Saturday, 31 October 2015

करवाचौथ का विहान मुबारक ..:)

कल सब अपने-अपने ही चाँद को देख खुश थे | हम भी खुश और मनन कर रहें थे कि दुनिया ऐसे ही खुबसुरत हो तो कितनी अच्छी लगे|और तो और पवित्रता अपने देश में वाश करने लगे फिर से चहुँओर | मुस्करा ही रहें थे तभी एक महोदय पास आ बोले , क्यों मुस्करा रहीं हैं अकेले-अकेले ? हमारा उत्तर सुन ठठा पड़े | बोले अरे तरह तरह के चांदो की नुमाइश तो रोज करता हूँ | कम से कम एक दिन तो अपने चाँद को देखूं न और परखू भी कि कहीं दूजा चकोर उस पर ग्रहण तो न डाल रहा |

करवाचौथ का विहान मुबारक ..:)

Friday, 30 October 2015

शुभ कामनायें

सभी बहनों को हार्दिक शुभकामनायें ...आप सभी का सुहाग बना रहें!!!!जीवन सुखमय रहें।
पति लोग जो ये कहते कि औरते चुप रहें तो उम्र बढ़ेगी उनकी वो शायद भ्रम में हैं । उनकी उम्र तो हमेशा बढ़ती ही हैं बल्कि उनके चिकचिक से औरतो की उम्र घटती, तभी तो शादी के वक्त औरतो की उम्र आदमी से दस से तीन साल तक छोटी होती। कारण साफ़ औरते आदमियो से जल्दी बूढी होती फिर भी ये सब कहते औरते व्रत से अच्छा चुप रहें....विज्ञानं कहता चुप रहने से उम्र बढ़ती तब तो औरतो की बढ़नी चाहिए!! यदि आदमी कहते की उनकी उम्र घट रही यानि साबित होता हैं कि आदमी लोग ज्यादा बोलते।😂😂😂😂😂
यानि अब से आप सब कम बोलने की आदत डाले और अपना जीवन खुशहाल करें!!!पत्नियो को जेवर कपडे देकर उन्हें भी खुश रखे और मांगती ही क्या हैं आपसे बस थोडा सा प्यार ही न...जो आप दुसरो पर लुटाने के इच्छुक रहते!!! अपनों पर लुटाए !! सुखी रहें और खुश रहने दें!!!!!पड़ोसन को देख ईष्या न पाले!!!!!!!!बोलो करवा माता की जय☺☺☺☺

Thursday, 29 October 2015

~सुसंस्कार~


ससुर-सास गाँव से आते ही न चाय पिया न पानी । बहू से पूछताछ करने लगें ।
"बहू , सुना हैं तू तलवार बाजी सीखा रहीं हैं बिटिया को |"
"किसने कहाँ बाबूजी , वो मुए लफंगे अफवाह उड़ाते रहते | तलवारबाजी सिखाकर शादी व्याह में रोड़े थोड़े डालना हैं मुझे | वो तो झाँसी की रानी का मंचन चल रहा | आपकी पोती रानी लक्ष्मीबाई का किरदार निभा रही | इस लिय थोड़ा सा सीख रही हैं बस|"
"तभी कहूँ कि मोहन तो ऐसा न करेगा कि लड़की को तलवार सिखाये और लड़के को रोटी बनाना | कहाँ हैं मोहन, उससे कहना कि दोनों को एक दूजे का सम्मान करना सिखाये | "
"अरे जी, तुम क्या समझोंगे ! क्या लड़के ,क्या लड़की सबको आजकल की हवा लग गयी हैं | अब लड़कियां घर में कहाँ रहती और लड़के भी रसोई में दो-चार पकवान बना ही लेवे।" पत्नी बोल उठी
"हा तू तो खूब समझती हैं तभी लड़की को घर में कैद रख सोची वह सुरक्षित रहेंगी | उसे भी जमाने की हवा लगने दी होती तो आज ...|"
माहौल गमगीन हो गया | सहसा गाँव के ही लड़के द्वारा सोनी का चीर हरन आँखों के सामने गुजरने लगा | घर में बंद रहने के कारण वह लड़को से नजर भी मिलाने से डरती थी विरोध क्या करती | सोनी की माँ के आँखों से दर्द बहने लगा ।
"गलती तेरी भी न सोनी की अम्मा मैं भी तो समभागी हूँ | काश शिक्षक का फर्ज भी निभाते हुय अपने गाँव के बच्चों में सुसंस्कार बांटे होते तो बेटी का दर्द नासूर बन ना रिसता रहता |" सविता मिश्रा

