Sunday, 31 March 2013

++एक दूजे को समझने का सरल ढंग ++


सभी परिवार से दूर रहने वाले वर्दी धारियों को समर्पित .......

किसी भी त्यौहार पर
पास नहीं होते हो तो
क्यों इन्तजार करें हम
इन कथित त्योहारों का
कहतें हैं होली मिलन एवं
प्रेम बरसाने वाला त्यौहार हैं
हम दोनों तो वैसे ही
जन्मों से मिलते रहे हैं
प्रेम की बरसात
एक दूजे पर करते रहे हैं तो
आखिर क्यों करे इन्तजार...
तुम अपना काम कर
कितनों को तो मिलाते हो
प्रेम से परे जो हुए
उन्हें समझाते हो
कुछ जो इस रंग भरे त्यौहार पर
खून की होली खेलने पर
उतारू रहते हैं
उन्हें प्रेम का पाठ पढ़ाते हो
कितनी जिन्दगी तुम्हारे
कारण ही तो हर्षो-उल्लास से
यह त्यौहार मनाती हैं
तो फिर हम क्यों दुखी हो
क्योकि हमें मालूम हैं
इस त्यौहार में हमारे साथ
ना होकर भी तुम
साथ रहते हो हमारे
एक दूजे के मन में दिल में
हर क्षण हर सांस में
बच्चो को खलता हैं
तुम्हारा पास ना होना
पर वह भी अब समझदार हो गये हैं
समझते हैं कि जिम्मेदारी निभाना जरुरी हैं
दूरियां जब जिम्मेदारी के कारन हो
एक दूजे को समझने का सरल ढंग हो
तो कोई भी कारन प्यार को कम नहीं करता
बल्कि और भी प्यार- सम्मान बढ़ा देता हैं|..सविता मिश्रा

Saturday, 30 March 2013

====प्यारा सा गाँव ====


शहरो की ख़ाक-छान,
जेठ की धुप में,
बैठे थे हम ,
भिखमंगे के रूप में |


प्यारा सा गाँव छोड़,
रिश्तों से नाता तोड़,
शहर की ओर रुख मोड़,
सड़कों से नाता जोड़ |


सड़कों पर भटक-भटक,
सह अषाढ़ की धुप कड़क,
गाँव की छोड़ सोधी महक,
खो गये शहरों की तड़क-भड़क|


पैरों पर पड़ गये छाले,
हो गये रोटी के भी लाले,
हुआ यूँ कमाल,
कि गावँ छोड़े बीते कई साल |


इतने सालों बाद,
आयी फिर गाँव की याद,
सुन लों मेरी फ़रियाद,
कोई फिर कभी ना मांगना ऐसी मुराद ||......सविता मिश्रा



==कल्पना होती हैं मन में ==



नफ़रत की अविरल धारा में
प्यार का पानी बरसे
कुछ ऐसी ही कल्पना होती है
मन में ...
पर नफ़रत सदा प्यार को तरसे|
नफ़रत हो ना कभी
सदा प्यार ही प्यार रहें
पर होगा क्या ऐसा कभी
जब तक घृणा किसी से रहें |

प्यार का बादल घिर जाएँ
घृणा की बदबू तक ना आएँ
नफ़रत बिजली की तरह
मिट्टी में मिल जाएँ |
बस प्यार भरी ...
सावन की घटा छाएँ
प्यार का संगम दिखे
हर दिल में ,
नफरत के पोखर सुख जाएँ
कुछ ऐसी ही कल्पना
होती है मन में|| 2/1990
||सविता मिश्रा ||

Thursday, 28 March 2013

कुलदीपक बेटी क्यों नहीं --



जिस घर में जन्म लिया उसी घर में बेटियों का कोई महत्व नहीं होता है| माना आधुनिक युग में पढ़ाते-लिखाते हैं |
उसे  भी अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाते हैं | परन्तु कुलदीपक की बात आती है तो बेटे ही आगे होते हैं |
बेटियों
का तो अपने
ही घर में कोई भी वजूद नहीं होता है|

जन्म से लेकर जवान होते-होते न जाने कितनी बार उसे उसके भाइयों से कमतर समझा जाता है | उसे भी इसका
अहसास अक्सर ही दिलाया जाता है | पढ़ाई-लिखाई, पहनावा, खानपान सब चीजों में भाइयों की बराबरी का दर्जा कहाँ प्राप्त होता है उसे!!

