Sunday, 29 September 2019

वादा

“तुम्हें गिरते देख मैंने पकड़ लिया है, हाथ मत छोड़ना! कसकर पकड़ के रखो वरना तुम गिरे तो मैं भी नष्ट हो जाऊँगी। तुम्हारे सहारे ही तो मैं जमा हूँ, नदियों में, तालाबों में, नलों से होते हुए तुम्हारे घरों में।”
फिसलती चट्टानों से सम्भलकर वह उठ ही रहा था कि उसके कान फुसफुसाहट सुनकर खड़े हो गए।
“अरे! अरे! देखना छोड़ना नहीं, किसी भी हाल में नहीं। पीने-नहाने के लिए मैं चाहिए तुम्हें कि नहीं ! यदि चाहिए तो फिर कसकर पकड़े ही रहना, वरना उँगली भर रह जाऊँगी मैं।”
झरने के नीचे खड़े होकर पानी से खेलते हुए कानों में कोई आवाज़ दुबारा से गूँजी तो वह चारो तरफ चकरबकर देखने लगा। अपने कल-कल को पीछे छोड़ती हुई वही आवाज़ फिर आयी तो वह पानी की ओर हाथ बढ़ाए हुए स्टेच्यु की स्थिति में आ गया।
“भरा-पूरा शरीर था कभी मेरा लेकिन तुम्हारे दादा-परदादा ने कीमत नहीं समझी मेरी। तुम भी उन्हीं के नक़्शे-क़दम पर चलने लगे हो। अब हाथ भर रह गई हूँ, हो सके तो मेरी कीमत समझो और कसकर थामे रहो मुझे। जैसे तुम्हारे बाद भी तुम्हारे बच्चे मेरी उंगलियों को छू सकें, क्यों थामे रहोगे न!”
मूर्तिवत उसने हाँ में अपनी मुंडी हिला दी।
“यदि तुमने भी छोड़ दिया न तो तुम अपने आँसुओं में ही पाओगें मुझे।”
झरने के नीचे खड़ा वह झरने से आते छटाँग भर पानी को देख सोच में डूब गया।
“सुनो, तुम मुझे जीवन दो बदले में मैं तुम्हें जीवित रखूँगी, वादा है ये मेरा।”
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा
29/9/2019 को

Wednesday, 25 September 2019

माँ अनपढ़

“क्या कह रही बिटिया ! हमने तो तुम्हें खूब पढ़ाया। हमारे खानदान की कोहू बिटिया ने इतना न पढ़ा है।”
“हाँ अम्मा, तुमने पढ़ाया, लेकिन..!
“हम तो पाँचवी तक बस पढ़े रहे, पर तुम्हें पढ़ाया, जैसे कोई ई न कहें कि जैसे माई वैसेही बिटिया। के कहेस तोहके अनपढ़, बतावअ त, बताई ओहके ...!”
“अम्मा, हम पांचवी में आते ही जैसे तुमका कहते थे न कि अम्मा तुम तो न ही पढ़ाओ हमें! तुमको कुछ न आता, वैसे ही अब..!”
हा हा हा...
“अम्मा, बस करो हँसना, हम पर तो गुस्सा जाती थी । अब वही चीज तुम्हारी नातिन हमसे कह रही है तो उस पर तुम्हें लाड़ आ रहा..!”
“बिटिया, अम्मा लोग कितना भी पढ़ी-लिखी जाए अपने बिटियन के आगे अनपढ़े ही रहिए, हर जुग मा।”
 दोनों माँ ही अपनी अगली पीढ़ी से सिखती-सिखाती उसके पीछे-पीछे चलने लगीं।
--००--

सविता मिश्रा अक्षजा
आगरा
2012.savita.mishra@gmail.com

२३/९/२०१९ को लिखी 

Tuesday, 6 August 2019

सुनो पूर्वाग्रही

 370 हटाए जाने के प्रस्ताव एक सदन से पास होने की खुशी में जो हल्के फुल्के हास्य चल रहे हैं शोशल मीडिया पर वह किसी की भवनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है बल्कि अपने अपने ढंग है हंसने बोलने के तरीके हैं उस पर इतनी ज्यादा उथल पुथल उन्हीं के अंदर मच रही जो कि पूर्वग्रह से पीड़ित हैं। 'अक्षजा'
अब इस 370 को लेकर फैलने वाले हास्य को कबड्डी का मैच बताने वाले लेखक को मेरा जवाब---
पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखा गया है यह लेख। भाषायी संयम सिखाने वाले लेखक महोदय दूसरे की आहत भावनाओं से खेलकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
ये भाषा संय
मी तब क्यों नहीं बने रहने की सलाह दी जाती जब हिन्दू देवी देवता पर और त्योहारों के दिन फूहड़ हास्य लिखे जाते हैं और असहाय होकर ह्वाट्सएप ग्रुपों में और फेसबुक पर घूमते रहते हैं। उन फूहड़ हास्य के विरोध में  मसीहा बनकर क्यों नहीं उभरते! तब क्यों नहीं दी जाती जब नारी पर खासकर पत्नियों पर हजारों फूहड़ हास्य चलते हैं । और तब क्यों नहीं दी जाती जब सरदारों को निहायत ही मूर्ख बताने वाले हास्य शोशल मीडिया पर धड़ल्ले से चलते हैं...।
तब तो सभी इन सबका समर्थन करने वाले मर्यादित लोग हास्य है यार ! हास्य में लो, गंभीरता से नहीं, कहकर खींस निपोर देते हैं।
यदि महज हास्य बस कुछ लाइनें इन दो दिनों से चल रहीं तो सभी अपना दिल बड़ा करिए सरदारों की तरह और इन हल्के फुल्के हास्य को चलने देकर महज मुस्कुरा लीजिए । इस तरह से लोगों की भवनाओं को भड़काकर जहर मत बोइए...😊सविता मिश्रा 'अक्षजा'

