Sunday, 22 May 2022

समीक्षक अशोक अश्रु

वरिष्ठों का आशीष मिलता रहे यूँ ही और क्या चाहिए

😊😊😊
आप सब भी पढ़िए हो सके तो---👇👇
समीक्षा : 'रोशनी के अंकुर '
लेखिका: सविता मिश्रा 'अक्षजा'
मैं आप से बात कर रहा हूँ लेखिका श्रीमती सविता मिश्रा 'अक्षजा' की पुस्तक 'रोशनी के अंकुर' लघुकथा संग्रह की जो निखिल पब्लिसर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स आगरा से प्रकाशित हुआ है। जब हम इस संग्रह के आवरण पृष्ठ को देखते हैं तो आवरण पृष्ठ की धरा पर एक प्रकाश पुंज दृष्टिगोचर होता है ।जो कहीं न कहीं अंकुर से ही प्रस्फुटित हुआ है जो कह रहा है कि समग्र सृष्टि का बीज रूप अंकुर ही है तथा जहाँ से प्रकृति का उद्गम हुआ है। आवरण के पृष्ठ भाग पर लेखिका का परिचय है। जब मैं उनका परिचय पढ़ रहा था या यूँ कहूँ कि मैंने अनुभव किया कि वह जो हैं वही दीखना चाहती हैं। किसी तरह का कोई आडम्बर नहीं। अधिकाधिक महिला लेखिकाएँ अपने जन्म का वर्ष नहीं लिखतीं पर यहाँ ऐसा नहीं है। परिचय मैं उन्होंने अपने माता-पिता, पति एवं बच्चों का जिक्र किया है। जब मैंने पुस्तक खोली तो यह पुस्तक उन्होंने अपने स्वर्गीय सास-ससुर को समर्पित की है। मेरे कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि वह अपने परिवार अपने रिश्तों के प्रति निष्ठावान हैँ तथा संस्कारों के प्रति सजग हैं।
आज का पाठक बड़े बड़े उपन्यासों एवं कहानियों की तुलना में लघुकथाओं की ओर अधिक आकर्षित है। कारण स्पष्ट है कि आज की भागमभाग जिंदगी में उसके पास समय कम है।वह कम समय में अधिक से अधिक मनोरंजन चाहता है वहाँ लघुकथाएं अपना स्थान बनाने में सफल रही हैं। पद्य में जिस प्रकार दोहा या शेर को दो पंक्तियों में बड़ी से बड़ी बात कहने की महारथ प्राप्त है उसी प्रकार लघुकथा को गद्य में वही स्थान प्राप्त है। ये कुछ क्षणों में पाठक की हमराही बन जाती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि लघुकथाएं कुछ शब्दों में ही अपनी भाव प्रवीणता के कारण पाठक के मन को गुदगुदाने लगतीं हैं तथा कुछ समय में ही पाठक की पाठन क्षुधा को तृप्त कर देतीं हैं।
'रोशनी के अंकुर' एक सौ एक मोतियों की माला है।जिसके हर मोती में आब है तथा हर मोती की महत्ता है। ये एक सौ एक लघुकथाएं संग्रह के एक सौ अड़तीस पृष्ठों में हैं अर्थात अधिकाधिक कथाएं एक पृष्ठ के अंदर ही पूर्ण हो गई हैं। इस प्रकार ये लघुकथाएं वास्तव में लघु रूप में हैं। लघुकथाओं के सन्दर्भ में विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न परिभाषाएं दी हैं।मेरा मानना तो यही है जो कि जो लघुकथा पाठक मन को झंकृत करदे या जो कथाकार कह रहा है वह मानव मन की गहराइयों में उतर कर अपना घर बनाले वही कथा श्रेष्ठ है। लेखिका ने इस सन्दर्भ में बहुत ही सच्चाई से श्रम किया है। उनकी अधिकतर लघुकथाएं भावनात्मक और मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत हैं। जो रोजमर्रा के जीवन में घटने वाली घटनाओं को अपने अंदर समेटे हुए हैं। इसीलिए पाठक को लघुकथाओं के चरित्र अपने आसपास के ही महसूस होते हैं। जिसके कारण वह उनसे शीघ्र तारतम्य स्थापित कर लेता है। यही अक्षजाजी के इस लघुकथा संग्रह का विशेष गुण है।
जिस प्रकार पारखी के माध्यम से कुछ दानों से ही बोरी में भरे अनाज के गुणों की पहचान करली जाती है। उसी प्रकार मैं भी 'रोशनी के अंकुर' संग्रह की कुछ लघुकथाओं का जिक्र करूंगा। उनकी लघुकथा 'कागज का टुकड़ा' दाम्पत्य जीवन के खट्टे-मीठे प्रसंगों को लेकर लिखी गई है। इस लघुकथा के माध्यम से लेखिका यह संदेश देने में पूरी तरह सफल रही हैं कि कभी-कभी जो आँखें देखती हैं वह सत्य नहीं होता। इसलिए मन की आँखें खोलकर देखना और समझना परमावश्यक है। इसी प्रकार लघुकथा 'तुरपाई' में लेखिका यह संदेश देने में पूर्णतः सफल रही हैं कि बेटी का घर बनाने में बेटी की मां का बहुत बड़ा योग रहता है। इस कथा में मां अपनी बेटी को एक दृष्टांत के माध्यम से उचित सीख देकर उसे उसकी ससुराल वापिस भेज देती है। जिससे बेटी का घर बिगड़ने से बच जाता है। जब मैं इस संग्रह की लघुकथा 'अभिलाषा' पढ़ रहा था। उस समय मेरे मन में अयोध्या सिंह उपाध्याय'हरिऔध' की कविता 'एक बूंद' घुमड़ने लगी। जिसमें एक बूंद बादलों से निकल कर आगे बढती है तो स्वयं से प्रश्न करने लगती है। "हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढी ।" इसी प्रकार अभिलाषा लघुकथा में टूटी हुई चूडियां भट्टी में पुनः तपने जाने से पूर्व आपस में चिंतन करने लगती हैं कि भविष्य में हमारा क्या होगा। पता नहीं हम किसके हाथ की चूड़ियाँ बनेंगे। लघुकथा 'मन का बोझ' के माध्यम से लेखिका ने समाज को यह सीख दी है कि कभी कभी हम रास्ते में हुए एक्सीडेंट को देखकर भी उसे अनदेखा करके आगे बढ जाते हैं।जबकि हमारा धर्म एवं कर्तव्य यह होना चाहिए कि हम उसके प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करें तथा पुलिस को सूचित करें।इस कथा का पात्र दुर्घटना देखकर भी बिना रुके चला जाता है। बाद में उसे मालूम पड़ता है कि उसी के पुत्र का एक्सीडेंट हुआ था यदि तुरत उपचार मिल जाता तो शायद उसके प्राण बच जाते। मैं इस संग्रह की लघुकथा 'सच्ची सुहागन' पर कुछ न कहूँ तो मेरी बात अधूरी रह जाएगी। यह लघुकथा एक गरीब परिवार की व्यथा कथा है। इस लघुकथा के द्वारा लेखिका ने बहुत ही मार्मिक ढंग से इस तथ्य को उजागर किया है कि एक गरीब परिवार की अभिलाषाओं और इच्छाओं का आर्थिक विपन्नता के कारण किस प्रकार गला घुटता है। मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि इस संग्रह की अधिकाधिक लघुकथाएं संदेशपरक एवं सकारात्मक सोच के साथ साथ समाज का नग्न चित्रण करने से भी नहीं चूकी हैं। इसी प्रकार लेखिका ने 'इज्ज़त' 'समय का फेर' 'वर्दी' 'बिन मुखौटे के' 'आत्मसम्मान' 'देश' 'बेटी' 'नशा' 'इतिहास दोहराता है' 'रौशनी' 'भाग्य का लिखा' आदि लघुकथाएं समाज में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करती हुई दीखतीं हैं।
सविता मिश्राजी ने समाज में घटने वाली घटनाओं के हृदय पटल पर बनने वाले बिम्बों के मंथन से निकले नवनीत को ही अपनी लघुकथाओं की विषय वस्तु बनाया है।जो यथार्थ के करीब हैं और उद्देश्यपरक हैं।उन्होंने अपने आसपास जो देखा है और अनुभव किया है उसी का सार 'रोशनी के अंकुर' के रूप में हमारे सामने है।आप संस्कारों के प्रति जिद्दी हैं इसकी झलक भी उनकी लघुकथाओं में मिलती है। सरल भाषा में आपको बड़ी से बड़ी बात कहने की महारथ प्राप्त है। आपका जन्म इलाहाबाद में हुआ है और वहीँ आप पढ़ी- बढ़ी हैं इसलिए वहाँ की मिट्टी की सुगंध आपकी भाषा में घुलमिल गई है जिससे आपकी भाषा शैली में मिठास बढ़ गया है।
इस संग्रह की एक दो लघुकथाओं को छोड़ दें तो यह एक सशक्त लघुकथा संग्रह है। ईश्वर करे कि 'अक्षजाजी' की लेखिनी इसी खूबसूरती के साथ सक्रिय रहे। भविष्य में शीघ्र और भी उनकी पुस्तकें देखने को मिलें। ऐसी रचनाएँ साहित्य की निधि होती हैं, जो साहित्य को सही अर्थों में 'साहित्य' होने का गौरव प्रदान करती हैं।
समीक्षक
अशोक अश्रु
सम्पादक: संस्थान संगम मासिक पत्रिका, आगरा ।
मो.9870986273

