Sunday, 15 February 2015

~~मजबूरन~~


"पोस्टमार्टम होगा , आप हस्ताक्षर कर दे ।"
"कीजिये साहब ! रिश्तों का पोस्टमार्टम तो कर ही चुकी है ।"
"दूसरी लाश का वारिश कौन है?"
"मैं ही हूँ साहब !"
"आप ! इसका पिता कहाँ है ?"
"मैं ही हूँ !"
"ओह ! मतलब ये दोनों प्रेमी भाई.बहन ...!"
"हा साहब ! बेटे को बचपन में ही मैंने अपने साले को गोद दे दिया था ।"
"बहुत समझाया पर...., जवानी के जोश में रिश्तों का होश नहीं रख पाये दोनों | मजबूरन ..." (मजबूरन शब्द) बोल कर भी नहीं बोला पुलिस के डर से

Friday, 13 February 2015

~~शिक्षा~~

"आज रिटायर हो गया सुगन्धा | "
"अरे कैसे-क्यों ? तबियत तो ठीक है न ! अभी आपकी नौकरी के तो चार साल बाकी है |" "नहीं रे 'पगली' 'प्यार' से रिटायर हुआ | आज बहू बराम्दे से मेरी गोद से चिक्कू को लगभग छीन के ले गयी| बड़बड़ा रही थी कि प्यार तो देते नहीं , बस गुजरे जमाने की शिक्षा देते है | 'अंग्रेजी स्कूल ' में पढ़ रहा है | आपकी तरह कोई खैरात वाले में नहीं| "
सविता मिश्रा

कांटो भरी राह

युवकों को आशीर्वाद देने के बाद कौशल अपने काँपते हुए हाथ जोड़कर सिर आकाश की ओर उठाकर बोला -"ये सब आपकी शिक्षा का ही प्रताप है पिता जी, जो मैं कांटो भरी राह में फूल उगा पाया |" उसकी आँखों में झिलमिलाते पर्दे ने अतीत को उघार दिया था |
जहाँ तक नजर जा रही थी टिहरी के कोठियाड़ा गाँव में खंडहर ही खंडहर दिख रहा था | बादल फटा और देखते ही देखते खुशहाल गाँव में बदहाली फ़ैल गयी | कौशल का मनोबल फिर भी नहीं टूटा था|
रह-रहकर पिता की बात उसके दिमाग में गूंजती थी कि ‘विद्यादान सबसे बड़ा दान है! इस दान को प्राप्त करके ही सब आगे बढ़ सकेंगे
| दान देने वाले को भी अभूतपूर्व संतोष का धन प्राप्त होता हैइस दान में वह सुख है जो कभीकहीं भी नहीं मिल सकता है |
‘माने हर्रे लगे न फिटकरी, और रंग चोखा का चोखा
 | अपने पिता की बात को समझा लल्ला | अपने पिता की तरह तुम भी अपना ज्ञान बाँटना | माँ दुलारती हुई पिता की बात पर मोहर लगा देती थी |
जलजले से आए अचानक गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित बच्चों को देखकर पिता का दिया मूल-मन्त्र उसे याद आने लगा था | बस फिर क्या था उसने शहर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया था उसी दिन
और अपने गाँव के सारे बच्चों को इकठ्ठा करके एक टूटे-फूटे खंडहर में ही लग गया था विद्या का दान देने |
खंडहर भले ही खंडहर रह गया था | परन्तु बच्चों के मस्तिष्क खण्डहर होने से मुक्त हो रहे थे | कौशल अपनी मेहनत को अँकुरितपल्लवितपुष्पित देखकर फूला नहीं समाता था | धीरे-धीरे बच्चें बड़े होकर ऊँचे-ऊँचे ओहदो को सुशोभित करते जा रहे थे |
इतने वर्षो बाद आज वहीं महकते-चहकते बच्चे गाँव में इकट्ठा हुए थे
 | उन सबने कौशल की बूढी आँखों पर पट्टी बांधकर एक ज्ञान के मन्दिर के सामने लाकर उसे खड़ा कर दिया था |
पट्टी खुलते ही खँडहर को अपनी माँ के नाम से ज्ञान के मंदिर रूप में स्थापित देखकर कौशल के आँखों से अश्रुधारा बहने लगी | और उसके हाथ रौबीले गबरू जवान हो चुके उन चहुँ-दिशा में सुगंध बिखेरते फूलों को आशीर्वाद देने के लिए उठ गए थे |
--००--
सविता मिश्रा ‘अक्षजा'
 आगरा 
 
2012.savita.mishra@gmail.com
 5 September 2016 at 08:41
  Savita Mishra

Thursday, 12 February 2015

~~बेकदरी का डर ~~

रीना , ऋतू को एक फ्लावर पाट टूट जाने पर मारते-मारते गलियारे में आ गयी |
दो पड़ोसी महिलायें धूप सेंक रही थी वही | यह देख फुसफुसाने लगी आपस में |
पहली महिला- "बाँझ है न क्या समझेगी कोख का दर्द, बच्चे की ममता |"
दूसरी महिला -"लेकिन वह तो ऋतू की माँ है न, तो बाँझ ...."
पहली महिला -"नहीं रे वह प्रेगनेंसी का झूठ बोल बनारस चली गयी थी | वही का जन्म बताती रही परिवार वालो से | वह तो मेरे दूर के रिश्तेदार ने बताया कि ऋतू इसकी ममेरी बहन की बेटी है | जिसे मरते-वक्त वह एक महीने की ऋतू को इसकी गोद में डाल गयी थी| इसने परिस्थितियों का फायदा उठाया और दो साल बाद जब आई तो सभी से खुद को ऋतू की माँ बताने लगी| जैसे सास की नजरों में उठ जाये| इसकी जेठानी को भी कोई औलाद नहीं है , उसकी बेकदरी यह देख ही रही थी |"
दूसरी महिला- "तो तुमने इसकी सास से खुलासा नहीं किया ?"
पहली महिला -" नहीं , क्यों खुलासा कर इसका जीवन नरक बनाऊं, यही सोच चुप हूँ | सास-जेठानी का गुस्सा इस पर उतारती भले है , पर प्यार भी खूब करती है, ऋतू को खिलाये बगैर एक दाना भी मुहं में नहीं डालती |"
.दूसरी महिला - "आखिर माँ जो है | देखो अब आंसू बहाते हुये मलहम लगा रही है ।"
पहली महिला - कह रही थी मैं न , बहूत प्यार करती है। जान छिड़कती है जान । तभी तो राज फास नहीं कर रही। वर्ना खूसट सास अनाथ ऋतू का जीना हराम कर देंगी इसके साथ-साथ। ........सविता मिश्रा