बेटी की शादी के लिए जब वर ढूढने निकलते हैं, दो चार घर में न सुनने पर ही बेटी बोझ लगने लगती है|
अक्सर लड़की की शादी खोजने में परेशानी होने पर माता-पिता यह कह बैठते है कि 'पता नहीं किस जन्म में
क्या पाप किया कि जो बेटी का जन्म हुआ' क्यों! हैं न |
कितने धक्के खाने पड़ रहे हैं | भले ही बाद में बहू आकर कितने भी धक्के मारे| दाना-पानी भी देने में मुहँ फेरे |
यहाँ  तक  कि  धक्कियाँ  के  घर से बाहर का रास्ता भी दिखा  दे |  लेकिन बहू, बहू  है  और बेटी बोझ |

बेटी सदियों से बोझ ही तो मानी जाती रही है | और आज भी यही निति -रीति चली आ रही है| उसका अपना घर
न कल था न आज है| भले आज की लड़की कमा धमाकर अपने मजबूत पैरों पर खड़ी है|
यदि ईट-पत्थरों से घर हुआ करता तो एक क्या वह चार घर बना लेती अपनी कमाई से लेकिन अपनों से घर, घर
होता है और उसके अपने उसका अपना घर रहने नहीं देते हैं | भले ही वह किसी घर को अपना समझ के
सजाएँ-संवारे|

शादी होने के बाद भी बेटी बनी बहू जब तक पुरुषों की सह-सुन सहयोग करती रहे तब तक ठीक | उसकी
सेवा-सहयोग से पति यदि कस-बस में हो गया तब तो सुभानल्लाह| परन्तु  पति के सिर पर से प्यार का भूत उतर
गया | फिर तो लेने के देने पड़ जाते | तन-मन-धन गवाँ के भी फिर वह कहीं की भी न रहती | उसकी हालत तब
नौकरानी से भी गयी गुजरी हो जाती है |
नौकरानी तो कम से कम पगार लेकर काम करती है| ऊपर से ऐंठ भी दिखाती है | पर पत्नी वह भी नहीं कर
सकती है | नारियों को सम्मान देने को कहने वाला यही समाज बस मौन खड़ा रहकर देखता रहता है तमाशा |
सिर्फ तमाशा ही देखता तो भी ठीक था किन्तु जले पर नमक भी छिड़कता रहता | और चटखारे ले-लेकर निंदा-
रसपान भी करता है |

पति से कंधा से कंधा मिलाकर घर गृहस्थी में अपना हर क्षण होम कर देने वाली महिला को मशीन बन जाना 
पड़ता है | जिस दिन भी कह दे- 'बाहर से थक-हार कर आती हूँ तुम भी हाथ बाटाया करो !!' देखो फिर क्या
बवाल होता है | पुरुष के अहम को कितना ठेस पहुँचता है इस बात से | वह अपनी हर हद तब पार कर जाता है |
मानसिक प्रताड़ना उसी दिन से फिर औरत को झेलनी होती है | भले प्यार से  कहने में वही पुरुष तलवे चाटे
औरत  की |  लेकिन रोज -रोज घर  का काम वह कभी भी नहीं  कर सकता है |  क्योंकि
ऐसी मानसिकता ही नहीं है पीढ़ियों  से |  घरेलू काम तो बस  महिलाओं के ही जिम्मे होते हैं |

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि औरत हमेशा ही शासित होती रही है| यदि विद्रोह करे तो दस ऊँगलिया उसी की ओर यह समाज उठाता है |

प्यार में हो तो पुरुष नारी के इशारें पर नाचे! प्यार खत्म होते ही दासी का भी दर्जा नहीं देता| यही कड़वी सच्चाई है इस पुरुषशासित समाज की | औरत एक छत होने की आस में इस कड़वे विष का पान करती रहती है |
और शायद आगे भी करती ही रहेगी | क्योंकि समाज भले बदल जाये, लोग बदल जाये लेकिन मानसिकता कभी
नहीं बदल सकती | न औरत की और न ही मर्दों की ही |

कन्या के रूप में जन्म लेकर बड़े होते ही माँ के यह शब्द कि "तुम लड़की हो सह-सुन चला करो' मरते दम तक
एक नारी के साथ होते है| और यही शब्द वह अपनी अगली पीढ़ी को देती जाती है |