*रिश्तों की सच्चाई को संवेदना के स्तर पर उधेड़ती सशक्त लघुकथाएं* समीक्षा

 2 वर्ष के बाद पुनः #लघुकथा संग्रह- '#रोशनी_के_अंकुर' की समीक्षा के साथ

😊😊

पुस्तक समीक्षा
*रिश्तों की सच्चाई को संवेदना के स्तर पर उधेड़ती सशक्त लघुकथाएं*
समीक्षक: डाॅ. अखिलेश पालरिया
आगरा निवासी सविता मिश्रा 'अक्षजा' का लघुकथा संग्रह- 'रोशनी के अंकुर' समाज में व्याप्त उन तमाम विद्रूपताओं, विषमताओं व असमानताओं का यथार्थ चित्रण है जिन्हें पढ़कर मस्तिष्क उद्वेलित होता है, मन में संवेदनाओं का ज्वार उमड़ता है तो खलनायकों के प्रति आक्रोश भी फूट पड़ता है।
इसमें कोई शक नहीं कि संग्रह का फलक विस्तृत है, जहाँ रोशनी के अंकुर मनमाने तरीके से अवांछित बादलों को चीर कर प्रस्फुटित हो जाते हैं।
इन 101 लघुकथाओं में कुछ का विषय काॅमन जरूर है लेकिन स्वर अलग-अलग हैं जो कभी बाँसुरी की तरह रिश्तों को सहेजते हैं और कभी ढोल-नगाड़ों की भाँति कानों में गूँजते हैं तथा लघुकथाओं की साफगोई व उद्देश्य से पाठकों को परिचित कराते हैं।
लघुकथाओं के केन्द्र में मुख्यतः विवश स्त्रियों की दास्तानें हैं जो कई बार पुरुषों की आक्रामकता पर हथौड़े की तरह वार करती हैं। लगता है, लेखिका समाज की एक जागरूक महिला की तरह अपनी पैनी व सूक्ष्म दृष्टि से घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में दुष्टजनों के नंगे बदन पर चाबुक की चोट करती प्रतीत होती हैं। एक पुलिस निरीक्षक की पत्नी सविता जी जिस दबंगता से यह काम शब्दों से बखूबी करती हैं उसे देखते हुए पति-पत्नी दोनों के लिए ताली बनती है।
यह भी सच है कि लेखिका अपनी लघुकथाओं द्वारा रिश्तों को सींचने का काम कर रही हैं- कभी प्रेम से, कभी व्यंग्य तो कभी हास्य से।
संग्रह की 101 लघुकथाओं में 'वैटिकन सिटी' सर्वाधिक मार्मिक बन पड़ी है जिसमें कन्या भ्रूण हत्या को अंजाम देते समय गर्भस्थ शिशु व माँ के बीच संवाद पाठक को झकझोर कर रख देते हैं। प्रस्तुत है लघुकथा के कुछ अंश-
*"माँ-माँ..."*
*"क्या हुआ मेरी बच्ची?"*
*"माँआआअ, सुनो न! तुझे सुलाकर डाॅक्टर अंकल मेरे पैर काटने की कोशिश में लग गए हैं..!"*
*ओ मुए डाॅक्टर! मेरी बच्ची, मेरी लाडली को दर्द मत दे। कुछ ऐसा कर ताकि उसे दर्द न हो! भले मुझे कितनी भी तकलीफ दे दे तू।"*
*माँ मेरा पेट...!"*
*"ओह मेरी लाडली! इतना सा कष्ट सह ले गुड़िया, क्योंकि इस दुनिया में आने के बाद इससे भी भयानक प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी तुझे! मुझे देख रही है न! मैं कितना कुछ झेलकर आज उम्र के इस पड़ाव पर पहुँची हूँ। इस जंगल में स्त्रीलिंग होकर जीना आसान नहीं है, नन्ही गुड़िया।"*
*"माँ-माँआआआ, इन्होंने मेरा हाथ..!"*
*"आह! चिंता न कर बच्ची। बस थोड़ा सा कष्ट और झेल ले! जिनके कारण तुझे इतना कष्ट झेलना पड़ रहा है, वो एक दिन 'वैटिकन सिटी' बने इस शहर में रहने के लिए मजबूर होंगे, तब उन्हें समझ आएगी लड़कियों की अहमियत।" तड़प कर माँ बोली।*
*माँ, अब तो मेरी खोपड़ी! आह! माँ! प्रहार पर प्रहार कर रहे हैं अंकल!"*
*"तेरा दर्द सहा नहीं जा रहा नन्हीं! मेरे दिल के कोई टुकड़े करें और मैं जिन्दा रहूँ! न-न! मैं भी आ रही हूँ तेरे साथ!"*
*माँ!"*
*"मैं तेरे साथ हूँ गुड़िया...! वैसे भी लाश की तरह ही तो जी रही थी। स्त्रियों को सिर उठाने की आजादी कहाँ मिलती है इस देश में। तुझे जिंदा तो रख न सकी किन्तु तेरे साथ मर तो सकती ही हूँ! यही सजा है इस पुरुष प्रधान समाज को मेरे अस्तित्व को नकारने की।"*
(पृष्ठ 93-94)
संग्रह में रिश्तों पर आधारित उल्लेखनीय लघुकथाएं हैं- *'आहट', 'प्यार की महक', 'तुरपाई', 'सौदा', रीढ़ की हड्डी', 'ठूंठ', 'पारखी नज़र' , 'एक बार फिर'* आदि।
इसी प्रकार संवेदना के स्तर पर उत्कृष्ट लघुकथाओं में *' वैटिकन सिटी', 'सम्पन्न दुनिया', 'सही दिशा', 'हिम्मत', 'ब्रेकिंग न्यूज', 'पछतावा', 'इंसान ऐसा क्यों नहीं', 'अपनी नज़रों में', 'परिवर्तन', 'परिपाटी'* आदि हैं।
कहना होगा कि लेखिका सविता मिश्रा 'अक्षजा' व्यंग्य ही नहीं, लघुकथा विधा की भी एक सशक्त हस्ताक्षर हैं।
पुस्तक की प्रिंटिंग व बाइंडिंग ठीक है लेकिन बिन्दियों की कई जगह त्रुटियाँ अखरती हैं। कवर पृष्ठ भी अधिक आकर्षित नहीं करता।
लघुकथा संग्रह: *रोशनी के अंकुर*
लघुकथाकार: *सविता मिश्रा 'अक्षजा'*
प्रकाशक: *निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा*
प्रकाशन वर्ष: *2019*
पृष्ठ: *152*
मूल्य: *₹300*
150/ में इधर अमेजॉन पे उपलब्ध

Friday, 11 February 2022

समीक्षा- रोशनी के अंकुर (लघुकथा संग्रह)

 पुस्तक समीक्षा-                                                                       

समीक्षक- डॉ.दिनेश पाठक‘शशि’  28, सारंग विहार, मथुरा-281006 मोब.-9870631805 ईमेल-drdinesh57@gmail.com

समीक्ष्य पुस्तक-रोशनी के अंकुर (लघुकथा संग्रह) लघुकथाकार- श्रीमती सविता मिश्रा‘अक्षजा’ ISBN: 978.93.89376.45.6

पृष्ठ-152 मूल्य- १५0 रुपये, प्रकाशन वर्ष-2019                                     
प्रकाशक- निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 37, शिवराम कृपा, विष्णु कॉलोनी, शाहगंज आगरा  

यथार्थ के धरातल पर उपजी, वातावरण को सुगन्धित करने का प्रयास करती लघुकथाओं का संग्रह: रोशनी के अंकुर

हिन्दी, राजनीति शास्त्र और इतिहास में स्नातक, विदुषी साहित्यकार श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ने हिन्दी साहित्य की कहानी, व्यंग्य, कविता, आलेख और लघुकथा आदि विविध विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है। 

उनके  लघुकथाओं के संग्रह-‘रोशनी के अंकुर’ में उनकी 101 चुनिंदा लघुकथाओं को समाहित किया गया है। वरिष्ठ लघुकथाकार डॉ.अशोक भाटिया जी ने इस लघुकथा-संग्रह की भूमिका में कहा है कि- ‘इस संग्रह की अधिकतर लघुकथाएँ पारिवारिक धरातल के विभिन्न आयामों को रेखांकित करती हैं साथ ही समाज और राजनीति में व्याप्त विद्रूप पर भी सविता मिश्रा की दृष्टि गई है।

मैंने संग्रह की पूरी 101 लघुकथाओं को पूरे मनोयोग से पढ़ा है और मैं कह सकता हूँ कि संग्रह की लघुकथाओं का फलक बहुत विस्तृत है। इसमें पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के तुलनात्मक अन्तर को भी देखा जा सकता है तो शिक्षा के महत्व को भी दर्शाने का पूर्ण प्रयास परिलक्षित होता है। दहेज के कोढ़ की ओर भी एक-दो लघुकथा इशारा करती नजर आती है तो नारी जागृति की बात करते कई लघुकथाएँ नजर आती हैं। दाम्पत्य जीवन के खट्टे-मीठे अनेक अनुभवों पर संग्रह में कई लघुकथाएँ हैं तो धर्म और पूजा-पाठ के नाम पर रचते ढोंग को नकारती लघुकथाएँ सविता मिश्रा जी की लेखनी से निसृत हुई हैं।

नारी सशक्तिकरण, नारी उत्पीड़न, नारी का महत्व और नारी उद्धार सम्बन्धी लघुकथाएँ भी अपने प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण के कारण उत्कृष्ट लघुकथाएँ बन पड़ी हैं।

वर्तमान युग की देन-‘कैरियर के चक्कर में अविवाहित रहे जा रहे बच्चों की पीड़ा भी लघुकथा के माध्यम से प्रकट की गई है। निष्कर्षतः कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि श्रीमती सविता मिश्रा जी ने इन लघुकथाओं के माध्यम से जीवन के कोने-कोने को झाँकने का प्रयास तो किया ही है अपनी लघुकथाओं में सकारात्मकता का पुट देकर घर-परिवार और समाज को सुगन्धित करने का प्रयास भी किया है।

गाँव में रह रहे अपने वृद्ध सास-ससुर को सर्वधाम लघुकथा के माध्यम से चारों धाम की संज्ञा देकर सविता जी ने बुजुर्गों के प्रति जो सम्मान प्रकट किया है वह भटके हुए परिवारों के दम्पत्तियों को राह दिखाती नजर आती है। फोन पर बातचीत के दौरान सुमन ने अपनी जिठानी को जब बताया कि  परिवार चारों धाम की यात्रा करके लौटा है तो सुमन से उसकी जेठानी सख्त नाराज हो जाती है और शिकवा करते हुए फोन काट देती है कि सुमन ने उसे चारों धाम की यात्रा पर चलने के लिए क्यों नहीं कहा। वह भी सपरिवार चलती।किन्तु जब जेठानी को चारों धाम के बारे में पता चलता है तो वह चुप लगा जाती है।
थोड़ी देर में सुमन फिर फोन मिलाकर बोली--‘दीदी गुस्सा ठंडा हुआ हो तो सुनिए, आपसे पूछा था मैंने।’
‘‘कब पूछा तुमने? गुस्से में जेठानी बोली।’’
‘महीनेभर पहले ही जब बात हुई थी तभी मैंने आपसे पूछा था कि आप अम्मा-बाबूजी के पास इस गर्मी की छुट्टी में गाँव चलोगी।’’
अब दूसरी तरफ शान्ति फैल गई थी।(सर्वधाम , पृष्ठ-81)

कई मायनों में नई जनरेशन अधिक होशियार है, इस बात को सिद्ध करती संग्रह की लघुकथा-‘माँ अनपढ़’ है तो शिक्षा के महत्व को दर्शाती लघुकथा-‘मात से शह’ तथा ‘कांटों भरी राह’ है। रिश्तों में पैदा होती खटास-‘मीठा जहर’ में तो नारी के नये जाग्रत  रूप को  लघुकथाओं-‘बदलाव, यक्ष प्रश्न, सबक, नशा, हिम्मत, सीमा, मात से शह और कसक में देखा जा सकता है-

जब तक दोनों बिलकुल पास आतीं, गार्ड तब तक बीड़ी से एक लम्बा कस ले चुका था। बीड़ी का धूंआं अन्दर जाते ही , अन्दर का शैतान चेहरे पर विराजमान हो गया। उन दोनों को बगल से जाते देखकर, गार्ड ने बीड़ी के धूंए को उन पर छोड़ दिया।

चेहरा फिर बैक यार्ड की ओर घुमाते समय, उसके मुखड़े पर शैतानी मुस्कान टहल गई।

उधर निढाल नीता, जब बीड़ी के धूंए से प्रभावहीन हुई तो वह फुर्ती से पलटी और गार्ड के बदरंग चेहरे पर खींचकर एक तमाचा जड़ दिया।

जब तक कोई कुछ समझ पाता, वह गुर्राई-‘‘आँखें गार्डी करने में सजग रखो, लड़कियों के बदन नहीं, समझे? यह थप्पड़ सिर्फ आगाह करने के लिए है। आगे से तुम्हारी नजर उठी तो हड्डियाँ तोड़ दूंगी।’’ ( हिम्मत, पृष्ठ-141,142)