Monday, 9 February 2015

आत्मग्लानी (लघुकथा)

"चप्पल घिस गयी बेटा, एक जोड़ी लेते आना | मैं थक गया हूँ, अब सोऊँगा |" 
"पापा! आपका प्रमोशन दो साल से रुका पड़ा है, दे दीजिये न बाबू को हज़ार रूपये | आपकी फ़ाइल वह आगे बढ़ा देगा | आप हैं कि आज के ज़माने में भी उसूलों से बंधे हैं !"
"बेटा, गाढ़े की कमाई है, ऐसे कैसे दे दूँ उसे ? और कोई गलत काम भी तो नहीं करा रहा हूँ !"
"अच्छा पापा, इन बातों में एक बात बताना भूल ही गया |" बैग से कुछ कागज़ निकालता हुआ बोला |
"क्या बेटा ?"
"सरकारी कॉलेज में मेरा एडमिशन हो गया है | लेकिन वहां का बाबू तीस हजार रूपये मांग रहा था |" कहकर कागज़ पिता के हाथ में पकड़ा दिया |
"काहे के तीस हजार...? " कागज़ पकड़ते हुए पिता ने आश्चर्य से पूछा |
"वह कह रहा था कि मैने तुम्हारे एडमिशन के लिए बड़ी मेहनत की है, थोड़ा तो मेहनताना देना ही पड़ेगा | मैंने मना किया, कहा - 'पापा बड़े सिद्धांत वादी हैं' |"
"फिर ..!" गर्व से सीना तानकर बोले |
”हँसने लगा, और फिर कहा कि 'बबुआ, पिता 'सिद्धांत वादी' हैं तब पढ़ना-लिखना भूल ही जाओ | बिना दिए-लिए सरकारी कॉलेज में एडमिशन आसान नहीं है | जाओ ! मूंगफली बेचो|" सिर झुकाकर बेटे ने एक साँस में ही सब कुछ कह डाला |
"तुम्हारा दाखिला तो हो गया है न !" आँखे तरेरकर पिता बोले |
"हाँ, मैंने यही कहा उससे | उसने कई लोगों के नाम गिना दिए | कहा पिछले साल इन सब लड़कों का भी हो गया था | लेकिन मिठाई का डिब्बा दिए बगैर सबका अधर में लटक गया |"कहते हुए नाउम्मीदी चेहरे पर दस्तक दे चुकी थी उसके |
"अच्छा..!" लम्बी सांस छोड़ते हुए बोले |
"......" पांच मिनट की ख़ामोशी के बीच बेटा सिर झुकाए मुलजिम की तरह खड़ा रहा |
“ठीक है, माँ से रूपये लेकर कल दे आना उसे |" कहकर ठंडी साँस छोड़ते हुए नजरें झुका लीं उन्होंने |
"पर पापा ! आपके उसूल !" पिता का झुर्रियों से भरा चेहरा आश्चर्य से देखते हुए बेटे ने कहा |
"मैं तो अपना वर्तमान और भविष्य ! दोनों ही उसूलों में उलझाये रहा, अब तुम्हारा भविष्य बर्बाद होते नहीं देख सकता हूँ |" सिर झुकाए उनके मुख से मरी-सी आवाज़ निकली |
बेटा अब भी असमंजसपूर्ण स्थिति में वहीं खड़ा रहा |
"आजकल सिद्धांतो की रस्सी पर बिना डगमगाए चलना बहुत मुश्किल है |"
--००---
बुदबुदाते हुए वह पलंग पर लेटे ही थे कि चिरनिद्रा ने उन्हें आलिंगनबद्ध कर लिया | सविता मिश्रा 'अक्षजा'
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नया लेखन - नए दस्तखत
9 February 2015

रिश्‍ता (उम्रदराज प्रेमी)

"अरे विनोद! क्या हुआ बीमार से लग रहे हो! आजकल टहलने भी नहीं आते?"
"क्या बताऊँ यार?"
"अरे बताओ तो सही, शायद मैं मदद कर सकूँ!"
"यार, वह जो कोने वाली बेंच पर बैठी है न, बस उससे प्रेम-सा हो गया है"
"उससे! वह तो अभी जवान है और तुम 'पिलपिले आम'! आज गये कि कल.. !"
बात चुभने वाली थी! विनोद तीखे स्वर में बोला, "आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता, सुना नहीं कभी क्या? और वह भी चालीस से ऊपर की तो होगी ही!"
"अरे भई! सुना है, गुस्सा क्यों होता है कैरियर बनाने के चक्कर में शादी नहीं की उसने। और जब करनी चाही तो कोई लड़का ही नहीं मिला परिवार के तानों से जब आहत होती है, तो मन को सुकून देने यहाँ आ बैठती है"
"फिर बात करो न! तुम्हारी सहकर्मी रही है, तुमसे तो घुली-मिली है न"
"बात क्या करनी है, फाइनल समझो वह तो खुद कहती है, दर्जनों खा जाने वाली नजरों से अच्छा है, एक जोड़ी आँखें 'प्यार भरी' नजर से देंखे नजर चाहे उम्रदराज ही क्यूँ न हो"
दोस्त की बात सुनते ही विनोद ने चुप्पी लगा ली उसका दिल
वात्सल्यमयी हो उठा वह झेंपकर बोला- तू मेरे भतीजे का ब्‍याह इस बिटिया से करा दे उसने भी कैरियर और फिर अपने नखरों के कारण अब तक शादी नहीं की है इससे दो-तीन साल ही बस बड़ा है, बूढ़ा नहीं"
दोस्‍त का दिल ही नहीं आँखें भी भर आईं थीं। उसने विनोद को गले से लगा लिया।
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
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9 फ़रवरी 2015 को संवेदना ग्रुप में लिखी

