Friday, 8 July 2016

~इशारा ~


आज घर में तूफ़ान सा आया था| सारी अस्तव्यस्त चीजें सही स्थान पर रखी जा रहीं थीं | घर को बड़े सलीके से सजाया जा रहा था| पुरे मुहल्ले में लड्डू बाँटने की तैयारी पूरी हो चुकी थी | बधाइयों का तो जैसे ताँता लगा था| मोबाईल की घंटी हर क्षण घनघना उठ रही थी | जब से खबर आई थी कि अंजू ने आईएएस में टॉप किया |अंजू की ख़ुशी का ठिकाना न था | माँ-बाप के कदम तो जमीं पर ही न थे | परिवार का कोई सदस्य थक कर लेटा-बैठा न था| सब कुछ न कुछ करें जा रहें थें | पत्रकार इन्टरव्यू के लिए बस आने ही वाले थे |
अंजू अपने पिता की ख़ुशी को देख, न चाहते हुए कुछ साल पीछे का वह दिन याद करने लगी, जब घर में ऐसे ही तूफ़ान आया था | सब चीजें अस्त व्यस्त हो गयी थीं | अलमारी में रखी उसकी किताबें जमीं में बिखर गई थीं | पापा के क्रोध का शिकार हुआ उसके मोबाईल का पुरजा-पुरजा इधर उधर जमीं पर बिखरा पड़ा था | आग बबूला हो पापा ने फरमान जारी कर दिया था कि कोई जरूरत नहीं आगे पढ़ने की | घर बैठो, अपने माँ से भोजन बनाना सीखो |
माँ को भी कहाँ छोड़े थे,'देख लिया लाड प्यार का नतीजा | बड़ा जुनून था न कि अंश और इसे एक सा माहौल देकर एक मिसाल कायम करने की| एक भी संस्कार न दिए | अवारा घुमती रहती है; उसी का खामियाजा हैं | फोर्टी परसेंट नम्बर आये हैं इंटरमिडीएट में | सिखाओ अब बेटियों वाले गुण | बहुत जल्द शादी खोज अपने घर से विदा करता हूँ इसे |" गुस्से में बस बोले चले जा रहें थें |

कितना रोई-गिड़गिड़ाई थी मैं | पापा रत्ती भर भी न पिघले थे | माँ से वादा किया कि मैं सिर्फ पढूंगी और कुछ न; न दोस्त, न टीवी, न मोबाईल, कुछ भी न | किताबी कीड़ा हुई तब कहीं जाके तूफ़ान ठहरा था | फिर भी माँ को महीनों लग गये थे पापा को मुझे काँलेज में एडमिशन के लिए मनाने में |
माँ सर पर हाथ फेर बोली "अंजू, बेटा पत्रकार आ गए |" सुनते ही वर्तमान में लौटी तो देखा तूफ़ान थम चूका था | कल और आज के तूफ़ान में जमीन-आसमान का फर्क नजर आ रहा था | कल के उस क्रोध से तमतमाये चेहरे से आज फूलों की वारिस हो रहीं थी|
पत्रकार का पहला सवाल, "अंजू जी आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देंगी |"
अंजू ने सामने बैठे पिता की ओर 'इशारा' बस कर दिया | पिता का सीना गर्व से तन गया |
माँ अपने दिए ,संस्कार, पर गदगद हो पिता की ओर देखने लगीं | सविता

~कुछ मन की~ (आज की शिक्षा पर सवाल )

फेशबुक पर जब रूबी राय का मजाक उड़ाती पोस्टों पर जब नजर जाती हैं एक टीस सी होती दिल में | रूबी राय का मजाक उड़ाने वाले हो सकता है खुद ही रूबी राय ही रहें हों | न पूरा सही अंशमात्र ही सही | घर में भी झांकिएँ रूबी राय का थोड़ा बहुत अंश दिखेगा | हम खुद ही रूबी राय की तरह पोडिकल साइंस वाले है | न जाने कितने शब्दों का उच्चारण गलत करते | इंग्लिश तो इंग्लिश हिंदी की भी लुटिया बखूबी डुबोते| लिखने में भी हिंदी शब्द को कितना गलत लिखते ये हमें यही पर पता चला , जब कईयों ने शब्दों के लिए टोका |

हमारे 'दिमाक को दिमाग' करने में प्रभाकर भैया के साथ और कई लोग जुटे रहें | श्रवण भैया, विजय सिंघल भैया,मुकेश कुमार पांड्या भैया ने बहुत मदद की | विनीता सुरेना सखी और दीपिका द्विवेदी दी और भी कई नाम हैं जिनका योगदान कम न हमारी रचना के परिमार्जन में | हाँ ये बात और है कि हम नकल नहीं करें कभी | शायद इसी लिए टॉपर भी न रहें | सामान्य विद्यार्थी थे और पढ़ना छोड़ा तो दिमाग में भी भूसा भरता गया | प्रश्नपत्र हल करके घर आते तो कोई एक भी प्रश्न का उत्तर पूछ लेता तो हमें नहीं आता था| अंशमात्र भी न याद रहता कि उत्तर-पुस्तिका में लिखे क्या हैं |