आज कल शहरी जीवन यंत्रवत हो गया है। अधिकांश लोग अपनी आपाधापी में अथवा अपने ईगो के कारण एक-दूसरे से कोई सम्बन्ध नहीं रखते। गाँव या विपन्न जन समुदाय जैसा मेल-मिलाप, एक-दूसरे से बातचीत की ललक इन तथाकथित सम्पन्न जनों में दिखाई नहीं पड़ती। इसी बात को सविता जी ने अपनी लघुकथा-‘‘सम्पन्न दुनिया’’ के माध्यम से सहज ही में दर्शा दिया है-

‘नहीं बेटा, टाइमिंग तो एक ही है परन्तु इनमें इंसानियत नहीं है, सब रोबोटिक्स हैं। तू लेकर चल मुझे वहीं, जहाँ एक-दूसरे का दुख-दर्द पूछने वाले ढेरों इंसान रहते हैं।’’ (सम्पन्न दुनिया, पृष्ठ-18)

दाम्पत्य जीवन के उतार-चढ़ाव, दाम्पत्य की समस्याएँ, संदेह, और सुख-दुख अनेक बातों का विष्लेषण, करती, अर्थ प्रदान करती, समस्याओं का हल प्रदान करती और उलझनों को सुलझाती इस संग्रह की लघुकथाओं में आहट, प्यार की महक, कागज का टुकड़ा, तुरपाई, समय का फेर, खुलती गिरहें, हस्ताक्षर और भाग्य का लिखा आदि का उल्लेख किया जा सकता है।

तुरपाई के बहाने माँ के द्वारा बेटी के दाम्पत्य को बिखंडित होने से कैसे सहज रूप से बचा दिया है सविता जी ने प्रशंसनीय है।-

‘‘माँ देखो तो यह धागा कितना उलझ गया है कब से सुलझा रही हूँ सुलझने का नाम ही नहीं ले रहा।’’

दोनों चीजों को लेकर माँ वहीं बैठ गई। धागा सुलझाती हुई वह बेटी पर तिरछी नजर डालते हुए बोली-‘थोड़ा समय देकर अपने और उदय के रिश्ते को सुलझाती तो कब का सुलझ जाता। शादी के दो महीने में ही एक छोटे से झगड़े के कारण अपने रिश्ते को तुमने क्रोधाग्नि के हवाले कर दिया।’
माँ के समझाइश भरे शब्द बेटी के गाल पर तमाचे से पड़ रहे थे। वह तमतमाकर उठी और अपनी अटैची लगाने लगी।
"अब कहाँ जाने की तैयारी है?"
‘‘ससुराल जा रही हूँ। तुम चाहती हो न कि इस धागे की तरह उलझी जिन्दगी जिऊं, फटे कुरते पहनूं, तो यही सही, अब मैं वहीं रहूंगी। भले मुझे कुड बुरा लगे या भला।’’
माँ मुस्कराकर बोली-‘ले, तेरी सूई का धागा तो सुलझ गया। और कुरता भी ठीक कर दिया मैंने।’
बेटी ने कुरते को ध्यान से देखा,छेद पर रफू इतनी बारीकी से हुआ था कि पता ही नहीं चल रहा था।
‘‘मम्मी तुम न आतीं तब तो मैं परेशान होकर इसे काट चुकी होती। कैसे किया तुमने?’’
‘बेटा प्यार और थोड़ी सहनशीलता से बड़ी-बड़ी उलझन सुलझ जाती हैं, क्रोध में तो वही होता है जो तुम करने वाली थीं।’
कुरता पहन बेटी ने माँ के गलबहियां डाल दीं।
माँ बिटिया को पुचकारते हुए बोली-‘ठहर, मैं दामाद जी को फोन करती हूँ, वो खुद आकर तुम्हें ले जायेंगे।’
मंद-मंद मुस्कुराती हुई बेटी ने माँ के गर्दन पर अपनी बांहों का दबाव बढ़ा दियाथा। (तुरपाई पृष्ठ-28)

 इसी तरह की अन्य उत्कृष्ट लघुकथाओं में समय का फेर,खुलती गिरहें,माँ की सीख,चारों धाम और बेटी, आदि कई लघुकथाएँ हैं जो अपनी सकारात्मक सोच के कारण अति उत्कृष्ट लघुकथा बन पड़ी हैं। और जो सिद्ध करती हैं कि श्रीमती सविता मिश्रा जी लघुकथा लेखन में पारंगत रचनाकार हैं।

घर-परिवार, और आसपास के समाज से लिए गये कथानक पर बुनी गई इस संग्रह-‘रोशनी के अंकुर’ की सभी लघुकथाएँ यह आभास नहीं होने देतीं कि यह लघुकथा संग्रह उनका प्रथम लघुकथा संग्रह है। बल्कि विदुषी साहित्यकार श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ के घनीभूत अनुभव एवं अनुभूतियों की परिपक्वता, ग्रहणशीलता और पैनी दृष्टि की प्रशंसा को उद्यत करती हैं। भाषा-शैली सहज एवं सरल  आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग सविता जी ने किया है।

हिन्दी साहित्य जगत में लघुकथा संग्रह- रोशनी के अंकुर’’ का भरपूर स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है।


समीक्षक- डॉ.दिनेश पाठक‘शशि’ drdinesh57@gmail.com

Sunday, 7 November 2021

वर्दी वाले (लघुकथा)

 वर्दी वाले
सविता मिश्रा 'अक्षजा'


बाहर साइकिल खड़ा करता हुआ सोनू बोला - “पापा, आज तो मेरी रेहड़ी पर पुलिस ही पुलिस आयी थी।” 
सुनकर पिता का चेहरा मलिन हो उठा। जेब में हाथ कुछ टटोलने लगा था।
“तू रेहड़ी लगाया कहाँ था कि ग्राहक न आये? जानता है न कि कितने मुश्किल से मैं और तेरे पिता दीये बनाते हैं।” माँ के चेहरे की तकलीफ शब्दों में बह गई।
“अम्मा चौराहे पर ही तो बैठा था। ग्राहक तो पास से खूब सारे गुजर रहे थे।”
“थोड़ा दूर बैठता। चार दिन भर पेट भोजन मिल जाता, अब वो भी नसीब नहीं होगा।”
“क्यों डांट रही है, पहली बार रेहड़ी लगाई थी, इसे ज्यादा जानकारी थोड़ी ही थी।”
“दीपक गए तो गए पचास रुपये की डलिया भी गवां आया। अच्छा चल, रोटी बनाती हूँ, खा ले। फिर देखूँगी क्या करना है। लगता है दिवाली पर भी सूखी रोटी ही खानी पड़ेगी।”
“अम्मा, ये लो। इस बार दीपावली पर हम भी पूड़ी और पनीर की सब्जी खाएंगे।” पास आकर सारे रुपये माँ के आँचल में डाल दिया।
“इतना रुपया!”
“जो दरोगा साहब चौराहे पर बैठे थे, वह मुझसे मेरे बारे में अपनी ड्यूटी से खाली होते ही पूछने लगते थे।”
 “अच्छा..!”
“उन्होंने कड़ककर पूछा था कि पढ़ता-लिखता भी है..!
तो मैंने उन्हें बताया कि कैसे मेरी पढ़ाई छूट गयी। पापा का अपाहिज होना, तेरी बीमारी के बारे में भी|  घर का सारा हाल भी मैंने उनसे कह डाला।”
“अच्छा..! तो क्या कहा?”
“कुछ नहीं, डंडा फटकारते हुए अपने काम में लग गये थे।"
“बेचा किसे, ये तो बता?” पिता ने कराहते हुए पूछा।
“थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि ढ़ेर सारे पुलिसवाले मेरी ओर आ रहे हैं। मैं डर गया था अम्मा! पापा ने जो कहा था वो सब आँखों के सामने नाचने लगा था। मेरी नजरें उन दरोगा अंकल को खोजने लगी थी जैसे मेरी रेहड़ी बच जाए।”
“फिर, क्या सारे तोड़ दिया उन लोगों ने। उस दरोगा ने अपने लोगों की करतूत पर पर्दा डालने के लिए इतने रुपये तुझे पकड़ाये?”
“अरे ना अम्मा! इतने भी खराब नहीं होते हैं वर्दी वाले। सभी ने अच्छी कीमत देकर दर्जन-दो दर्जन दीपक खरीदें। वो दरोगा अंकल भी मुस्कुराते हुए उन सबके पीछे खड़े थे, दुगनी कीमत देकर बचे हुए दीपकों को उन्होंने ले लिया।”

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Monday, 17 May 2021

संजीवनी (लघुकथा)




 दैनिक जागरण में छपी  लघुकथा पुनः सही तथ्य के साथ आप सबके बीच...😊 

संजीवनी (लघुकथा)

सविता मिश्रा 'अक्षजा'


इंटरनेट मीडिया पर घंटो बिताने के दौरान अचानक स्नेह ने कहा- “पापा, काश मुझे भी कोरोना हो जाता!”

“ओह, क्या कह रही हो बिटिया| भगवान दुश्मनों को भी न दें ये रोग| कितने लोग असमय ही दुनिया छोड़कर जा रहे हैं|”

“पापा, अस्सी परसेंट ठीक हो रहे हैं| मम्मी और आप भी तो अब बिलकुल ठीक हो गये हैं न!”

“हां, हां, ठीक हो रहे हैं, लेकिन लोग अपनी जान बचाना चाह रहे हैं और तू है कि पॉजिटिव होना चाह रही है!”

“पापा मैं लोगों की जान बचाना चाहती हूं|”

“गजब प्राणी है तू भी! बीमार होकर कोई किसी की जान बचा सकता है क्या?”

“हाँ पापा, ठीक होने के बाद प्लाज्मा देकर| आप तो लोगों को बस दुआ देना जानते हैं, प्लाज्मा देने में जाने क्यों डरते हैं!”