~~हुनर~~

"वाह ! क्या गजब की हारमोनियम बजाते हो बेटा| कहाँ से सिखा ?"
कोई जबाब नहीं |
"किस कक्षा में पढ़ते हो |"
कोई जबाब नहीं ..|
तभी एक बूढ़ा सा व्यक्ति आकर उसे उठाने लगा |
"ये बच्चा जबाब क्यों नहीं दे रहा |"
"बेटा ये गूंगा-बहरा है| भगवान ने कमियाँ सारी दी है, पर ये हुनर दे दिया है| जिससे भरण-पोषण हो रहा है | ले-देके ये बूढ़ा दादा ही अब इसका सहारा है|"
"इसके पिता ..."
"वह एक हादसे का शिकार हो गया | मरते समय उसने, इसकी हथेली को छूकर ना जाने क्या किया कि 'हारमोनियम' पर हाथ रखते ही 'सातो सुर' गुंजायमान हो गये | सविता मिश्रा

Sunday, 8 February 2015

~~गर्म खून~~

"मालूम है तुम जवान हो, खून उबाल मरता है | हर गलत बात का स्वविवेक से प्रतिकार करना चाहते हो | यह सब कर देखो, मार ली न अपने पैरो पर ही 'कुल्हाड़ी' | होती हुई 'प्रोन्नति' रुक गयी|"
"पर पापा, वो नियम विरुद्ध ....|"
"बेटा अनिमितताएं कहाँ नहीं हैं ? कौन चल रहा हैं नियमपूर्वक ? दिल-दिमाक भले ही क्रोध से उबल रहा हो, पर जबान को ठण्डी रखो| ठीक हैं ना ..सुन रहे हो या ..."
"सुन रहा हूँ पापा ..|"
"ऐसा कर सकें तो खुशनसीबी, वर्ना बदनसीबी तो दस्तक देने दरवाज़े पर ही खड़ी रहती है |"
"मतलब पापा, आप चाहते है वीरबहादुर का बेटा चमचा बन जाये |"
"बिल्कुल नहीं बेटा,पर कभी-कभी इस जुबान को दाँतों के अन्दर भींचना होता है| वर्ना मेरी हालत तो देख ही रहे हो| जो तुम्हें सिखा रहा हूँ यदि खुद कर पाता तो आज कहाँ से कहाँ होता| पर अपनी सच्चाई की अकड़ में चापलूसी को पकड़ नहीं पाया |..सांस खींचते हुए से अफ़सोस जाहिर किये फिर बोले -- "तभी तुम्हारी मम्मी ताने मारती रहती है कि 'क्या किये आप ? आपके साथ के कहाँ के कहाँ पहुँच गये|' अब वही साथ वाले साथ उठाना बैठना क्या ! देखना भी नहीं चाहते सामने मुझे |"
बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले - "ये सीख 'विरासत' है बेटा, एक नाकामयाब बाप की ! जो बेटे की कामयाबी की आशा रखते हुए अपने बेटे को सौंप रहा है | पर बेटा यह भी ख्याल रखना कि चापलूसी इतनी भी मत करना कि अपनी ही नजरों में गिर जाओ|"
"जी पापा, आपकी सीख हमेशा याद रखूँगा | थोड़ी जरूरत पर चापलूसी, वर्ना मौन रहूँगा | जब तक 'गर्म खून' का उबाल कम ना हो जाये|"
"कामयाबी कदम चूमेगी बेटा और हर दिल अजीज़ रहोगे फिर|" आश्वस्त हो पिता बोले | सविता मिश्रा

