Saturday, 3 November 2012


मेरे कृष्ण कन्हिया
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ना कोख में पाला ना ही जन्म दिया ,
फिर भी कृष्णा तुने यशोदा को माँ का मान दिया |
हर नटखट शरारत को कर ,
माँ यशोदा को तुने निढाल किया |
चाँद खिलौना माँगा ,माखन नहीं खाया जताया ,

मिट्टी खा माँ को मुख मुख में ही सारा ब्रह्माण्ड दिखाया |
गोपियों की मटकी फोड़ीं ,माखन की चोरी किया ,
फिर भी भोला बन माँ की ओखली में भी बंध गया |
वात्सल्यमयी माँ बना यशोदा को तुने तृप्त किया ,
देवकी को ना जाने किस जन्म के पाप का फल दिया |

कोख में पाला जन्म तुझको उसने दिया ,
फिर भी अपनी अठखेलियों से मरहूम किया |
सारा-का-सारा प्यार तुने यशोदा को ही दिया ,
देवकी तो बस तरसती रही कुढ़ती ही रही कन्हैया |
कोख में पाला जन्म दिया जिसने तुझको कृष्णा ,
वही तेरी बाल रूप के दरश को सदैव तरसती रही कन्हैया |
||सविता मिश्रा ||

1 comment:

Savita Mishra said...

ना कोख में पाला ना ही जन्म दिया ,

फिर भी कृष्णा तुने यशोदा को माँ का मान दिया |

हर नटखट शरारत को कर ,

माँ यशोदा को तुने निढाल किया |

चाँद खिलौना माँगा ,माखन नहीं खाया जताया ,

मिट्टी खा माँ को मुख मुख में ही सारा ब्रह्माण्ड दिखाया |

गोपियों की मटकी फोड़ीं ,माखन की चोरी किया ,

फिर भी भोला बन माँ की ओखली में भी बंध गया |

वात्सल्यमयी माँ बना यशोदा को तुने तृप्त किया ,

देवकी को ना जाने किस जन्म के पाप का फल दिया |

कोख में पाला जन्म तुझको उसने दिया ,

फिर भी अपनी अठखेलियों से मरहूम किया |

सारा-का-सारा प्यार तुने यशोदा को ही दिया ,

देवकी तो बस तरसती रही कुढ़ती ही रही कन्हैया |

कोख में पाला जन्म दिया जिसने तुझको कृष्णा ,

वही तेरी बाल रूप के दरश को सदैव तरसती रही कन्हैया |

||सविता मिश्रा ||