Friday, 27 April 2018

तीसरा (लघुकथा)

कथानक चोरी को लेकर शोर-शराबा पहले भी होता रहा था, अब भी हो रहा है। यह सब देखकर मेरा मन बहुत व्यथित होता रहा। अक्सर सोचती हूँ कि आखिर ऐसा क्यों करते हैं लोग।
पहले लेखक का इल्ज़ाम था कि मेरी कथा की आत्मा चुराई गयी है। दूसरा कथाकार चोरी करने की बात से मुकरता हुआ उसे अपना मूल कथानक बता रहा था।  
कथा चोरी की उस विवादित पोस्ट पर टिप्पणियाँ पीले पत्ते की तरह टपक रही थीं। लेकिन उसमें पीड़ित को न्याय दिलाने का कोई उपक्रम नहीं था। सब अपनी-अपनी कथा की चोरी का बही-खाता लिए हुए ही पेश हुए थे। तवा गरम था। रोटियां सिंकती जा रही थीं । रोटियाँ सेंकने वाले हुनरमंद हाथ मंद-मंद मुस्करा रहे थे। कई लोग मूक दर्शक बन हँस रहे थे। कई अपने-अपने खेमे के लिए सिपाही तड़ रहे थे। वहाँ ख़ेमेबाजी भी किसी से छुपी नहीं थी।

वहाँ दिखने वाले कई हाथों में नमक ही था, मरहम लगाने वाले हाथ वहाँ से गायब थे।

इसी गहमागहमी के बीच अचानक एक जादुई टिप्पणी हुई - "नवांकुरों! तुम सब जिन कथाओं को लेकर आपस में लड़ रहे हो! दरअसल वो कथाएं तो कथाएं हैं ही नहीं।"
अब चारो तरफ असीम शान्ति छा गयी। उन सब लिख्कड़ों को लगा कि कोई उनके हाथों से उनकी कलम को छीन लिया हो।  अब उसी से अपनी लेखनी को चमकवाने की चाह में सब बदहवास से उस जादूगर के पीछे हो लिए। जादूगर मुस्कराता हुआ मौन धारणकर अपनी नई कथा के जन्म की तैयारी में लग गया।

बाहर प्रांगण में ''मेरी कथा बनी! मेरी कथा हुई क्या?'' का  स्वर कोलाहल कर रहा था। लेकिन शब्दों के जादूगर ने दो शब्द हवा में उछालने के बाद से अपना मौनव्रत नहीं तोड़ा तो नहीं ही तोड़ा। 
रह-रहकर उठते शोर-शराबे और चुप्पी के मध्य कोई मेरे कान में फुसफुसाया - "फेसबुक की पोस्ट पर दो बिल्लियों की लड़ाई चल रही। और बंदर फायदा उठा रहा है।"

मैंने उसे घूरकर देखा और कहा - "उस लड़ाई में एक नहीं बल्कि  मुझे तो बंदरों का झुण्ड फायदा उठाता हुआ दिखाई पड़ रहा है।" 

 #सविता मिश्रा '#अक्षजा'
आगरा (इलाहाबाद)
Savita Mishra
24 April २०१८

Friday, 20 April 2018

कथा है !

"इस विषय पर कितनी कोशिश की मैंने, लेकिन लिख नहीं पा रही हूँ। यह कथा भी झन्नाटेदार लघुकथा नहीं बन पा रही है!" अपनी सखी को कथा सुनाकर रूबी बोली। "अरे क्यों! कितना अच्छा तो लिखी हो रूबी। हमें तो तुम्हारी लेखनी में जादू-सा अहसास होता है। बहुत दमदार लिखती हो तुम।" "वरिष्ठजन कभी कहते हैं कि कथा का कथ्य कमजोर है! तो कभी कहते हैं कि शिल्प अच्छा नहीं है। कई तो हमारी भाषा पर ही ऊँगली उठा देंते हैं।" "मत सुन किसी की तू! आपस में ही सब एकमत नहीं हैं। तू दिल से लिख, दूसरों के दिल तक जरुर पहुँचेगी।" दोनों पार्क में पड़ी बेंच पर बैठकर चर्चा कर ही रही थीं कि तभी बगल में बैठे बुजुर्ग ने कहा, "अच्छा विषय चुना है! कोशिश करती रहो।" कहकर पार्क के एक कोने में पत्थर के नीचे से नन्हें पौध को निकलते देखकर वह मुस्करा रहे थे कि रूबी ने पूछा- "मैं ऐसा क्या करूँ कि अपने अच्छे विषय को बढ़िया कथा में ढाल सकूँ अंकल जी?" "कुछ नहीं बेटा! बस एक चुनौती की तरह लो फिर देखो कमाल। झन्नाटेदार कथा लिखने की कोशिश के बजाय, अपने दिल पर झन्नाटेदार थप्पड़ महसूस करो।" 24 August 2015 सविता मिश्रा ‘अक्षजा' ९४११४१८६२१ आगरा 2012.savita.mishra@gmail.com