Saturday, 7 February 2015

आशंका ~

"अरे बेबी! इतनी मंहगी ड्रेस फाड़ डाली कैसे फटी कुछ बताओगी?"
"माँ ! वो -वो ..!"
"क्या वो- वो लगा रक्खी हैदस साल की हो रही हैफिर भी शिशुओ-सी हरकत करती है |"
"माँ! वो..वो नीचे सोसायटी में ..!"
"क्या नीचे किसी ने तुझसे कुछ किया क्या कहीं टॉफी या चॉकलेट...?" घबराकर नीतू अपनी बेटी के पूरे शरीर पर बारीकी से नजर दौड़ाते हुए सवाल पर सवाल पूछती गयी |
"माँ ! माँ सुनो तो ....|" चॉकलेट वाला छुपाया हाथ दिखाकर कुछ कहने की कोशिश की तो माँ चॉकलेट देख परेशान-सी हो चीख पड़ी -
"क्या सुनू कहा था न मैंनेअकेले कहीं मत जाना कोई उठा ले ...|
घंटी बजी ! दरवाजा खोलते वक्त भी नीतू बच्ची को डांट ही रही थी टीवी का स्वर दब गया था उसकी आवाज़ से |
"अरे तू ! आज जल्दी आ गयी !"
"'बीबी जीउ आकर..."
"तेरा शराबी पति आया था..! कहीं वहीं तो कुछ ..!" सिर पर हाथ रख धम्म से सोफ़े पर बैठ गयी।
फिर चंद मिनट बाद बोली-- "देख मेरी बेटी को..!"
"गलती होई गयी ! माफ़ी ..!"
"क्या माफ़ी ..! पुलिस को फ़ोन करती हूँ मैं |"
"उ बीबी जी !सुनिए तो..! बेबी नीचे बच्चुवन के साथ मा छुक-छुक रेलगाड़ी खेलत रहीन उहीं में मोरी बिटिया से इनका फ्राक फटी गवा है मोरा मरद कछू न करो ..!" फ़ोन को पकड़कर डरती हुई कामवाली बोली।
"ओह ! मेरी तो जान हलक में अटक गयी थी इतनी देर से बस यह वो-वो कर रही थीकुछ और बताई ही नहीं |"
"मम्मी ! आप तो डांटती ही जा रही थीबात कहाँ सुन रही थी मेरीफ्राक फटने पर ऐसे रियेक्ट कर रही थी जैसे गेम में कपड़ेफटते ही नहीं हैं..|
"फटते हैं ! पर तेरे..!"
"भैया भी तो पिछले हफ्ते कबड्डी में शर्ट फाड़ के आये थेउन्हें तो आप ऐसे नहीं डांटी थी |"
"वोवो ...|"
"देखिए ! अब 'आपवो-वो कर रही हैं मुझे भी गुड टच और बैड टच के बारे में पता है अंकल ने तो बस प्यार से चॉकलेट दी थी |"तुनककर वह अपने कमरे में चली गयी |
माँ उठी और सावधान इण्डिया खटाक से बंदकर रिमोट गुस्से में पटक दी |
--००--
 
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
नया लेखन में 2015

Thursday, 5 February 2015

तमाचा ( लघु कथा )

निष्ठा अपने घर के बरामदे में सहेलियों के संग बैठी थी | जब कभी मंजू तीन चार सहेलियों के साथ होती तो किसी न किसी मुद्दे पर चर्चा गरमा ही जाती थी | लेकिन जल्दी ही हँसी-ठिठोली पर आकर समाप्त हो जाती थी | आज चाय की गर्मागर्म चुस्कियों के साथ ईमानदारी पर बातचीत हो रही थी। अचानक यह बातचीत एक दूसरे पर कटाक्ष में बदलने लगी | मेरा पति ईमानदार तेरा बेईमान साबित करने की मंशा थी जैसे | गर्व पूर्वक स्नेहा ने जैसे ही बोला, "मेरे पति तो बहुत ईमानदार है |" "पति तो मेरा ईमानदार है | वह सब की तरह पद का दुरूपयोग कभी नहीं करता |" कनखियों से स्नेहा की तरफ देखकर व्यंग्यात्मक आवाज में मंजू बोली| स्नेहा को समझते देर नहीं लगी | वह रोष भरी आवाज में बोली , " छोड़ो यार पद का कितना सदुरूपयोग करते हैं यह तो तेरा महल जैसा घर ही चीख--चीखकर गवाही दे देता है। मानो या नहीं मानो ईमानदार तो मेरे ही पति है! " यह सुनते ही निष्ठां ने झट चुटकी ली,, "छोड़ स्नेहा यार ! मलाईदार पद और ईमानदारी!! स्नेहा तुनकती हुई बोली -"तुम्हारे 'वो' की तरह मेरे 'ये' पद का फायदा उठाकर मलाई ही नहीं चाटते रहते है। आठ घंटे कड़ी मशक्कत करते है समझी |" देखो भई ईमानदार तो मेरे पति है! जिस कुर्सी पर है , उस कुर्सी को पाने के लिए खाने वालों की लाइन लगी रहती है| ऐसी कुर्सी पर होकर भी क्या मजाल कि एक पैसे की बेईमानी करें| निष्ठा चाय की चुस्की लेती हुई रोष में बोली | 'मेमसाब', 'साहब' ने ये कम्बल भेजवाये हैं | कहाँ रख दूँ ?" तभी अर्दली की आवाज आई। "क्या जरूरत थी इनकी ?" पास जाकर निष्ठा उसी रोष में बोली। अर्दली सकपकाकर बोला- "कोई जाड़े में बांटने के लिए चार बंडल दे गया था, 'साहब' ने कहा इन बंडलो से दस- बारह निकालकर घर पर रख आओ|" "एसी, टीवी कोई भेजवाता तो ....,!!" रामू को आवाज लगाकर कहा , " रामू इन कम्बलों को ससुरजी वाली अलमारी में रख दो |" फिर बरामदे में पहुँचकर सहेलियों को सुनाती हुई बोली - टीवी खरीदनी मुझे | आजकल मेरे कमरे का टीवी खराब हुआ पड़ा है। कहाँ कितना भ्र्ष्टाचार फैला हुआ है, कोई खबर ही न मिल पा रही है।" कुर्सी पर बैठी ही कि मंजू उठती हुई बोली - "मैं चलती हूँ अब निष्ठा, मेरा भी टीवी ख़राब है, किन्तु भ्र्ष्टाचार की खबरें मिल ही जाती हैं |" खीझते हुए स्नेहा भी उठकर बिच्छू का डंक मार दी। सुनते ही निष्ठा को अपनी कुर्सी चुभने सी लगी | दोनों की बातों का जबाब नहीं बन पड़ रहा था उससे| लेकिन फिर भी ओंठ बुदबुदा उठे - "इस अर्दली के बच्चे को अभी आना था |" #सविता मिश्रा

Tuesday, 3 February 2015

~~पलटी~~

"पलटी"

"का हो लल्लन, कैसन चलतबा तोहार नेतागिरी |"

(क्या हो लल्लन, कैसी चल रही है तुम्हारी नेतागिरी)

"का बताई भईया, इ जब से मोदी आईगा बा न, रच्चिव क रहाईस नाही बा | भागमभाग बा बिल्कुलय, दिन- रात एक करा, पर एक्कव कौड़ी हाथे नाही लागत| और-ता-और केऊ पहिचनबव नाही करत अब| "

(क्या बताये भैया, ये जब से मोदी आयें हैं, थोडा भी आराम नहीं मिल रहा| भागमभाग हमेशा| दिन रात एक करना पड़ रहा, परन्तु एक भी पैसा हाथ नहीं लग रहा| और छोड़िये, कोई पहचान भी न रहा अब|)


"अरे काहे ?" (अरे क्यों ?)

