Monday, 9 February 2015

~~आत्मग्लानी ~~लघुकथा

"चप्पल घिस गयी बेटा एक लेते आना , मैं थक गया, अब सोऊंगा|"
" पापा दे दीजिये न बाबु को हजार रूपये, दो साल से प्रमोशन रुका पड़ा है| बिना दाम के काम कहीं होते है क्या ? आप खामखां सिद्धांतो में अब तक अटके है| "
"बेटा गाढ़े की कमाई है, ऐसे कैसे दे दूँ | और कोई गलत काम भी तो नहीं करा रहा |"
अच्छा पापा -"वो सरकारी कालेज में एडमिशन हो गया हैं| पर वो बाबू तीस हजार रूपये मांग रहा था|"
"काहे के तीस हजार... "
"वो कह रहा था, थोड़ा तो मेहनताना देना पड़ेगा | दिन भर लगा रहा तुम्हारे ही फार्म में|"
"मैंने मना किया | कहा उनसे कि पापा बड़े 'सिद्धांत वादी' है |"
"फिर .."
"हंसने लगा, और कहाँ कि बबुआ , पिता 'सिद्धांत वादी' है तब पढ़ना लिखना भूल ही जाओ| जाओ मूंगफली बेचो |"
"अच्छा" - लम्बी सांस छोड़ते हुये बोले- "जाओ माँ से लेकर कल दे आना | "
मैं तो अपना वर्तमान उसूलों में उलझाये रहा पर तुम्हारा भविष्य कैसे बर्बाद होते देख सकता हूँ | बुदबुदाते हुय लेटते ही चिरनिद्रा में चले गये |
सविता मिश्रा

3 comments:

Kailash Sharma said...

आज की व्यवस्था का एक कटु चित्र...

Upasna Siag said...

aisa bhi karna padta hai ....

Upasna Siag said...
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