Saturday, 24 March 2018

जुड़ाव

"दृश्टि" नामक राजनैतिक लघुकथा अंक में प्रकाशित कथा...सम्पादक -अशोक जैन भैया का आभार 


गणपति विसर्जन और जुमे की नमाज़ दोनों ही एक साथ पड़ गए थे| सड़क पर दोनों सम्प्रदायों को आमने-सामने टीवी पर दिखाया जा रहा था| इस अव्यवस्था को लेकर पुलिस की किरकिरी होती देख, फोन घुमा दिया एसएसपी साहब ने|
"जय हिन्द 'सर'|"
"'जय हिन्द' वो इलाका इतना सेंसटिव है| फिर भी सड़क के एक छोर पर नमाज़ पढ़ने करने की इजाज़त क्यों दे दी गयी ?" एसएसपी साहब गुस्से में इंस्पेक्टर से बोले|
" सर जी! भीड़ ज्यादा हो गयी थी| मस्जिद में जगह बची ही नहीं थी| अतः डीएम साहबsss !" इंस्पेक्टर साहब की आवाज़ हलक से निकल नहीं पा रही थी, अधिकारी के गुस्से के सामने|
"जुलूस को ही थोड़ी देर रोक लेते, नमाज अदा होने तक कम से कम|" राय जाहिर करते हुए बोले|
"जुलूस में भी भारी तादाद में लोग थे सर| रोकने से बवाल कर सकते थे|" अपनी समस्या बता दी इंस्पेक्टर ने|
हल्की-सी भी चिंगारी उठी तो आग की तरह फैल जायेगी| सख्ती फिर भी तुम सबने नहीं दिखाई | कुछ हुआ तो डीएम साहब तो जायेंगे ही, साथ में हम सब को भी डूबा के जायेंगे|" चिंता जताते हुए वे गुर्राए|
"चिंता की बात नहीं हैं सर|" वह आत्मविश्वास से बोला|
"क्यों ? इतना यकीं कैसे है तुन्हें ? जबकि मालूम है कि हर छोटी बात पर उस क्षेत्र में दंगा हो जाता है?"
सर, क्योंकि क्षेत्राधिकारी मंजू खान सर नमाजियों के साथ और एसपी कबीर वर्मा साहब जुलूस के साथ निरंतर लगे हुए हैं| और और दूसरे खुशी की बात यह है कि दोनों के ही तरफ, कोई नेता नहीं दिखाई पड़ा अभी तक|” इंस्पेक्टर साहब ने स्पष्टीकरण दिया|
"ओह, अच्छा! तब तो चिंता की कोई बात नहीं है| किसी नेता का वहाँ न होना ही तुम्हारे यकीं को पुख्ता करता है| फिर भी अलर्ट रहना !" एसएसपी साहब निश्चिन्त होकर बोले|
"जी सर" उनके माथे का पसीना अब सूखने लगा था|
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
November 1, 2015 नया लेखन ग्रुप के चित्र पर लिखी कथा

Friday, 9 March 2018

"उद्गार" लघुकथा संकलन

"उद्गार" लघुकथा संकलन - वनिका पब्लिकेशन
संकलनकर्ता - रश्मि सिन्हा दीदी
प्रकाशित - फ़रवरी २०१८
इस संकलन में मेरी चार कथाओं को स्थान दिया गया है | समूह की संचालिका रश्मि सिन्हा दीदी का आभार। साथ के साथ नीरज शर्मा दीदी का बहुत बहुत धन्यवाद --१--दोगलापन
२--खुलती गिरहें
३--सहयोगी
४-- कृतघ्न
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१--दोगलापन -लघुकथा इस लिंक पर ---
२-खुलती गिरहें- लघुकथा इस लिंक पर ---
३--सहयोगी- लघुकथा इस लिंक पर ---
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/05/blog-post_27.html
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४- कृतघ्न