जिस दिन भी औरत इन शब्दों से उलट चली, उसी दिन तत्काल  प्रभाव  से उसकी खुशियाँ खत्म हो जाती है|
समाज-परिवार उसे ठुकराना शुरू कर देता है |  उसे घृणित नजरों से देखने लगता है | तब वह सब कुछ  होते हुए भी  न घर  की  होती  और  न ही  घाट की |  सारे रास्तें  फिर  बबूल  के  काँटों  से  भरे  हुए  ही मिलते  है| गिने-चुने फूल भी जो रहें होते हैं राह में, वह मुरझा जाते हैं |...सविता मिश्रा #अक्षजा

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~~दुःख ही औरत का मित्र ~~

औरत की किस्मत में कितने गम है
पुरुष कहते यह तो बहुत कम है|

औरत की आँखे होती हमेशा नम
पुरुषों को नहीं होता इस पर कोई गम|

कहते है यह तो त्रिया चरित्र है
दुःख ही औरत का सच्चा मित्र है|
दुःख को सहती जाती रह अडिग
घर सुखमय रहे करती रहती गणित।

डिगा नहीं पाता कोई उसके पग
हिम्मत से बढाती हमेशा अपने डग।

कितना भी कर ले कोई सितम
नहीं मनाती कभी उसका मातम|

दुःख सह और भी परिपक्व हो जाती
ध्येय पर अपने खुद को अडिग ही पाती|| ...||सविता मिश्रा ||

Thursday, 21 March 2013

++हम से ही है स्रष्टि सारी++

हमने ही बनाई यह सृष्टि
हम ही है पिछड़े
हमने ही सिखाया चलना
हमे ही अब सिखा रहें
हम मौन है तो
समझो नहीं कमजोर

रह पाओगें क्या हम बिन
सोचो  दें दिमाक  पर  जरा जोर
जीवन होगा छिन्न-भिन्न
मन भी अक्सर रहेगा खिन्न|

माँ-बहन-पत्नी
सब रूप है मेरे
तुम खुद से चल पाओ
ऐसे कर्म नहीं तेरे
हमसे ही है तेज तुम्हारा
हमसे ही गरिमा बनी
सिख- सिखा हारी तुमको
कमजोर नहीं हैं नारी
हम से ही हैं सृष्टि सारी
पड़ते हैं हम सब पर भारी
सब सुखद हैं सपन सा सुहाना
फिर भी सब कुछ ही हैं अपना .
.
.विसंगतियों के साथ  हमको
अब यूँ नहीं जीवन यापन करना||
...सविता मिश्रा

Tuesday, 5 March 2013

==काश हम अपना दिया वोट वापस मांग सकते ==

)===============================(
काश हमने जो वोट दिए वो वापस हो सकते,
तो हम उसे वापस ले सरकार को पायदान पर लाते|
हमारे से ही लेकर हमें नीचा दिखाते हैं,
कुछ बोलो तो हम पर ही गुर्राते हैं|
धक्के मार बाहर का रास्ता समझाते हैं,
उनके चमचे भी अब पहलवान हो गये हैं|
नाशापिटो के मुहं में गज भर लम्बी जुबान हो गयी हैं,
नेता के खास होते ही इंसानियत तो जैसे लहुलुहान हो गयी हैं|
काश हम अपना दिया वोट वापस मांग सकतें .........

सब तरफ है त्राहिमाम त्राहिमाम सा चीखता ,
छत्तीस के आंकड़े में ही उलझता गया इंसान|
कहीं मंहगाई कहीं तस्करी होती है बेधड़क,
गुर्गे गुंडागर्दी करते हर तरफ बेखटक|
सब जगह तो नाचते मिल ही जाते हैं इनके ही गुर्गें,
जिसे भी पाते है सीधा साधा बना जाते हैं देखो मुर्गें|
जिसे देखो उसे ही ये अपना शिकार बना जाते,
जहाँ तहां ये बेखौफ देखो उत्पात मचा जाते|
जो बच निकले नजर से वह बड़ा खुशनसीब हैं बन्दा,
राजनीती का दलदल सच में बहुत ही हैं गन्दा|
काश हम अपना दिया वोट वापस मांग सकते ..........सविता मिश्रा