Friday, 19 April 2019

'यक्ष प्रश्न' लघुकथा की रचना प्रक्रिया

 
यक्ष प्रश्न 
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

"दिख रही है न! चाँद-सितारों की खूबसूरत दुनिया?" अदिति को टेलिस्कोप से आसमान दिखाते हुए शिक्षक ने पूछा।
"जी सर! ढेर सारे तारे टिमटिमाते हुए दिख रहे हैं।"
"ध्यान से देखो! जो सात ग्रह पास-पास हैं, वो 'सप्त ऋषि' हैं! और जो सबसे अधिक चमकदार तारा उत्तर में है, वह है 'ध्रुव-तारा'।”
“जिनकी कहानी माँ सुनाया करती हैं!”
“हाँ वे ही, राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव! जिन्होंने अपने अपमान का बदला कठोर तप करके सर्वोच्च स्थान को पाकर लिया |"
"सर! हम अपने निरादर का बदला कब ले पाएंगे? हर क्षेत्र में दबदबा कायम कर चुके हैं, फिर भी ध्रुव क्यों नहीं बन पाए अब तक?" अदिति अपना झुका हुआ सिर उठाते हुए पूछा।
शिक्षक का गर्व से उठा सिर अप्रत्याशित सवाल सुन करके झुक-सा गया।
17/4/2015
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
 आगरा (प्रयागराज)  
 2012.savita.mishra@gmail.com  
 ---००---

रचना प्रक्रिया 

एक फेसबुक ग्रुप में 'चित्र प्रतियोगिता' आयोजित की  गयी थी |  वहां दिए गए चित्र में  एक आदमी एक बच्ची को  से टेलिस्कोप कुछ दिखाने का प्रयास कर रहा  था | उसी  चित्र  को  देखकर चेतन  मन लघुकथा हेतु कथानक चुनने लगा |  अचानक  से  17 April 2015 को उस चित्र को देखकर हमारे दिमाग में ध्रुव तारा आया | जिसके साथ उस विषय में दादी-नानी द्वारा बताई गयी पौराणिक कहानी भी याद आई |  दिमाग में क्लिक हुआ कि लड़कियों के महती कार्य को कहकर हम उनकी होती उपेक्षा और निरादर दिखा सकते हैं | बस फिर क्या था कम्प्यूटर के किबोर्ड पर उँगलियाँ थिरकने लगीं | और अवचेतन मन में छुपा लडकियों के प्रति होता निरादर  'निरादर का बदला' नामक लघुकथा रूप में स्क्रीन पर उतरता गया |
कथोपकथन शैली को अपनाकर अपनी बात को कहना ज्यादा सरल था | जिसके कारण हमने इसी शैली को अपनाते हुए ही अपने अन्तर्द्वन्द को शब्दों में गढ़ा |
पहले ही ड्राफ्ट के साथ यह लघुकथा दो-तीन जगह छपी, जिसमें साहित्य शिल्पी वेबसाइट महत्वपूर्ण है | बाद में २०१८ में मेल में भेजते समय दिमाग ने कहा कि 'निरादर का बदला' से ज्यादा ‘यक्ष प्रश्न’ नामक शीर्षक मेरे विचारों को गति दे रहा है | इस बात के दिमाग में कौंधते ही हमने इसके शीर्षक में बदलाव कर दिया | क्योंकि लगा कि लड़कियों को उनका सम्मान कब मिलना, पूछना एक ‘यक्ष प्रश्न’ ही है, जिसका जवाब न अब तक मिला है और न ही शायद आगे भी कभी मिलेगा | साथ ही हमने इसके  वाक्य-विन्यास और अशुद्धियों को सही  किया | यानी की दूसरे ड्राफ्ट में ही यह  कथा वर्तमान स्वरूप  को प्राप्त  हुई |
 इसको सही करने या शीर्षक बदलने में  हमने  किसी की भी सलाह का सहारा नहीं लिया  |
आज २९/१०/२०२० को वाक्यविन्यास में थोड़ा परिवर्तन किया |
---००---

Monday, 4 February 2019

पारखी नज़र

"आज मेरा चाँद मुरझाया है, थक गयी हो क्या ?" ऑफिस से आते ही पत्नी को देख प्यार जताते हुए रमेश बोला |
"....."
"कहो तो माँ के लिए एक नर्स रख दूँ |"
"नहीं, नहीं ! माँ की सेवा करने में तो मुझे आनन्द आता है |"
"अच्छा जी, फिर क्या बात है ?"
"वह छोटी घर में लड़-झगड़कर अलग फ़्लैट में रहने लगी है ! आज दोपहर में फोन पर सारी बात बता रही थी | मन दुखी-सा हो गया सुनकर |"
"ओह, सूरत और सीरत में कितना फर्क होता है !"
"हु..!"
"लक्ष्मी ! आज तुम्हारे व्यवहार और सेवा भाव से मेरा बिखरा परिवार एक हो गया | लेकिन यह बताओ ! तुम और तुम्हारी बहन में जमीं-आसमां का फर्क कैसे है? वह भरे-पूरे परिवार में गयी थी, पर आज एक ही शहर में सब अलग-अलग रह रहे हैं | और वहीं तुम मेरे साथ रिश्तें में बंधी थी, परन्तु सब पर अपना जादू चलाकर पूरा बिखरा कुनबा जोड़ दिया तुमने | जो बड़ी भाभी पिछले पाँच सालों से जब से लड़कर गयी थीं, पलट कर नहीं आयी थीं | उन्हें भी तुमने इस परिवार में दूध-पानी-सा कर दिया | मेरी सब बहनें भी मिलने-जुलने आने लग गयीं | क्या कोई जादूगरनी हो क्या ?"
बोलता जा रहा था वह अपनी ही रौ में | पत्नी के मुख से एक भी शब्द न सुनकर उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला - "सुन रही हो मेरी जान..या..!" 
 एक आडियो गूँजा -
" ‘अपनी शक्ल देखी है आईने में!
‘क्यों ? मेरी शक्ल को क्या हुआ ! अच्छी भली तो हूँ |
'मेरी किस्मत खराब थी जो तू मुझे मिली, उस लंगूर को तेरी बहन | जो कितनी खूबसूरत है, काश वह मुझे मिल जाती, तो मेरी जिन्दगी संवर जाती '|"
"भूल जाओ न मेरी रानी, वह पुरानी बात |"
"क्या करूँ ! तुम प्रेम में बहुत बीमार हो जाते हो तो यह कड़वी डोज देनी पड़ती है मुझे |" कहकर खिलखिला पड़ी लक्ष्मी |
"वह मेरी नादानी थी | मैं उसके शारीरिक सुन्दरता पर मुग्ध हो उठा था | तुम्हारी आँतरिक सुन्दरता तो माँ ने देखा, तभी तो तुम्हें इस घर की बहू बनाकर वह ले आयीं |"
"हाँ, तुमने तो मुझे ठुकरा ही दिया था | माँ के कारण ही तो आज मैं तुम्हारे दिल पर राज कर रही हूँ !" बोलकर मुस्काते हुए वह चल दी माँ के कमरे की ओर |
--००---