जूता फैक्ट्री में आग लगने से कई जाने चली गयी थीं| जिनकी इस हादसे में मृत्यु हो गयी थी उनके परिवार वालों को लाखों का मुवावजा मिला, ऊपर से एक सदस्य को नौकरी भी मिली| यह खबर लगते ही आशीष बहुत दुखी हुआ| 
उसी दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल हुए अपने बापू की तरफ देखकर बुदबुदाया- "मेरी तो किस्मत ही खोटी है|"
खटिया पर पड़ा उसका बाप कन्हैया भी दुखी था कि अब वह काम करके अपने बेरोजगार बेटे-बहू का पालन-पोषण नहीं कर पायेगा| अभी तक जो बहू खांसने पर भी, पानी लेकर 'बापू क्या हुआ?' पूछने दौड़ी आती थी, आज खाने की थाली में दो सूखी रोटी और प्याज पटक गयी थी|
कन्हैया पानी मांगता रह गया न आशीष ने सुना और न ही बहू ने..| सूखी रोटी गले में फँस जाने से उसकी सांस अटक गयी| जब बेटे ने बापू की लाश देखी तो दौड़ा-दौड़ा फैक्ट्री पहुँच गया| मैनेजर से राय-बात करके पीड़ित परिवार में अपना स्थान भी पक्का करा लिया|
घर पहुँचते ही नीतू ने झल्लाते हुए कहा, "अब इनका क्या करें? कितनी देर कर दिए आने में!"
मुवावज़ा मिलने और नौकरी लगने कि ख़ुशी में भूल गया कि मृत बापू की कृपा से है सब| अब तक की 'बेकारी का दर्द' शराब में डुबोकर अपने जमीर को भी मार आया था वह| खटिया पर गिरते ही बेफ़िक्री से बोला- "सो जाओ, सुबह देखेंगे|"
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सविता मिश्रा 'अक्षजा'
Savita Mishra
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Sunday, 18 February 2018

साझा-लघुकथा-संग्रह (व्योरा)

इसके लिए हम आभारी हैं आप सभी के ...
आज १८/२/२०१८ तक कुल दस #साझा-लघुकथा-संग्रह पुस्तक  रूप में आ चुकी हैं | जिनमें #बत्तीस #लघुकथाएँ प्रकाशित हुई हैं | चार आधी रूप में अधर में है, एक की कोई सूचना नहीं मिली | यानी पांच हाथ में आ नहीं पायी हैं | मतलब यह कह सकते हैं कि कुल पंद्रह संग्रह लघुकथा के हो गये ...बहुत हैं न !
अबतक जो संग्रह हाथ में आई है उनमें कोई भी कथा दूसरी संग्रह में रिपीट नहीं हुई है |
१-- 'मुट्ठी भर अक्षर' साझा-लघुकथा-संग्रह (६लघुकथाएँ - १०किताब -२१००)
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_9.html
२--'लघुकथा अनवरत' सत्र २०१६ लघुकथा-साझा-संग्रह (४लघुकथाएँ-किताब खरीदना दो ६००)
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_23.html
३--'अपने अपने क्षितिज' साझा -लघुकथा-संग्रह - (४लघुकथाएँ -दो किताब -९००)
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_24.html

४-- "लघुकथा अनवरत" साझा-लघुकथा-संग्रह (२०१७)- (३ लघुकथाएँ-किताब खरीदना दो ६००)
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_25.html

५--‘सपने बुनते हुए' साझा-लघुकथा-संग्रह - (३लघुकथाएँ-एक किताब+१५०० मिले हमको)
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post.html

६-- "आधुनिक हिंदी साहित्य की चयनित लघुकथाएँ" साझा-लघुकथा-संग्रह (१लघुकथा-एक किताब+५०० मिले हमको)
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_78.html

७--"नई सदी की धमक" साझा-लघुकथा-संग्रह - (१ लघुकथा- न लिया न दिया/ किताब एक मिली ) दो खंड के साथ फ्री थी |
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_51.html

८-- 'सफ़र संवेदनाओं का' -साझा-लघुकथा-संग्रह -(४लघुकथाएँ -१०००-दो किताब)
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_93.html

९-- "आसपास से गुज़रते हुए" साझा-लघुकथा-संग्रह --(१लघुकथा -२०० में एक किताब )
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_80.html

१०.'सहोदरी लघुकथा' साझा-लघुकथा-संग्रह - (५लघुकथाएँ -२००० में ५ किताब)
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_17.html

लघुकथा.कॉम वेबसाइट के 'संचयन' में

लीजिए खुशी का मटका ऐसे भी फूटता है, एक साथ पांच कथाएँ फेवरेट वेबसाइट लघुकथा.कॉम पर। 
संजोग देखिये fb फरवरी माह का ही अपडेट दिखा रहा ! ब्रेकिंग न्यूज़ नामक रचना छपने का।😊😊   शायद फ़रवरी महीना लकी हमारे लिए ..