Monday, 4 March 2013

~~ खुशामद जो जीवन भर ना सीख पायें ~~

खुशामद ना कियें कभी भी
और ना ही कर पायें अभी
जब देखो तब हम
सभी से अकड़ते आयें..
मात-पिता ने समझाया बहुत
झुकना सीखो थोड़ा हो लड़की जात
पर जैसे अपने खून में ही ना था
और ना थी अपने बस की यह बात ...
धीरे-धीरे बड़े होते गये
भाइयों के साथ ही खड़े होते गये
कभी नहीं की भाइयों की चापलूसी
ना ही मक्खन पालिस कभी भाभी की....
विधालय में भी आकर नहीं आया यह गुण
सहेलियों की चमचागिरी देख करती भुनभुन
टीचरों को भी नहीं लगाया कभी मक्खन
गलत बात नहीं कोई कभी किया सहन ...
हर गलत बात पर झट कर बैठती दंगा
प्रिंसिपल से भी ले लिया करती पंगा
पता नहीं क्या सोचती होगी टीचर भी
शायद कहती हो हैं बहुत नकचढ़ी यह लड़की....
सास ने भी बहुत ही सिखाया
एक अच्छी कहावत भी याद दिलाया
दुधारू गाय की लात भी हैं सहते
सह लिया करो कोई कुछ है यदि कहतें ...
पर अपने सर पर तो अकड़ ही छायी
कभी भी ना कर सकी किसी की झूठी बड़ाई
अपने बच्चे भी जब नहीं पीतें थे दूध
जाते थे चिड़चिड़ा कर गोदी से कूद....
 तब सास समझातीं 
थोड़ा चापलूसी कर भटकाओं 

फिर बहला-फुसला के
दूध तुम उन्हें पिलाओं ....

तब भी हम ना समझे इस गुण के महत्व को
रुला-रुला पिलातें थे किसी तरह दूध उनको ...
क्या बताएं ऐसे -ऐसे पड़ाव है जीवन में बहुतेरे आयें
कई बार इस खुशामद के बिना हम बहुत कुछ झेल जाये||.
:)=======================:(

..सविता मिश्रा

Saturday, 2 March 2013

~~सपना सुहाना~~

गले लगा के उन्होंने हमसे बोला
क्यों रह रहकर तुम बन जाती हो शोला|

उनकी इस बात पर हम आवक रह गए
आंसू हमारी आँखों से अपने आप ही बह गए|

बड़े प्यार से आंसुओं को उन्होंने पोछा
बांसुरी बजा के हमको प्यार से रोका|

हम तब गले लग उनसे बिफर से गए
बड़ी मुश्किल से फिर खुद को संभाल लिए|

उन्होंने बोला बताओं सच में क्या हुआ
हम सुनाना शुरू किये तो फिर रुके कहा|


धैर्य रख वह हमारी हर बात सुनतें रहें
फिर बड़े सहजता से बोले अब सब दुःख तुमसे दूर हुए|

जा अब तू ना कभी रोएगी
तेरा होगा अब से मंगल ही मंगल|

हमारी याद में जब जब खोएगी
तुझे हम तुरंत आ तब तब देगें दर्शन|

हम बड़े खुश हो उछल ही पड़े
पर यह क्या बिस्तर से जमीं पर गिरे|

यह तो महज एक था सपना सुहाना
बुदबुदाये हम कि सविता तू औकात में रहना|

+मिलने वाला कहा है असलियत में भगवान्
क्योकि तू अभी तो सही से बनी नहीं इंसान||..
सविता मिश्रा

Thursday, 14 February 2013

+++अभिलाषा +++

उफ़ धरती का सीना क्यों ना फट गया
माँ के लाल जब माँ की गोद में सोने को गया|
दिल हो गया जख्मी कोई अपना ही कर गयी
लकड़ियाँ सुखी जली तो चीख यही कह गयी|
चिता कई जली सब सुलग सुलग सी रही
गंगा के जल से पवित्र हो सुकून जो पा गयी|
माँ ने ही जन्म दिया पालपोष किया था बड़ा
माँ ने ही हमें अपने गोद में छुपा उपकार किया बड़ा|
याद कर करके भले रोयें हमे हमारे परिजन
पर हम तो मुक्त हो गए इस संसार से माँ के करके दर्शन|
बहुत थी अभिलाषा कि गंगा स्नान कर स्वर्ग सीधे सिधारेगें
वह तमन्ना भी माँ ने बहुत ही जल्दी कर दी पूरी अब ना कराहेगें |
..सविता मिश्रा