“अच्छा, अच्छा! ठीक है| चल लेकर चल मुझे अस्पताल, मैं प्लाज्मा देने को तैयार हूं| तुझे इस तरह नौटंकी करने की जरूरत नहीं है|”

उंगली पकड़कर चलाने वाला पिता बिटिया की हथेली थाम बच्चे-सा चल पड़ा था।

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Thursday, 4 March 2021

संग्रहों का लेखाजोखा

 लेखिका - सवितामिश्रा ‘अक्षजा’ गृहिणी।

जन्म : 1/6/73, इलाहाबाद ।
पुस्तक का नाम – रोशनी के अंकुर लघुकथा संग्रह (१०१ लघुकथाएँ)
प्रकाशन वर्ष ; नवम्बर २०१९ में प्रकाशित|
संकलन - अनेक लघुकथा संकलनों में लघुकथाएँ
ई-मेल : 2012.savita.mishra@gmail.com
मो. : 09411418621
१०१ लघुकथाएँ---

माँ अनपढ़/ मात से शह/ सम्पन्न दुनिया/ अधूरा कोटा /पेट दर्द/ इज्ज़त/ कागजका टुकड़ा/ आहट/ सही दिशा/ प्यार की महक/ तुरपाई/ तीसरा/ अभिलाषा/ माँ की सीख/ निर्णय/समय का फेर/ पुरानी खाई-पीई हड्डी/ मन का बोझ/ बदलते भाव/ मौकापरस्त/ आस/ खुलतीगिरहें/ वर्दी/ हाथी के दांत/ मन का चोर/ टीस/ ढाढ़स/ अहमियत/ रिश्ता/ कथा है/ बिनमुखौटे के/ ठंडा लहू/ नीयत/ आत्मग्लानि/ बदलाव/ आत्मसम्मान/ सबक/ दाएं हाथ का शोर/ मीठा जहर/पेट की मज़बूरी/बेबसी/ भूख/ हिम्मत/ दर्द/ सुरक्षा घेरा/ ज़िद नहीं/ ब्रेकिंग न्यूज़/ पाठशाला/सच्चीसुहागन/ रीढ़ की हड्डी/ सर्वधाम/ बेटी/ दंश/ अफवाहों के बीच/ ग्लानि/ यक्ष प्रश्न/दूसरा कन्धा/ सबक/ ज़िंदगी का फ़लसफ़ा/ वैटिकन सिटी/ जुड़ाव/ नशा/ पछतावा/ कृतघ्न/सहयोगी/ हस्ताक्षर/ बाजी/अन्याय/ सौदा/ श्वास/ इन्सान ऐसा क्यों नहीं/ अपनी नज़रोंमें/ ठंड/ राक्षस/ इतिहास दोहराता है/ परछाई/ रौशनी/ परिवर्तन/ दुनियादारी/मुक्ति/ उपयोगिता/ अस्त्र/ सच्चा दीपोत्सव/ आशंका/ तोहफ़ा/ कर्मशक्ति/ कपूर/ खुशबू/फ़ांस/ ठूँठ/ पारखी नज़र/ एक बार फिर/ हिम्मत/ भाग्य का लिखा/ काँटों भरी राह/कलुषता/ सीमा/ कसक/ परिपाटी/ उपाय |-०-
अन्य संग्रह ----


लघुत्तम-महत्तम लघुकथा-संकलन-अभ्युत्थान प्रकाशन

संपादिका -महिमा 'श्रीवास्तव' वर्मा

प्रकाशन समय - अगस्त २०१८

लघुकथा के १४वें संकलन में मेरी 'तीन' लघुकथाओं को स्थान दिया गया है | संपादिका महिमा 'श्रीवास्तव' वर्मा का आभार।

१--एक बार फिर

२--वेटिकन सिटी

३--इज्ज़त
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'नयी सदी की लघुकथाएँ' लघुकथा-संकलन- 'नवशिला प्रकाशन' से प्रकाशित

सम्पादक- अनिल शूर आजाद

प्रकाशन समय - जुलाई २०१८

लघुकथा के १3वें संकलन में मेरी 'दो' लघुकथाओं को स्थान दिया गया है | सम्पादक डॉ.अनिल शूर आज़ाद का आभार।

१--मन का चोर

२--दूसरा कन्धा

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'अभिव्यक्ति के स्वर' लघुकथा-संकलन - 'हिन्द युग्म' से प्रकाशित

सम्पादक- विभा रानी श्रीवास्तव

प्रकाशन समय - जुलाई २०१८

लघुकथा के १२वें संकलन में मेरी 'पाँच' लघुकथाओं को स्थान दिया गया है | सम्पादक विभा रानी श्रीवास्तव दीदी का आभार।

१--मूल्य (बेटी)

२--वर्दी

३--ग्लानि

४--गिरह

५--टीस

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"नई सदी की धमक" साझा-लघुकथा-संग्रह- दिशा प्रकाशन

सम्पादक - श्री मधुदीप गुप्ता

विमोचन- दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जनवरी २०१८

लघुकथा-बेटी

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'सफ़र संवेदनाओं का' साझा-लघुकथा-संग्रह - वनिका पब्लिकेशन

सम्पादक द्वय -डॉ. जितेन्द्र जीतू जी और डॉ. नीरज सुधांशु जी |

विमोचन- दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जनवरी २०१८ में |

प्रकाशित चार लघुकथाएँ .--

१..पछतावा

२ -परिपाटी

३--उपाय

४--अमानत

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"आसपास से गुज़रते हुए" साझा-लघुकथा-संग्रह - अयन प्रकाशन |

सम्पादक द्वय - सम्पादक द्वय .. ज्योत्स्ना 'कपिल' और डॉ. उपमा शर्मा |

विमोचन- दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जनवरी २०१८ में

"आसपास से गुज़रते हुए" साँझा-लघुकथा-संग्रह जनवरी -२०१८ में प्रकाशित "परिवर्तन" नामक कथा-

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प्रतियोगिता के अन्तर्गत 'शब्द निष्ठा सम्मान-2017' में मेरी लघुकथा 'सर्वधाम' ३५वें स्थान पर रही |"आधुनिक हिंदी साहित्य की चयनित लघुकथाएँ" साझा-लघुकथा-संग्रह--बोधि प्रकाशन |

सम्पादक- कीर्ति शर्मा

विमोचन- अजमेर में अक्टूबर 2017 को

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‘सपने बुनते हुए' साझा-लघुकथा-संग्रह-ललिता अग्रवाल स्मृति संस्थान, कोटकपूरा |

सम्पादक द्वय-- श्री श्याम सुंदर जी और श्री बलराम अग्रवाल

विमोचन- दिनांक 29 /१०/ 2017 को 26वें अंतर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन पंचकूला में |

२०१७ में प्रकाशित तीन लघुकथाएँ --

१--रीढ़ की हड्डी

२--कागज का टुकड़ा

३--मीठा जहर

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'लघुकथा अनवरत' दूसरा सत्र २०१७ साझा-लघुकथा-संग्रह- "अयन प्रकाशन"

सम्पादक द्वय ..श्री सुकेश साहनी और श्री रामेश्वर काम्बोज |

विमोचन- दिल्ली के पुस्तक मेले में जनवरी २०१७ में |

प्रकाशित तीन लघुकथाएँ .

१...जीवन की पाठशाला

2...सच्ची सुहागन

३..ब्रेकिंग न्यूज |

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'लघुकथा अनवरत' सत्र २०१६ साँझा-लघुकथा-संग्रह-- "अयन प्रकाशन"

सम्पादक द्वय ..श्री सुकेश साहनी और श्री रामेश्वर काम्बोज |

विमोचन दिल्ली में पुस्तक मेले में जनवरी २०१६

प्रकाशित चार लघुकथाएँ--

१..पेट की मज़बूरी

२..पुरानी खाई -पीई हड्डी

३..ढाढ़स

४..भाग्य का लिखा

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'अपने अपने क्षितिज' साझा-लघुकथा-संग्रह -वनिका पब्लिकेशन

सम्पादक द्वय -डॉ. जितेन्द्र जीतू जी और डॉ. नीरज सुधांशु जी |विमोचन- दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जनवरी २०१७ में हुआ |

प्रकाशित चार लघुकथाएँ .

१..ज़िद नहीं

2...हिम्मत

३...सुरक्षा घेरा

4..दर्द |

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"उद्गार" लघुकथा संकलन - वनिका पब्लिकेशन

संकलनकर्ता - रश्मि सिन्हा दीदी

प्रकाशित - फ़रवरी २०१८

इस संकलन में मेरी चार कथाओं को स्थान दिया गया है | समूह की संचालिका रश्मि सिन्हा दीदी का आभार। साथ के साथ नीरज शर्मा दीदी का बहुत बहुत धन्यवाद --१--दोगलापन

२--खुलती गिरहें

३--सहयोगी

४-- कृतघ्न

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'मुट्ठी भर अक्षर' साझा-लघुकथा-संग्रह

२४ अप्रैल २०१५ में 'मुट्ठी भर अक्षर' साझा-संग्रह ...हिंदी युग्म प्रकाशन

सम्पादक द्वय ..विवेक कुमार और श्रीमती नीलिमा शर्मा |

विमोचन दिल्ली के हिंदी भवन में 24 April 2015 को |

हमारा पहला साझा-लघुकथा-संग्रह |

प्रकाशित छः लघुकथाएँ ..

१..हस्ताक्षर

२...हाथी के दांत

३...जन्मदाता

४...आस

५...बदलते भाव

६...खुशी में छुपा गम

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'लघुकथा अनवरत' दूसरा सत्र २०१७ साझा-लघुकथा-संग्रह- "अयन प्रकाशन"

सम्पादक द्वय ..श्री सुकेश साहनी और श्री रामेश्वर काम्बोज |

विमोचन- दिल्ली के पुस्तक मेले में जनवरी २०१७ में |

प्रकाशित तीन लघुकथाएँ .

१...जीवन की पाठशाला

2...सच्ची सुहागन

३..ब्रेकिंग न्यूज |

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समकालीन लघुकथा का सौंदर्यशस्त्र’ 2019 में

संपादन : जितेंद्र जीतू भैया

वनिका पब्लिकेशनस से

प्रकाशित लघुकथाएँ .- सुकून

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विशेषांक पत्रिकाएँ --

मिनी पत्रिका (पंजाबी)

संपादक एवं अनुवादक - श्री श्याम सुंदर दीप्ति,

लघुकथा : रीढ़ की हड्डी

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साहित्य कलश अंक

ध्यान नहीं

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समकालीन प्रेम-विषयक लघुकथाएँ

प्रकाशित दो लघुकथाएँ .

१..मुक्ति
2...वेटिकन सिटी
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संरचना २०१९

सम्पादक - श्री कमल चोपड़ा

लघुकथा- प्यार की महक

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सहोदरी लघुकथा साझा संकलन

प्रकाशित पांच लघुकथाएँ --

उम्रदराज प्रेमी

रंग-ढंग

बदलाव

सबक

दंश

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कारवाँ साझा संकलन

सम्पादक-मिथिलेश दीक्षित दीदी

सही दिशा

आत्मसम्मान

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६६ लघुकथारों की ६६ लघुकथाएँ

खुलती गिरहें

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महानगर की लघुकथाएँ

सम्पादक- श्री सुकेश साहनी

तोहफा

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आधुनिक साहित्य पत्रिका 

अतिथि सम्पादक - बलराम अग्रवाल भैया

१- बदलते भाव

२- आत्मग्लानि
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कथादेश पुरस्कृत लघुकथाएँ (पुस्तक )

सम्पादक - श्री हरिनारायण एवं श्री सुकेश साहनी

लघुकथा - प्यार की महक


Friday, 30 October 2020

प्यार की महक/लघुकथा

 कथादेश पुरस्कृत लघुकथाएँ (पुस्तक)

सम्पादक - श्री हरिनारायण एवं श्री सुकेश साहनी
लघुकथा - प्यार की महक

हर दिन कभी फोन पर कभी आमने-सामने सावन की फुहार-सा पति का प्यार पत्नी पर बरसता रहता था। पत्नी रेखा प्रेम के घने बादलों को ओढ़े हुए अपने घर के कोने-कोने में भाद्रपद के मेघ-सी बरसती रहती थी । गलती होने पर भी मम्मा डांटती नहीं है यह देखकर बच्चें भी खुश रहते थे। घर का हर कोना खिलखिलाता रहता था। रसोई भी तरह-तरह के पकवानों से महकती रहती थी।