इन दिनों समाचार पत्र में पढ़े की कई शिक्षकों को प्रार्थनापत्र तक लिखना नहीं आया | बहुत सी गल्तियाँ की उन्होंने, तो लगा जब 'राजगीर ऐसा तो मकान फिर कैसा' | इन शिक्षकों की भी शिक्षा शायद ऐसे ही किसी शिक्षक के द्वारा पूर्ण हुई होगीं | मोटी रकम भर शिक्षक की कुर्सी मिली होगीं| फिर उस कुर्सी को खाली रखने के लिए आधी रकम संस्थापक के जेब में भरी होगीं | खरीदना-बेचना जब तक होता रहेगा ऐसे ही बच्चें निकलते रहेंगे | हजारों क्या लाखों ऐसे ही बच्चें कुर्सी की शोभा बढ़ा रहें और आगे भी बढ़ाते रहेंगे | आरक्षण ने तो सोने पे सुहागा किया हुआ हैं | देश को चलाने में तो अग्रणी है ऐसे ही बच्चें | देश का राष्ट्रीय गान व गीत नहीं जिन्हें पता वो देश चला रहें |
खैर ये तो सरकारी स्कूल के बच्चों की बात हुई | कान्वेंट में पढ़े बच्चें भी फर्राटे से भले इंग्लिश बोल ले पर हिंदी में तो उनकी भी नानी मरती | इंटर का बच्चा भी इतनी लिखने में गल्तियाँ करता जितनी सरकारी स्कूल के पांचवी-छटवी के बच्चें करतें | दिमाग में एक बात घुमड़ रहीं कि ऐसे बच्चों की काँपी मेरे ससुर श्री राधेश्याम मिश्रा के हाथ लगती होगीं तो उसका क्या होता होगा| इतने मग्न हो काँपी जांचते थे , एक-एक शब्द पढ़| ज्यादातर तो शुरू-अंत पढ़ नम्बर दे देते हैं शायद | जैसे चल रहा चलने दो | यदि कोई माता-पिता शिकायत करें भी तो टीचर हाथ खड़े कर देता | हर का रटा -रटाया जबाब, हमारे क्लास में ५० विद्यार्थी ,ऐसे एक-एक को हम नहीं सिखा सकते | माता-पिता भी मजबूर , पढ़ाना तो हैं ही अतः मुहं पर पट्टी बांध लेता | इमेज भी बनाएं रखनी आखिर नामी-गिरामी स्कूल का लेबल जो लगता | कोई खडूस टाइप का हो तो कह दें, 'इतनी फ़ीस फिर किस बात की भई' |
देखा जाय तो हमारे दिमाग के नींव में ही ये बात बैठा दी जाती हैं कि सब चलता हैं | देखो, सुनो पर कड़वा यानि सच्चाई न बोलो | शिक्षक अपने कर्म भूल, पैसे से मोह करते रहेंगे तो हम जैसे छात्र भी बनते रहेंगे | ना जाने कितने फर्जी बाड़े रोज समाचारों में पढने को मिल जाते हैं |स्कूल- काँलेज कुकुरमुत्तों की तरह हर गली-मुहल्लें में खुले | डिग्रियां बिकती है बोलो खरीदोगें !! नकल भी खूब होती, ज्यादतर कालेजों में पैसा गुरु और सब चेला का बोलबाला हैं | फिर उम्मीद कैसे कि कोई टॉपर सही मायने में टॉपर ही है | ऐसे टॉपरों के लिए फर्जी कॉलेजों की भी भरमार है आजकल |पैसा फेंको तमाशा देखो |
जो पकड़ा गया वो चोर जो छूट गया वो शाह !! हद है !! हम भारतीय हैं ही ऐसे एक अगुवा होता नहीं कि चल पड़ते पीछे-पीछे | पीछे की सच्चाई से किसी को कोई मतलब नहीं | कुर्सी पातें ही अपना इतिहास भूल जाते लोग, फिर वर्तमान को इतना दूषित कर देते कि इतिहास भी गर्वान्वित हो जाता | गलती उनकी भी कहाँ, जब नींव की ईंट ही लोना लगी हो| वैसे हम भारतीय अपनी गलती छुपा दुसरे की गल्तियाँ उजागर करने में भी माहिर हैं; शायद इसी लिए हम भी अपनी असफलता का घड़ा अपने ही शिक्षकों पर फोड़ रहें| खुद की खोपड़ी में भूसा भरा था | मेहनत से भी जी चुराते रहें | हमारी तरह कई सोचेंगे तो ऐसा ही सोचेंगे --
मिट्टी घट थे
निखारा होता गर
आसमां छूते |
जी-जान से सब मेहनत करें तो शायद बात कुछ और हो| मेहनतऔर लगन से आदमी कहाँ से कहाँ पहुँच जाता हैं| नकल और दौलत को बैशाखी बना आगे बढ़ने से अच्छा हैं लंगड़ा कर चलना | परन्तु लंगड़े का मजाक उड़ाते सब, जिस दिन सब मजाक उड़ाना छोड़ उन्हें भी इज्जत देने लगेंगे कोई रूबी राय नहीं बनेगी/गा |

शिक्षा का शिखर उतना मायने नहीं रखता जितना अनुभव का| एक अनपढ़ भी अनुभवी हो सकता हैं और आप सभी पढ़े-लिखों पर भारी भी | इतिहास और वर्तमान दोनों गवाह है कि शिक्षा से ज्ञान नहीं वरन ज्ञान से शिक्षा हो जाती है...अपना मत तो यही है 
बाबा रामदेव को ही देख लीजिए...बिना एमबीए किए भी किसी एमबीए के टॉपर से भी कम दिमाग न उनमे..!😊😊
शिक्षा तो एक पड़ाव पर आ समाप्त हो जाएंगी पर अनुभव आपको जिन्दगी भर शिक्षित करता रहेंगा|
किसी भी व्यक्ति को जीवन में इतना कड़ा अनुभव न कराए कि वो जिन्दगी जीना ही छोड़ दे | सविता मिश्रा

~कुछ मन की~ (आज की शिक्षा पर सवाल )

फेशबुक पर जब रूबी राय का मजाक उड़ाती पोस्टों पर जब नजर जाती हैं एक टीस सी होती दिल में | रूबी राय का मजाक उड़ाने वाले हो सकता है खुद ही रूबी राय ही रहें हों | न पूरा सही अंशमात्र ही सही | घर में भी झांकिएँ रूबी राय का थोड़ा बहुत अंश दिखेगा | हम खुद ही रूबी राय की तरह पोडिकल साइंस वाले है | न जाने कितने शब्दों का उच्चारण गलत करते | इंग्लिश तो इंग्लिश हिंदी की भी लुटिया बखूबी डुबोते| लिखने में भी हिंदी शब्द को कितना गलत लिखते ये हमें यही पर पता चला , जब कईयों ने शब्दों के लिए टोका |

हमारे 'दिमाक को दिमाग' करने में प्रभाकर भैया के साथ और कई लोग जुटे रहें | श्रवण भैया, विजय सिंघल भैया,मुकेश कुमार पांड्या भैया ने बहुत मदद की | विनीता सुरेना सखी और दीपिका द्विवेदी दी और भी कई नाम हैं जिनका योगदान कम न हमारी रचना के परिमार्जन में | हाँ ये बात और है कि हम नकल नहीं करें कभी | शायद इसी लिए टॉपर भी न रहें | सामान्य विद्यार्थी थे और पढ़ना छोड़ा तो दिमाग में भी भूसा भरता गया | प्रश्नपत्र हल करके घर आते तो कोई एक भी प्रश्न का उत्तर पूछ लेता तो हमें नहीं आता था| अंशमात्र भी न याद रहता कि उत्तर-पुस्तिका में लिखे क्या हैं |