बड़ी उत्सुकता थी कि कौन-कौन सी कथाएं लगी हैं। पता चला आज कि पांच लगी हैं | जिनमें 'उपाय' अपनी पसंदीदा रचना । वैसे तो अपनी सारी उँगली बराबर, बस उपाय हमें पसन्द थी | सबको लिखने में हमें ज्यादा नहीं सोचना-समझना पड़ा। 

 लेकिन दो एक को 'उपाय' पसंद नहीं आयीं थी। यादास्त  कमजोर अपनी। अब यहाँ लिखने में यह याद कि पसन्द नहीं आयी थी लेकिन यह याद नहीं कि कैइसी थी जो पसन्द न आई और क्या कुछ हम परिवर्तन करें उसके बाद । वैसे 'उपाय' obo में लिखी 'पैंतरा 'का बिगड़ते -बिगड़ते सुधरा रूप है  
खैर कोई न अब खुशियों में शामिल होइए आप सब भी----


पढ़कर पञ्च परमेश्वर को ! अरे हमारी इन पाँचों कथाओं को और बताइये आपको कौन-सी बेहतर लगी या नहीं भी लगी |😊


-तोहफ़ा.

.पछतावा
-परिपाटी
--उपाय
--अमानत

तोहफ़ा इस लिंक पर उपलब्ध ..
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/11/blog-post_27.html
और  चारों कथाएँ इस लिंक पर उपलब्ध हैं .
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_93.html

आभार सम्पादक द्वय Sukesh Sahni भैया औरRameshwar Kamboj Himanshu भैया का तहेदिल से। बड़े आशीर्वाद बनाये रखें तो मार्ग सहज होता जाता है और खुशकिस्मती कि सब बड़ो का आशीष बना हुआ है।

बस एक क्लिक पर यहाँ भी पढ़ सकते हैं ...😊

http://laghukatha.com/लघुकथाएँ-15/

Saturday, 17 February 2018

लेखन का दुःख (व्यंग्यमुखी)

हाँ तो सब तैयार हैं न? फेसबुक पर हमारे यह कहते ही आश्चर्यचकित हो सब मुँह खोलकर सुनने में लग गये कान लगाकर | कुछ छिपकली की तरह कुछ बन्दर की तरह | कुछ ही थे जिन्होंने हमारे इस वाक्य को सीरियसली लिया | माने हमऊ नेता माफ़िक होई गये चंद मिनट खातिर | शुक्र है आदतन भाइयों-बहनों नहीं बोले थे हम, वरना तो लोग जय-जयकार करने लगतें भई | ऊ क्या है कि हमको ई जयकारा छटांग भर भी नहीं भाता है | इस लिए जुबान को कंटोल करना पड़ा, बटन तो खटखट चल पड़ी थी, चलने के बाद उसे भी डिलीट मारना पड़ा | 
अच्छा हाँ, अपनी भाषा सही रखें हम, नहीं तो सब इसी पर जंग जीत लेंगे | हाँ तो तैयार हैं न बिल्कुल मीडिया के जैसे, कैमरा और माइक लेकर। और हाँ ख़ुफ़िया कैमरा लेकर भी, क्योंकि बहुत से लोग इसी खास कैमरे से देख सकेंगे। अपने विरोधियों की गतिविधियों को देखना इसी कैमरे से तो आसान होता है ! हाँ तो अच्छी तरह से सभी ने अपने-अपने कैमरे, अरे भई सामान्य कैमरे की कौन बेवकूफ बात कर रहा है, ख़ुफ़िये (कुछ और समझते हैं, तो उस आपकी समझ में हमारी लेखनी का कोई दोष नहीं है :P ) कैमरे यथास्थान फीट कर लिए हैं न !
यह अपना भारत भी बड़ा अजीब देश है और भारतवासी उससे भी ज्यादा अजीबो-गरीब |