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
3 January 2017

Tuesday, 11 September 2018

गहमर-साहित्यक-यात्रा

गहमर की धरती पर 8-9सितम्बर को अमृतवर्षा हुई ...आयोजन था 'अखिल भारतीय गोपाल दास गहमरी साहित्यकार सम्मेलन' जो की 'गहमर इंटर कॉलेज गहमर' जनपद गाजीपुर में हुआ। इस अमृतवर्षा का लाभ हम भी ले सके, यह हमारा सौभाग्य रहा..।
7 सितम्बर रात 2:15 पर ट्रेन पकड़े और भदौरा स्टेशन पर पहुँचे रात 11:30 बजे के आसपास। वहाँ पर अखण्ड भाई मिले फिर बाइक से उनके घर की ओर। कुल मिलाकर पूरे 22 घण्टे में पहुँचे गहमर की भूमि पर। जैसे-जैसे ट्रेन खच्चर हो रही थी वैसे-वैसे दिमाग में एक अजीबोगरीब डर बैठ रहा था। क्योंकि गाँव तो गाँव ही होता है कितना भी नामी-गिरामी हो या फिर मशहूर लोगों का ही क्यों न हो। शहरों की तरह सड़कों पर स्ट्रीट लाइटें तो नहीं ही मिलती ऊपर से सड़क खराब है! जाने से एक दिन पहले ही हम सुन चुके थे। खाना-पानी करके बिस्तर पर पड़े फिर अगले दिन सुबह छः बजे उठ गए। सुबह नाश्ता-पानी करके कार्यक्रम स्थल का जायजा लेने पहुँच गए जो कि सड़क पार करते ही स्थित था। वहाँ बच्चों को भाला फेंककर अभ्यास करते हुए देखना भी अच्छा लगा।
 कार्यक्रम थोड़ा देर से शुरू हुआ लेकिन देर आए दुरुस्त आए वाली स्थिति थी। गर्मी से बेहाल हुए जा रहे थे लेकिन अच्छा लगा सबको सुनकर। यह भी महसूस हुआ कि ऐसे आयोजनों में जाने पर ज्यादा शिष्टाचार निभाने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए सामने वाला आदमी आपको पीछे और पीछे करने के चक्कर में हो जाता है...खैर देखते हैं कि हम आयोजनों में अपनी भागीदारी करते हुए कब तक शिष्टाचार न छोड़ेने की कवायद कर पाते हैं।
लघुकथा वाचन में हमने अपनी लघुकथा भी पढ़ी। फिर शाम को कवि सम्मेलन में कविता पाठ भी किया। औरों को सुनकर अच्छा लगा सबसे अच्छा तब लगता है जब कई लोग बिना देखे ही कविता या कथा-कहानियां पढ़ लेते हैं, एक हम हैं कि मुंडी पेपर से उठती ही नहीं।
वाराणसी के स्कूल से आई लड़कियों ने बहुत अच्छी प्रस्तुति दी। डांस, गायन में कजरी, स्वागत गीत सब मन को लुभाने ले लिए पर्याप्त थे। और असम प्रदेश का डांस के तो क्या कहने, बेहद अच्छी प्रस्तुति रही वहां ले लोक-नृत्य की भी।

 सैनिकों के गांव में एक से बढ़कर एक न जाने कितने मोती दिखाई पड़े....कुछ मोती हमारे हाथ लगे कुछ छिटक गए..उन सब ज्ञानियों के बीच खुद को खड़ा देखकर अभूतपूर्व खुशी मिली जिसे शायद शब्दों में बयान नहीं कर सकते हैं...दो-चार-दस से मिलने का साहस भी नहीं जुटा पाए हम...। श्रवण भैया ने नाम लेकर कहा था कि मेरा दोस्त है वहाँ मिलेगा लेकिन उन्हें सामने पाकर सिर्फ अभिवादन करके रह गए | परिचय न दिए न बात ही कर पाए। सबसे बड़ी खुशी की बात यह भी रही कि अयोध्या से शास्त्री जी आए थे जिन्हें शासन द्वारा दो लाख का पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई है।
हमें इस बात का बड़ा अफसोस है कि एक बुजुर्ग शायद उसी गाँव की कोई प्रतिभा थी, वह कुछ सुनाना चाहते थे..हमसे 'माता जी' कहकर बोले थे अपनी बात लेकिन. जब तक हम उनकी बात समझते तब तक कोई उनसे कह चुका था कि कार्यक्रम समाप्त हो चुका कल आके सुनाना बाबा..कल यानी दूसरे दिन वह दिखे ही न...!
सुबह कार्यक्रम स्थल पर भी एक लड़का जो एयरफोर्स में जाना चाहता था और कवि सम्मेलन में भाग लेता रहता है जैसा कि उसने बताया, उसने अपनी तीन चार कविता सुनाई थी । काश ऐसे ही उन बुजुर्ग का मान रखते हुए हम उनसे भी सुन लेते, कुछ जो वो बोलना-गाना चाहते थे और मोबाइल में कैद कर लेते। इससे उनका मान भी रह जाता और हमें भी पछतावा न होता, खैर।