~~आंख पर पड़ा परदा~~पथप्रदर्शक-

पथप्रदर्शक-

"सब्जी ले लो,तोरी, गाजर,मटर, आलू ले लोओओsss!!"
"भैया रूको , मैं आती!!"
"बेटा रिशु ,चल साथ में ,ज्यादा सब्जी लेनी हैं न, तू उठा ले आना।"
"जी मम्मा ,आप चलिए मैं आता हूँ, बस थापर सर की कामयाबी के टिप्स लिख लूँ!!"
"जल्दी आना !!"
"हां मम्मा, आप के खरीद चुकने से पहले आपके पास होऊंगा ।"
"टमाटर और प्याज कैसे दिए भैया|"
"40 रूपये में दीदी जी|"
"इतने महंगे !!!न न 30 में दो तो बोलो , हमें तीन चार केजी लेना। कल मेरे बेटे के राष्ट्रिय कबड्डी टीम में सेलेक्शन होने की पार्टी हैं न।"
"वाह दीदी जी, आप मेरी तरफ से फिर फ्री लीजिये।" सब्जी वाला खुश होकर बोला।
'सर'- 'सर' कहते सुन अचानक ठेल से नजर उठाते ही नीलम रिशु को सब्जी वाले के कदमो में झुका हुआ देख हतप्रभ रह गयी।
"रिशु ये क्या हैं??"
"मम्मा तुम नहीं जानती इन्हें? यही तो हैं मेरे अदृश्य गुरु!!! गोल्ड मेडिलिस्ट!!! जिनकी मैं दिन रात पूजा करता हूँ। आज ये मुझे मिल गए, मैं साक्षात् इनसे ही अब सीखूंगा।"
"बोलिये न थापर सर, आप सिखायेंगे ना मुझे कबड्डी के गुर???"

नीलम की ख़ुशी अब काफूर सी हो गयी थी। बेटे के उत्साह और देश के महान कबड्डी खिलाड़ी को सब्ज़ी बेचते देखकर अचानक वो कठोर निर्णय लेते हुए सब्जी वाले से बोली- "भैया टमाटर बस आधा केजी ही देना।"
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Sunday, 27 September 2015

~पुरानी खाई -पीई हड्डी~

~चित्र आधारित लघुकथा ~

अस्त्र-शस्त्रों से लैस पुलिस की भारी भीड़ के बीच एक बिना जान-जहान के बूढ़े बाबा और दो औरतों को कचहरी गेट के अन्दर घुसते देख सुरक्षाकर्मी सकते में आ गए |

"अरे! ये गाँधी टोपीधारी कौन हैं ?"

"कोई क्रिमिनल तो न लागे, होता तो हथकड़ी होती |"
"पर, फिर इतने हथियारबंद पुलिसकर्मी कैसे-क्यों साथ हैं इसके ?" गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी आपस में फुसफूसा रहे थे |
एक ने आगे बढ़ एक पुलिसकर्मी से पूछ ही लिया, "क्या किया है इसने? इतना मरियल सा कोई बड़ा अपराध तो कर न सके है |"
"अरे इसके शरीर नहीं अक्ल और हिम्मत पर जाओ !! बड़ा पहुँचा हुआ है| पूरे गाँव को बरगलाकर आत्महत्या को उकसा रहा था |" सिपाही बोला
"अच्छा! लेकिन क्यों ?" सुरक्षाकर्मी ने पूछा
"खेती बर्बाद होने का मुआवज़ा दस-दस हजार लेने की जिद में दस दिन से धरने पर बैठा था | आज मुआवज़ा न मिलने पर इसने और इसकी बेटी,बीबी ने तो मिट्टी का तेल उड़ेल लिया था | मौके पर पुलिस बल पहले से मौजूद था अतः उठा लाए |"
"बूढ़े में इसके लिए जान कैसे आई ?" सुरक्षाकर्मी उसके मरियल से शरीर पर नज़र दौड़ाते हुए बोला|
"अरे जब भूखों मरने की नौबत आती है न तो मुर्दे से में भी जान आ जाती है, ये तो फिर भी पुरानी खाई -पीई हड्डी है |" व्यंग्य से कहते हुए दोनों फ़ोर्स के साथ आगे बढ़ गया |

"गाँधी टोपी में इतना दम, तो गाँधी में ..." सुरक्षाकर्मी बुदबुदाकर रह गया |

 सविता मिश्रा

Saturday, 26 September 2015

मन में लड्डू फूटा (लघुकथा)

"भैया डीजल देना"
"कितना दे दूँ भाईसाब ?"
"अरे भैया गैलेन भर दो, देख ही रहे हो आजकल लाईट कितनी जा रही है| रोज-रोज दूकान के चक्कर कौन लगाये|"
"हा भाईसाब इस सरकार ने तो हद कर दी है|" जैसे उसके दुःख में खुद शामिल है दूकानदार|
उसके जाते ही वही दूकानदार आरती करते वक्त- "हे प्रभु अपनी कृपा यूँ ही बनाये रखना| यदि साल भर भी ऐसे ही सरकार को बुद्धि देते रहे तो बच्चे की पढ़ाई पूरी हो ही जायेगी प्रभु |"