इन दिनों समाचार पत्र में पढ़े की कई शिक्षकों को प्रार्थनापत्र तक लिखना नहीं आया | बहुत सी गल्तियाँ की उन्होंने, तो लगा जब 'राजगीर ऐसा तो मकान फिर कैसा' | इन शिक्षकों की भी शिक्षा शायद ऐसे ही किसी शिक्षक के द्वारा पूर्ण हुई होगीं | मोटी रकम भर शिक्षक की कुर्सी मिली होगीं| फिर उस कुर्सी को खाली रखने के लिए आधी रकम संस्थापक के जेब में भरी होगीं | खरीदना-बेचना जब तक होता रहेगा ऐसे ही बच्चें निकलते रहेंगे | हजारों क्या लाखों ऐसे ही बच्चें कुर्सी की शोभा बढ़ा रहें और आगे भी बढ़ाते रहेंगे | आरक्षण ने तो सोने पे सुहागा किया हुआ हैं | देश को चलाने में तो अग्रणी है ऐसे ही बच्चें | देश का राष्ट्रीय गान व गीत नहीं जिन्हें पता वो देश चला रहें |
खैर ये तो सरकारी स्कूल के बच्चों की बात हुई | कान्वेंट में पढ़े बच्चें भी फर्राटे से भले इंग्लिश बोल ले पर हिंदी में तो उनकी भी नानी मरती | इंटर का बच्चा भी इतनी लिखने में गल्तियाँ करता जितनी सरकारी स्कूल के पांचवी-छटवी के बच्चें करतें | दिमाग में एक बात घुमड़ रहीं कि ऐसे बच्चों की काँपी मेरे ससुर श्री राधेश्याम मिश्रा के हाथ लगती होगीं तो उसका क्या होता होगा| इतने मग्न हो काँपी जांचते थे , एक-एक शब्द पढ़| ज्यादातर तो शुरू-अंत पढ़ नम्बर दे देते हैं शायद | जैसे चल रहा चलने दो | यदि कोई माता-पिता शिकायत करें भी तो टीचर हाथ खड़े कर देता | हर का रटा -रटाया जबाब, हमारे क्लास में ५० विद्यार्थी ,ऐसे एक-एक को हम नहीं सिखा सकते | माता-पिता भी मजबूर , पढ़ाना तो हैं ही अतः मुहं पर पट्टी बांध लेता | इमेज भी बनाएं रखनी आखिर नामी-गिरामी स्कूल का लेबल जो लगता | कोई खडूस टाइप का हो तो कह दें, 'इतनी फ़ीस फिर किस बात की भई' |
देखा जाय तो हमारे दिमाग के नींव में ही ये बात बैठा दी जाती हैं कि सब चलता हैं | देखो, सुनो पर कड़वा यानि सच्चाई न बोलो | शिक्षक अपने कर्म भूल, पैसे से मोह करते रहेंगे तो हम जैसे छात्र भी बनते रहेंगे | ना जाने कितने फर्जी बाड़े रोज समाचारों में पढने को मिल जाते हैं |स्कूल- काँलेज कुकुरमुत्तों की तरह हर गली-मुहल्लें में खुले | डिग्रियां बिकती है बोलो खरीदोगें !! नकल भी खूब होती, ज्यादतर कालेजों में पैसा गुरु और सब चेला का बोलबाला हैं | फिर उम्मीद कैसे कि कोई टॉपर सही मायने में टॉपर ही है | ऐसे टॉपरों के लिए फर्जी कॉलेजों की भी भरमार है आजकल |पैसा फेंको तमाशा देखो |
जो पकड़ा गया वो चोर जो छूट गया वो शाह !! हद है !! हम भारतीय हैं ही ऐसे एक अगुवा होता नहीं कि चल पड़ते पीछे-पीछे | पीछे की सच्चाई से किसी को कोई मतलब नहीं | कुर्सी पातें ही अपना इतिहास भूल जाते लोग, फिर वर्तमान को इतना दूषित कर देते कि इतिहास भी गर्वान्वित हो जाता | गलती उनकी भी कहाँ, जब नींव की ईंट ही लोना लगी हो| वैसे हम भारतीय अपनी गलती छुपा दुसरे की गल्तियाँ उजागर करने में भी माहिर हैं; शायद इसी लिए हम भी अपनी असफलता का घड़ा अपने ही शिक्षकों पर फोड़ रहें| खुद की खोपड़ी में भूसा भरा था | मेहनत से भी जी चुराते रहें | हमारी तरह कई सोचेंगे तो ऐसा ही सोचेंगे --
मिट्टी घट थे
निखारा होता गर
आसमां छूते |
जी-जान से सब मेहनत करें तो शायद बात कुछ और हो| मेहनतऔर लगन से आदमी कहाँ से कहाँ पहुँच जाता हैं| नकल और दौलत को बैशाखी बना आगे बढ़ने से अच्छा हैं लंगड़ा कर चलना | परन्तु लंगड़े का मजाक उड़ाते सब, जिस दिन सब मजाक उड़ाना छोड़ उन्हें भी इज्जत देने लगेंगे कोई रूबी राय नहीं बनेगी/गा |

शिक्षा का शिखर उतना मायने नहीं रखता जितना अनुभव का| एक अनपढ़ भी अनुभवी हो सकता हैं और आप सभी पढ़े-लिखों पर भारी भी | इतिहास और वर्तमान दोनों गवाह है कि शिक्षा से ज्ञान नहीं वरन ज्ञान से शिक्षा हो जाती है...अपना मत तो यही है 
बाबा रामदेव को ही देख लीजिए...बिना एमबीए किए भी किसी एमबीए के टॉपर से भी कम दिमाग न उनमे..!😊😊
शिक्षा तो एक पड़ाव पर आ समाप्त हो जाएंगी पर अनुभव आपको जिन्दगी भर शिक्षित करता रहेंगा|
किसी भी व्यक्ति को जीवन में इतना कड़ा अनुभव न कराए कि वो जिन्दगी जीना ही छोड़ दे | सविता मिश्रा

Tuesday, 1 March 2016

सर्वधाम (मात -पिता परमेश्वर)

"क्या चल रहा आजकल?" फोन उठाते ही जेठानी ने पूछा।
"अरे कुछ नहीं दीदी, घर अस्त-व्यस्त है उसे ही समेट रही थी। चारोधाम यात्रा करने चले गए थे न।"
"अच्छा! चारोधाम कर आयी और हमें भनक भी न लगने दी," तुनकते हुए बोली।
"नहीं दीदी ऐसी बात नहीं है!"
"ऐसी-कैसी बात है फिर? वैसे तो तुम कहती हो हर बात बताती हूँ, फिर इतनी बड़ी बात छुपा ली मुझसे! डर था क्या कि हम सब भी साथ हो लेंगे। साथ नहीं चाहती थी तो मना कर देती, छुपाया क्यों?"
"अरे दीदी सुनिए तो...।"
"क्या सुनूँ सुमन। मैं तो सब बात बताती हूँ, पर तुम छुपा जाती हो। अरे ख़र्चा हम भी दे देते। माना हम पाँच और तू चार है ..एक बच्चे का ख़र्चा सहने में तकलीफ़ थी तो बता देती। आगे से कहीं भी जायेंगे तो हम ज़्यादा दे देंगे समझी। एहसान मैं नहीं लेती किसी का।"
"अरे नहीं दी! सुनिए तो ..," फोन कट।
थोड़ी देर में सुमन फिर फ़ोन मिलाकर बोली- "दीदी ग़ुस्सा ठंडा हुआ हो तो सुनिए, आपसे पूछा था मैंने।"
"कब पूछा तुमने?" ग़ुस्से में बोली जेठानी।
"महीने भर पहले ही जब बात हुई थी तभी मैंने आपसे पूछा था कि आप अम्मा-बाबूजी के पास इस गर्मी की छुट्टी में गाँव चलेंगी।"
अब दूसरी तरफ शांति फैल गई थी।
--००--

===(शब्द निष्ठा सम्मान-२०१७ में ३५ वें नम्बर पर सम्मानित) ====

यहाँ  लिखी  थी इसे .
29 February 2016 में ...
https://www.facebook.com/events/979124858844337/permalink/982249925198497/?ref=1&action_history=null