लेकिन आज सुबह से सब कुछ उलट चल रहा था । बड़ा बेटा अपनी बहन के कान में फुसफुसाया- “आज कोई गलती नहीं करना ! मम्मी का पारा चढ़ा हुआ है ।”
“क्या हुआ ?”
“सुबह ऑफिस जाते समय पापा से मम्मी की लड़ाई हो गई है।” वह डरते हुए बोला |
“ओह! तब चलो ! पढ़ने चलते हैं । टीवी बंद कर दो।”
रेखा के काम तो सभी हो रहे थे लेकिन गुस्से के साथ । आज रसोई से बर्तनों की आवाजें उछलती हुई बच्चों के रूम तक पहुँच रही थीं। बच्चे समझ रहे थे कि आज कुछ पसंद का खाना खाने को कहना, मतलब आग में घी डालना। जो बनकर आया, शांति से थोड़ा-सा खा लिया । स्वाद जीभ को खराब लगा लेकिन माँ के आगे उन दोनों का चेहरा मुस्कुरा रहा था ।

तभी पति का आगमन हुआ- “क्या हुआ ! रोज की तरह मेरा स्वागत नहीं करोगी?”
पति  रेखा के चेहरे पर झुका लेकिन रेखा चमककर रसोई में चली गई । पति भी उधर चला और उसने एक लाल गुलाब रेखा को पकड़ा दिया । फिर भी प्यार की महक से घर नहीं महका। अकेले गुलाब की सुगंध ही रसोई में विचरण करने लगी।
पति ने जेब से मीठा पान निकाल रेखा के मुँह में डालते हुए बोला- “महीनों से लड़ाई नहीं हुई थी। मीठा ज्यादा होने से उसमें कीड़े पड़ जाते हैं । जिंदगी में कुछ नमकीन भी होना चाहिए न! नमकीन के बाद जो मीठा खाने का स्वाद आता है न! उसकी तो पूछो ही नहीं।”
पान की शौक़ीन रेखा के मुँह में प्यार से खिलाए पान के घुलते ही सुबह से गमगीन पड़ी रसोई फिर से चहक उठी। यह चहचहाहट एक बार फिर बन्द दरवाजों को भेदती हुई पूरे घर में फैल गई । पूरा घर फिर से महक उठा | बेटे की खनकती आवाज गूंजी – “मम्मी ! आलू के पराठे बनाइएगा । बहुत तेज भूख लगी है।”

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा, (प्रयागराज)
2012.savita.mishra@gmail.com
ब्लाग - मन का गुबार एवं दिल की गहराइयों से |   

Thursday, 1 October 2020

समीक्षा- रोशनी के अंकुर (लघुकथा संग्रह) /डॉ लता अग्रवाल

 जीवन के केनवास पर बुनी लघुकथाएँ


पुस्तक – रोशनी के अंकुर 

विधा- लघुकथा

लघुकथाकार  - सविता मिश्र ‘अक्षजा’

प्रकाशक -  निखिल पब्लिकेशन आगरा

पृष्ठ – 152 

कीमत – १५0/-


आज विश्व का परिदृश्य बदला हुआ है | व्यक्ति से लेकर प्रकृति भी विकास की दौड़ में है फिर भला साहित्य कैसे पीछे रह सकता है | आखिर मानवीय चेतना का प्रतिबिम्ब ही तो है साहित्य | आज साहित्य भी मानवीय चित्त की गति से प्रेरित है, अत: साहित्य की विधा लघुकथा कैसे इस दौड़ से पीछे रह सकती है | अपने साहित्य को समृध्द करती लघुकथा आज विकास के सोपान छू रही है | लघुकथा साहित्य को समृध्द करने में महिला लेखिकाओं की एक लम्बी श्रंखला  रही है | इसी श्रंखला में आगरा की लेखिका सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ भी एक सम्मानित नाम है |

सविता जी का प्रथम लघुकथा संग्रह ‘रोशनी के अंकुर’ मुझे प्राप्त हुआ | यदपि प्रतिक्रिया देने में बिलम्ब हुआ | एक सौ एक लघुकथाओं का यह संग्रह लेखिका की अवलोकन दृष्टि से अवगत कराता है | वे कितनी बारीकी से परिस्थितियों का मूल्यांकन करती हैं | यूं भी कहन में वक्रोक्ति उनका गुण है उनका यह गुण मुझे बेहद पसंद है | अब संग्रह की बात करूं तो अमूमन जो होता है अधिकांश लघुकथाएँ स्त्री विमर्श पर लिखी गई हैं | आरम्भ वे तीन पीढ़ियों को लेकर लघुकथा से करती हैं | ‘माँ अनपढ़’ यही जिंदगी है ज्ञान सतत गतिमान रहता है यही कारण है कि हर पिछली पीढ़ी को अगली पीढ़ी का अनुगामी होना  होता है | इसी तरह ‘मात से शह’, श्याम वर्ण लड़की की पीड़ा के साथ दहेज के संकट को रेखांकित करती है साथ ही नायिका द्वारा उठाये कदम के माध्यम से  स्त्री सशक्तिकरण का रास्ता भी दिखाती हैं,

“आपकी गलती सुधरने के लिए मैं कोई गलती क्यों करूँ ?” ‘वर्दी’ ‘अधूरा कोटा’, वर्दीधारियों की पत्नी का दर्द बयाँ करती है | वाकई इन पत्नियों को सलाम जिनकी भावनाएं वर्दी की भेंट चढ़ जाती है | सविता जी के जीवन साथी भी इसी महकमे से हैं अत: वे इस वर्ग की महिलाओं के दर्द को बेहतर समझ पाई हैं | ‘इज्जत’ स्त्री का स्त्री से सवाल, “मम्मी अगर भाभी की जगह मैं होती तब भी क्या आप ऐसा ही करतीं ?” स्त्री विमर्श पर बड़ा सवाल है | ‘सबक’ ‘आहट’ लघुकथा संग्रह की श्रेष्ठ कथाओं में से हैं | एक गरीब की बेटी के जीवन का मर्म उजागर करती है  | मुझे लगता है इसका शीर्षक ‘दरवाजा’ अधिक उपयुक्त होता |

“बाबा तुम्हारे जवाई के दिल का दरवाजा मेरे लिए खुला है या बंद, ब्याहने से पहले तुमने यह देखा ...?” यह सवाल समाज की कई बेटियों का प्रतिनिधिव करता है | इसी प्रकार सुरक्षा घेरा , दंश, दूसरा कंधा  सबक , नशा , हस्ताक्षर ,इन्सान ऐसा क्यों नहीं ...स्त्री सम्बन्धी गम्भीर मुद्दे उठाती हैं | ‘एक बार फिर’ नारी सशक्तीकरण की लघुकथा है | ‘सीमा’ स्त्री सजगता की लघुकथा है | ‘वेटिकन सिटी’, “इस जंगल में स्त्रीलिंग होकर जीना आसान नहीं |” सम्पूर्ण समाज को कटघरे में खड़ा करती है|

‘संपन्न दुनिया’ कटाक्ष है इंसान पर, कैसे आज मानवता कैद हुई है अपने खोल में। ‘पेट दर्द’ जैसा मैंने कहा वक्रोक्ति में सविता जी का कोई जवाब नहीं, यह लघुकथा इसका बेहतर उदाहरण है | अक्सर महिलाएं इस रोग की शिकार बताई जाती हैं मगर लेखिका ने लीक से हटकर शर्माजी को इस रोग का शिकार बनाया व्यंग्य का पुट लिए सार्थक लघुकथा है | ‘कागज का टुकड़ा’ प्रेम पत्र के माध्यम से इंसानी सोच का आवरण हटाती बहुत बढ़िया लघुकथा |आज डॉक्टरी महत्व प्रोफेशन बनकर रह गई है जिसका मुंहतोड़ जवाब देती है युवती,

“गृहिणी बनकर तो मैं सेवा करुँगी ही , लेकिन डाक्टरी की डिग्री लेकर भी मैं सेवा ही करुँगी| मुझे प्रोफेशन के तौर पर कोई लाइन नहीं चुननी है |” 


संग्रह की कुछ लघुकथाएं समर्पित है रिश्तों को, ‘प्यार की महक’ पति-पत्नी के मधुर रिश्तों को दर्शाती है, दोनों का गतिमान होना बहुत आवश्यक है उनकी नोकझोंक प्यार को और भी चटपटा बनाते हैं | बेटी की गृहस्थी की ‘तुरपाई’ करती एक ‘माँ की सीख, “ बेटी प्यार और थोड़ी सहनशीलता से बड़ी -बड़ी उलझनें सुलझ जाती हैं |‘आस’ सामान्य कथा लगी, ‘खुलती गिरह’ सास बहू के बीच उगती कटीली झाड़ियां में परिवार कैसे उलझ जाता है | अक्सर यह पूर्वाग्रह भी हो जाता है, इसलिए लेखिका कहती हैं,यह उक्ति अपनाई जाए कि, 

“सुने क्यों यदि सुने तो गुने क्यों ?” अमूमन स्त्री विमर्श पर ही प्रताड़ना के विषय लिए जाते हैं | इस दृष्टि से ‘टीस’ विषय नया है | पुरुष की प्रताड़ना भी साहित्य का विषय है जो सामने आना चाहिए ,

“ बेटा ! गिरा दो अंजलि का जल तुम परशुराम भले बन जाओ पर मैं जमदग्नि नहीं बन सकता हूँ |” ‘बेबसी’ व्यस्त जिंदगी में बच्चों द्वारा माता-पिता की उपेक्षा है | ‘नजर’ मूर्तिकार का मूर्तियों से प्रेम भरा रिश्ता, वाकई में जिस प्रकार मां के लिए बच्चे उसकी कृति हैं जिनसे उसे अनन्य प्रेम है उसी तरह एक मूर्तिकार के लिए उसकी कृति बच्चों के समान ही प्रिय होती है | खुशबू और फांस रिश्तों के दो रूपों को दर्शाती है |‘तीसरा’ ‘ठंडा लहू’ लघुकथा को अगर कहूँ साहित्य में दंगल की पीड़ा को मुखर किया है| इसे अगर महज लघुकथा तक न रखकर सम्पूर्ण साहित्य को दृष्टि में रखकर लेतीं तो कहानी का कद और बड़ा हो जाता |


‘अभिलाषा’ कथा मानवेत्तर (चूड़ियों के माध्यम से ) नारी जीवन की विसंगति को कुशलता से प्रस्तुत किया है | यह भी संग्रह की श्रेष्ठ लघुकथाओं में स्थान पाती है | ‘निर्णय’ देश में योग्यता की उपेक्षा पर कटाक्ष है |‘मन का बोझ’ सुप्त होती संवेदना पर एक चिन्तन दृष्टि है |एक ऐसी घटना की गवाह मैं भी हूँ अत: कह सकती हूँ कथा यथार्थ के करीब है |

‘हाथी के दांत’ कहावत को, ‘मन का चोर’ चरित्र को उजागर करती है|

‘ढाढस’ समाज के दो वर्ग का चित्र सामने रखती है, एक वर्ग के लिए महज दिखावा है जिसका अंत नहीं और दूसरे वर्ग के लिए जीवन भूख पर जिन्दगी अटक जाती है |‘रिश्ता’ कहते हैं हृदय परिवर्तन के लिए एक पल काफी होता है | यह लघुकथा दिल को छू जाती है | जिस सौन्दर्य पर कुछ समय पहले स्वयं मोहित था उम्र का एहसास होते ही उसे बिटिया के रूप में स्वीकार करना ...लेखिका ने अच्छा मोड़ दिया कथा को ,

