Saturday, 7 February 2015

~~ आशंका ~~

"अरे बेबी इतनी मंहगी ड्रेस फाड़ डाली | कैसे फटी कुछ बताओगी |"
" 'माँ ' वो -वो .."
"क्या वो- वो लगा रक्खी है, दस साल की हो रही है, फिर भी शिशुओ सी हरकत करती है| "
"माँ वो, वो नीचे सोसायटी में ....."
" क्या नीचे ? किसी ने तुझे कुछ किया क्या ? कही टाफी या चाकलेट तो ...?" घबरा कर नीतू अपनी बेटी के पूरे शरीर पर बारीकी से नजर दौड़ाते हुय सवाल पर सवाल पूछती गयी |
"माँ, माँ सुनो तो ....|"
क्या सुनु ? कहा था मैंने न , अकेले कही मत जाना | कुछ हो ....|"
घंटी बजी तो दरवाजा खोलते वक्त भी नीतू डांट ही रही थी बच्ची को |
" 'बीबी जी' मेरी बेटी से गलती हो गयी माफ़ करियेगा |" वो ' बेबी ' नीचे कामवालियों के बच्चो के साथ 'छुक-छुक रेलगाड़ी' खेल रहीं थी | उसी में मेरी बेटी से इनका फ्राक फट गया|" डरती हुई कामवाली बोली|
"ओह ! मेरी तो जान हलक में अटक गयी थी| इतनी देर से 'वो' 'वो' कर रही थी पर यह बात नहीं बताई इसने |"
" मम्मी आप तो डांटती ही जा रही थी, बात कहाँ सुन रही थी मेरी | फ्राक फटने पर ऐसे रियेक्ट कर रही थी जैसे गेम में कपड़े, फटते ही नहीं ...| भैया भी तो पिछले हफ्ते कबड्डी में शर्ट फाड़ के आये थे, उन्हें तो आप ऐसे नहीं डांटी थी |"
"वो, वो ...|"
"देखिए अब 'आप' वो-वो कर रहीं हैं |" तुनक कर अपने कमरे में चली गयी|
बेटी की बात पर नीतू दिल खोल कर हंस पड़ी|  आशंकाओं से पर्दा जो उठ गया था | कामवाली भी स्थिति को भाप हंस पड़ी | सविता मिश्रा

2 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 8-2-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1883 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Digamber Naswa said...

माँ को तो चिंता होना स्वाभाविक है ...
अच्छी कहानी ...