Tuesday, 24 February 2015

साहित्य का नशा ~


घर-परिवार -समाज सब भूल नेट में खोयी रहती हो | ये कैसा नशा पाल लिया रितु | मैं कहता रहता हूँ , नशेणी न बनो | नेट पर रहो पर एक नार्मल यूज़र की तरह ,एडिक्ट की तरह नहीं | कब से आव़ाज लगा रहा हूँ | पर तुम्हारे कान पर जूं नहीं रेंग रही | हद है यह तो |"
"नशा , ये नेट का नशा , मेरी बात यारो मानो, नशे में नहीं हो तो करो ये 'नशा' जरा । " खिलखिला पड़ी रितु |
"तू पगला गयी है रितु । मेरे पास और भी नशे है करने को इस नशे के सिवा | "

"हाँ जी, पागल हो गयी हूँ मैं | महीने दो महीने में घर आते हो फिर चिल्लाते हो ये कहाँ है वो कहाँ है ! व्यस्त थी कुछ लिखने में, नहीं सुना | नशा जब दर्द की दवा बन जाये तो फिर उस नशे को अपनाने में बुराई ही क्या है जी | साहित्य पढ़ने-लिखने का नशा है, जो अब तो बढ़ेगा ही |"
".......!"
 "देखो आज पत्रिका
 में मेरी कविता छपी है |"
"तो, कौन सा तीर मार ली ! इतनी पढाई पहले करती तो आज आईएएस-पीसीएस होती! खाना लगा दोगी या वो भी मैं खुद ले लू?" सविता मिश्रा 'अक्षजा'

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