Tuesday, 19 August 2014

++यमुना किनारा++

गाँव से खबर आई कि पड़ोस के जो की परिजन ही थे उनके बड़े बेटे की मृत्यु हो गयी है|
शीला भूख से बिलखते अपने चार साल के बेटे के लिए मैगी बनाने के लिए स्टोव जलाने जा ही रही थी कि जेठानी ने रोका, "अरे यह क्या कर रही हो जानती नहीं हो ऐसे में कुछ भी नहीं बनता, आज दूध पिला दो रो रहा है तो|"
"अच्छा सुनो 
शीला मैं तुम्हारे जेठ जी के साथ जरा यमुना किनारे जा रही हूँ , वही से कुछ फल-फूल लेती आऊंगी|" शाम ढल चुकी थी, शीला और उसका पति अब भी शोक में ही बैठे मरे हुए भाई के बारे में बात कर रहे थे| जेठ जेठानी हँसते-खिलखिलाते आये, जेठानी ने आम पकड़ाते हुए कहा, "लो शीला बड़ी मुश्किल से मिला काट कर सबको दे दो|" 'दो आम और सब' मन में ही सोच रह गयी| शीला कभी अपने भूखे सोये बच्चे को देखती कभी घड़ी की ओर| "अरे जानती हो शीला यमुना के किनारे बैठे-बैठे समय का पता ना चला|"
"हा दी क्यों पता चलेगा" शीला दुखी सी हो बोली, "तुम्हारे जेठ की चलती तो अब भी ना आते, पर मैंने ही कहा कि चलो सब इन्तजार कर रहें होगें...." ....शीला उनकी उतारी साड़ी तह करती हुई बोली अरे दीदी "इस पर कुछ गिर गया है" जेठानी का मुहं उतर सा गया पर संभल कर बोली, "हा तुम तो जानती ही हो लोग कितने बेवकूफ होते है, दोना फेंक दिया था मुझ पर एक ने ." "तुम्हारें भैया तो लड़ जाते मैंने ही रोक दिया" कह हंस कर अपने चेहरे के भाव छुपाने लगी| "...हां दी होते भी है और दुसरो को समझते भी है ........"  जेठानी की चेहरे की रंगत देखने लायक थी|  ..सविता मिश्रा


http://www.rachanakar.org/2014/11/blog-post_294.html रचनाकार वेब पत्रिका में छपी हुई |
१९ अगस्त २०१४ में नया लेखन ग्रुप में |

(अब इसे बदल कर दिखावा शीर्षक से लिखा है )

~दिखावा ~
  (मन का चोर -)
शीला भूख से बिलखते अपने बेटे के लिए मैगी बनाने जा ही रही थी कि जेठानी ने टोंका, "अरे जानती नहीं हो! जवान भतीजे की मौत हो गयी है| ऐसी खबर सुनकर, उस दिन घर में आग नहीं जलाई जाती है| उसे दूध दे दो |"
शीला गोद में बैठाकर बेटे को दूध पिलाने लगी|
"अच्छा सुनो, शीला मैं तुम्हारे जेठ जी के साथ जरा यमुना किनारे जा रही हूँ | कुछ शांति मिलेगी, मन बेचैन हो उठा है यह सुनकर||"
शाम ढल चुकी थी| शीला का पति भतीजे की शैतानियाँ सुना सुनाकर दुखी हुआ जा रहा था| तभी जेठ और जेठानी हँसते-खिलखिलाते हुए आ गए |
जेठानी ने आम पकड़ाते हुए कहा, "लो शीला बड़ी मुश्किल से मिला, सबको काट कर दे दो|"
शीला कभी अपने भूखे सो गए बच्चे को देखती तो कभी घड़ी की ओर|
"अरे जानती हो शीला, यमुना के किनारे बैठे-बैठे समय का पता ही न चला|"
"हाँ दी क्यों पता चलेगा! दुखों का पहाड़ जो टूट पड़ा है!" शीला दुखी हो बोली|
"तुम्हारे जेठ की चलती तो अब भी ना आते| कितनी शांति मिल रही थी वहां | मैंने ही कहा कि चलो सब इन्तजार कर रहे होंगे..|"
"दीदी, साड़ी पर चटनी का दाग़ लग गया है|"
सुनते ही चेहरा फ़क्क पड़ गया| बोलीं - "इस बंटी ने लगा गिरा दिया होगा| फ्रीज से चटनी निकालकर चाट रहा था बदमाश|"
"परन्तु दीदी, चटनी तो कल ही .. "
"तू कुछ खाई कि नहीं ! आ ले आ आम काट दूँ, तुम सब लोग खा लो| मुझे तो ऐसे में भूख ही न लग रहीं |" सविता मिश्रा , आगरा


2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

अच्छी कहानी सच को आईना दिखाती हुई ।

Savita Mishra said...

सुशील भैया सादर नमस्ते .......आभार आपका दिल से