यहां कोई बस बकरा बन भर जाए, सब उसे हलाल होते देखना चाहते हैं | क्या राजा क्या रंक! क्या अमीर, क्या गरीब! क्या कलम के हस्ताक्षर और क्या अँगूठा छाप। यहाँ तक की, कि बहुत से बकरे भी बकरा को हलाल होता देख मजा लेना चाहते हैं।

तो रहिये तैयार और पढ़िए यह --!
हाँ तो हम बकरा बनने को तैयार क्या हुए, सब हिंगलिश- संस्कृत- हिंदी -अंग्रेजी में दुई के पाँच पढ़ने लगें और हमें "शुभष्य शीघ्रं" की शिक्षा देने लगें | अब क्रोध में हमने शब्दों की तलवार उठायी तो थी, पर सोचे राय ले ली जाय कि सबका दिन ख़राब करें या रात में परी के सपने में आने के तार तोड़ दें |

राय मांगना भर था कि सब बोल उठे कि हंगामा हो तो अभी ही हो | हंगामे के समर्थन में नारे लगाने लगें | माने मजा सबको तुरंत ही चाहिए | कोई हलाल हो इससे किसी को कोई ख़ास मतलब नहीं होता है | हु-हा की लाठी लेकर चल पड़े, माने शांत बैठे गाँधी भक्त भी चूके नहीं ! हिंसा चाहने वाले तो इन मामलों में हमेशा ही सजग रहते हैं भई !

ऐसा विरोधाभाषी आचरण वाला आश्चर्य तो भारत में ही सम्भव है | कहने का अभिप्राय है कि मन में राम और बगल में छूरी रखने वाले भी हैं कई और कई तो ख़ास रूप से तभी दिखे जब फेसबुक पर यह गलती से अनाउंस हो गया हमारे मुख से | कई गहरे पानी में धक्का देने को आतुर दिखें, बिना यह जाने कि हमें तैरना आता भी या हम ऐसे ही डींग हांक दिए |

शाम को आतंकवादी आक्रमण करते हैं यह आठवाँ अजूबा आज ही पता चला हमें | हमने आव देखा न ताव हाँक दिया कि "चिंता न करा, हम उनहू से भिड़ी जाब, मरब या मारब" लेकिन सच पूछिये तो डर तो लगा | क्योंकि यहाँ तो सब मौके की ताक में ही रहते हैं कि कब कोई किसी को कोई कुछ कहें तो वो भी अपनी रोटी सेंक लें फुर्ती से | रोटी सेंकने वाले इतने उतावले रहते हैं कि सर फुटव्वल भी कर लेते हैं आपस में ही |
फिर चिंतक आगाह किए कि भिड़ना ठीक नहीं ! हम बाज क्यों आते, बोल दिए - ब्रह्मास्त्र है अपने पास | शुक्र है जुकरबर्ग भैया जानते थे कि यह फेसबुक भारत में कत्लेआम मचा देगा | गालियों-धमकियों का एक नया ग्रन्थ लिखवा देगा इसलिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र की व्यवस्था आपातकालीन स्थिति के लिए रख छोड़ी थी | बस उसी ब्रह्मास्त्र के बलबूते पर हम जैसे लोग सर्वाइब कर रहे हैं बंधुओं | हमें भी इस ब्रह्मास्त्र बड़ा गुमान है और जुकरबर्ग से प्रार्थना है कि अपडेट के नाम से भविष्य में हमसे यह हथियार नहीं छीना जाए |

हाँ तो खुफियागिरी वाले ज्यादा ध्यान दें | और यह खबर वाइरल कर दें कि आदमी से जितना सम्भले उतना ही भार उठाए | तैरना न जाने तो  हमारी तरह पानी में जबरजस्ती ही नहीं कूद पड़े, बिना सोचे-समझे | वरना लेने के देने पड़ सकते हैं |