Tuesday, 15 September 2015

बदहाल हिंदी

सब जगह बस तू ही तू ....मेरा अस्तित्व तो बस किताबो में रह गया ...वहां भी तेरा ही घुसपैठ ..मेरी कराह कोई सुन कहाँ रहा...जो सुन रहा वो तेरी ही भाषा में बोल रहा....वेट ऐंड वाच या फिर टेक केयर कह निकल जा रहा..मेरे को बचाने कोई मसीहा आएगा क्या कभी!!!!
उम्मीद पर दुनिया कायम हैं और मैं भी...जल्दी आना वो मेरे मसीहैं ☺☺☺तेरी बदहाल हिंदी
सविता मिश्रा

Monday, 24 August 2015

~~दर्द~~

"कितनी कोशिश की पर नहीं लिख पा रही। ये कथा भी झन्नाटेदार लघु कथा नहीं बन पा रही। "कथा सुनाती हुई अपनी सखी से रूबी बोली
"अरे क्यों !! तुम कितना अच्छा तो लिखी हो रूबी। हमें तुम्हारी लेखनी में तो जादू सा अहसास होता हैं। बहुत दमदार लिखती हो।"
तभी बगल में बैठे बुजुर्ग ने कहा , "अच्छा विषय चुना कोशिश करती रहो ।"
"ऐसा क्या करूँ कि अपने अच्छे विषय को परफेक्ट बना सकूँ अंकल जी।"
"कुछ नहीं बेटा बस एक चुनौती की तरह लो फिर देखो कमाल। झन्नाटेदार कथा लिखने की कोशिश के बजाय , अपने दिल पर झन्नाटेदार थप्पड़ महसूस करो। " सविता

Saturday, 22 August 2015

खुशबू चंदन की


“अरे ! यह किताब ! यह तो मेरी कहानी संग्रह है | यह आपके हाथ ! आज मुझको  कैसे पढ़ने की इच्छा हुई !!”
“तुम्हें तो कब से पढ़ रहा हूँ, पर जान ही नहीं पाया कि तुम  छुपी रुस्तम भी हो |
क्या लिखती हो ! आज पता चला। एक कहानी पढ़कर तो  हँसी ही नहीं  रुक रही है।”
“कौन सी कहानी पढ़कर हँसी का फव्वारा फूट पड़ा है जनाब ?”
“अरे ये  वाली ‘जाहिल पिया ! कहीं इस कहानी के जरिये मुझ पर तो गुबार नहीं निकाली हो |” कहानी वाला पेज खोलकर निगाहें तिरक्षी करते हुए कहा |
“ह्ह्ह्हह तुम भी न ! सब मर्द एक जैसे ही होते हो, शंकालु। सब इमेजिनेशन है | सच्चाई तो  हींग माफ़िक होगी, समझे बुढऊ।” दोनों ही उन्मुक्त हँसी हँसने लगें |
“एक बात पुछु ?”
“हाँ भई हाँ, पूछो! तुमको कब से इजाजत लेने की जरूरत पड़ने लगी।! ”
“मेरी हर आवाज पर तुम सामने होती थी। बच्चों को भी कभी भी अकेले एक पल के लिए नहीं रहने दिया। फिर ये कहानियों  के लिए समय कब निकाल लेती थी तुम ?”
“काम तो हाथ करते थे न, दिमाग़  तो कहानी बुनता था फिर रात बिरात कलम उन्हें संग्रह कर लेता था | ”
“तुम्हारी कहानी की तरह ही तुम्हारे जवाब भी लाजव़ाब हैं।”
"हुँह!!” चलो अब खाना खा लो बहुत तारीफ़ हो गयी। ”
“हाँ चलो, अब खा ही लूँ ! नहीं तो ‘भूखा पति‘ कहानी लिख दोगी।” फिर से ठहाका गूँज उठा कमरे में। ..सविता मिश्रा

Tuesday, 14 July 2015

अन्तर्मन (kahani)