"का बताई, मोदी के पच्छ में, इ न्यूजवा वाले दौड़ लगावत रहथिन न | गवां रहे एक ठनी के दुआरे वोट मांगय, ससुर का नाती कहेस 'के हए तू, हम ता कमल के देब | खबरवा में देखा हम उ मोदी देश के सुधारी दें, ता तोहके दई का आपन वोट ख़राब काहे करी' | आपन अस मोह लेई क रही गये|"

( "क्या बताये, मोदी के पक्ष में, ये न्यूजचैनेल वाले दौड़ लगाते रहते हैं| एक के घर गए थे वोट मांगने, ससुर का नाती कहा कि "कौन हो तुम? हम तो कमल को देंगे वोट| समाचार में देखा हमने, वह मोदी देश को सुधार देगा| तो फिर तुमको देकर वोट ख़राब काहे करें|

अपना सा मुहँ लेके रह गए हम|")

" 'अरे इसन कहेस उ' वइसे लल्लन इ त सही कहेय तू | चमच बनय , और तलवा चाटय के दौड़ में त आजकल न्यूजवा वाले चितवव से भी तेज हयेन |"

(अरे ऐसा कहा उसने, वैसे लल्लन यह तो सही कहा तुमने| चमचा बनने और तलवा चाटने की दौड़ में आजकल न्यूज वाले चीता से भी तेज दौड़ रहें हैं|" )


"हा भईया गिद्ध नज़र गड़ाये रहथिन ससुरे, हमरे पचन पर| मौका पउतय, मारी देथिन झपट्टा , उघाड़ी देथिन सब हमार छुपा-मुदा| अइसय हाल रहा त हमार नेतागिरी त खतमय समझअ |"

(हां भैया, गिद्ध नज़र गड़ाये रहते है ससुरे, हम सब पर| मौका मिलते ही मार देते है छापा, खोल देतें हैं सब अपना छुपा-मुदा हुआ| ऐसा हाल रहा तो हमारी तो नेतागिरी ख़त्म ही समझिये आप|" )_


"ता आगे अब का सोचय|"
(" तो आगे के लिए अब क्या सोचा हैं ?)

"भईया, का बताई , सोचत हई मारी जाई 'पलटी' ...पंजा छोड़ी पकड़ी लेई कमल |"
("भैया क्या बताये, सोच रहें है पार्टी बदल ही डाले|" ) सविता मिश्रा

Monday, 2 February 2015

~~गुमराह~~

अपने पोते को लड़कियों के साथ घर आया देख दादी ने माथा पीट लिया | बेटे को भला बुरा कहती हुई बोली "मन्नू क्या ऐसे संस्कार दिए थे मैंने, जो तूने अपने बेटे को दिया | गुमराह हो गया है तेरा बेटा| देख कैसे लडकियों से खी-खीकर ,लिपट चिपट कर..बात कर रहा है | मेरे बच्चे कितने संस्कारी थे पर तेरे....छी छी क्या जमाना आ गया है |"
पोता माँ के पास जाकर बोला -" किस जमाने से आई है दादी | जाके बता दूँ क्या कि मैंने तो लडकियों से महज दोस्ती की है, भैया तो बंगलौर में अपनी सहकर्मी के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में है| और 'चाचा जी' वह तो राह ही भटक गये थे मेरी दोस्त पर ही .....
" चुप कर बेटा क्यों लंका-दहन करने पर तूला है| एक दो महीनों के लिय गाँव से आई हैं, हंसी-ख़ुशी बीत जाने दे। "
सविता मिश्रा 

Sunday, 1 February 2015

~~हींग लगे न फिटकरी~~

पिता से देसी गाय नहीं जर्सी लेने को लड़ाई करके चार साल पहले महेश गाँव से भाग आया था | पढ़ा लिखा था नहीं, हुनर के नाम पर गाय भैस दुहना आता था|अतः मजबूर हो किसी तरह दोस्त से कर्ज लेकर जर्सी गाय खरीदी पर बांधे कहाँ| खुद ही सड़क किनारे झुग्गी झोपड़ी में रह रहा था|
उसने देखा शहर में जूसऔर फल की दुकानों के सामने अच्छा ख़ासा फल-छिलका कचरा रूप में फैला होता है| महंगाई में अधिक चारा भी खरीदने के पैसे तो उसके पास थे नहीं| बस उसके दिमाक की घंटी बजी| अब सुबह थोड़ा सा चारा डाल दूध दुहता फिर गाय छोड़ देता सड़क पर| कुछ दिन लोग उस पर चिल्लाये, फिर उन्हें लगा कि आकर वेस्ट(waste) ही तो खाती है गंदगी नहीं होती और पुन्य भी हो जाता है| अब तो महेश के दोनों हाथों में लड्डू थे क्योकि ज्यादातर दुकानदार पुचकार-पुचकार दूकान बंद करते-करते सारा खराब फल, सब्जी और छिलके खिला देते| गाय बिना किसी को परेशान करें रोज वही चक्कर लगाती और सारा कुछ खा चुपचाप अपने मालिक के पास सड़क किनारे बैठ जाती|
पिता को दस हजार भेजते हुय उसने चिट्ठी में लिखा, देखा पिता जी कहता था न देशी गाय में नहीं जर्सी में फायदा है| हमारी चिंता ना करना यहाँ हींग लगे न फिटकरी पर रंग चोखा ....| सविता मिश्रा