लड़की से शादी वक्त अक्सर सवाल पूछा जाता है बिटिया खाना बना लेती हो ? हाँ कहने पर फिर सवाल उछलता है -बीस-पचास का बना लोगी ? हाँ कहने पर सास ठहर जाती है और पसंद कर लेती है | लेकिन लड़की की माँ तैस में आकार यह कह दें कि हमारी लाड़ो तो पूरी बारात खिला लेगी ! और तो और शादी की पूरी व्यवस्था सम्भाल लेगी | तो भैये यह सही है क्या ? नहीं न |
आदमी हर काम और दस हाथ के सम्भलने वाला काम अकेले नहीं कर सकता | इसलिए उसे उतना ही काम अपने सिर पर लेना चाहिए, जितना वह सुचारू रूप से कर सकें | माने हम खामखाँ ही सीख देने पर उतारू हो गये हैं |
अब मुद्दे की बात पर आते हैं ! जिसके फलस्वरूप ये पांच सौ शब्दों का तानाबाना बुन उठा |
हमारी कथा "बदलाव" छपी है उस "बदलाव' में लिंग ही बदल दिया | उस कथा की ऐसी खटिया खड़ी करी गयी है कि हम पढ़कर क्रोधित हो उठे | घंटो आँख फोड़कर लिखने और गलतियों पर बारीकी से निरिक्षण करने का इतना कष्ट हुआ कि पूछिये ही मत |

उस किताब से सम्बन्धित आठ सम्पादक लोग हैं | किसे सुनाए समझ ही नहीं आ रहा है | इमेल का भी अता-पता नहीं मिल रहा है, घंटो मशक्कत कर लिए  | हम फोन भी करें कि जाने आखिर हमारा असली मुलजिम है कौन ! पर फोन उठा नहीं |  तो क्रोध की सीमा रेखा पार हो गयी, जो फेसबुक पर पोस्ट रूप में चिपकी |

लेकिन फिर देखा कि एक लाइन नहीं पूरा पैराग्राफ ही तहसनहस हुआ है | तो फिर क्या ! उठा लिए कलम और आ गये जनता दरबार में | मेहनत पानी में नहीं जाये इसका ख्याल तो सम्पादकों को अवश्य ही रखना होगा | अपनी टांग अड़ाने से अच्छा है जैसा लेखक दें हुबहू वही छाप दिया जाय | सम्पादन के नाम से कथा रूपी शरीर के पेट का आपरेशन करने के बजाय दिमाग का आपरेशन न कर दिया जाय ! फान्ट बदलने की गलती तो आदमी बर्दास्त कर सकता पर इस तरह की गलती असहनीय है !  असहनीय !! है न !!


देखिये आप सब भी इस कथा को...इतनी गलतियाँ ..पिछली बार के सम्पादक ने पता ही बदल दिया था, इस बार स्त्रीलिंग का पुलिंग में वार्ता कर दिया गया--


सही कथाएँ इस लिंक पर ..