Sunday, 31 January 2016

माता

"अरे ओ! ठहर |" सुरक्षाकर्मी के आवाज लगाते ही वह आकृति स्टेच्यु के जैसी खड़ी हो गयी |
"ऐसे कैसे यह हाथ में सूखी रोटी पकड़े, इन दो बच्चों को गोद में उठाए, यहाँ चली आ रही है | जानती नहीं है! यह राजपथ है |"
"जानती हूँ ! मेरे कुछ बच्चे भूखे हैं, अतः उनके लिए अमीर-घरों से रोटियाँ माँगकर इकठ्ठी कर लायी हूँ | कूड़े की ढेर पर पड़ी इस अनाथ बच्ची को उठा लिया मैंने, पालूँगी इसे | जैसे सब बच्चों को पाल रही हूँ !”
“और इतने तुड़े-मुड़े झंडे ?”
“देश के सम्मान का प्रतीक तिरंगा ! यहीं राजपथ पर ही बिखरा धूलधुसरित हो रहा था | कैसे अपमान होते देखती! अतः उठाकर सहेज लिया मैंने ...|"
"हैं कौन रे, तू "
“मैं ! "मैं भारत माता हूँ |"
"तूss हाँ ! हाँ ! और भारत माताss ...| हाथ में झंडा होने से भारत माता हो गयी क्या |" हँसी उड़ाते हुए सुरक्षाकर्मी ने कहा |
"क्यों, शर्मिंदगी हुई क्या यह सुनकर?
"यार विवेक! देख इसे, फटेहाल अपनी भारत-माता |" जोर का ठहाका लगाते हुए सुरक्षाकर्मी अपने दोस्त को आवाज लगाकर बोला |
"अब भी कोई शक है, क्या तुम्हें ?"
"नहीं ! नहीं ! माता ! पर यहाँ कैसे, और यह चेहरा क्यों ढक रक्खा है आपने ?" व्यंग्य भरे स्वर में सुरक्षाकर्मी पूछ बैठा |
"यहाँSS ! नेताओं के गिरगिटी रंग देखने आई हूँ ! और चेहरे से पर्दा उठा दिया न, तो और भी शर्मिंदा होने के साथ-साथ डर भी जाओंगे बेटे |"
"क्यों भला ?" बेपरवाही से वह बोला |
"क्योंकि कुदृष्टि डाली थी किसी ने | मेरे विरोध करने पर एसिड फेंक दिया मुझपर, नक्शा बिगड़ गया है मेरा |" दुःख भरी आवाज में कहा उसने |
"क्या बहस कर रही है यह 'बुढ़िया' ? भागाओ इसे इधर से | नेताओं का आना शुरू हो चुका है | किसी की नजर तुम पर पड़ी तो नौकरी से जाओगे |" दूसरा साथी गुस्से में आदेशात्मक स्वर में चीखा |
"पागल है यार ! बस अभी हटा रहा हूँ ..|"
"भारत माता, आप जरा कृपा करेंगी!! जो उधर कुर्सिया रक्खी है, वहाँ जाकर विराजेंगी | आप ऐसे यहाँ इस अवस्था में खड़ी रहीं तो मेरी नौकरी चली जाएगी माता |" कुटिल हँसी हँसते हुए वह सुरक्षाकर्मी बोला |
"हाँ बेटा, क्यों नहीं ? माँ बच्चों के लिए गूंगी-बहरी-अंधी सबकुछ बनी रह सकती है |
“जी माता ! आप कृपा करें !” यह कह हँसकर वहाँ से जाने को हुआ कि– “बस मेरे बच्चें सही सलामत रहें | परन्तु बच्चों को कुछ हुआ तो...! बुढ़िया की तेज तीखी आवाज़ सुरक्षाकर्मी के कान से टकराई |
ध्वजारोहण के साथ उसका चेहरा खुल गया था | सुरक्षाकर्मी ने पलटकर देखा तो उसकी आँखे और चेहरा दोनों ही आग उगल रहे थे |
--००--
सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
26 January 2015 at 06:03

दाए हाथ का शोर (रंग-ढंग)

चेतन का फेसबुक अकाउंट पुरानी यादों को ताज़ा कर रहा था। आज अचानक उसको वें तस्वीरें दिखी, जो उसने पांच साल पहले पोस्ट की थी। दूसरों की मदद करते हुए ऐसी तस्वीरों की अब उसे जरूरत ही कहाँ थी। उसने उन्हें स्क्रॉल कर दिया।
कभी समाजसेवा का बुखार चढ़ा था उस पर। 'दाहिना हाथ दें, तो बाएं को भी पता नहीं चले! सेवा मदद ऐसी होती है बेटा।' माँ की दी हुई इसी सीख पर ईमानदारी से चलना चाहता था वह।
लोग एनजीओ से नाम, शोहरत और पैसा, सब कुछ कमा रहे थे। और वह, वह तो अपना पुश्तैनी घर तक बेचकर किराये के मकान में रहने लगा था
पत्नी परेशान थी उसकी मातृभक्ति से। कभी-कभी वह खीझकर बोल ही देती थी कि 'यदि मैं शिक्षिका न बनती तो खाने के भी लाले पड़ जातेचेतन झुंझलाकर रह जाता था। उसी बीच उसने गरीब बच्चों को खाना खिलाते, उन्हें पढ़ाते हुए तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट कर दी थी।
यादों से बाहर आ उसने पलटकर फेसबुक पर वही अल्बम फिर से खोल लिया। तस्वीरों को देखकर बुदबुदाया- "सोशल साइट्स न होती, तो क्या होता मेरा। यही तस्वीरें तो थी, जिन्हें देखकर दानदाता आगे आये थे और पत्रकार बंधुओ ने मेरी वाहवाही करते हुए अपने समाचार-पत्र में स्थान दिया था। फिर तो मैं दूसरों को मदद करते हुए  सेल्फ़ी लेता और डाल देता था फ़ेसबुक पर। ये कारनामा फेसबुक पर शेयर होता रहा और मैं प्रसिद्धी प्राप्त करता रहा। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा मैंने।"
"अरे! कहाँ खोये हो जी! कई लोग आएँ हैं।" पत्नी की आवाज ने उसे आत्मग्लानि से उबारा।
"कहीं नहीं! बुलाओ उन्हें।"
"जी चेतन बाबू, यह चार लाख रूपये हैं। हमें दान की रसीदें दे दीजिए, जिससे हम सब टैक्स बचा सकें।" कुर्सी पर टिकते ही बिना किसी भूमिका के सब ने एक स्वर में बोला।
हाँ, हाँ ! क्यों नहीं, अभी देता हूँ।" रसीद उन सबके हाथ में थमा वह रुपयों की गड्डियाँ हाथ में लेकर मुस्कुराया
अचानक माँ की तस्वीर की ओर देखा! आँखे झुकी, फिर लपकर उसने तस्वीर को पलट दिया।
सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
---00---

Saturday, 30 January 2016

~चोट ~

"ये क्या कर रहे हो दोनों बगीचे में इस बरसात में ? बीमार पड़ जाओगे अगर भींगे तो ?
"दादी, रेन कोट पहने हम दोनों, भीगेंगे नहीं | "
"इस बूंदाबांदी में भी कोई वृक्ष की जड़ों में पानी डालता हैं क्या ?"
"नहीं दादी माँ, वृक्ष को पानी नहीं दे रहे थे बल्कि बिल्ली मौसी को पानी पिला रहे थे |
"बिल्ली पी रही थी !"
"नहीं, वो भी पानी देखते ही वृक्ष के पास अपने पंजो से मिट्टी खोदने लगी | शायद उसे भी पता कि वृक्ष को पानी की जरूरत होती हैं |"
"पर बच्चों,जैसे हम तुम्हारा ख्याल रखते और प्यार करते हैं वैसे ही उन नन्हें पौधों को ही देखभाल और प्यार यानि पानी की जरूरत होती है | "वृक्ष तो बरसात से स्वयं ही पानी इकट्ठा कर लेता है |
"अच्छा ! मतलब जैसे पापा-मम्मी आपका ख्याल नहीं रखते और न प्यार बरसाते वैसे वृक्ष ...?" सविता मिश्रा