“तू मेरे भतीजे का ब्याह इस बिटिया से करा दे |”

‘कथा है’ सहमत हूं लेखिका के विचारों से ,

“मत सुन किसी की तू ,आपस में ही सब एकमत नहीं हैं | तू दिल से लिख, दूसरों के दिल तक जरूर पहुंचेगी |” हमने अगर सच्ची संवेदना के साथ लेखन किया है तो वह पाठकों तक पहुंचता है और यही हमारा सबसे बड़ा सम्मान है |

‘बिन मुखोटे के’ श्रद्धा और आस्था के महत्व को दर्शाती है |

आज का यथार्थ दर्शाती , ‘नीयत’ बेहतरीन लघुकथा है | स्मृतियां उतनी मायने नहीं रखती जितनी मां की विरासत | एक पिता की अनुभवी आंखें उस भाव को पहचान जाती है ,

“बिटिया बंद कर दे मां की अमानत वरना बिखर जाएगी |” ‘आत्मग्लानि’ विडंबना है,

“आजकल सिद्धांतों की रस्सी पर बिना डगमगाए चलना वाकई बहुत मुश्किल है|” ‘बदलाव’ ‘रावण मन के भीतर बैठा है’ स्त्री विमर्श के मुद्दे को अलग अंदाज में उठाती है लेखिका | राजनीति - कूटनीति परिवारों में भी घर कर गई है | ‘मीठा जहर’,  बताती है | कंस मामा जिंदा हैं| ‘पेट की मजबूरी’ जैसी लघुकथा देश का  दुर्भाग्य है | ‘भूख’ एक जीवन रक्षक (डॉक्टर) की अपने पेशे से बेईमानी और लिंग भेद की कथा है|  ‘दर्द’, यक्ष प्रश्न बाल सुलभ मन की लघुकथा है| ‘परछाई’ से प्रेमचंद की कथा ईदगाह स्मरण हो आई | उसी तरह ‘अस्त्र’ जमीन पर लोटना बच्चे अपना जन्मसिद्ध अधिकार और सर्वव्यापी अस्त्र मानते हैं| ‘आशंका’ समय की मांग है ‘मुझे भी गुड टच बैड टच के बारे में पता है। अंकल ने तो बस प्यार से चॉकलेट दी थी|”

‘ब्रेकिंग न्यूज़’ में थोड़ा अटक गई | कारण इस तरह के शब्द प्रयोग नहीं होते वह भी तब जब लाइव प्रोग्राम चल रहा हो ,

“अबे बुड्ढा जाके खोज, होगी कहीं मुंह काला कर रही होगी ...देख नहीं रहा हम ब्रेकिंग न्यूज़ चला रहे हैं |” ‘पाठशाला’ लघुकथा बताती है वही ज्ञान बड़ा होता है जो जीवन की पाठशाला में पढ़ा हो | ‘सच्ची सुहागन’ मार्मिक रचना है | ‘सर्वधाम’ बहुत बढ़िया लघुकथा है। चारों धाम माता-पिता की सेवा, इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं| एक संदेश परक रचना है इनकी दरकार है आज | 

‘बेटी’ बाप बेटी के प्रेम के साथ स्त्री के आत्मविश्वास की कथा है ,

“आपकी तरह अपनी बिटिया के शक्तिशाली हाथों को पकड़ मैं भी चौथा पड़ाव पार कर लूंगी |” सीख देती लघुकथाएं हैं, ‘अफवाहों के बीच’, संगत का फल भुगतना पड़ता है | प्रणव की संगति ने उसकी दुर्गति की | ‘ग्लानि’ पर्यावरण पर पोते द्वारा दादा को दी सीख है | ‘ठंड’ लघुकथा में अपेक्षाकृत कुछ अधिक विस्तार हो गया, ‘राक्षस’ आज तार-तार  होते रिश्ते समाज की चिंता का विषय है | ‘दुनियादारी’ में प्रयुक्त आंचलिक भाषा अपना प्रभाव छोड़ती है| सविता जी की कथाओं में अवधी, प्रयागराज क्षेत्र की भाषा का प्रयोग दिखाई देता है | आंचलिक भाषा सदैव साहित्य को रसविभोर करती है | भाषा की आंचलिकता को बरकरार रखते हुए इनके प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए | ‘मुक्ति’, ‘परिपाटी’ अंधविश्वास के विरोध में बहुत प्यारी लघुकथा है। यह लेखकीय दायित्व है कि वह समाज को जकड़ी हुई  रुढियों से आजाद कराएं | सकारात्मक सोच की अच्छी कथा ‘उपयोगिता’ तकनीकी आज लघुकथा का प्रिय विषय है | यहां मोबाइल को लेकर अच्छा प्रयोग किया है |

‘सच्चा दीपोत्सव’ , ‘कपूर’ संवेदनशील लघुकथाएं हैं |आज जहां सर्वत्र बेटों द्वारा वृद्ध आश्रम की घटनाएं पढ़ने को मिल रही है ऐसे में अलग हटकर प्यारी सी कथा है ‘तोहफा’ ,

“बाबा ! आप अपने वृद्ध आश्रम में अपने बेटे -बहू को भी आश्रय देंगे ना।”

‘पारखी नजर’ आज के भौतिक चकाचौंध के युग में नसीहत देती है | कि पारखी नजर भीतर का सौन्दर्य देखने की क्षमता रखती हैं | ‘कलुषता’,’कसक’ बाप बेटे के बीच पिघलती शिला का काम करती है | 

इस तरह सविता जी की लेखनी से निकले कुल एक सौ एक ‘रोशनी के अंकुर’ लघुकथा विधा को समृध्द करते हैं | संग्रह की 3-4 लघुकथाओं को छोड़कर सभी लघुकथाएं रोचक एवं पठनीय हैं | यह उनका प्रथम प्रयास था इसलिए यह गुंजाईश तो बहुत सामान्य बात है | बड़ी बात है लेखिका ने विधा को समझते हुए अपने अनुभव साझा किये | साहित्य और क्या है , जीवन और जगत के अनुभवों का दस्तावेज ही तो है | इस दृष्टि से ‘रोशनी के अंकुर’ संग्रह का लघुकथा के पाठकों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए | मैं अनुजा सविता जी को बहुत बहुत शुभकामनायें देती हूँ | माँ सरस्वती की कृपा आप पर यूँ ही बनी रहे |


डॉ. लता अग्रवाल 

भोपाल

Sunday, 28 June 2020

समीक्षा- रोशनी के अंकुर (लघुकथा संग्रह)