Monday, 11 February 2013

~~लड़कियां जन्म के पहले से ही हारी हैं~~

क्या कहें!
कैसी भारत में आई त्रासदी हैं
 लडकियों को
नहीं कोई आजादी है
लड़कियां जन्म के पहले से ही हारी हैं
गर्भ में ही मार दी जाती क्या बेचारी हैं |

जैसे-जैसे बड़ी होती जाती हैं
बोझ कह धरती का सताई जाती हैं
चाहे कितनी भी खुशियाँ बिखेरे
रहती खुद सदा गम के ही अँधेरे
किसी भी चेहरे पर लाती ओज हैं
ईश्वर की अप्रितम सुंदर खोज हैं |

बिना कुछ सोचे समझे लड़कियां ही
हमेशा से ही घर-बाहर सताई जाती हैं
अपने घर में तो होता अपमान ही बस
दूजे घर की बेटियां तो जलाई जाती हैं|

कुछ बड़ी हुई तो घातक नजरें
लफंगो की सरेआम टिकने लगती है|
सुनसान देख नोंचने-खसोंटने-लपकने
ताक में सदैव ही नजरें गड़ी रहती है|
बड़ी पीड़ा है दारुण क्या-क्या सुनायें हम
बहरी गूंगी सरकार को क्या-क्या बतायें हम|

उठ खड़ा हो कोई नवजवान
गलती से भी मदद को कभी यदि
जाता है मारा वह इन आतंकियों से ही
फिर उठ खड़ा ना होता कोई कभी भी|

ना जाने कब वह दिन आएगा
जब लड़कियां भी चैन से जीने लगेंगी
मस्त उन्मुक्त आंगन में फुदकती
आजादी की सांस आसमान में लेती फिरेंगी|

लड़कियों की भी किलकारी  गुजेंगी कब हर घर
बेफिक्र चारदीवारी के बीच में वह भी डोलेंगी |
गला घोटने वाले हाथ ना जाने कब
खुश हो प्यार से गले
उसे लगायेंगे
लड़कियों  को भी अपनी प्यारी बिटिया
स्नेह से ना जानें कब वह कह बुलायेंगे|

थोड़े से तो लोग सुधर गए है
देखते हुए बदलते समय को
जो थोड़े और बचे है अकडू
ना जाने कब वह सुधर पायेंगे|
दिखावे में पूजनीय है नारी न कह
सच में सम्मान से कब बुलाएगें
पूजा छोड़ कन्या को कह देवी
उसका सम्मान वह उसे कब दिलायेंगे|

फिर भी आशा यही है हमारी
वह दिन भी बहुत जल्दी आएगा
जब लड़कियों के जन्म पर भी हर घर ही
बन्दूक-पटाखे खूब जोर-शोर से चलवायेगा|
यूँ हर चौराहें पर हमें नहीं कभी यातनायें दी जायेंगी
लफंगों द्वारा कभी भी नहीं फब्बित्तियाँ कसी जायेंगीं|

.विश्वास हैं घना
त्रासदी भारत की ये जल्द दूर हो जायेंगी
लड़कियां भी आँगन में खिलखिलायेंगी।।
....सविता मिश्रा

Sunday, 10 February 2013

प्रकृति सौन्दर्य-



१-
सजी हुई है जैसे नवयौवना
मौसम बनता है इसका गहना
पुराने वस्त्र उतार गिराया
नव-नवीन वस्त्र धारण किया
नवीन ताम्र-पत्र की सुन्दरता
नवयौवना को और भी निखारता
नवीन वस्त्र एवं गहनों से सजी यौवना
हमें लुभाती है चीरकर पृथ्वी का सीना
वसंत ऋतु की यह मन मोहना
कोई और नहीं
वृक्ष है, यह किसी से न कहना||

२-
ओह कैसी ऋतु यह आई
बुढ़िया भी जैसे शरमाई
मौसमी हवा के तेज झोंको से
झड़ गए पत्ते हर नोंको से
बादलों की ओर निहारती
अपनी हालत पर लजाती
सौन्दर्य की थी जो बाला
लगती है अब मेरे अब्बू की खाला
हुई कैसी यह दुर्दशा तेरी
वृक्ष है वह
हालत हुई है जिसकी ऐसी |