Saturday, 31 January 2015

~~ इतिहास दोहराता है ~~

दो घंटे की पार्टी का कहके चार घंटे से उप्पर हो गये थे |माँ देहरी पर नज़रें गड़ाये अपनी बेटी के इंतजार में थी पर बेटी थी कि मस्त दोस्तों के साथ पार्टी में| माँ फ़ोन कर-करके परेशान पर दूसरी तरफ से कोई जबाब नहीं| अंततः घबराई सी माँ निकल पड़ी उस होटल की ओर जहाँ पार्टी चल रही थी|
मन में ना जाने कैसे -कैसे  ख्याल लिय जब वह वहां पहुँची तो पार्टी अपने पिक पर थी सभी मस्त थे एक दूजे के साथ डांस करने में|
माँ  सब के पास जा-जा डिस्को लाईट में अपनी बेटी का चेहरा खोज रही थी| तभी एक आव़ाज सुन मुड़ी ही थी कि बेटी लगभग चीख सी रही थी - "क्या मम्मी! आप यहाँ भी मेरी बेइज्जती कराने आ गई| आप घर जाइये आ जाऊँगी मैं, बच्ची नहीं हूँ ! पता नहीं आप समझती क्यों नहीं|"
"हा बेटा समझती ही तो नहीं मैं " कह सिसकते हुए निकल आई तेजी से | तभी आवाज आई - "क्यों ! चोट लगी क्या ?..सीधे दिल पर न "...चकर -बकर देखती माँ के कानो में फिर आवाज गूंजी -"इधर-उधर क्या देख रही  .....तुमने कितना परेशान किया भूल गयी क्या ?" सविता मिश्रा

Friday, 30 January 2015

मुँहदेखाई

-
नई बहू के गृहप्रवेश करते ही घर में जमा हुई औरतों के बीच कानाफूसी शुरू हो गई|
"बडे पन्डित बने फिरते हैं, इन्हें पता ही नहीं था !!"
"क्या नहीं पता !" आँखे गोल करती हुई रामदीन काकी बोलीं |
"यही की, कि राहुकाल में नई बहू को गृहप्रवेश नहीं कराते हैं|"
"हाँ री! सुना है, बड़ा अशुभ होता है|"
"...ईश्वर ही मालिक है अब।"
इन्हीं कानाफूसियों के बीच सारे रीतिरिवाज बीत गए ...| दादी भी मुँह फुलाये कोने में बैठी थी ।
बहू ने पैर छूकर आशीर्वाद माँगा ही था कि वह बादल सी फट पड़ी .."राहुकाल में प्रवेश हुआ है छोरी, भगवान करें, आगे सब अच्छा ही हो।"
बहू हँसते हुए बोली- "यह राहुकाल क्या होता है दादी, आप बस हँसते रहा करिए, ये हँसी का काल है।" कहके जोर से खिलखिला पड़ी |
दादी उसकी निरछल हँसी सुन मुँह बिचकाकर कही 'आजकल की बहुए भी|"
वह आँखे फाड़े हाथ को गाल पे लगाकर चौकन्नी हों मूर्ति सी टीवी के आगे बैठ गयीं | अचानक पाकिस्तान का नाम सुनते ही उनके कान घर में उठते शोर-शराबे से हटकर टीवी-स्क्रीन से चिपक गये | टीवी की खबर कानों से टकराई कि पन्द्रह साल से जेल में बंद रामकृपाल के साथ दो और बुजुर्ग बंदियों को छोड़ा जा रहा है।
नाम सुनते ही पलंग से फुटबाल की तरह उछली और अलमारी के पास जा पहुँची | "बहू-बेटा, सुनते हो! अरे जल्दी आओ ! तेरे पिता जी जिन्दाsss हैं ..।" पति द्वारा दिया गया नौलखा हार हाथो में लिए बोलीं -"तेरी बहूरिया कहाँ है, बुला उसे! उसकी 'मुँहदेखाई' दे दूँ । अरे उसका प्रवेश बड़ा शुभ है |"

Saturday, 24 January 2015

"आस "( laghukatha)

"आस "
गोदाम में बिखरे दानों को देख अचानक भीखू को माँ की सीख याद आ गयी - ' बेटा अन्न का आदर करना चाहिए |' ...ये अमीर लोग क्या जाने इन दानों की कीमत? यह तो कोई मुझसे पूछे, जिसके पेट में सुबह से शाम हो गई पर अन्न का एक दाना भी नहीं पहुंचा है ..|
दोस्त ने कहा था कि मोटा गैंडा काम खूब कराता है, पर रूपये देने में आना-कानी नहीं करता, ऊपर से वहां पर गिरे अनाज घर ले जाने को बोल देता है| बस इसी आस में आज इस सेठ के गोदाम में आ गया ..... |
फैले हुए दानों को देख भीखू खुश हो मन ही मन बोला -'आज माँ भूखी न सोयेंगी |' झाड़ू मारते-मारते भीखू सोच ही रहा था..... |
तभी कानो में एक कर्कश आवाज गूंजी "अबे जल्दी जल्दी हाथ चला खाया नहीं है क्या?"
सुनते ही आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे|
"अरे क्या हुआ .....काम नहीं होता तो फिर क्यों आया?"
"सेठ जी सुबह से कुछ नहीं खाया, माँ कल रात में चावल का माड़ पिला सुला दी थी ..घर में एक दाना भी नहीं है..|"
"ओह तो ये बात है, ले खा ले आज सेठाइन ने ज्यादा ही खाना भेजा है ..तू भी खा ले और हाँ, खाकर अच्छे से साफ़ सफाई करना भले कितनी भी देर हो जाये|"
ख़ुशी ख़ुशी भीखू बोला-"जी सेठ जी" अब उसके हाथ फुर्ती से चलने लगे ,खाना मिलने की "आस" जो जग गयी थी| ........सविता मिश्रा