Sunday, 10 January 2016

सब तन कपड़ा ~

‘एक तो घर में जगह नहीं ऊपर से नये कपड़े चाहिए, परन्तु पुराने किसी को देने को कहो तो मुहं बनता है |' भुनभुनाते हुए थैले सहेजती | बच्चें सुनकर अनसुना कर देते |
पुराने थैले को खोल देखती फिर छाँट कर एक-दो कपड़े निकाल बच्चों को पहनने को कहती रमा| लेकिन अलमारी के कोने में हफ्तों से अनछुआ पड़ा देख उन्हें फिर थैले में भर, रख देती| थैलों को देखकर जरूरतमंद पाकर खुश हो जायेंगे, मन ही मन सोच खुश हो जाती |

रोज-रोज की किच-किच होती रमा के घर में कपड़ो को लेकर|
आज दीपावली पर बच्चों को कपड़े की जिद पकड़े देख रमा भड़क उठी -” नए कपड़े खरीदो, एक दो बार पहन ही रख देते हो| पैसे जैसे पेड़ पर उगते हैं |"
“ऐसा हैं मम्मी, ये पुराने कपड़े हम नहीं देने जायेंगे, वो भी स्कूटर से | पापा को कहो कार लेकर दें | ”
“अच्छा ! अब पुरानी चीजें किसी को देने चलना हो तो कार चाहिए, स्कूटर से शर्म आती है क्या तुम्हें ?”
“आप घर में बैठी रहतीं | निकलिए बाहर तनिक | कार होंगी तो उसी में रखे रहेंगे | दूरदराज जहाँ जरूरत मंद दिखे कोई, दे दो उन्हें |”
“ठीक है चल मैं खुद चलती हूँ आज | देखती हूँ कैसे नहीं मिलते जरूरतमंद!!!! निकाल स्कूटर मैं आ रहीं हूँ ।”
मुश्किल से दो थैले पकड़, किसी तरह सड़क किनारे झुग्गी बस्ती में पहुँची रमा | पर ये क्या !! थैला लेकर दो, फिर चार,फिर आठ झोंपड़ियों के चक्कर लगा ली वह| कीचड़, कूड़े के ढेर से से बचती बचाती घंटो बाद, भरा थैला टाँगे दूर खड़े बेटे के पास पहुँच गयी |
” क्या हुआ मम्मी ? नहीं मिला कोई जरुरतमन्द ?”
“सब तन कपड़ा चाह रही थी मैं, कपड़े भले चीथड़े हो, पर एक दो के घर के सामने यहाँ तो कार खड़ी थी , भले बहुत पुरानी ही सही | छत भले झुग्गी थी, पर टाटा स्काई की छतरी मुझे मुहं चिढ़ा रही थी | "
"और आप है कि 'महंगा है' कह टाटा स्काई हटवा दीं। "
अनसुनी कर रमा फिर बोली, "हट्टे-कट्टे लड़के बड़े-बड़े मोबाईल में वहां तो मगन थे | सोचा आगे जाऊं शायद कोई जरूरतमंद मिले | पर ना , उनसे ज्यादा जरूरतमंद तो मैं हूँ बेटा, जो बड़े बेटे के कपड़े छोटे को और छोटे के बेटी को पहना रही हूँ।

Sunday, 22 November 2015

जीत - लघुकथा

कपड़े पहनने के ढंग को लेकर फिर से पत्नी से मनोज की कहासुनी हुई | कभी कपड़े, कभी खाना और कभी पार्टी में जाने को लेकर लड़ाई हो ही जाती थी | रोज की चिकचिक से तंग आ गया था | झगड़ते हुए दिमाग का संतुलन बिगड़ा तो आज मनोज निकल पड़ा घर से | जब दिमाग़ जागा तो रेल की पटरियों के पास खुद को पाया |
'तुम जैसे गँवार से शादी करके फंस गयी मैं |' पत्नी द्वारा कहें कुत्सिक वचन बेचैन मन में मंथन कर रहे थे | वहीं खड़ा हुआ सोचने लगा 'ट्रेन आते ही कूद पडूँगा उसके सामने !'
कितना मना किया था माँ ने कि पूरब और पश्चिम का मिलन ठीक नहीं हैं | पर वह प्रेम में अँधा था | उसने सोचा था कि थोड़ा वह गाँव से जुड़ेंगी और थोड़ा मैं उसकी तरह मार्डन हो जाऊँगा | परन्तु दो साल में दोनों में कोई तालमेल नहीं बैठ पाया था |
"तृप्ति तो मेरे रंग में रत्ती भर भी न रंगी और मैं, मैं हूँ कि घर-बार, माँ-बाप, सब कुछ छोड़ दिया उसके लिए | हर समय उसके साथ खड़ा रहा पर वह ....|"
मन को स्वयं के ही शब्दों के तीर चुभो रहा था कि इसी बीच दनदनाती हुई एक ट्रेन बगल की पटरियों से गुजर गई |
जीवन से तंगहाल और आत्मग्लानी में भय बहुत दूर हो गया था उससे |धड़धड़ाती हुई ट्रेन बिलकुल नजदीक से उसके कपड़े और बालों को उड़ाती हुई चली गयी |
मन-मंथन अब भी चल ही रहा था 'हाँ' या 'न' | क्या सुन्दरता, शहरीपन और पद गृहस्थी के दोनों पहियों के तालमेल में सच में बाधक हैं ! क्या मेरी अनपढ़ माँ सच कहती थी | शायद सही ही कहती थी माँ | आखिर साईकिल का पहिया कार के पहिए के साथ कैसे चल सकता है |
दूसरी ट्रेन का इंतज़ार करता हुआ वह वही पटरी पर बैठ गया ! तभी उसने ध्यान से देखा वो जिस दो पटरियों के मिलने वाले पाट पर बैठा था, वहीं से दो पटरी निकल, अलग-अलग हो, ट्रेनों के चलने का माध्यम बन रही थीं | फिर अपनी दूरी बनाते हुए दूर कहीं मिलती हुई-सी दिख रही थीं |
अब उसका दिमाग पूरी तरह जाग चुका था | तृप्ति से तालमेल बैठाने का एक नया फार्मूला उसे प्राप्त हो चुका था | वह झटके से उठा और दुकान से फूलों का गुलदस्ता लेकर सधे कदमों से घर की ओर चल पड़ा |
21 November 2015