पहली बार कवि सम्मेलन में भाग लेने का सुअवसर मिला , संस्थाओं के आयोजनों में, संकलन के विमोचनों में और आगरा की साधिका समिति की बैठकों में कविता-पाठ करते रहे हैं पर ऐसे बड़े-बुजुर्गों-ज्ञानियों के बीच मंचासीन होकर कवि सम्मेलन का अनुभव पहली बार लिया..पहले से हमने अपना नाम भी नहीं दिया था लेकिन वहाँ रमेश तिवारी भैया ने पूछा फिर हमारा नाम लिख लिया । सच में बड़ा अजीब लगा । शायद पहली बार ऐसे मंच की जमीन पर बैठने के कारण लेकिन बहुत सुखद भी लगा और जब श्री सतीश राज पुष्करणा अंकल ने कहा कि बढ़िया कविता थी, तो हमारी प्रसन्नता की सीमा का अंदाजा भी कोई लगा नहीं सकता है...😊😊
लघुकथा वाचन-कवि -सम्मेलन और सम्मान पाकर अपार खुशी तो हुई ही, मेजबानों के आथित्य-सत्कार से भी मन गदगद हुआ😊
गर्मी से बड़े बेहाल भले हुए लेकिन गंगा मैया और कामाख्या देवी जी का दर्शन करके कलेजे को बड़ी ठंडक पहुँची।

दूसरे दिन सुबह गंगा मैया की सैर हुई बीना बुंदकी दीदी के सिवा किसी ने गंगा में डुबकी नहीं लगाई बस फोटो-शूट करने में लगे रहें।  उसके बाद कामाख्या माँ के दर्शन करने पहुँचे सब..वहाँ भी मैया के दर्शन और फोटो-पे-फोटो लिए गए..कई जनों से उधर वार्ता भी हुई। फोटोग्राफर से ग्रुप फोटो निकलवाई गयी जिसे लगभग सबने ही लिया, वह भी खुश हो गया होगा। फिर वहाँ से लौटकर नाश्ता किया गया। नाश्ते में लीट्टी बनी थी जो की न जाने कितने साल बाद खाई हमने। वार्तालाप और नाश्ता करने के बाद कार्यक्रम स्थल का रुख किया गया।
सम्मान पाकर किसे नहीं खुशी होगी अतः हमें भी 'पंडित कपिल देव द्विवेदी स्मृति सम्मान'  (समाज सेविका क्षेत्र में ) पाकर बहुत खुशी हो रही है...एक जन ने कहा था कि सविता तुम कब से सेविका बन गयी तो हमारा जवाब था  कि हम भारतवासियों के मूल में ही सेवा भाव है ।  विरला ही ऐसा कोई भारतवासी होगा जो जो भारतीयता के इस गुण से वंचित होगा। कुल मिलाकर गहमर की धरती पर आकर अपार खुशी मिली, इस महाकुंभ में आकर गंगा जल की कुछ बूंदें अवश्य ही अपने दिमागी कमंडल में आ पहुँची होगी और हम भी साहित्य के पथरीली जमीन पर चलने की कोशिश कर पाएंगे।
एक दो मोती ऐसे भी दिखे जिनकी चमक हमें आकर्षित न कर सकी ...फिलहाल मोतियों की माला के एक-एक मोती जो हमारे मोबाइल की गैलरी में गूंथे हुए हैं उन सबको उनके नाम के साथ पहचानने की कवायद जारी है...😊
आयोजन में हमें 'कपिल देव शास्त्री सम्मान' से सम्मानित करने हेतु जजों की टीम और अखंड गहमरी का धन्यवाद- कविता पाठ और लघुकथा पाठ के लिए मंच प्रदान करने क लिए भी आभार 😊😊
चाक-चौबंद व्यवस्था के लिए अखण्ड गहमरी भैया और उनके परिवार की प्रशंसा तो करना बनता है उनके सहयोगियों और उनके पूरे परिवार का हृदयतल से आभार । खासकर उनके बेटे और नन्हे से भतीजे का। सुबह हिन्दुस्तान अखबार में कवि-सम्मेलन खबर के साथ अपनी फोटो भी थी इससे और खुशी हुई शायद बड़ो-बड़ो को छोड़कर अंगार भाई के साथ हमारी फोटो इसलिए थी पत्रकार भाई सोचे होंगे ये आगरा के पगलखाने से भागकर आयी है इसकी तो फोटो लगा ही दो😀
आते-आते अखण्ड भैया के पिताजी से भी जरा-सी बात हुई ..फोटो भले न ले पाए उनकी लेकिन साथ में लेकिन मिलकर बात करके एक हस्ती लगे। उनका चेहरा भी रोबीले होने की कहानी कह रहा था। सबसे अच्छी बात लगी कि समारोह के मंच पर वह अपने वास्तविक परम्परावादी लिबास में रहें। वैसे तो धोती को लोग पीछे खोंसकर पहनते हैं लेकिन उन्होंने धोती को नार्मल कहिए या हम कहे कि तमिल स्टाइल में पहन रखा था उन्होंने तो आप सब अच्छे से समझ पाएंगे आप सब |
लौटने में भारत बंद आह्वान के कारण तनिक समस्या आयी हमें भदौरा के बजाय बक्सर से ट्रेन पकड़नी पड़ी लेकिन ओमप्रकाश क्षत्रिय भैया का साथ था अतः चिंतामुक्त थे । कुलमिलाकर 10 सितम्बर 11 बजे गहमर से निकलकर 11 सितम्बर की सुबह 8 बजे अपने घर को आ गए। ट्रेन में भी वाराणसी से पंडित जनों का झुंड बैठा था शाम ढलते ढलते पता चला सब प्राचार्य हैं और साथ-साथ कवि भी।
ऐसे सहित्यक महाकुंभ से वापस आने के बाद अपने आप से कहना पड़ता है कि सविता कुछ बढ़िया से लिखना- पढ़ना सीख ले..ऐसे आयोजनों में तेरी स्थिति डांट खाने से पहले वाले कालिदास सरीखी न हो....चार दिन अपने को ऐसे ही समझाने हुए पाँचवे दिन फिर सब दिन जात एक समान हो जाता है...खैर जब तक हम जागे या न भी जागे , आप सब महाकुंभ में चमकते चेहरों को निहारिए...और पहचानिए😊😊...सविता मिश्रा 'अक्षजा'