http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_17.html

१०) 'सहोदरी लघुकथा' साझा-लघुकथा-संग्रह

'सहोदरी लघुकथा' साझा-लघुकथा-संग्रह प्रकाशन -भाषा सहोदरी हिंदी |
सम्पादक - कुल आठ सदस्य मुख्य सम्पादक श्रीमती कांता राय |
विमोचन- दिल्ली के "हँसराज कॉलेज" में जनवरी २०१८ को हुआ |
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'सहोदरी लघुकथा' साझा-लघुकथा-संग्रह जनवरी -२०१८ में पांच कथाएँ प्रकाशित हुई हैं |
आठ सम्पादको की देखरेख में कुल ७० नवांकुरो के साथ १५ वरिष्ठ अतिथि लघुकथाकारों के लघुकथाओं से सजी ३८० पेज की किताब .. |
भाषा सहोदरी हिंदी द्वारा लघुकथा अधिवेशन 2018, हँसराज कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिनांक : 15 जनवरी 2018 को सम्पन्न हुआ जिस में सौभाग्य से हम उपस्थिति रहे |
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प्रकाशित पांच लघुकथाएँ-
१..उम्रदराज प्रेमी
२ -रंग-ढंग
३--बदलाव
४--सबक
५.-सभ्यता के दंश
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--उम्रदराज प्रेमी
इसका बदला हुआ स्वरूप ब्लॉग और फेसबुक के इस लिंक पर ...
फेसबुक 
https://www.facebook.com/savita.mishra.3994/posts/1716223348415913
इसे 9 February 2015 को इस ग्रुप में लिखा था ..
https://www.facebook.com/groups/364271910409489/permalink/425160117654001/
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२--रंग-ढंग अब इस नाम से --दाए हाथ का शोर
चेतन का फेसबुक अकाउंट पुरानी यादों को ताज़ा कर रहा था। आज अचानक उसको वें तस्वीरें दिखी, जो उसने पांच साल पहले पोस्ट की थी। दूसरों की मदद करते हुए ऐसी तस्वीरों की अब उसे जरूरत ही कहाँ थी। उसने उन्हें स्क्रॉल कर दिया।
कभी समाजसेवा का बुखार चढ़ा था उस पर। 'दाहिना हाथ दें, तो बाएं को भी पता नहीं चले! सेवा मदद ऐसी होती है बेटा।' माँ की दी हुई इसी सीख पर ईमानदारी से चलना चाहता था वह।
लोग एनजीओ से नाम, शोहरत और पैसा, सब कुछ कमा रहे थे। और वह, वह तो अपना पुश्तैनी घर तक बेचकर किराये के मकान में रहने लगा था
पत्नी परेशान थी उसकी मातृभक्ति से। कभी-कभी वह खीझकर बोल ही देती थी कि 'यदि मैं शिक्षिका न बनती तो खाने के भी लाले पड़ जातेचेतन झुंझलाकर रह जाता था। उसी बीच उसने गरीब बच्चों को खाना खिलाते, उन्हें पढ़ाते हुए तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट कर दी थी।
यादों से बाहर आ उसने पलटकर फेसबुक पर वही अल्बम फिर से खोल लिया। तस्वीरों को देखकर बुदबुदाया- "सोशल साइट्स न होती, तो क्या होता मेरा। यही तस्वीरें तो थी, जिन्हें देखकर दानदाता आगे आये थे और पत्रकार बंधुओ ने मेरी वाहवाही करते हुए अपने समाचार-पत्र में स्थान दिया था। फिर तो मैं दूसरों को मदद करते हुए  सेल्फ़ी लेता और डाल देता था फ़ेसबुक पर। ये कारनामा फेसबुक पर शेयर होता रहा और मैं प्रसिद्धी प्राप्त करता रहा। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा मैंने।"
"अरे! कहाँ खोये हो जी! कई लोग आएँ हैं।" पत्नी की आवाज ने उसे आत्मग्लानि से उबारा।
"कहीं नहीं! बुलाओ उन्हें।"
"जी चेतन बाबू, यह चार लाख रूपये हैं। हमें दान की रसीदें दे दीजिए, जिससे हम सब टैक्स बचा सकें।" कुर्सी पर टिकते ही बिना किसी भूमिका के सब ने एक स्वर में बोला।
हाँ, हाँ ! क्यों नहीं, अभी देता हूँ।" रसीद उन सबके हाथ में थमा वह रुपयों की गड्डियाँ हाथ में लेकर मुस्कराया। अचानक माँ की तस्वीर की ओर देखा! आँखे झुकी, फिर लपकर उसने तस्वीर को पलट दिया।

सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
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इसे ओबीओ में लिखा था |
http://www.openbooksonline.com/forum/topics/32-5...
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३--बदलाव
ब्लॉग के इस लिंक पर ..
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/01/blog-post_23.html
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‎ लघुकथा प्रतियोगिता - बदलाव/परिवर्तन ......दिनांक २५/०५/२०१५ से दिनांक ०२/०६/२०१५ तक
25 May 2015
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४--सबक


भोर-सी मुस्कुराती हुई भाभी, साज-श्रृंगार से पूर्ण होकर अपने कमरे से जब निकलीं।
“अहा! भाभी आज तो आप नयी-नवेली दुल्हन-सी लग रही हैं, कौन कहेगा कि शादी को आठ साल हो गया है।” कहकर ननद ने अपनी भाभी को छेड़ा।
“हाँ! आठ साल हो गए, पर खानदान का वारिस अब तक न जन सकी।” सास ने मुँह बिचका दिया।
‘माँ भी न, जब देखो भाभी को कोसती रहती हैं।’ सोचते हुए वह भाभी की ओर मुखातिब हुई। “भाभी मैं आपके कमरे में बैठ जाऊँ, मुझे 'अधिकारों की लड़ाई' पर लेख लिखना है।”
“सुन सुधा, सुन तो! तू माँ के... ।” भाभी की बात अधूरी रह गयी थी और सुधा भाभी के कमरे में जा पहुँची थी।
“भाभी यह क्या? आपका तकिया भीगा हुआ है। किसी बात पर लड़ाई हुई क्या भैया से!” पीछे-पीछे दौड़ती आई भाभी की ओर उसने सवाल छोड़ा।
“वह रात थी सुधा, बीत गयी। सूरज के उजाले में, तू क्यूँ पूरी काली रात देखना चाह रही है।”
“काली रात का तो पता नहीं भाभी! परन्तु रात का स्याह, अपनी छाप तकिये पर छोड़ गया है। और इस स्याह में, भोर-सा उजास आप ही ला सकती हैं।” सुधा अनायास ही गंभीर हो गयी थी और इधर उसका लेख का शीर्षक 'अधिकारों की लड़ाई' भाभी के दिमाग में, सबक बनकर कौंध रहा था।
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सविता मिश्रा "अक्षजा'
"सबक" 16 October 2016 को इस ग्रुप में ...
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--सभ्यता के दंश