Wednesday, 31 December 2014

विदा २०१४

दिन +हफ्ते +महीने कर कर के २०१४ का कलेंडर  बदल गया ....यदि कुछ नहीं बदला तो वह है इंसान का दिलोदिमाक ...नए से कोई ख़ास उम्मीद नहीं पर हा जैसे पिछले चार-पांच साल बिते  वैसे ना बीते तो अच्छा ....आगे हरी इच्छा
जीवन को उधेड़ बुन कर अच्छे -बुरे समय को समझना बड़ा मुश्किल हैं, हो सकता है बहुत से पल वो भी आये हो जो अमृत पान कराएं हो, पर वह पल किसे याद रहते है -हा गम के चाबुक कभी नहीं भूलते .....इन्ही चाबुको के बीच अपने और गैर का हम चुनाव कर लेते है...|

कोई गैर अपना बन दिलोदिमाग में घर कर जाये अच्छा लगता है| कोई बनना चाहे अपना तो भी अच्छा लगता है, पर अपना गैरों सा बर्ताव करें बहुत बुरा लगता है ...फिर भी समय के साथ हर रिश्तें पर धूल ज़मने देते है कभी रिश्तों पड़ी धूल साफ़ करने की भरपूर कोशिश करते है ......कुछ रिश्ते पर कोशिशें कामयाब होती है, कुछ पर नहीं ....समय फिर भी नहीं रुकता ...महीने साल बीतते जाते है समयानुसार ....कभी-कभी अथक परिश्रम कर हम खुद को ठगा सा पाते है ..कभी हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ा समय के साथ हो लेते है .....चलिए समय के साथ, सब कुछ समय पर छोड़  ...उप्पर वाले ने कोई तो समय मेरे लिय या आपके लिय भी बनाया ही होगा ..मूक बन उस समय का इन्तजार करिए ....बस निस्वार्थ कर्म करते हुए .....
वैसे तो निस्वार्थ कर्म करने को कहना बेमानी सा ही है क्योकि इस आज की दुनिया में कोई निस्वार्थ कहाँ हैं भला|

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया///हर व्यक्ति यदि ऐसी सोच रक्खे ऐसी प्रतिज्ञा कर ले तो, न गये समय के दुःख दर्द याद आये, न नये समय से आशंकित हो ...दुःख हो सुख हो अपनों के कंधे का सहारा मिलें तो भवसागर भला कौन नहीं पार कर लेंगा ...पर हम इसी उधेड़ बुन में रहते है कि किसने, कब,कैसा मेरे साथ किया उसे कब, कैसे गच्चा देना है ...बस समय अपनी राह हो लेता है और हम कष्ट में डूबते ही अपनों का साथ न पा तमतमा जाते है क्योकि अपने जो होते है वह कष्ट में कन्धा देने के बजाय अपनी ही उधेड़बुन में लगे होते है कि कब पैरो के नीचे से चादर खींची जाये |  ख़ुशी की सीढी कोई नहीं बनना चाहता है, सब गम की लिफ्ट बन जल्दी से जल्दी उप्पर पहुँचाना चाहते है| अपनों का साथ सभी को चाहिए होता है, पर कोई अपना साथ देने को तैयार नहीं होता|
वक्त  के साथ चलिए ,वक्त -वक्त पर मिलते रहिये, वर्ना वक्त यदि बित गया किसी तरह तो वह व्यक्ति खुद ही नहीं याद रखेगा कि आप किस खेत की मूली थे | क्योंकि वक्त एक न एक दिन घूमफिर कर सभी का आता ही हैं| :) सविता मिश्रा
बोलिए गणेश भगवान् की जय :) :D

Wednesday, 3 December 2014

~इतना सारी समस्याएं लड़ें तो लड़ें कैसे ~

अदना सा आदमी कितनों से लड़ता फिरे | अपने विचारों से, परम्पराओं से, नियमों से, कानून से, विसंगतियों से, संगतियो से भी, अव्योस्थाओं से, झूठे आरोपों से, तकियानुसी विचार धाराओं से, एक अजीब ही ढर्रे पर चलती नियमों से, जो बदलना ही नहीं चाहती,सरकार से, भ्रष्टाचार से, महंगाई से, जिन्दगी से, मौत से भी, और तो और इन आकाश में घूमते पर अपने ही आसपास चालों की बिसात बिछातें इन ग्रह नक्षत्रों से ....|एक मामूली सा कमजोर आदमी और इतना सारी समस्याएं लड़ें तो लड़ें कैसे .....?

सब से यदि लड़ भी ले तो आखिर प्रारब्ध और उस अदृश्य शक्ति से कैसे लड़ें ...?
कभी कभी लगता हैं हार कर बैठ जाएँ एक कोने में, और सब कुछ उसके मर्जी पर छोड़ दिया जाएँ| सविता .............