पेड़ के बगल ही खड़ी हो पेड़ से प्रगट हुई स्त्री ने पूछा , “अब बताओ इस रूप में ज्यादा काम की चीज और खूबसूरत हूँ या पेड़ रूप में |
पेड़ बोला , “खूबसूरत तो मैं तुम्हारे रूप में ही हूँ , पर मेरी खूबसूरती भी कम नहीं | काम का तो मैं तुमसे ज्यादा ही हूँ |”
” न ‘मैं’ हूँ |”
पेड़ ने कहा, ” न न ‘मैं’ ”
पेड़ ने धोंस देते हुए कहा , “मुझे देखते ही लोग सुस्ताने आ जाते हैं |जब कभी गर्मी से बेकल होते हैं |”
“मुझे भी तो |” रहस्यमयी हंसी हंसकर बोली स्त्री
“मुझसे तो छाया और सुख मिलता हैं आदमी को |”
“अरे मूर्ख मैं भी छाया और सुख प्रदान करती हूँ| आंचल से ज्यादा छाया और सुख कोई नही दे सकता |” अहंकार से भर इठला गयी स्त्री
“मुझ पर लगे फल लोग खा के तृप्त होते हैं |”
“हा हा हा हा” ठहाका जोर का मारकर बोली , “मुझसे भी तृप्त ही होते हैं |” कह शरमा सी गयी
“मेरी पतली पतली शाखायें लोग काट आग के काम में लाते हैं |”
“मैं स्वयं एक आग हूँ, बड़े बुजुर्ग यही कहते हैं |” रहस्यमयी मुस्कान बढ़ गयी थी
“मैं आक्सीजन प्रदान करता हूँ |”
“मैं खुद आक्सीजन हूँ ! जिन्दगी देती हूँ ! मेरे से प्यार करने वाला मेरे बगैर मर जाता हैं | तुमसे भी प्यार करने वाले करते तो हैं पर तुम्हारे न होने पर मरते नहीं हैं |” गर्वान्वित हो बोली स्त्री
“मैं उपवन को हरा-भरा रखता हूँ |”
“अरे महामूर्ख , मैं खुद उपवन ही हूँ ! मेरे बगैर इस धरती का सारा वैभव तुच्छ हैं |”
“मुझे लोग काट निर्जीव कर अपने घरों में सजाने के उपयोग में लें आते हैं |” थोड़ा दुखी हो वृक्ष बोला ” इससे अच्छा हैं मैं तुम्हारे इस स्त्री रूप में ही रहूँ | सच में तुम ज्यादा खूबसूरत और काम की हो | मैंने हार मान ली तुमसे |”
अहंकार खो सा गया यह सुनते ही | स्त्री बोली, “नहीं , नहीं वृक्ष मैं इस रूप में नहीं रह सकती | तुम्हारा निर्जीव रूप में ही सही शान से उपयोग तो लोग कर रहें पर मुझे तो ना जीने देते हैं न मरने | तुम्हे निर्जीव कर तुम्हारे ऊपर आरी चलाते हैं पर मुझ पर तो जीते जी |” दुखित हो स्त्री बोली
"ठहरों , मैं तुम में समा जाती हूँ फिर से | जादूगर ने कहा था न सूरज डूबने से पहले नहीं समाई तो मैं स्त्री ही बन रह जाऊँगी | हे वृक्षराज , मैं स्त्री नहीं वृक्ष रूप में ही ज्यादा सुरक्षित हूँ | और हर रूप में मानव को सुख देने में सक्षम रहूंगी इस वृक्ष रूप में | मानव स्त्री को तो नरक का द्वार कहकर घृणा भी करता हैं | तुम्हें यानि पीपल को पिता का रूप मान आदर देता हैं | मैं तुम्हारे रूप में ही रहकर सुकून पाऊँगी | मुझे अपने में समेट लो वृक्षराज |” विनती करती हुई सी बोली स्त्री |
दोनों ने जादूगर द्वारा दिए मन्त्र बोले और एक रूप हो गये | अँधेरा अपने यौवन रूप में प्रवेश कर चुका था |
— 

Sunday, 12 July 2015

~~ऐतवार ~~

"मेरे शरीर का हर अंग मैं दान करती हूँ , बस आँख न लेना डाक्टर |" मरते समय शीला कंपकपाती आवाज में बोली
"आँख !आँख क्यों नहीं , यही अंग हैं जिसकी जरूरत ज्यादा हैं लोगों को |"
"डाक्टर साहब,  ये मेरे पति की आँखे हैं |  मोतियाबिंद के कारण मेरी दोनों आँखें नहीं रही थीं  | हर समय दिलासा दिलाते रहते | हर वक्त मेरी आँख बन मेरे साथ रहतें |शरीर से तो वो मुक्त हो गये मुझसे, पर आँख दे गये |बोले इन आँखों में तुम बसी हो अतः अब ये तुममें ही बस कर तुमकों देखेंगी | इन आँखों को दान कर मैं उनके प्रेम से मुक्त नहीं होना चाहती | तभी मोबाइल बज उठा, ये प्यार का बंधन हैं ....रिंग टोन सुन डाक्टर मुस्करा उठे |
बस इतना ही रहें तो कैसी बनी कथा |
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या ये नीचे लिखा हुआ जोड़ दें तो अच्छा ...कृपया राय भी दे दीजियेगा पढने पर

उठाते ही विदेश में रहने वाले बेटे की आवाज आई- "माँ,मैं आ रहा हूँ ! अच्छे से अच्छे डाक्टर को दिखाऊंगा तुम चिंता न करो | "
"बेटा, आ जा जल्दी , पर अब डाक्टर की जरूरत नहीं |अब ये शरीर इस मोह के बंधन को तोड़ दैविक बंधन में बंधना चाहता हैं |" फोन कटते ही निश्चेत हो गयीं |

Saturday, 11 July 2015

ज़िद नहीं (चोट)

