Wednesday, 2 October 2013

---कड़वा सच ---


स्वयं ही स्वयं को कोसते है,
किसी से नहीं बोलेगें सोचते है |
पर जुबाँ है कि फिसल जाती है ,
कैंची की तरह चल जाती है |
सामने वाला हो जाता है घायल ,

हो जाता है उसको मलाल |
क्यों बोलती हू सच कड़वा ,
झूठ का खिलाती नहीं क्यों हलवा|
झूठ ही है दुनिया पर छाया ,
सच को कोई समझ न पाया|
झूठ बोल स्वयं पर इतराया ,
सच बोलना सबको क्यों नहीं आया |
झूठ फरेब से उकता गयी हूँ ,
सच के घेरे में आ गयी हूँ |
सच के कारन अपनो से बिछुड गयी ,
अपने ही दायरे में सिकुड़ गयी |
कोई करता नहीं है मुझको सलाम ,
क्योकि सच बोलती हूँ यह जानती है आवाम |

||सविता मिश्रा ||
26---7--98.

4 comments:

राकेश कौशिक said...

"क्यों बोलती हू सच कड़वा,
झूठ का खिलाती नहीं क्यों हलवा"

अक्षरसः सत्य - सामायिक प्रस्तुति
सच के रास्ते में कांटे ही कांटे हैं

durga prasad Mathur said...

आदरणीया सविता जी अच्छी रचना के लिए बधाई ।

Savita Mishra said...

राकेश भैया आभार आपका दिल से

Savita Mishra said...

दुर्गा प्रसाद भैया बहुत बहुत शुक्रिया आपका