Monday, 3 September 2018

'चुनिंदा लघुकथाएँ' साझा-संकलन-


'चुनिंदा लघुकथाएँ' साझा-संकलन -रवीना प्रकाशन
सम्पादक-ओमप्रकाश क्षत्रिय भैया
प्रकाशन समय -जून २०१८
"तोहफ़ा" #लघुकथा के साथ 'चुनिंदा लघुकथाएँ' सांझा-संकलन में भी उपस्थित हैं हम। आभार सम्पादक ओमप्रकाश क्षत्रिय भैया का --००--
 'तोहफ़ा' लघुकथा इस लिंक पर उपलब्ध --
http://kavitabhawana.blogspot.com/2017/11/blog-post_27.html
लेखिकीय पुस्तक नहीं दी गयी |

साझा-लघुकथा-संग्रह (व्योरा)

पिछले दस लघुकथा-संकलन में आज १/९/२०१८ तक कुल छः और #साझा-लघुकथा-संग्रह पुस्तक रूप में जुड़ गयी हैं |

१--"उद्गार" लघुकथा-संकलन- वनिका पब्लिकेशन फरवरी २९१८ में ..
https://kavitabhawana.blogspot.com/2018/03/blog-post.html

२--- 'चुनिंदा लघुकथाएँ' साझा-संकलन -रवीना प्रकाशन जून २०१८
http://kavitabhawana.blogspot.com/.../blog-post_28.html...

३--'अभिव्यक्ति के स्वर' लघुकथा-संकलन--'हिन्द युग्म' से प्रकाशित जुलाई २०१८
https://kavitabhawana.blogspot.com/.../blog-post_2.html...


४--'नयी सदी की लघुकथाएँ' लघुकथा-संकलन- 'नवशिला प्रकाशन' से प्रकाशित जुलाई २०१८
http://kavitabhawana.blogspot.com/2018/09/blog-post_3.html

५--लघुत्तम-महत्तम लघुकथा-संकलन-अभ्युत्थान प्रकाशन अगस्त २०१८

http://kavitabhawana.blogspot.com/2018/09/blog-post_1.html

६--लघुकथा अनवरत --अयन प्रकाशन सितम्बर २०१८

लघुत्तम-महत्तम लघुकथा-संकलन (साझा)

लघुत्तम-महत्तम लघुकथा-संकलन-अभ्युत्थान प्रकाशन
संपादिका -महिमा 'श्रीवास्तव' वर्मा
प्रकाशन समय - अगस्त २०१८
लघुकथा के १४वें संकलन में मेरी 'तीन' लघुकथाओं को स्थान दिया गया है | संपादिका महिमा 'श्रीवास्तव' वर्मा का आभार।
१--एक बार फिर
२--वेटिकन सिटी
३--इज्ज़त
--००--
एक बार फिर

"कहाँ आगे-आगे बढ़े जा रहे हो जी', मैं पीछे रह जा रही हूँ |"
"तुम हमेशा ही तो पीछे थी |" पार्क से बाहर निकलकर पति ने कहा |
"मैं आगे ही रही !" पत्नी पति के बराबर आकर बोली |
"अच्छा ..!"
"और चाहूँ तो हमेशा आगे ही रहूँ, पर तुम्हारे अहम को ठेस नहीं पहुँचाना चाहती हूँ, समझे !"
"शादी वक्त जयमाल में पीछे रही...!"
"डाला जयमाल तो मैंने आगे !"
"फेरे में तो पीछे रही..!"
"तीन में पीछे, चार में तो आगे रही न !"
"गृह प्रवेश में तो पीछे..!"
"जनाब ! भूल रहे हैं, वहां भी मैं आगे थी | "
इसी आगे पीछे को लेकर एक-दूजे से नोंकझोक करते हुए ही बेफिक्र हो बाइक से घर की ओर जा रहे थे | सुनसान रास्ते पर बदमाशों ने उनकी बाइक को रोककर तमंचा तान दिया - "निकालो सारे गहने" चीखा एक |
पत्नी को अपने पीछे कर, पति बदमाशों से भिड़ गया |
जैसे ही घोड़ा दबा, उसकी बाहों में झूलती हुई पत्नी मुस्करा कर बोली- " लो जी ! यहाँ भी मैं आगे ..!" सावित्री-सी होने का अहम उसके चेहरे पर तारी होने को था |
"ऐसे-कैसे मेरी शेरनी ! मैं तो रेड बेल्ट पर ही अटक गया था, तू तो ब्लैक बेल्ट थी | इतने में ही हिम्मत टूट गयी !
सुनकर वह दहाड़ी | बाह में गोली लगने के बावजूद पति के हमकदम हो लड़ी थक के चुकते दोनों इससे पहले ही सायरन की आवाज़ गूंजने लगी | बदमाशों के रफूचक्कर होते ही दोनों एक दुसरे के बाँहों में मुस्कराकर बोले हम साथ-साथ हैं, न आगे न पीछे |"
--००--सविता मिश्रा 'अक्षजा'

२--वेटिकन सिटी इस लिंक पर --
http://kavitabhawana.blogspot.com/2015/05/blog-post_15.html
३--इज्ज़त इस लिंक पर --
http://kavitabhawana.blogspot.com/2017/05/blog-post_12.html

'नयी सदी की लघुकथाएँ' लघुकथा-संकलन

'नयी सदी की लघुकथाएँ' लघुकथा-संकलन- 'नवशिला प्रकाशन' से प्रकाशित
सम्पादक- अनिल शूर आजाद
 प्रकाशन समय - जुलाई २०१८
 लघुकथा के १3वें संकलन में मेरी 'दो' लघुकथाओं को स्थान दिया गया है | सम्पादक डॉ.अनिल शूर आज़ाद का आभार।
 १--मन का चोर
 २--दूसरा कन्धा
 --००--
 १--मन का चोर
 सही ---
https://kavitabhawana.blogspot.com/2014/09/blog-post_87.html
 पहले वाली --
https://kavitabhawana.blogspot.com/2014/08/blog-post_19.html
२--दूसरा कन्धा
http://kavitabhawana.blogspot.com/2015/03/blog-post.html