"पापा, आइसक्रीम चाहिए |"
"सुबह-सुबह आइसक्रीम नुकसान करेगी |" समझाने पर भी विमल को आखिरकार दिलानी ही पड़ी।
कुछ देर में, "पापा, गुब्बारा चाहिए, गुब्बारा चाहिए ।"
"बेटा, घर चल के दिला दूँगा, यहॉ लेगी तो घर चलते-चलते फ़ुस्स हो जायेगा।" पर पंखुड़ी तो ज़िद पर अड़ी रही।
विमल के दिमाग में कुछ और ही कौंध गया उसकी ज़िद देख। उसे तो समझा रहा हूँ और खुद ज़िद पर अड़ा हूँ कि मुझे भीखू की भी जमीन चाहिए। वो नहीं देना चाहता फिर भी | आखिर तीन सौ एकड़ ज़मीन क्या कम है। इतना लालच आखिर किस लिए? अन्ततः रह सब यहीं जाना है |गुब्बारे की तरह ज़िन्दगी एक दिन फ़ुस्स हो जायेगी।'
"पापा, पापा बांसुरी चाहिए |"
"बांसुरी! हाँ, बांसुरी ठीक है | गुब्बारा घर जाते-जाते फूट जायेगा | बांसुरी तो रहेगी न, और इसकी आवाज़ की मिठास भी |"
विमल सोचने लगा | उसके कानों में पंखुरी की आवाज़ नहीं आ रही थी- "पापा, आप सिखाओगे न मुझे बजाना |"
--००--नया लेखन - नए दस्तखत
10 July 2015 ·

Wednesday, 1 July 2015

दर्द

शिखा अपने पड़ोसन अमिता और बच्चो के साथ पार्क में घूमने गयी चारों बच्चे दौड़-भाग करने में मशगूल हो गये, शिखा भी अमिता के साथ गपशप करने लगी, गपशप करते हुए समय का पता ही नहीं चला पता तब चला, जब घर पर पहुँच शिखा के पति उमेश का फोन आया
शिखा अपने बच्चों को आवाज़ दी, "श्रेया, मुदित जल्दी आओ घर चलना है
"
दोनों दौड़े-दौड़े माँ के पास पहुँचे ही थे कि शिखा उनके दोनों हाथो में पार्क के सुंदर-सुंदर फूल देख, ठगी सी इधर-उधर देखने लगी
कोई पार्क का पहरेदार देखकर गुस्सा ना करने लगे तभी अचानक श्रेया से अमिता का बेटा दौड़ते हुए भिड़ गया श्रेया ज़मीन पर गिर गयी, जिसके कारण उसके घुटने छिल गये वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी
शिखा और अमिता दोनों उसे चुप कराने लगे और चोट पर फूंक मारने लगे

अमिता उसे चुप कराते हुए बोली, "बेटा देखो तुम्हें चोट लगी तो हम सब को दुःख हुआ, इसी तरह तुम्हारे फूल तोड़ लेने से पौधों को भी दुःख हुआ होगा न
फूल और पौधा दोनों ही रोये होंगे"
श्रेया भिनक गयी, "हमें चोट लगी और आप दोनों को पौधों-फूलों की पड़ी है
आप दोनों ही गंदे हो, पापा से बोलूँगी मैं"
शिखा मुस्कराते हुए बोली, "अच्छा बाबा! चलो, घर बता देना पापा की लाडली...
" शिखा बच्चों के साथ घर आ गयी, घर में श्रेया पापा से रो-रो बताने लगी
पापा ने मरहम पट्टी की और उसे संतुष्ट करने के लिए माँ को भी डांट लगाई
फिर बात करते-करते श्रेया को घर के बाहर ले गये
बाहर खड़े कैक्टस में से एक पत्ती तोड़ बोले, "देखो! बेटा इसको भी चोट पहुँची न
पत्ती और पेड़ दोनों आँसू बहा रहे हैं न!"
--००--