''मैं तहज़ीब के शहर लखनऊ से हूँ।" दोस्त की पत्नी शीला से विवेक ने अपना परिचय देते हुए कहा।
"किस तहज़ीब की बात कर रहे है, जनाब? तहज़ीब तो अब उस शहर में बेगैरत लोगों के घर में पानी भरती है। शर्मशार करने वाली खबरें आपके इस तहज़ीब भरे शहर से आ ही जाती हैं।" शीला ऐसे भड़की मानो ठहरे शांत पानी में विवेक ने ‘तहज़ीब’ नामक कंकड़ फेंक दिया हो।
दोस्त इशारे से शीला को शांत कराता रहा।
पर ज्वार तो फूटकर बह निकला था।
"
अभी हाल ही की मोहनलालगंज की घटना को सुनकर, आपकी जुबान ने भी खूब कहर ढाया होगा, उन नामुरादों पर।"
"
जीss.."
"
लेकिन किया क्या आप सबने! सिवाय मोमबत्तियाँ जलाने के?"
"
पानी भी तो दे जाओ, या सुनाती ही रहोगी!"
रसोई में जाते हुए शीला बोलते हुई गयी-

"
भाईसाहब! औरत तो मर कर भी नहीं मरती। बड़ी सख्त जान है यह औरत जात। वह तो मर गयी, खुशकिस्मत थी। अच्छा करते हैं वह माँ-बाप, जो कन्या-भ्रूण की हत्या कर देते हैं! वरना! ये भूखे भेड़िये पैदा होते ही बलात्कार करने की ताक में रहेगें।पानी से भरा जग क्या रखा, शीला ने अपनी तीखी वाणी से पानी-पानी कर दिया विवेक को।
सुनकर विवेक मन ही मन बोला- "बेटा! किस बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया।
पहली मुलकात में ही तेरी खटिया खड़ी करने पे आमदा हैं ये तो।"
दोस्त ने रसोई में जाकर शीला को चुप रहने की हिदायत दे डाली।

फिर टेबल पर आकर बैठते हुए विवेक से बोला, ''यार! बुरा नहीं मानना, ऐसी घटनाओं पर तेरी भाभी कुछ ज्यादा ही भावुक हो उठती है।"
"अरे, नहीं! नहीं..! भाभी का गुस्सा जायज है। हम सच में न जाने किस मानसिकता के वशीभूत हो रहे हैं। पहले तो बस औरतों की बेकदरी करते थे! अब आये दिन ऐसी घटनायें चुल्लू-भर पानी में डूबने को विवश करती हैं।'' विवेक चेहरे पर बिना सिकन के शन्ति से बोला।
फिर मन-ही-मन बुदबुदाया- "तहज़ीब का शहर कह आग में घी तो मैंने ही डाला था! अब उठती लपटों से झुलसना ही पड़ेगा।
"
वह रोटी देने आई तो विवेक ने कहा ''भाभी! शर्मिंदा हैं हम! आपसे वादा है, कम से कम मैं अपनी जिन्दगी में कभी भी औरतों की बेइज्जती नहीं करूँगा और न ही अपने आसपास में किसी को ऐसा करने दूँगा।'' यह सुनकर शीला के क्रोध पर जैसे घड़ो पानी पड़ गया हो, वह मुस्कराकर विवेक की प्लेट में रोटी देते हुए बोली- "और लीजिये न भाईसाहबसंकोच मत करिए"
मुस्कराता हुआ विवेक भाभी का दो मिनट पहले का रूप याद कर मन में ही कह रहा था- "यह वही हैं
, दो मिनट पहले वाली चंडी, जो अब अन्नपूर्णा बन गयी हैं।"
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सविता मिश्रा "अक्षजा'

(सहोदरी में सभ्यता के दंश ऐसी छपी है, बाद में इसमें बदलाव करके ब्लॉग पर पोस्ट है)