Sunday, 2 September 2018

'अभिव्यक्ति के स्वर' लघुकथा-संकलन


'अभिव्यक्ति के स्वर' लघुकथा-संकलन - 'हिन्द युग्म' से प्रकाशित
सम्पादक- विभा रानी श्रीवास्तव
प्रकाशन समय - जुलाई २०१८
लघुकथा के १२वें संकलन में मेरी 'पाँच' लघुकथाओं को स्थान दिया गया है | सम्पादक विभा रानी श्रीवास्तव दीदी का आभार।
१--मूल्य (बेटी)
२--वर्दी
३--ग्लानि 
४--गिरह
५--टीस 
--०००--
१--मूल्य इस लिंक पर ---
https://kavitabhawana.blogspot.com/2016/12/blog-post.html
२--वर्दी इस लिंक पर ---अविराम साहित्यिकी के जुलाई-सितम्बर २०१७ में छपी है यह लघुकथा --

३--
ग्लानि

" बेटा! अच्छा हुआ जो तू आ गया तेरे बाबा, जब से तेरे पास से लौटे हैं, गुमसुम से रहने लगे हैंक्या हुआ ऐसा वहाँ?"
"कुछ नहीं अम्मा!"
"कुछ तो हुआ ही होगा! रोज जितनी हिम्मत होती है, खेत में जाकर पेड़-पौधे लगाते रहते हैं गाँव वालों से भी उस सूख गए गड्ढे को खोदकर फिर से तालाब बनाने की गुजारिस करते फिर रहे हैं"
"तेरा पोता सुशील, अब बड़ा हो गया है अम्मा! और तू जानती है, वो बचपन से ही स्पष्ट-वक्ता रहा है"
"तो क्या उसने इन्हें कोई चुभती हुई बात कह दी! वरना जो आदमी एक तुलसी का पौधा न रोपा कभी, वह दिन में दो-चार पेड़ लगा दे रहा! तूने उसे कुछ बोला नहीं?"
"उसने कुछ गलत न बोला अम्मा, तो उससे क्या कहता मैं बल्कि मैं खुद बदलते वातावरण से परेशान हूँ, रिटायर होते ही इस ओर ध्यान दूँगा"
"बात तो बता बेटा, पहेलियाँ काहे बुझा रहा है? उसने ऐसा क्या कहा तेरे बाबा को?"
"उसने बाबा को फालतू पानी बहाते देख कह दिया कि दादाजी! एक दिन में बस पांच सौ लिटर पानी मिलता है इस तरह पानी की बर्बादी करेंगे, तो कैसे काम चलेगा' और..!"
"और ...कुछ और भी बोला! इतना बड़ा हो गया है क्या?" विस्मित-सी होकर अम्मा बोली
"और उसने बाबा से कह दिया कि आपके दादा-परदादा पेड़-पौधे लगाकर वातावरण को हरा-भरा रखे आप की पीढ़ी ने बैठे-बैठे उसके खूब मजे लूटे अब आपकी पीढ़ी की निष्क्रियता के दंड हम लोग भुगतेंगे ही' उसकी इन्हीं बातों से, बाबा क्रोधित होकर वहाँ से अकेले ही चले आए"
"हाय राम! उसने इतना कुछ कह कैसे दिया !"
"अम्मा! दादा-परदादा के लगाये पेड़-पौधे आंधी से उजड़ते रहे, हम उन्हें बेचते गए तालाब भी पाटकर बस्ती बसा डाली अब तक मन माफ़िक पानी की बर्बादी भी होती रही | कुएँ का भी जलस्तर गिरता जा रहा है अब इन सब का खामियाजा नई पीढ़ी को तो भुगतना ही पड़ेगा और वो इसी तरह झल्लाते हुए अपने पूर्वजों को कोसते रहेंगे.!” कहकर चिंतामग्न हो गया
थोड़ी देर बाद फिर बोला- "अम्मा! कल बाबा के साथ मैं भी पेड़ लगवा आऊँगा बस उनकी देखरेख तुम करती रहना"
"कई बार मैंने कही कि पुराने पेड़ धीरे-धीरे गिरते जा रहे हैं, लगा दीजिए कुछ फलों के पेड़ मेरे कहने से तो सुने नहीं कभी! अच्छा हुआ जो पोते ने चोट दी! अब उसकी दी हुई चोट की ओट में, जमीन की खोट दूर हो जाएगी कितने बीघे जमीन बंजर होने को थी"
---००---
Jul 31, 2016 obo
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
 
४--गिरह इस लिंक पर --

टीस

"अँजुली में गंगाजल भरकर यह कैसा संकल्प ले रहे हो रघुवीर बेटा? इस तरह संकल्प लेने का मतलब भी पता है तुम्हें!" गंगा नदी में घुटनों तक पानी में खड़े अपने बेटे को संकल्प लेते देख पूछ बैठा पिता।
"पिताजी! आप अन्दर-ही-अंदर घुलते जा रहे हैं। कितनी व्याधियों ने आपको घेर लिया है। नाती-पोतों की किलकारियों से भरा घर, फिर भी आपके चेहरे पर मैंने आज तक मुस्कराहट..।"
आहत पिता ने कहा- "बेटा! अपने नन्हें-मुन्हें बच्चों को बिलखता हुआ छोड़कर कोई माँ कैसे जा सकती है! इस कैसे-क्यों का प्रश्न मेरे जख्मों को भरने ही नहीं देता।"
"पिताजी तभी तो..!"
पिता बेटे की बात को बीच में काटते हुए बोले- "बेटा! पैंतीस सालों में परिजनों के कटाक्ष को दिल में दफ़न करना सीख गया हूँ मैं। उसके जाने के बाद समय के साथ समझौता भी कर लिया था मैंने। हो सकता है उसके लिए उस व्यक्ति का प्यार मेरे प्यार से ज्यादा हो! इसलिए वो मेरा साथ छोड़कर, उसके साथ चली गयी हो।" 
"मैं उन्हें ...!" 
बेटा क्रोध में बोल ही रहा था कि पिता ने दुखी मन से कहा -"फिर भी बेटा! मैं सब कुछ भूलना चाहता हूँ! परन्तु यह समाज मेरे जख्म को जब-तब कुरेदता रहता है।"
"समाज के द्वारा आप पर होते कटाक्ष की इसी ज्वाला में जलकर तो मैं आज संकल्प ले रहा हूँ। मैं माँ का मस्तक आपके चरणों में ले आकर रख दूँगा पिता जी, बिलकुल परशुराम की तरह।"
"बेटा! गिरा दो अँजुली का जल तुम परशुराम भले बन जाओ, पर मैं जमदग्नि नहीं बन सकता हूँ।"
--००---
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा
November 30, 2015 obo में ..
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Wednesday, 15 August 2018