Saturday, 7 November 2015

परछाई -

सड़क किनारे एक कोने में, छोटे से बच्चे को दीपक बेचते देख रमेश ठिठका |
उसके रुकते ही पॉलीथिन के नीचे किताब दबाते हुए बच्चा बोला - "अंकल कित्ते दे दूँ?"
"दीपक तो बड़े सुन्दर हैं | बिल्कुल तुम्हारी तरह | सारे ले लूँ तो ?"
"सारे ! लोग तो एक दर्जन भी नहीं ले रहें | महंगा कहकर, सामने वाली दूकान से चायनीज लड़ियाँ और लाइटें खरीदने चले जाते हैं | झिलमिल करती वो लड़ियाँ, दीपक की जगह ले सकती हैं क्या भला !"
उसकी बातें सुन, उसमें अपना अतीत पाकर, रमेश मुस्करा पड़ा |
"बेटा ! सारे दीपक गाड़ी में रख दोंगे?"
"क्यों नहीं अंकल !" मन में लड्डू फूट पड़ा | पांच सौ की दो नोट पाकर सोचने लगा, 'आज दादी खुश हो जाएगी | उसकी दवा के साथ-साथ मैं एक छड़ी भी खरीदूँगा | चलने में दादी को कितनी परेशानी होती है बिना छड़ी के |'
"क्या सोच रहा है, कम हैं ?"
"नहीं अंकल ! इतने में तो मैं सारे सपने पूरे कर लूँगा।
कहकर वह अपना सामान समेटने लगा। अचानक गाड़ी की तरफ पलटा फिर थोड़ा अचरज से पूछा - "अंकल, लोग मुझपर दया दिखाते तो हैं, पर दीपक नहीं लेते हैं | आप सारे ही ले लिए !" कहते हुए प्रश्नवाचक दृष्टि टिका दी ड्राइविंग सीट पे बैठे रमेश पर।
रमेश मुस्करा कर बोला-
"हाँ बेटा, क्योंकि तुम्हारी ही जगह, कभी मैं था |"
-----००---
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
Savita Mishra

Tuesday, 3 November 2015

~~मरहम या नमक~~

साहित्यकारों के सम्मान लौटाने की होड़ मची हुई थी | थोड़ा हो हल्ला हुआ | एक दूजे को गलत साबित करने के कई कारण गिनाये गये पर जनता मूक बनी रही | उनकी सम्मान वापिसी को मीडिया वाले भी फुटेज देना बंद कर दिए थे | सारे साहित्यकार छींटाकसी और उपेक्षा से तिलमिला उठे |
बस एक कौने में छोटी सी खबर 'फलां ने लौटाया साहित्य सम्मान' होती | खबर पढ़ कुकरेजा साहब ने कहा था "बात बनती दिख ना रही हैं मुकेश बाबु" |
फिर क्या था कई सम्मानित साहित्यकार ने नामी-गिरामी हस्तियों से मिल एक नया पैतरा खेला | अखबार टीवी की सुर्खियों में खबर आ रही थी, "साहित्यकारों के साथ अब फ़िल्मी कलाकार भी सम्मान लौटाने की दौड़ में शामिल "| सम्मान लौटाने को लेकर एक नयी रणनीति का आगाज हो गया था |
मुकेश बाबू बोले, "अब बात बनी न कुकरेजा साहब |"
"हा मुकेश बाबु, हफ्तों की मेहनत रंग दिखा रही अब|"
हर गली मुहल्ले में अपने चहेते कलाकार के पक्ष में भीड़, भिड़ने को तैयार थी |
चाय,परचून,शराब यहाँ तक की 'अस्पताल' की दुकानों में खबर गर्म थी | बच्चे-बच्चे को मालूम था की सम्मान लौटाया जा रहा | वो भी फ़िल्मी हस्तियों के कारण बड़ो के सुर में सुर मिलाने लगे थे | कुकरेजा और मुकेश बाबू गर्मागर्म बहस का मजा लेते हुय फुसफुसा उठे "क्यों ? पासे सही फेंके गये न अब" |
रज्जू काका के चाय की ठेल पर एक नवजवान इस कदम को सही ठहरा दलील पर दलील दें रहा था | दलील सुन नरसंहार में अपने दो जवान बेटे को खोने का जख्म हरा हो रहा था|
एकाएक रज्जू काका का नासूर फूट पड़ा, वो रुंधे गले से बोल उठे, " वो सब तो जानवर थे जो २०१५ से पहले ही कई बार बर्बाद हुय | काश आज के समय में बर्बाद हुए होते तो कम से कम इंसानों में तो गिने जाते |" सविता मिश्रा

Saturday, 31 October 2015

करवाचौथ का विहान मुबारक ..:)

कल सब अपने-अपने ही चाँद को देख खुश थे | हम भी खुश और मनन कर रहें थे कि दुनिया ऐसे ही खुबसुरत हो तो कितनी अच्छी लगे|और तो और पवित्रता अपने देश में वाश करने लगे फिर से चहुँओर | मुस्करा ही रहें थे तभी एक महोदय पास आ बोले , क्यों मुस्करा रहीं हैं अकेले-अकेले ? हमारा उत्तर सुन ठठा पड़े | बोले अरे तरह तरह के चांदो की नुमाइश तो रोज करता हूँ | कम से कम एक दिन तो अपने चाँद को देखूं न और परखू भी कि कहीं दूजा चकोर उस पर ग्रहण तो न डाल रहा |

करवाचौथ का विहान मुबारक ..:)

Friday, 30 October 2015

शुभ कामनायें

सभी बहनों को हार्दिक शुभकामनायें ...आप सभी का सुहाग बना रहें!!!!जीवन सुखमय रहें।
पति लोग जो ये कहते कि औरते चुप रहें तो उम्र बढ़ेगी उनकी वो शायद भ्रम में हैं । उनकी उम्र तो हमेशा बढ़ती ही हैं बल्कि उनके चिकचिक से औरतो की उम्र घटती, तभी तो शादी के वक्त औरतो की उम्र आदमी से दस से तीन साल तक छोटी होती। कारण साफ़ औरते आदमियो से जल्दी बूढी होती फिर भी ये सब कहते औरते व्रत से अच्छा चुप रहें....विज्ञानं कहता चुप रहने से उम्र बढ़ती तब तो औरतो की बढ़नी चाहिए!! यदि आदमी कहते की उनकी उम्र घट रही यानि साबित होता हैं कि आदमी लोग ज्यादा बोलते।😂😂😂😂😂
यानि अब से आप सब कम बोलने की आदत डाले और अपना जीवन खुशहाल करें!!!पत्नियो को जेवर कपडे देकर उन्हें भी खुश रखे और मांगती ही क्या हैं आपसे बस थोडा सा प्यार ही न...जो आप दुसरो पर लुटाने के इच्छुक रहते!!! अपनों पर लुटाए !! सुखी रहें और खुश रहने दें!!!!!पड़ोसन को देख ईष्या न पाले!!!!!!!!बोलो करवा माता की जय☺☺☺☺