Tuesday, 2 December 2014

~हाइबन~

पहली हमारी कोशिश हाइबन लिखने की इधर आइये तो पढ़ अवश्य बताइए कैसी है यह अदना कोशिश ....आप सभी के इंतजार में मेरी यह रचना ...:)

ओह कितनी खुबसुरत तस्वीरें है| काश मैं भी घूम पाती ! इस नाव में, पतवार मैं चलाती और तुम बैठते| जिन्दगी की नाव तो तुम्ही खे रहे हो न | पहाडियों पर चढ़ के तुम्हारा नाम पुकारती| सुनती हूँ, एक बार नाम बोलो तो कई बार गूंजता है| मैं पूरे फिज़ा में तेरे नाम की ही गूंज बसा देती|
समुद्र की शांत पड़े पानी में डूबते सूरज की अरुणाई को निहारती रहती| स्वर्णिम आभा को अपने हृदय में बसा लेती हमेशा-हमेशा के लिय| सब कहते है कि स्त्रियों को स्वर्ण बहुत पसंद है पर तुम तो जानते हो न मुझे बिल्कुल भी नहीं पसंद| पर यह स्वर्ण आभा मैं अपने अंदर बसा सबको अलानिया बताती कि देखो, मुझे भी स्वर्ण पसंद है| सच्चा स्वर्ण बिल्कुल ख़ालिस, कोई मिलावट नहीं |
और तो और एक टका भी न लगेगा इस स्वर्ण को अपने शरीर पर धारण करने पर |
ये सुन रहे हैं न या फिर मैं बके जा रही हूँ| हू हा सुन रहा हूँ!उहू तुम भी न कभी तो मेरी बातें भी सुन लिया करो, घूमा नहीं सकते तो ना सही|
अच्छा दीदी आप बताये आप तो घूम के आई है ???
क्या बताऊ सवित ! जितना तुम तस्वीर देख बयान कर दी, उतना तो हम वहां देखकर भी महसूस नहीकर पायें| हा थक जरुर गये घूमते घूमते| देखो पैरो में सूजन अब भी हैं|
अरे दी आप भी ध्यान से देखिये इन तस्वीरों को सारी थकान दूर हो जायेगी| कितनी खुबसुरत शानदार तस्वीरें आप और जेठजी ने खिंचवाई हैं| देखिये जरा गौर से .......

मन लुभाती
हरियाली बिखरी
कृति निखरी|


पक्षी बन मैं
प्रकृति छटा देखूं
मनु से दूर| ..............सविता मिश्रा

Sunday, 23 November 2014

मोह- (बदलाव )

ढाबे पर काम करते हुए बंटी को आज पांच साल हो गये थे | कुछ महीनों से बंटी का व्यवहार बदलने लगा था | जब तब मालिक उसे डांट देता था, "क्या लड़कियों की तरह शर्माता है | जल्दी-जल्दी काम निपटा |"
बंटी था कि अब ट्रक-ड्राइवरो से आर्डर लेने से बचने लगा था | जब भी किसी नशेबाज को खाने की टेबल पर देखता था वह सहम जाता था | उनकी आवाज अनसुनी करता हुआ वह चिंटू को उनके पास जाने की मिन्नते करता |
मालिक को अब शक होने लगा कि कहीं बंटी भाग न जाये, तो वह बंटी पर नज़र रखने लगा | एक दिन अचानक उसकी नजर नहाते हुए बंटी पर पड़ गयी | देखकर वह दंग रह गया |
पास बुलाकर उसकी पगार दें उसे वहां से अपने घर जाने को कहने लगा - "अच्छा-खासा मेरा ढ़ाबा चल रहा है, तुम्हारे कारण मुझे पुलिस का कोई लफड़ा नहीं चाहिए |"
बंटी रोते हुए बोला- "साब! मुझे मत निकालो, मेरे बाबा, दीदी की तरह मुझे भी बेच देंगे | मुझे अपने घर में नौकरी पर रख लो...., बचपन से आपके यहाँ काम किया है | आप जानते हो मैं कामचोर नहीं हूँ, और ईमानदार भी हूँ |"
"अच्छा ठीक है, देखता हूँ |" कहने पर ही बंटी के आँसू रुके |
अपनी पत्नी का मायूस चेहरा और कभी-कभी रोने से सूजी हुई उसकी आँखें | पापा सुनने को तरसते उसके कान | बीस साल से बीतती वीरान जिन्दगी में उसे बंटी की वो पांच वर्ष पुरानी खिलखिलाहट, मासूम अदाए याद आयीं जिससे उसके चेहरे पर चमक आ जाती थी | अचानक उसके ओंठ फड़फड़ाये- "स्नेहा !"
"स्नेहा! यह नया नाम सुनकर बंटी अब भरसक मुस्कराने की कोशिश में लग गया |
मालिक घर पर फोन लगाकर अपनी जोरू से बोला - "सुनो ! आज रात के खाने में खीर बनाना | आज से तुझे कोई बांझ नहीं बोलेगा | अब सब तुम्हें स्नेहा की अम्मा कहकर पुकारेंगे |"
स्नेहा अभी ठीक से मुस्करा भी नहीं पायी थी कि उसके आँखों से आँसुओ की निर्झरिणी फिर से बह निकली | --००---- सविता मिश्रा 'अक्षजा'

Monday, 3 November 2014

*इच्छा-शक्ति*

आंसू चीख-चीख कह रहे थे कि जो हुआ उसके साथ वह बहुत गलत हुआ| पर जुबान थी कि ताला जड़ चुका था|
दीपावली के विहान खुशियों का लेखा-जोखा करते, पर अब गम की नदी में गोते लगा रहे थे| हंसता-खेलता परिवार आज गमजदा हो गया था| रह-रह हर बात को लघुकथा में ढ़ालने वाला शख्स आज आँखे मूदें पड़ा था|

ना जाने कितनी लघुकथायें उसके अवचेतन मन में दफ़न हो रही थी| वह बोलना चाहता था कि मैं लिखूंगा जब उठाऊंगा कलम, खूब ढेर सारी घटनाओं पर लिखूंगा| मैं जो यह यमराज से लड़ रहा हूँ ना, वह भी लिखूंगा देखना तुम| पर पत्नी थी कि दुःख के सागर में डूबी, उसके दिलोदिमाग को नहीं पढ़ पा रही थी|
बस कलम उठने ही वाली हैं, आखिर हजारों दुआओं में अमृत-सा असर जो हैं| सविता मिश्रा Savita Mishra