आरक्षण का तीर

आप सब विद्वानों में हम बहुत छोटे हैं घर-गृहस्थी के दायरे में बन्द, लेकिन फिर भी विचार देने धृष्टता कर रहे हैं....,🙏

आरक्षण वह औजार है जिससे देश की प्रगति-गौरव की नाव में लगातार छेद-पर-छेद किया जा रहा। अब तो धीरे -धीरे ये नाव डूब रही है और नाव को ठीक करने वाले खुद को कोसते हुए किनारे खड़े उसको डूबता हुआ देख रहे हैं।
एक दिन आएगा जब सब पछतायेंगे लेकिन तब पछताने से आखिर होगा क्या । मेरे भारत सोन चिरैया के पंख फिर से नोंच लिए जाएंगे। नोंचने वाले गैर नहीं अपने ही होंगे। कुछ कुर्सी के मद में नोचेंगे, कुछ कुर्सी न पाने की कोफ्त में। हर हाल में चोट तो अपने देश को ही लगेगी।

जाति-जाति करते-करते लुट गया अपना तो देश
प्रतिभाएं पलायन करके बस रही जाकर परदेश । सविता मिश्रा 'अक्षजा'

शब्द निष्ठा हवाट्स एप ग्रुप पर आज अभी-अभी लिखकर डाले...15/8/2018

Wednesday, 8 August 2018

दृष्टि महिला लघुकथा-विशेषांक

दृष्टि पत्रिका  को पढ़ते हुए अपनी दृष्टि...😊


सब नामों में जी-जी लगाकर हमारे मत को पढ़ना
हमें उदंड, असंस्कारी कहकर कोई नाराज मत होना । ------

बलराम मेहनत करके किए एक असाधारण खगोलीय खोज
 कोने-कोने से खोज लिए महिलाओं की एक लंबी-सी फौज ।

 मार्टिन जान ने चार - चांद का कराया हमें दृष्टि-भान
उनके रेखा-चित्रों ने  नव-दृष्टि का दिया हमको वरदान।

 माधव नागदा ने हमारी कमी को लिया जैसे ताड़
 हमने भाषा का इंद्रधनुष पढ़ा कई-कई बार ठाढ़।

 लता के प्रश्नोत्तरी तो अब हमें बड़ा ही लुभाते हैं
शकुंतला के जवाब हमारा पथ-प्रदर्शन करवाते हैं ।

 अशोक भाटिया ने जिस-जिस लघुकथाओं का किया जिक्र
उन्हें पढ़ने के लिए हमने किया यत्र-तत्र ही अथक परिश्रम ।

 दो-चार भी न मिली कहीं पर वो लघुकथाएं हमको
 अशोक वाटिका में भटक दृष्टि में हम पुनः अटको।

 दृष्टि ने महिलाओं के भावनाओं की सच्ची-सुंदर-प्यारी कश्तियां बनाई
अशोक-कांता ने महिला विशेषांक के समुंदर में उन्हें बड़े करीने से तैराई।

दृष्टि महिला-विशेषांक की  लघुकथाओं का किया जो हमने मनन
 लगा घर-गृहस्थी की दहलीज भीतर कर रहीं हों वो अभी बतकुचन।

लघुकथाओं का सार जो भी निकले बस निकलता ही रहें
दृष्टि लघुकथा का विशेषांक यूँ ही सदा फलता-फूलता रहें। 😊😊

आभार शुक्रिया
 सविता मिश्रा 'अक्षजा'
 

Thursday, 26 July 2018

कुछ तो है- ('परिंदों के दरमियां')

कुछ तो है, नहीं ! नहीं! बहुत कुछ है नवोदित लघुकथाकारों के लिए 'परिंदों के दरमियां' किताब में 😊
कभी-कभी कुछ किताबें पढ़कर आदमी मौन रह मनन करता रहता है, और करना भी चाहिए। बोलने के बजाय उस पुस्तक की बातों को मनन करना या फिर उसमें कहीं बातों के विषय में खुद से वाद करना लेखक से विस्तृत रूप में कहने से ज्यादा अच्छा है।
फिलहाल 'परिंदे पूछते हैं' हाईस्कूल की बोर्ड की तैयारी करने जैसा है तो 'परिंदों के दरमियां' को पढ़ना इंटर की बोर्ड परीक्षा पास करने के लिए बहुत जरूरी है। दोनों किताबें आपको उतना लाभ पहुँचाने में सक्षम है जितना आप मन से पढ़ेंगे। बस परीक्षा पास होने के लिए यानी सिर्फ और सिर्फ सतही लघुकथा लिखना है तो किताब के पन्नों पर सिर्फ सरसरी निगाह डालने भर से आपका काम हो जाएगा। लेकिन कुछ गूढ़ कथाएँ लिखनी है तो ऐसी पुस्तकें आपको लिखने में बहुत मदद करती हैं |

