सहयोग करती रहे तब तक ठीक| पति यदि बस में हो गया तब तो सुभानल्लाह| पर पति के सर पर से प्यार का भूत उतरा नहीं कि वह नौकरानी से भी गयी गुजरी हो जाती है| नौकरानी तो कम से कम पगार लेकर काम करती है| ऊपर से ऐंठ दिखाती है| पर पत्नी वह भी नहीं कर सकती है| नारियों को सम्मान देने को कहने वाला समाज बस मौन खड़ा रहकर देखता रहता है तमाशा|

बाहर काम करने वाली महिला जिस दिन भी कह दे- बाहर से थक-हार कर आती हूँ तुम भी हाथ बाटाया करो!! देखो फिर क्या बवाल होता है| पुरुष के अहम को ठेस पहुँचती है|

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि औरत हमेशा ही शासित होती रही है| यदि विद्रोह करे तो दस उंगलियाँ उसी की ओर यह समाज उठाता है |

प्यार में हो तो पुरुष नारी के इशारें पर नाचे! प्यार खत्म होते ही दासी का भी दर्जा नहीं देता| यही कड़वी सच्चाई है इस पुरुषशासित समाज की|

कन्या के रूप में जन्म ले बड़े होते ही माँ के यह शब्द कि "तुम लड़की हो सह-सुन चला करो मरते दम तक एक नारी के साथ होते है|" जिस दिन इन शब्दों से उलट चली वह, उसकी खुशियाँ खत्म हो जाती है| समाज-परिवार उसे ठुकराना शुरू कर देता है|...सविता मिश्रा

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