Thursday, 29 October 2015

~सुसंस्कार~


ससुर-सास गाँव से आते ही न चाय पिया न पानी । बहू से पूछताछ करने लगें ।
"बहू , सुना हैं तू तलवार बाजी सीखा रहीं हैं बिटिया को |"
"किसने कहाँ बाबूजी , वो मुए लफंगे अफवाह उड़ाते रहते | तलवारबाजी सिखाकर शादी व्याह में रोड़े थोड़े डालना हैं मुझे | वो तो झाँसी की रानी का मंचन चल रहा | आपकी पोती रानी लक्ष्मीबाई का किरदार निभा रही | इस लिय थोड़ा सा सीख रही हैं बस|"
"तभी कहूँ कि मोहन तो ऐसा न करेगा कि लड़की को तलवार सिखाये और लड़के को रोटी बनाना | कहाँ हैं मोहन, उससे कहना कि दोनों को एक दूजे का सम्मान करना सिखाये | "
"अरे जी, तुम क्या समझोंगे ! क्या लड़के ,क्या लड़की सबको आजकल की हवा लग गयी हैं | अब लड़कियां घर में कहाँ रहती और लड़के भी रसोई में दो-चार पकवान बना ही लेवे।" पत्नी बोल उठी
"हा तू तो खूब समझती हैं तभी लड़की को घर में कैद रख सोची वह सुरक्षित रहेंगी | उसे भी जमाने की हवा लगने दी होती तो आज ...|"
माहौल गमगीन हो गया | सहसा गाँव के ही लड़के द्वारा सोनी का चीर हरन आँखों के सामने गुजरने लगा | घर में बंद रहने के कारण वह लड़को से नजर भी मिलाने से डरती थी विरोध क्या करती | सोनी की माँ के आँखों से दर्द बहने लगा ।
"गलती तेरी भी न सोनी की अम्मा मैं भी तो समभागी हूँ | काश शिक्षक का फर्ज भी निभाते हुय अपने गाँव के बच्चों में सुसंस्कार बांटे होते तो बेटी का दर्द नासूर बन ना रिसता रहता |" सविता मिश्रा

~~आंख पर पड़ा परदा~~पथप्रदर्शक-

पथप्रदर्शक-

"सब्जी ले लो,तोरी, गाजर,मटर, आलू ले लोओओsss!!"
"भैया रूको , मैं आती!!"
"बेटा रिशु ,चल साथ में ,ज्यादा सब्जी लेनी हैं न, तू उठा ले आना।"
"जी मम्मा ,आप चलिए मैं आता हूँ, बस थापर सर की कामयाबी के टिप्स लिख लूँ!!"
"जल्दी आना !!"
"हां मम्मा, आप के खरीद चुकने से पहले आपके पास होऊंगा ।"
"टमाटर और प्याज कैसे दिए भैया|"
"40 रूपये में दीदी जी|"
"इतने महंगे !!!न न 30 में दो तो बोलो , हमें तीन चार केजी लेना। कल मेरे बेटे के राष्ट्रिय कबड्डी टीम में सेलेक्शन होने की पार्टी हैं न।"
"वाह दीदी जी, आप मेरी तरफ से फिर फ्री लीजिये।" सब्जी वाला खुश होकर बोला।
'सर'- 'सर' कहते सुन अचानक ठेल से नजर उठाते ही नीलम रिशु को सब्जी वाले के कदमो में झुका हुआ देख हतप्रभ रह गयी।
"रिशु ये क्या हैं??"
"मम्मा तुम नहीं जानती इन्हें? यही तो हैं मेरे अदृश्य गुरु!!! गोल्ड मेडिलिस्ट!!! जिनकी मैं दिन रात पूजा करता हूँ। आज ये मुझे मिल गए, मैं साक्षात् इनसे ही अब सीखूंगा।"
"बोलिये न थापर सर, आप सिखायेंगे ना मुझे कबड्डी के गुर???"

नीलम की ख़ुशी अब काफूर सी हो गयी थी। बेटे के उत्साह और देश के महान कबड्डी खिलाड़ी को सब्ज़ी बेचते देखकर अचानक वो कठोर निर्णय लेते हुए सब्जी वाले से बोली- "भैया टमाटर बस आधा केजी ही देना।"
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Sunday, 27 September 2015

~पुरानी खाई -पीई हड्डी~

~चित्र आधारित लघुकथा ~

अस्त्र-शस्त्रों से लैस पुलिस की भारी भीड़ के बीच एक बिना जान-जहान के बूढ़े बाबा और दो औरतों को कचहरी गेट के अन्दर घुसते देख सुरक्षाकर्मी सकते में आ गए |

"अरे! ये गाँधी टोपीधारी कौन हैं ?"

"कोई क्रिमिनल तो न लागे, होता तो हथकड़ी होती |"
"पर, फिर इतने हथियारबंद पुलिसकर्मी कैसे-क्यों साथ हैं इसके ?" गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी आपस में फुसफूसा रहे थे |
एक ने आगे बढ़ एक पुलिसकर्मी से पूछ ही लिया, "क्या किया है इसने? इतना मरियल सा कोई बड़ा अपराध तो कर न सके है |"
"अरे इसके शरीर नहीं अक्ल और हिम्मत पर जाओ !! बड़ा पहुँचा हुआ है| पूरे गाँव को बरगलाकर आत्महत्या को उकसा रहा था |" सिपाही बोला
"अच्छा! लेकिन क्यों ?" सुरक्षाकर्मी ने पूछा
"खेती बर्बाद होने का मुआवज़ा दस-दस हजार लेने की जिद में दस दिन से धरने पर बैठा था | आज मुआवज़ा न मिलने पर इसने और इसकी बेटी,बीबी ने तो मिट्टी का तेल उड़ेल लिया था | मौके पर पुलिस बल पहले से मौजूद था अतः उठा लाए |"
"बूढ़े में इसके लिए जान कैसे आई ?" सुरक्षाकर्मी उसके मरियल से शरीर पर नज़र दौड़ाते हुए बोला|
"अरे जब भूखों मरने की नौबत आती है न तो मुर्दे से में भी जान आ जाती है, ये तो फिर भी पुरानी खाई -पीई हड्डी है |" व्यंग्य से कहते हुए दोनों फ़ोर्स के साथ आगे बढ़ गया |

"गाँधी टोपी में इतना दम, तो गाँधी में ..." सुरक्षाकर्मी बुदबुदाकर रह गया |

 सविता मिश्रा

Saturday, 26 September 2015

मन में लड्डू फूटा (लघुकथा)

"भैया डीजल देना"
"कितना दे दूँ भाईसाब ?"
"अरे भैया गैलेन भर दो, देख ही रहे हो आजकल लाईट कितनी जा रही है| रोज-रोज दूकान के चक्कर कौन लगाये|"
"हा भाईसाब इस सरकार ने तो हद कर दी है|" जैसे उसके दुःख में खुद शामिल है दूकानदार|
उसके जाते ही वही दूकानदार आरती करते वक्त- "हे प्रभु अपनी कृपा यूँ ही बनाये रखना| यदि साल भर भी ऐसे ही सरकार को बुद्धि देते रहे तो बच्चे की पढ़ाई पूरी हो ही जायेगी प्रभु |"

Tuesday, 15 September 2015

बदहाल हिंदी

सब जगह बस तू ही तू ....मेरा अस्तित्व तो बस किताबो में रह गया ...वहां भी तेरा ही घुसपैठ ..मेरी कराह कोई सुन कहाँ रहा...जो सुन रहा वो तेरी ही भाषा में बोल रहा....वेट ऐंड वाच या फिर टेक केयर कह निकल जा रहा..मेरे को बचाने कोई मसीहा आएगा क्या कभी!!!!
उम्मीद पर दुनिया कायम हैं और मैं भी...जल्दी आना वो मेरे मसीहैं ☺☺☺तेरी बदहाल हिंदी
सविता मिश्रा