“रोशनी या प्रकाश-पुंज”
पुस्तक-“रोशनी के अंकुर”
रचनाकार- सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
प्रकाशक: निखिल पब्लिशर एंड डिस्ट्रीब्यूटर, आगरा
प्रकाशन वर्ष: २०१९
आलोचकों को अब लघुकथाकारों ने अपनी ओर आकर्षित करना शुरू किया है, लघुकथाओं पर आलोचना लिखी जा रही है, जो इस विधा को एक सही स्थान देने के लिए आवश्यक भी है। आलोचक अब नए रचनाकारों को तवज्जो देने लगे हैं, यह भी एक सुसंकेत है, कुछ लघुकथाकारों ने आलोचकों की ओर अपना ध्यान आकृष्ट किया है, सविता मिश्रा ऐसा ही एक नाम है जिनकी लेखन क्षमता हमें चौंकाना नहीं छोड़ती, यह उनके और लघुकथा विधा दोनों के लिए ही एक शुभ संकेत है। इस रचनाकार की मौजूदगी लघुकथा लेखिकाओं को भी बहुत आश्वस्त करती है, एक बानगी देखिए—“चुप कर मुई! कोई सुन लेगा, समाज में इज्जत बाकी रहे इसके लिए बहुत कुछ करना होता है, और फिर मैं तो उसे मर्द के नाम की छाँव दे रही हूँ। अब भले ही वह नामर्द है। उसकी भी इज्जत ढकी रहेगी और अपनी भी।“
“रोशनी के अंकुर” असल में न ही कहानी संग्रह है, न ही ये लघुकथा संग्रह ही, इसमें समाहित १०१ रचनाएँ हैं, जो कहानी की रवानगी से शुरू होकर लघुकथा के कलेवर में प्रस्तुत होती हैं। कथानक के चयन से लेकर वाक्य-विन्यास की दृष्टि से अगर देखा जाए तो मालूम होता है कि कहीं लघुकथा के कथानक को कहानी के अंदाज में लिखा गया है तो कहीं कहानी के कथानक को लघुकथा के रूप में लिखा गया है। लेकिन एक बात महत्वपूर्ण है कि रचनाकार सामान्य पारिवारिक विषयों/ समस्याओं का भी अति-विशिष्टीकरण करने में सक्षम है। इन समस्याओं को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना ही रचनाकार की बड़ी विशेषता है। समाज में हो रहे परिवर्तन- आधुनिकीकरण, विकास, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, इत्यादि का पारिवारिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है, सविता इन सबका सूक्ष्म विश्लेषण करती हैं, पीढ़ियों के न खत्म होने वाले अन्तर को “अनपढ़ माँ” में बखूबी दिखाया गया है, दाम्पत्य सम्बन्धों में संदेह हमेशा बना रहता है जिसको “कागज का टुकड़ा” में देखा जा सकता है। सविता हर पारिवारिक घटना पर मानो नजर गड़ाए बैठी हैं, कहीं आन्तरिक द्वंद्व को गहरे से निकाल पन्नों पर उकेर देती हैं, तो कहीं पारिवारिक रिश्तों में “प्यार की महक” को खोजने लगती हैं । बनते बिगड़ते रिश्तों में “तुरपाई” के महत्व को भी वे रेखांकित करना नहीं भूलतीं। जिसमें धागे के उलझने और रिश्तों के उलझने का अंतर-सम्बन्ध लेखिका ने दर्शाया है।
“रोशनी के अंकुर” पुस्तक सविता की संवेदनाओं का विस्तार है जो विभिन्न पात्रों के माध्यम से उभरता है। उनके पास संवेदनाओं के विभिन्न रंग है। ”तोहफा” कथा सकारात्मक सोच की एक बढ़िया पारिवारिक रचना है। “नियत” मनोवैज्ञानिक स्तर पर लिखी गयी सुन्दर रचना है। सविता की एक विशेषता ये है वे मात्र कथानक को विस्तार देने के लिए नहीं लिखती हैं। उनके लेखन में कथा के यथार्थ के साथ समाधान भी उपलब्ध है जिसे वे पात्र के माध्यम से समाज के सामने बड़े ही सहज ढंग से पेश करती हैं। ”माँ की सीख” में माँ कहती है-“जिन्दगी की कुछ तस्वीरें सबक सीखने-सिखाने के लिए भी ली जाती हैं।...” ये तस्वीरें है- लाल किले के कोने में पान के पीक, बदबूदार गन्दा कोना, पत्थरों पर लिखे आलतू-फालतू नाम, जगह-जगह लुढ़की हुई पानी की खाली बोतलें। लेखक का काम लिखना मात्र नहीं है- वह समाज को चेताने का काम भी करता है, समाज को जागरूक भी करता है, बहुत साधारण तरीके से लिखी गयी यह रचना समाज को बहुत बड़ा सन्देश दे जाती है।
कथा ‘निर्णय” में कबड्डी-खिलाड़ी का सब्जी बेचना पूरी शिक्षा-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है। गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ी का बेटे द्वारा परिचय कराने पर नीलम के चहरे से ख़ुशी का काफूर होना, बेटे के भविष्य की चिंता की लकीरें उसके चेहरे पर उभर आना, देश में खेलो के महत्व पर सोचने की ओर इशारा करता है। ”अभिलाषा” एक मानवेत्तर रचना है जिसमें चूड़ियों के माध्यम से एक सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया गया है। “सच्ची सुहागन” में नायक जेब में महज दो सौ रूपये देख सामान खरीदने की योजना बनाता है, लेखिका यहाँ गरीबी का एक चित्र खींचती हैं, नायक सामान ले घर पहुँचता है। पत्नी के साथ संवाद- “बड़े खुश लग रहे हो, लगता है कल ले लिए, बच्चों को भरपेट खाने को कुछ लाये हो, आज तो भूखे पेट ही सो गए दोनों।“- यहाँ लेखिका ने कहने का प्रयास किया है- माँ के लिए बच्चों से बढ़कर कुछ नहीं।
“राक्षस”लघुकथा के माध्यम से लेखिका परिवार में बच्चियों की सुरक्षा पर प्रश्न-चिह्न खड़ा करती हैं, रचना का कथानक एक वीभत्स घटना है-जहाँ पिता ही बेटी की अस्मिता को तार-तार कर देता है, यह समाज का घिनोना सच है जिससे लेखिका रूबरू कराती हैं। “बेबसी” द्वारा बच्चों के विवाह के बाद रिटायर माँ-बाप से अपने व्यस्त जीवन से समय न निकाल पाने की लेखिका की वेदना सभी बुजुर्ग माँ-बाप की वेदना बनकर उभरती है।
“ठंडा लहू” व्यंग्यात्मक शैली की रचना है। जिसे पढ़कर हिंदी भवन दिल्ली के पास चाय बेचते साहित्यकार “लक्ष्मण राव” की याद आती है, कितने ही साहित्यकार हैं जो बहुत अच्छा लिखने के बावजूद प्रसिद्ध नहीं हो पाते हैं, जिसका एक बड़ा कारण प्रकाशकों का बदलता स्वरुप है, इस रचना का पात्र परशुराम ऐसा ही एक पात्र है।
“मन का बोझ” की शुरुआत लेखिका व्यंग्यात्मक संवाद से करती हैं, जिसमें खुद के पुत्र के दुर्घटना में मारे जाने पर पात्र में संवेदना जागृत होती है, यह आत्मग्लानि से आत्मचेतना की रचना है। “बदलते भाव” में लेखिका मार्के की बात कहती हैं-“छीन-झपटकर कोई कब तक जिन्दा रह सकता है भला, पाप का घड़ा एक न एक दिन फूटता ही है।“ संग्रह की एक रचना है –“आस” जिससे एक सन्देश प्रदर्शित होता है-“इंसानियत की पहचान इन्सान की नजदीकी से पता चलती है, सुनी-सुनाई बातों से नहीं।“ यहाँ एक बात और ध्यान देने की है- अभाव वस्तु की कीमत का अंदाजा लगा देता है। एक संवाद देखिये-“अन्न का अपमान नहीं करना चाहिए.... ये अमीर लोग क्या जाने इन दानों की कीमत, यह तो कोई मुझसे पूछे, जिसके घर में हांड़ी में अन्न नहीं, पानी पकता है।“ ये एक पंक्ति समस्त साहित्य पर भारी पड़ती है।
“खुलती गिरहें” पढ़कर अंदाजा होता है कि लेखिका इस सब्जेक्ट में विशेष दक्षता रखती हैं, इस रचना और लेखिका दोनों पर सामाजिक प्रभाव का असर है। यह असल में पलायन की रचना है, जिससे सन्देश जाता है कि विचार परिवर्तन ही रिश्तों को सहज करते हैं। एक संवाद इसी रचना से-“मैंने ही सासु माँ नाम से अपने दिमाग में कँटीली झाड़ियाँ उगा रखी थी। सब सखियों के कड़ूवे अनुभवों ने उन झाड़ियों में खाद-पानी का काम किया।“ असल में सास शब्द को लेकर समाज में एक अजीब सी रिश्तों की दूरी है, जिससे बाहर आने का सन्देश ये रचना देती है। “वर्दी” पीढ़ियों की सोच का अंतर दर्शाती रचना है जो ज्यादा प्रभाव तो नहीं छोडती, लेकिन पहले लिए गए निर्णयों का प्रभाव आगामी जीवन पर क्या पड़ता है, इस बात की पड़ताल अवश्य करती है। “टीस” से स्त्री-पुरुष के बीच चारित्रिक भेद का अंतर लेखिका पुन: उजागर करती हैं, किसी एक महिला के घर छोड़कर जाने की सज़ा समाज कई पीढ़ियों को देता है, जबकि कोई पुरुष घर छोड़ जाए तो उसे सहानुभूति मिलती है, लेखिका ने यहाँ समाज के दोहरे चरित्र पर सवाल खड़ा किया है। “ढाढ़स” में दो वर्गों के अंतर को दो संस्कृति के अंतर के तौर पर रखा गया है, लेखिका पढ़ाई की अहमियत को इंगित करते हुए सन्देश देती हैं कि शिक्षा इन संस्कृतियों के अंतर को कम कर सकती है।
लेखिका को अभी साहित्य के क्षेत्र में बहुत कुछ करना है तो बहुत कुछ सीखना भी है, जो बात पूरे संग्रह में अखरती है वह है, विषयों में विविधता का न होना, कथानक चयन में एक बने बनाये दायरे के इर्द-गिर्द घूमना। व्याकरण पर भी लेखिका को ध्यान देना होगा। “दर्द” रचना की पहली पंक्ति- शिखा अपने पड़ोसन अमिता और बच्चों के साथ पार्क में घूमने गयी.... शिखा अपने बच्चों को आवाज दी... श्रेया, मुदित जल्दी आओ घर चलना है.... कोई पार्क का पहरेदार देखकर गुस्सा न करने लगे.... । एक ही रचना में इस तरह की व्याकरणिक गलतियों को टंकण की अशुद्धि कहकर नहीं बचा जा सकता। इस रचना का विषय पेड़-पौधों का दर्द है जिन्हें बोध कथाओं में खूब लिखा गया है, फिर इसमें नया क्या है? ”भूख” रचना में आँसुओं की नन्हीं-नन्हीं बूँदें तकिये की गोद में सोने चली थी,... ये किस तरह का प्रयोग है, मेरी पाठकीय नजर से बाहर की बात है। “आस” में अतः आधी टिफिन भीखू को दे डाली...., यहाँ भी व्याकरण पर ध्यान देने की जरूरत है। “तीसरा” रचना को आखिर लेखिका ने क्यों लिखा उस पर सवाल हो सकता है लेकिन आत्मकथ्यात्मक शैली में लिखी रचना में –“अक्सर सोचती हूँ कि आखिर ऐसा क्यों करते हैं लोग” जैसे वाक्यों से बचना चाहिए। “निर्णय” रचना को अगर संवाद के साथ विवरणात्मक शैली को भी सम्मिलित किया जाता तो अधिक प्रभावी रचना होती। “समय का फेर” रचना स्वयं में समय की मांग करती है, लेखिका अगर इसे समय दें तो इस रचना कोई भी बेहतर ढंग से लिखा जा सकता है।
अबोर्शन को केंद्र में रखकर लिखी "भूख" रचना पर लेखिका को सुझाव देना चाहूँगा- लेखिका को भाग्य या गलत काम के प्रभाव पड़ने जैसे अवैज्ञानिक विचार से बाहर आना चाहिए। बच्चे न होना एक वैज्ञानिक कारण है, जिसकी वजह किसी डॉ का गर्भपात में लिप्त होना नहीं हो सकता। यह मानसिकता बिल्कुल वैसी है जैसे शाप से सर्वनाश जैसी कल्पना करना। “नजर” और “मीठा जहर” औचित्यहीन रचनाएँ हैं, लेखिका को इस तरह की रचना लिखने से भी बचना चाहिए। “हाथी का दांत” में लेखिका ने “मोदी जी” शब्द का इस्तेमाल किया है। साहित्य वह होता है जो भविष्य में भी अपने समय का प्रतिनिधित्व करता है। “नेहरु” टायटल से ब्रांड बनने में सदी लगती है, “मोदी” टायटल को ब्रांड बनने में समय का इंतजार करना होगा। “टायटल के शब्द रचना को हल्का बनाते हैं और साहित्य को कालजयी होने से रोकते हैं, रचना मात्र सामायिक होकर रह जाती है, पद “प्रधानमन्त्री” इत्यादि लिखना जोखिम से बचना भी होता है और रचना को समय से आगे ले जाना भी। रचनाकार को शब्द-संचयन के मामले में बहुत सचेत रहने की आवश्यकता है, इसे कथ्य और कथा विन्यास के हिसाब से भी एक कमजोर रचना ही कहा जायेगा।
लेखिका की अधिकांश रचनाएँ नारी-वेदना, नारी-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण के इर्द-गिर्द घूमती हैं, लेकिन वे स्त्रीवाद की हिमायती न होकर स्त्री की अस्मिता की हिमायत करती हैं, जो लेखिका को स्त्रीवादी रचनाकारों से अलग करता है। उनके अन्दर की स्त्री-चेतना स्वाभाविक है। अधिकांश रचनाओं में लेखिका स्त्री के प्रति समाज के संकुचित दृष्टिकोण पर ध्यान आकृष्ट करती दिखाई देती हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो सविता के लेखन को सफल कहा जा सकता है।
भाषा-शैली की बात करें तो सविता की भाषा काफी लचीली है, जिसमें वे बातचीत के अंदाज में अपनी बातें कहती जाती हैं। उन्हें किसी भी तरह से किसी विशेष शैली की जरुरत महसूस नहीं होती। कहीं-कहीं मुहावरों का प्रयोग भी किया गया है. हालांकि अभी यह सविता की पहली एकल किताब है तो इसमें शब्दों के प्रयोग में बहुत अधिक सावधानी दिखती नहीं देती है। कहीं-कहीं वे असावधानी से भी कुछ प्रयोग करती हैं। सामान्य शब्दों के साथ कहीं कहीं भारी-भरकम शब्दों जिनका पर्याय आम बोलचाल के शब्दों में भी उपलब्ध है, का इस्तेमाल भी लेखिका कर गई हैं जिनसे अर्थ पर तो नहीं लेकिन, वाक्य के प्रवाह और सौन्दर्य पर प्रभाव पड़ता है। “मन का चोर” सुनते ही चेहरा फक्क पड़ गया, बोली- इस बंटी ने लगा गिरा दिया होगा...  तू कुछ खाई की नहीं... “कथा है”- कितना अच्छा तो लिखी हो रूबी..... “मीठा जहर” ...”अरे दी आप भी न. ।“ ”भाई । फिर वह रोहित को सम्बोधित हुआ.... । ”बदलाव” लघुकथा में कुछ संवाद बहुत अच्छे हैं लेकिन अंत तक आते-आते लेखिका कथा-वाचिका की भूमिका में आ जाती है, यह रचना अंत तक आते-आते अपना अभीष्ट खो धरासाई हो जाती है, रचनाकार से अपेक्षा की जाती है कि वह रचनाकर्म करते समय तठस्थ रहे।
पाठशाला में मुहावरा का प्रयोग भी वे करती हैं –......आग से रुई हुई जा रही थी। बहरहाल, कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि सविता के इन रोशनी के अंकुरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये रोशनी सीधी पाठकों की आँखों को खोए रखती हैं, और हमें यह मानना होगा कि ये अंकुर अपने आप में हिंदी साहित्य को विधागत स्तर पर और समृद्ध कर स्वयं एक वट वृक्ष बनेंगे। रोशनी के अंकुर में काफी कुछ मौजूद है।
कुल मिलाकर पूरी पुस्तक पठनीय होने के साथ-साथ विचारणीय भी है। प्रकाशकीय स्तर पर कुछ वर्तनी संबंधी अशुध्दियाँ हैं, जिनसे कहीं-कहीं अवरोध भी उत्पन्न होता है। उन्हें नज़रंदाज़ भी नहीं किया जा सकता। साज-सज्जा की दृष्टि से पुस्तक आकर्षक है और आवरण-पृष्ठ उतना ही विशेष है जितनी सविता मिश्रा की रचनाएँ. रचनाकार को इस पुस्तक के लिए शुभकामनाएँ।