३-
निचाट हो गया था जो उपवन
लो फिर आ गया झूम के सावन
कोमल पत्तियाँ किलकारने लगीं
गहनों से फिर स्वयं को संवारने लगीं
पूर्ण यौवन को फिर वह पाने लगीं
घुमड़ घुमड़कर फिर बदली छाने लगीं |
आश्चर्य में तुम न रहना
सदाबहार मौसम है उपवन का गहना
इस ऋतु में वृक्षों का
क्या कहना, क्या कहना |

४-
जैसे-जैसे बरसता जाता है सावन
निखरता जाता सौन्दर्य मनभावन
दिल में रखकर धैर्य
देखते ही बनता है प्रकृति सौन्दर्य
अग्नि में तपकर चमकता है जैसे सोना
वैसे ही सुन्दर लगता है उपवन का हर कोना
हर मौसम के झंझावतो को सहता
धरा के सौन्दर्य को है बढ़ाता
वृक्षों का अहसान न भूलना
सहेज अगली पीढ़ी को तुम देना |

प्रकृति सौन्दर्य को तुम भी प्रेम से अपने गले लगाते
जीवन में जो एक वृक्ष अपने कर कमलो से उगाते ||...सविता मिश्रा

Sunday, 3 February 2013

~~जब माँ बनेगीं ~~

माँ आज तेरी बहुत याद आ रही है
समझाती
तू हमको  हर वक्त
नहीं समझती थी  मैं
तुझ पर ही चिल्ला पड़ती थी
याद है हमको तू कहती थी कि
जब माँ बनेगीं तब समझेगी
देखो ना माँ आज मैं भी
एक सयानी बेटी की
माँ बन गयी हूँ
अब मैं भी तुझ सा ही चिल्लाती हूँ
यह ना कर वह ना कर
ऐसे उठ वैसे बैठ,
इधर उधर ताका -झांकी मत कर
धीमी आवाज में बोला कर
नजरें झुका कर चला कर
चार लड़को के बीच में मत बैठा कर
यूँ
हर वक्त ही ही ही मत किया कर 
स्कर्ट -मिडी
मत पहना कर 
सलवार-
सूट पहना कर
बिना दुप्पट्टे के मत रहा कर
देख रही हैं ना माँ
सब तुझ सा ही व्योहार
मैं करने लग  गयी हूँ
मेरी भी बिटिया मुझ सा ही कर रही है
मैंने तो तुझको कभी नहीं कहा  था कि
माँ जमाना बदल गया है
मेरी बिटिया तो कहने लग गयी है कि
माँ वह
पूराना जमाना नहीं है अब
यह नया जमाना है
अब सब फैशन में है
देख रही है ना माँ
मैं तो तुझ सा ही हुबहूँ बन गयी
पर मेरी बिटिया मुझ सा
नहीं बन पायी
वह नए जमाने की हो गयी है

नहीं कहा
कभी
मैंने तुझे पूराने जमाने की
वह मुझे पूराने जमाने की भी कह रही है||...सविता मिश्रा

Thursday, 31 January 2013

## मानस तन ##


मानस तन बड़े भाग्य से पाया ,
पर छल-कपट में ही गँवाया ,
धोखा-फरेब ही किया ,
झूठ को ही है जिया |
अपमान किया सबका,
नहीं किया सम्मान किसी का,
नफ़रत किया सभी से ,
नहीं किया  प्यार
किसी से|
धोखे से लिया कभी ,
धन दौलत कभी ,
जान
किसी की ,
या फिर लिया मान |
कौन करेगा विश्वास,
प्राणियों में हम खासमखास ,
लगाते है सब हमसे आस ,
हम तोड़ते हमेशा सबका विश्वास |

हम करते है घात ,
दिखने में बस मानस जात |
करते है जानवरों से भी ,
ज्यादा गये गुजरे काम ,
नहीं पा सकते ऐसे तो ,
हम कोई भी मक़ाम |
करते है मांस भी भक्षण ,
क्या ये है इंसानों के लक्षण,
बईमानी है हमारे हर सांस ,
बने फिर रहे है बस लाश ,|
जानवरों का सा व्योहार ,
करते इज्जत सबकी तार-तार ,
मानस तन बड़े भाग्य से पाया ,
पर दुरुपयोग ही कर इसे गंवाया |
||सविता मिश्रा ||


Monday, 28 January 2013

दूसरो ने जो रुलाया वह क्या कम था
अपनों ने भी हमकों रोता बिलखता छोड़ा
आंसुओं को करती इक्कठा जो सविता
नदियाँ भी समझती हमें अपने रास्तें का रोड़ा |
..सविता मिश्रा