22 June 2014
*एक उलझन और एक सुलझा हुआ जवाब *
Event for बाल उपवन [ साहित्यिक मधुशाला ]
(संकल्प) (पिता लाडली) पिछले शीर्षक 

Monday, 8 June 2015

~~नाकाम साज़िश ~~

"तुम अब तक स्कूल तक में कुछ भी नहीं की हो; अब कैसे स्कूल से बाहर डिबेट कम्पटीशन में जाने की बात कर रही हो | नाम डुबो के आओगी स्कूल का । " नाम फाइनल करते समय टीचर ने हिमा पर क्रोध करते हुए कहा ।
"सर, मौका मिला ही नहीं ,और न पूछा गया कभी क्लास में । अभी तक वही जा रहें थे, जो जाते रहें थे। "
खूब लड़-झगड़ आखिरकार अपनी जगह डिबेट में पक्की कर ली हिमा ने ।
"जाओ मना नहीं करूँगा ,पर कुछ कर नहीं पाओगी । " टीचर अपनी चहेती के ना जा पाने पर झुंझलाकर बोलें।
सुनते ही आग बबूला हो उठी हिमा, पर चुप्पी साध ली । माँ की बातें याद आ गयी ! बड़ो की बात बुरी लगे यदि कभी ,तो मुहँ से नहीं अपने काम से जबाब देना ।
"कहाँ खोयी हो हिमा?? तुम्हारा नाम एनाउंस हो रहा !" आज बीस दिनों बाद डिबेट में प्रथम आने का अवार्ड ऑडोटोरियम में मिलना। पूरा ऑडोटोरियम ताली की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था।
प्रिंसिपल से अवार्ड लेते समय उस टीचर को नजरों से ही ज़बाब दे रही थी हिमा।
टीचर यह कहते हुए मुहँ पीटकर लाल कर रहें थें कि "तुम तो बड़ी प्रतिभाशाली हो, अब तक कहाँ छुपी हुई थी तुम्हारी 'प्रतिभा की उड़ान'। सुनकर हिमा व्यंग से मुस्करा उठी ।
"अगली उड़ान के लिय फिर तैयार रहना |" शाबाशी देते हुए टीचर बोलें|

Tuesday, 2 June 2015

~~अविश्वास ~~

शादी समारोह में चाचा-ताऊ की सभी भाई-बहन इक्कठे हुए थे | तभी रुक्मी चिल्लाती सी बोली "ये पगली बहिन तोहके बाबू बोलावत हयेन |"
"बिट्टी, ई नाम न लिहा करा |  सब कहिही की पागल बाटय का | " विनती सी करती हुई धीरे से बोलीं |
"अरे बहिन, अब क्या करे ? जुबान पर यही नाम रटा है | बाबा क्यों रखे ऐसा नाम ?"
"का जानि बिट्टी, पर अब छोड़ी दा बोलब इ नाम सिधय बहिन बोलावा , ना नाम याद रहेय ता |" गुस्से में प्यार जताती चचेरी बहन बोली|

''दस बहिन हों  ,. कैसे पता किसे बुला रहे | नाम भी सबका एक जैसा ही 'पगली' 'सगली' |  जिसका नाम लो वही नाराज |" तुनक कर छोटी बोली|

''क्या
करी बिट्टी ?नाराजगी की बात हैं न| ससुराल वाले सुन लेंगे तो 'पहचान' जो बनी हैं मिटटी हो जाएँगी | सावित्री बहिन बोला करो न लाडो | मेरी प्यारी छुटकी |" फिर लरजकती हुई आवाज में विनती (चिरौरी) करती हई बोली|
''तीस-पैंतीस साल हो गये ससुराल में , जीजा तो पागल न समझेंगे न |"
''क्या पता बिट्टी !!" कथन में अविश्वास आसमान छू रहा था |

आंचलिक भाषा में ..:) पहले इसी में लिखे थे पर किसी को समझ न आने पर खड़ी हिंदी में लिखना पड़ा|

अविश्वास-

शादी समारोह में चाचा-ताऊ की सभी भाई-बहन इक्कठे हुए | तभी रुक्मी चिल्लाती सी बोली "ये पगली बहिन तोहके बाबू बोलावत हयेन |"
" ये बिट्टी, ई नाम न लिहा कर | सब कहिही की पागल बाटय का | "
"अरे बहिन, अब का करी , तोर इही नाम बचपन से जुबनवा पर बा |बबा काहे रखेंन तोर इ नाम |"
"का जानि बिट्टी, पर अब छोड़ी दा बोलब इ नाम सिधय बहिन बोलावा , ना नाम याद रहेय ता |" गुस्से में प्यार जताती हुई बड़ी बहन फिर बोलीं|
"दस बहिन हऊ , कैसे पता चले कौने बहिनी के बोलावत हई हम | नामव सब का पगली सगली | तोहरेन की नाही सब गुस्सा करथिन |"
" का करी बिट्टी ससुराल वाले सुनही ता बनी बनायी हमार पहचान हेराय जाये | 'सावित्री बहिन' बोला करा मोर बिट्टी|" चिरौरी करती हई बोली|
"तीस पैंतीस साल से रहत हए संगे, जीजा ता ना समझिही न पागल |"
"का पता बिट्टी !!" कथन में अविश्वास आसमान छू रहा था| सविता मिश्रा