Monday, 24 August 2015

~~दर्द~~

"कितनी कोशिश की पर नहीं लिख पा रही। ये कथा भी झन्नाटेदार लघु कथा नहीं बन पा रही। "कथा सुनाती हुई अपनी सखी से रूबी बोली
"अरे क्यों !! तुम कितना अच्छा तो लिखी हो रूबी। हमें तुम्हारी लेखनी में तो जादू सा अहसास होता हैं। बहुत दमदार लिखती हो।"
तभी बगल में बैठे बुजुर्ग ने कहा , "अच्छा विषय चुना कोशिश करती रहो ।"
"ऐसा क्या करूँ कि अपने अच्छे विषय को परफेक्ट बना सकूँ अंकल जी।"
"कुछ नहीं बेटा बस एक चुनौती की तरह लो फिर देखो कमाल। झन्नाटेदार कथा लिखने की कोशिश के बजाय , अपने दिल पर झन्नाटेदार थप्पड़ महसूस करो। " सविता

Saturday, 22 August 2015

खुशबू चंदन की


“अरे ! यह किताब ! यह तो मेरी कहानी संग्रह है | यह आपके हाथ ! आज मुझको  कैसे पढ़ने की इच्छा हुई !!”
“तुम्हें तो कब से पढ़ रहा हूँ, पर जान ही नहीं पाया कि तुम  छुपी रुस्तम भी हो |
क्या लिखती हो ! आज पता चला। एक कहानी पढ़कर तो  हँसी ही नहीं  रुक रही है।”
“कौन सी कहानी पढ़कर हँसी का फव्वारा फूट पड़ा है जनाब ?”
“अरे ये  वाली ‘जाहिल पिया ! कहीं इस कहानी के जरिये मुझ पर तो गुबार नहीं निकाली हो |” कहानी वाला पेज खोलकर निगाहें तिरक्षी करते हुए कहा |
“ह्ह्ह्हह तुम भी न ! सब मर्द एक जैसे ही होते हो, शंकालु। सब इमेजिनेशन है | सच्चाई तो  हींग माफ़िक होगी, समझे बुढऊ।” दोनों ही उन्मुक्त हँसी हँसने लगें |
“एक बात पुछु ?”
“हाँ भई हाँ, पूछो! तुमको कब से इजाजत लेने की जरूरत पड़ने लगी।! ”
“मेरी हर आवाज पर तुम सामने होती थी। बच्चों को भी कभी भी अकेले एक पल के लिए नहीं रहने दिया। फिर ये कहानियों  के लिए समय कब निकाल लेती थी तुम ?”
“काम तो हाथ करते थे न, दिमाग़  तो कहानी बुनता था फिर रात बिरात कलम उन्हें संग्रह कर लेता था | ”
“तुम्हारी कहानी की तरह ही तुम्हारे जवाब भी लाजव़ाब हैं।”
"हुँह!!” चलो अब खाना खा लो बहुत तारीफ़ हो गयी। ”
“हाँ चलो, अब खा ही लूँ ! नहीं तो ‘भूखा पति‘ कहानी लिख दोगी।” फिर से ठहाका गूँज उठा कमरे में। ..सविता मिश्रा

Tuesday, 14 July 2015

अन्तर्मन (kahani)

पेड़ के बगल ही खड़ी हो पेड़ से प्रगट हुई स्त्री ने पूछा , “अब बताओ इस रूप में ज्यादा काम की चीज और खूबसूरत हूँ या पेड़ रूप में |
पेड़ बोला , “खूबसूरत तो मैं तुम्हारे रूप में ही हूँ , पर मेरी खूबसूरती भी कम नहीं | काम का तो मैं तुमसे ज्यादा ही हूँ |”
” न ‘मैं’ हूँ |”
पेड़ ने कहा, ” न न ‘मैं’ ”
पेड़ ने धोंस देते हुए कहा , “मुझे देखते ही लोग सुस्ताने आ जाते हैं |जब कभी गर्मी से बेकल होते हैं |”
“मुझे भी तो |” रहस्यमयी हंसी हंसकर बोली स्त्री
“मुझसे तो छाया और सुख मिलता हैं आदमी को |”
“अरे मूर्ख मैं भी छाया और सुख प्रदान करती हूँ| आंचल से ज्यादा छाया और सुख कोई नही दे सकता |” अहंकार से भर इठला गयी स्त्री
“मुझ पर लगे फल लोग खा के तृप्त होते हैं |”
“हा हा हा हा” ठहाका जोर का मारकर बोली , “मुझसे भी तृप्त ही होते हैं |” कह शरमा सी गयी
“मेरी पतली पतली शाखायें लोग काट आग के काम में लाते हैं |”
“मैं स्वयं एक आग हूँ, बड़े बुजुर्ग यही कहते हैं |” रहस्यमयी मुस्कान बढ़ गयी थी
“मैं आक्सीजन प्रदान करता हूँ |”
“मैं खुद आक्सीजन हूँ ! जिन्दगी देती हूँ ! मेरे से प्यार करने वाला मेरे बगैर मर जाता हैं | तुमसे भी प्यार करने वाले करते तो हैं पर तुम्हारे न होने पर मरते नहीं हैं |” गर्वान्वित हो बोली स्त्री
“मैं उपवन को हरा-भरा रखता हूँ |”
“अरे महामूर्ख , मैं खुद उपवन ही हूँ ! मेरे बगैर इस धरती का सारा वैभव तुच्छ हैं |”
“मुझे लोग काट निर्जीव कर अपने घरों में सजाने के उपयोग में लें आते हैं |” थोड़ा दुखी हो वृक्ष बोला ” इससे अच्छा हैं मैं तुम्हारे इस स्त्री रूप में ही रहूँ | सच में तुम ज्यादा खूबसूरत और काम की हो | मैंने हार मान ली तुमसे |”
अहंकार खो सा गया यह सुनते ही | स्त्री बोली, “नहीं , नहीं वृक्ष मैं इस रूप में नहीं रह सकती | तुम्हारा निर्जीव रूप में ही सही शान से उपयोग तो लोग कर रहें पर मुझे तो ना जीने देते हैं न मरने | तुम्हे निर्जीव कर तुम्हारे ऊपर आरी चलाते हैं पर मुझ पर तो जीते जी |” दुखित हो स्त्री बोली
"ठहरों , मैं तुम में समा जाती हूँ फिर से | जादूगर ने कहा था न सूरज डूबने से पहले नहीं समाई तो मैं स्त्री ही बन रह जाऊँगी | हे वृक्षराज , मैं स्त्री नहीं वृक्ष रूप में ही ज्यादा सुरक्षित हूँ | और हर रूप में मानव को सुख देने में सक्षम रहूंगी इस वृक्ष रूप में | मानव स्त्री को तो नरक का द्वार कहकर घृणा भी करता हैं | तुम्हें यानि पीपल को पिता का रूप मान आदर देता हैं | मैं तुम्हारे रूप में ही रहकर सुकून पाऊँगी | मुझे अपने में समेट लो वृक्षराज |” विनती करती हुई सी बोली स्त्री |
दोनों ने जादूगर द्वारा दिए मन्त्र बोले और एक रूप हो गये | अँधेरा अपने यौवन रूप में प्रवेश कर चुका था |
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