 यदि बढ़िया शिल्प-शैली की कथाएँ लिखनी है तो मन लगाकर लघुकथा को समझने वाली पुस्तक  'परिंदों के दरमियां' पढ़ें और पढ़ें और पढ़ते रहें ! फिर मनन करें।
 एक अच्छा शिक्षक यह जरूर कहेगा कि रट्टू तोता होकर परीक्षा में न बैठें । पढ़े फिर खुद से समझे, फिर चिंतन करके आगे बढ़े।
बस बलराम भैया के सम्पादन में छपी हुई 'परिंदों के दरमियां' किताब को पढ़ते-पढ़ते यही विचार आया। यदि वह विस्तृत रूप से हमें कहेंगे तो वह भी हम लिख सकते हैं लेकिन हम चाहेंगे कि पत्ता गोभी को परत-दर-परत खोलकर , अरे हमारा मतलब है इस किताब के हर पन्ने को लघुकथा के सहपाठी खुद ही पढ़कर महसूस करें तो बेहतर है। उनके आगे गोभी की पूरी परतें खोलकर हम क्यों रखें भला।
दोनों ही पुस्तक बार-बार पढ़कर मनन करना ही चाहिए, ऐसा हमें लगता है। फिर पढ़िए और बढिए सब |

सविता मिश्रा 'अक्षजा'

Saturday, 21 July 2018

अलविदा😢 न कहना!

हिंदी साहित्य का दरख़्त धराशायी हो गया बीमारी के कारण, नहीं तो शायद अभी और कुछ साल तनकर खड़ा हो अपने गीतों के जरिये झूमता। श्रधांजलि💐#अक्षजा
लिखे जो खत तुझे, तेरी याद में...!😢

Monday, 16 July 2018

'मात' से 'शह' -

अपने लॉन में झूले पर झूलते हुए चाय पी रही थी कि उसकी नजर उस चोटिल पक्षी पर गयी | जो अपने पंखो को फैलाकर, बारम्बार उड़ने की कोशिश करता हुआ गगन को चुनौती देने को बेताब था | उस पक्षी की प्रतिबद्धता देखकर नीता मुस्करा पड़ी | मुस्कराहट अभी चेहरे पर फ़ैल भी नहीं पाई थी कि अतीत ने दबिश डाल दी |

"बेटा, अभी देख रहे हैं ! शादी थोड़ी कर रहे हैं तेरी! शादी तय होने में भी समय लगता है | तेरे साँवले नयन-नक्श के कारण दो-तीन ने सीधे मना कर दिया | पच्चीस-पचास लाख दहेज देने की तो हैसियत है नहीं अपनी |" माँ की चिंता, विवशता और दलीलें ।

"माँ, शादी बिना भी जिन्दगी चलती है | मुझे आगे पढ़ना है |"   नीता कहती।
"तेरे दिल की बात जानती हूँ ! मैं भी चाहती हूँ कि तू पढ़कर कोई दमदार नौकरी हासिल कर ले, फिर देखना यही नकारने वाले खुद आएंगे तेरा हाथ माँगने |" माँ के समर्थन और आश्वस्त करते ममता भरे शब्द नीता को राहत देते!
फिर कुछ सालों बाद घर-मोहल्ले तथा उसकी कार्यशाला के सहकर्मियों द्वारा तिल-तिल करके घुलने को मज़बूर करते ताने!

"न शक्ल, न ही सूरत! कौन शादी करेगा?" आत्मा तक को भेदने वाले, भाभी के मुख से निकले हृदयभेदी तीर!
"शादी नहीं करोगी, तो फिर क्या करोगी?" बाइक के फटे साइलेंसर की तरह निकला बड़े भाई का चुभता हुआ सवाल!
"उसी वक्त तो मैंने छोड़ दिया था, भैया का वह संसार |" चाय का घूँट लेती हुई वह बुदबुदाई ।

उन दिनों जब कभी अतीत का तूफान वर्तमान में आकर उसके पग पखारता था तो वह पर कटे पक्षी की तरह तड़प उठती और मायूस हो चाय लेकर बालकनी में आकर आराम-कुर्सी पर पसर जाती थी | अपने एक कमरे के फ्लैट में कैद हो एकटक प्रकृति-सौन्दर्य को निहारती रहती थी | झुण्ड से अलग किसी पक्षी को दूर गगन में उड़ान भरते देखती तो हिम्मत-सी बंध जाती थी उसकी |

कई साल उसके द्वारा की गई कड़ी मेहनत, पत्थर पर घिसी मेहँदी-सी महक उठी थी | एक एनजीओ ज्वाइन करने के बाद देश क्या विदेश से भी अब उसे नारी-जाति को मार्गदर्शन देने के लिए बुलाया जाता था | जिस शक्लोसूरत को  देखकर लोग कभी मुँह फेरते थे, आज उसके साथ तस्वीर लेना अपना अहोभाग्य मान रहे थे | मुस्कराती हुई तस्वीर खिंचाती थी लेकिन बैकग्राउंड में बीती जिन्दगी का समुद्री लहरों-सा शोर उफान मारता रहता था |

आहट से तन्द्रा भंग हुई तो देखा कि सामने बालों में सफेदी लेकिन चेहरे पर लालिमा लिए पैंतालीस-पचास साल का युवा खड़ा था |

"जी, क्या चाहिए आपको ! मैं औरतों की खैरख्वाहो में गिनी जाती हूँ | आपकी क्या मदद कर सकती हूँ ?"
"मैं अपनी गलती सुधारने आया हूँ |"
"गलती..! कैसी गलती ?"
"दो दशक पहले आपसे शादी न करने की |"
झूलता हुआ झूला अचानक ठहर गया |
"आपकी गलती सुधारने के लिए मैं कोई गलती क्यों करूँ।" तनकर खड़ी हो, आँखे तरेरती हुई बोली।
उस व्यक्ति के जाते ही नीता ने देखा कि गगन में वह किंचित घायल पक्षी भी गर्वान्वित हो इठलाने लगा था। उसे देखकर मंद-मंद मुस्करा पड़ी नीता ।
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मौलिक तथा अप्रकाशित
 सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा २८२००२
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