Monday, 25 May 2015

पगली-

पगली- ऑटो-चालक ने नन्हें-नन्हें बच्चें भेड़-बकरी से ठूँस रखे थे ऑटो में। | पड़ोसी के बच्चे मुदित उसकी नन्ही कली को भी डाल दिया था ऑटो में। तिल रखने की भी जगह न बची थी अब। नन्हा मुदित बैठते ही पसीने-पसीने हो रहा था| परन्तु मधु का ध्यान ही न गया इस ओर कभी भी। सुबह चहकती हुई उसकी कली दोपहर की छुट्टी बाद मुरझाई सी घर पहुँची थी | वह खाना-पीना खिलाकर उसे बैठा लेती पढ़ाने | थकी हारी बच्ची रात में खा-पीकर जल्दी ही सो जाती थी। एक दिन ऐसा आया कि ऑटो में ही कली मुरझा गयी | एक तो भीषण गर्मी, दूजे भेड़ बकरी से छोटे से ऑटो में ठूंसे हुए बच्चें।नन्हा मुदित भी बेहोश सा हो गया था| बड़े-बड़े डाक्टरों के पास रोते बिलखते माता पिता पहुँचे थे| पर सब जगह से निराशा हाथ लगी थी उन्हें| अपनी बच्ची को खोकर उसने सड़क पर अभियान सा छेड़ रखा था ! प्रतिदिन स्कूल के बाहर खड़े होकर उन ऑटो चालको को सख्त हिदायत देते देखी जाती थी, जो बच्चों को ठूँस -ठूँसकर भरे रहते थे| माता-पिता को भी पकड़-पकड़ समझाती थी। समझने वाले समझ जाते थे| पर अधिकतर लोग उसे पगली कह निकल जातें थे । एसपी ट्रैफिक ने जब उसे बीच सड़क पर चलती ऑटो को रोकते हुए देखा, तो पहुँच गये थे उसे डांट लगाने| परन्तु उसका दर्द सुनकर, लग गयेे थे खुद ही इस नेक काम में | आज मधु का सालों पहले छेड़ा अभियान रंग लाया था। 'अधिक बच्चे बैठाने पर ऑटो चालकों को फाइन भरना पड़ेगा ' सुबह- सुबह आज के न्यूज़ पेपर में यह हेडिंग पढ़ मधु जैसे सच में पागल सी होकर हँसने लग पड़ी। कानून के डर ने मधु के काम को बहुत ही आसान कर दिया था | अब नन्हें-नन्हें फूल ऑटो से दोपहर में मुस्करातें लौटेंगे| सोचकर ही मधु मुस्कराकर सिर ऊपर उठा दो बूँद आँसू टपका दी ! जैसे कि अपनी नन्हीं को श्रधांजलि दे रही हो। ======================================
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Friday, 15 May 2015

वैटिकन सिटी

"मेरी बच्ची! तू सोच रही होगी कि मैंने इस तीसरे अबॉर्शन के लिए सख्ती से मना क्यों नहीं किया!" ओपीडी के स्ट्रेचर पड़ी बिलखती हुई माँ ने अपने पेट को हथेली से सहलाते हुए कहा।
पेट में बच्ची की हल्की-सी हलचल हुई।
"तू कह रही होगी कि माँ डायन है! अपनी ही बच्ची को खाए जा रही है। नहीं! मेरी प्यारी गुड़िया, मैं उद्धार कर रही हूँ तेरा। इन अहसान-फरामोशों की बस्ती में आने से पहले ही मैं मुक्त कर रही हूँ तुझे।"
पेट के बायी ओर हलचल तेज हुई। लगा जैसे शिशु पैर मार रहा है।
"गुस्सा न हो मेरी लाडली ! क्या करूँ, बेबस हूँ ! और तेरे भविष्य की भी चिंता है न मुझे?
"माँ-माँss.." करुणा भरी आवाज़ आयी।
"क्या हुआ मेरी बच्ची?" माँ बेचैन हो गयी।
"माँआआअ, सुनो न ! देखो तो! तुझे सुलाकर, डॉक्टर अंकल मेरे पैर काटने की कोशिश में लग गए हैं..!"
"ओ मुए डॉक्टर! मेरी बच्ची, मेरी लाडली को दर्द मत दे। कुछ ऐसा कर ताकि उसे दर्द न हो ! भले मुझे कितनी भी तकलीफ़ दें दे तू।"
"माँ मेरा पेट...!"
"ओह मेरी लाडली ! इतना-सा कष्ट सह ले गुड़िया, क्योंकि इस दुनिया में आने के बाद इससे भी भयानक प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी तुझे !
मुझे देख रही है न ! मैं कितना कुछ झेलकर आज उम्र के इस पड़ाव पर पहुँची हूँ।
इस जंगल में स्त्रीलिंग होकर जीना आसान नहीं है, नन्हीं गुड़िया।"
"माँ -माँआआआ, इन्होंने मेरा हाथ.!"
"आहss! चिंता न कर बच्ची। बस थोड़ा-सा कष्ट और झेल ले! जिनके कारण तूझे इतना कष्ट झेलना पड़ रहा है, वो एक दिन "वेटिकनसिटी" बने इस शहर में रहने के लिए मजबूर होंगे, तब उन्हें समझ आएगी लड़कियों की अहमियत।" तड़पकर माँ बोली।
"माँsss अब तो मेरी खोपड़ी ! आहss ! माँsssss ! प्रहार पर प्रहार कर रहे हैं अंकल!"
"तेरा दर्द सहा नहीं जा रहा नन्हीं! मेरे दिल के कोई टुकड़े करें और मैं जिन्दा रहूँ! न-न! मैं भी आ रही हूँ तेरे साथ! अब प्रभु अवतार तो होने से रहा। मुझे ही इस पुरुष वर्ग को सजा देने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा न!"
"माँSSS!"
"मैं तेरे साथ हूँ गुड़िया...! वैसे भी लाश की तरह ही तो जी रही थी। स्त्रियों को सिर उठाने की आज़ादी कहाँ मिलती है इस देश में। तुझे जिंदा तो रख न सकी किन्तु तेरे साथ मर तो सकती ही हूँ! यही सजा है इस पुरुष प्रधान समाज को मेरे अस्तित्व को नकारने की।"
तभी सुरेश ओपीडी के अंदर बदहवास-सा दाखिल हो गया..!
"सॉरी सर!
  तैयारी पूरी हो गयी है। बाहर रहिये ! आप ये सब देख नहीं पायेंगे।"
"नहीं डॉक्टर! दुनिया में एक और वैटिकन शहर नहीं बनने देना है हमें!
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
--००--

Thursday, 14 May 2015

पछतावा (लघुकथा )

"बाबा आप अकेले यहाँ क्यों बैठे हैं? चलिए आपको आपके घर छोड़ दूँ|"
बुजुर्ग बोले, "बेटा जुग जुग जियो। तुम्हारे माँ-बाप का समय बड़ा अच्छा जायेगा| और तुम्हारा समय तो बहुत ही सुखमय होगा|"
"आप ज्योतिषी हैं क्या बाबा?"
हँसते हुये बाबा बोले- "समय ज्योतिषी बना देता है। गैरों के लिए जो इतनी चिंता रखे, वह संस्कारी व्यक्ति दुखित कभी नही होता| " आशीष में उनके दोनों हाथ उठ गये फिर से|
"मतलब बाबा ? मैं समझा नहीं| "
"मतलब बेटा मेरा समय आ गया| अपने माँ-बाप के समय में मैं समझा नहीं कि मेरा भी एक-न-एक दिन तो यही समय आएगा| समझा होता तो ये समय नहीं आता|" नजरे धरती पर गड़ा दीं कहकर|
---००---
सविता मिश्रा "अक्षजा'
९४११४१८६२१
 आगरा 
 2012.savita.mishra@gmail.com

Saturday, 18 April 2015

यक्ष प्रश्न (निरादर का बदला)


"दिख रही है न ! चाँद सितारों की खूबसूरत दुनिया ?" अदिति को टेलेस्कोप से आसमान दिखाते हुये शिक्षक ने पूछा |
"जी सर ! कई चमकीले तारें दिख रहे हैं |"
"देखो! जो सात ग्रह पास-पास हैं, वो 'सप्त ऋषि' हैं ! और जो सबसे अधिक चमकदार तारा उत्तर में है, वह है 'ध्रुव-तारा' | जिसने तप करके अपने निरादर का बदला, सर्वोच्च स्थान को पाकर लिया | "
"सर! हम अपने निरादर का बदला कब लें पाएंगे ! हर क्षेत्र में दबदबा कायम कर चुके हैं, फिर भी ध्रुव क्यों नहीं बने अब तक ?" अदिति अपना झुका हुआ सिर उठाते हुये बोली |
शिक्षक का गर्व से उठा सिर सवाल सुनकर अचानक झुक-सा गया ।

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
17/4/2015 https://m.facebook.com/groups/778063565555641?view=permalink&id=1025560104139318

Wednesday, 15 April 2015

~~बड़ा न्यायाधीश~~

" ये 'भगवान' आप सभी के साथ बहुत अन्याय कर रहें हैं | इसकी भरपाई तो नहीं कर सकतें हम , पर आप सभी को मुवावजा अवश्य दिलवाऊंगा |" नेता जी के उद्घोष पर तालियाँ 'गड़गड़ा' उठी |
एक बूढ़ा किसान दम साधे बैठा था |
"बाबा आप नहीं खुश हैं "
बेटा जब सबसे बड़ा न्यायाधीश ही अन्याय कर रहा हैं, इनके न्याय-अन्याय पर क्या ख़ुशी और क्या दुःख |
सांस जैसे यही बोलने के लिय अटकी थी |
तभी बादल फिर  'गड़गड़ा' उठा | दो चार किसान जो 'तिनका' पा खुश थे सहसा मिट्टी हो गये |...सविता मिश्रा

~~न्याय या अन्याय ~~

"ये बहुत अन्याय हो रहा है मेहनत से लिखो , सब वाह वाह कर सरक लेंते हैं |"
"अरे तो इसमें अन्याय कहाँ हैं आपकी रचना के साथ न्याय ही तो हैं | मन ही मन तो खुश होती हैं | फिर ये दिखावटी नाराजगी क्यों ? " सखी विमला चुटकी लेंते हुय बोलीं
" ये नाराजगी  दिखाती ही हूँ न्याय पाने के लिय .." .......सविता मिश्रा