समीक्षक
संदीप तोमर
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Saturday, 16 May 2020

क्रेडिट कार्ड (लघुकथा)

“माँ..,”  फोन पर रुंधे इस एक शब्द को सुनते ही  शैली अपने बेटे की घबराहट को भांप ली। अब  शैली उस आवाज के माध्यम से अपने बेटे की रोती आंखे साफ साफ देख पा रही थी। अपने को संयमित करके बोली-
“रोओ नहीं बेटा, क्या हुआ बताओ तो?”
न जाने कितने दुर्विचार शैली के सामने से चलचित्र की भांति चलने लगे । वह साहस जुटाकर बोली, “मैं हूँ न! बताओ तो..!"
माँ आज क्रेडिट कार्ड से किसी ने सारे रुपए बैंक खाते से उड़ा लिए। मैं नींद में था तभी फोन आया था और..और...सेकेंड भर में सारे रुपये..!”
मन किया कि कहे इतनी लापरवाही, सोने के चक्कर में होश खो बैठा था क्या? कल ही फीस को दिए पूरे दो लाख रुपए लुटा बैठा..! लेकिन फिर आंखों के सामने वो घटनाएं घूमने लगी जिसमें बच्चों के साथ घटी ऐसी घटनाएं दृष्टिगोचर हुई जिसमें बच्चे क्रेडिट कार्ड से रुपए लूटने के बाद माता-पिता की डांट के डर से आत्महत्या कर लिए थे। उसने अपने को सायास वर्तमान में धकेला और बोली- “बेटा, कोई बात नहीं, गलतियां हर किसी से हो जाती हैं। बस अब से जाग जाग जाओ और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल सावधानी पूर्वक करो, वरना येन केन प्रकारेण सारी मेहनत की कमाई ये क्रेडिट कार्ड  चूस लेगा, क्योंकि इसकी तो आँखें हैं नहीं, बस मुँह ही मुँह है।”
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सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
आगरा

Monday, 9 December 2019

मन की बात ततः किम के साथ (समीक्षा)


बबूल के कांटे-सी चुभती हुई लघुकथाएं

"ततःकिम" (
फिर क्या) संध्या तिवारी की पहली पुस्तक है | जो आजकल की प्रचलित और बहुधा पसंद की जाने वाली विधा लघुकथा को लेकर साहित्य क्षेत्र  में २०१८ अवतरित  हुई है | प्रथम दृष्टया पुस्तक का नाम लुभाता है और लेखिका की भाषा कैसी होगी इसका भी आभास करा देता है | वो कहते है न कि फस्ट इम्प्रेशन बढ़िया पड़ना चाहिए, जिसकी लेखिका ने भरपूर कोशिश की है और लेखक/लेखिका को करनी भी चाहिए। कई मूर्धन्य वरिष्ठ लेखकों से अपनी लघुकथाओं के बारे में लिखवाकर लघुकथा क्षेत्र में अंगद पांव रखने का लेखिका के द्वारा सफल प्रयास हुआ है| उनके बारे में दो लाइन, जब किताब हाथ में पढ़ने को ली तो ऐसे ही दिमाग मे आ गई--

संस्कृत की हैं पंडित बड़ी, तो भाषा का क्यों न हो ज्ञान
कथ्य को करती निरुपित ऐसे, जैसे हों शब्दों की विद्वान|

लघुकथाएँ विसंगतियों को लेकर छोटे रूप में लिखी जानी चाहिए | और अंत में कुछ ऐसी मारक बन पड़ी हों कि इंसान तिलमिला उठे, २०१४/१५ में प्रचलित इस नियम का इस लघुकथा संग्रह में ख़ास ख्याल रखा गया है| अति भावुक व्यक्ति इस संग्रह की दस- पन्द्रह लघुकथाएँ एक बार में नहीं पढ़ सकता है| हमने तो पढ़कर रख दी थी लेकिन फिर लगा कि किसी भी सँग्रह को पढ़कर उसके बारे में दो 
शब्द न कहना अच्छी बात नहीं है| प्यार से भेंट की गयी पुस्तक पर कुछ तो कहना ही चाहिए| जाहिर है दो शब्द कहने के लिए हमें फिर से पढ़नी पड़ी | १५/१६ कथाओं का तो पहले ही सार लिख चुके थे लेकिन फिर बहुतों की अभी हाल ही में लिखे|
इस संग्रह की सभी लघुकथाएँ पाठक को तिलमिलाता हुआ छोड़ देती हैं | सारी लघुकथाएं नकारत्मक/मारक बन पड़ी हैं जिसे पढ़ते हुए सहसा श्री सतीशराज पुष्करणा अंकल जी की बात याद हो आती है कि लघुकथाएँ सकारात्मकता लिए हुए होनी चाहिए | लेखक को सोचना चाहिए कि आखिर वह समाज को दे क्या रहा है| फिलहाल इस संग्रह की हर एक लघुकथा पाठक केे मन मेे बबूूल के कांटे-सी चुभती हैं | एक भी लघुकथा ऐसी नहीं मिली जो दिल को सुकून दे जाए | पढ़ने के बाद पता चलता है कितना जरुरी है विसंगतियो को लेकर कुछ सकारात्मक और कुछ हल्का/फुल्का लिखना भी।

 खैर अब इस संग्रह की लघुकथाओं की बात करते हैं ---
    
‘सांकल’ में छुआछूत का जिक्र करते हुए बेटी माँ को उसकी दोगली नीति से परिचित कराती है| जो की बाल्मीकि स्तोत्र पढ़ती तो है वह लेकिन बाल्मीकि समाज से दूरी बनाए रखना चाहती  है|
‘कठिना’ में मान सम्मान के चलते एक मासूम की जान लेने की कथा है| कथा में साफ-साफ दिखलाया गया है कि रिश्ते के भाई का न तो लड़की से प्रेम था, ना ही तत्क्षण की गलती थी| वह प्यार भितरघात हेतु प्लांट किया गया था| रिश्ते सच में बड़े जर्जर हो चुके हैं आजकल|

‘सीलन’ बेटी की मां और विधवा का सामंजस्य! आह निकल आती है इस मिलान पर |यह सीलन न जाने कब सुखेगी| वैसे बीच में जरा-सा बिखरी सी भी लगी हमें|
‘अंतर’ में अपने और गैर में अंतर साफ दिख जाता है| एक कहावत याद आ जाती है आदमी अपने जाए(बच्चों से) से ही हारता है|

‘आदमी’ में आदमी तो रहा ही नहीं, रोबोट से थे सब|

‘योगमाया’ आदमी जहां से चलना शुरु होता है अंततः पहुंचता भी वहीं है| आंखें खुल जाए तो यह बड़ी अच्छी बात है|

 ‘राजा नंगा है’  राजा भले नंगा हो पर प्रजा नंगी नहीं होनी चाहिए| इस समाज का राजा पुरुष, स्त्री का हाथ क्या! सिर काटने पर आमादा है|

‘क्या नाम दूं’ काला अक्षर भैंस बराबर, और क्या नाम दूं|

 ‘दिल से दिल में’ रहने की काश कोई कला सीख ले तो सारी कायनात मिल ही जाए|

 ‘भंवर’ करप्शन का ऐसा भंवर है जो कागज पर कुछ और, और असलियत में कुछ और ही होता है|

‘क्षेपक’ आदमी कितना भी पढ़-लिखकर बड़ी पोस्ट पर पहुँच जाए लेकिन जातिवाद के जाल से निकल न पाने की सोच पर चोट करती रचना | बेटी की पसंद वाले लड़के पर मुसहर की मोहर लगते ही चमार होते हुए भी पिता अगिया बेताल बन गया | लेखिका के कटाक्ष के तीर सीधे चुभते हैं|

 ‘फाँस’ में सालों की गुलामी की फाँस भीखारी के साथ अंग्रेज के मिस-बिहेवियर से उभर आना अच्छा लगा | पुराना जख्म इतना उभरा कि भीख न देने के हिमायती होते हुए भी सौ रूपये की भीख देकर वहां से उसे हटा देते हैं | कुछ कम  शब्दों  में समेटी जा सकती थी यह|

 ‘किसी भी कीमत पर’
 बाँझ न होने की कीमत यदि मांस का लोथड़ा भी हो तो एक औरत ‘बांझ’ होने का सामाजिक कलंक मिटाने को तैयार हो जाती है| बहुत बड़ी विसंगति है यह समाज की | ऐसे  समाज को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए |

‘ठेंगा’ इस लघुकथा में जमीर को ठेंगा दिखा  दिया गया है| आदमी पेट के लिए कितना गिर जाता है| पता नहीं मजबूर हो जाता है पेट की आग से या फिर....
 भगवान कथा को जोड़ना जरा नागवार गुजरा हमें | लेकिन सबकी अपनी-अपनी मर्जी और लेखन की कला |

‘बेचारे’ वृद्ध घर से निकाले गये या खुद निकलते नहीं है बल्कि उनकी गंदी आदतें भी वृद्ध आश्रम की मंजिल देख लेती हैं|

‘मोह’ में वृद्धा को खाना-कपड़ा-रहना फ्री का लालच मिलता है फिर भी जाने को तैयार नहीं होती है | परिवार के साथ न चलने पर कहती है कि अपना खून अगर मार भी डाले तो छाया में ही डालेगा | पराये तो पराये ही हैं | कहावत के जरिए अपनों से मोह दिखाया गया है| कुछ कहने को और है ही नहीं | मार-डाट आदमी सहता ही अपनों के बीच रहने के लिए है|

‘तोरई बनाम काजू’ दर्द में भी पति अपना मतलब निकालना चाहा | सब्जी के बहाने से स्त्री के दर्द को बयाँ करती कथा|
‘जय हो भारत’ धार्मिक भावनाओं को लाभ उठाना तो भारतीय परंपरा रही है| जय हो भारत|

‘न जाने कितनी मैरीकॉम’ जंजीरों में जकड़ दी जाती हैं| भाई-भतीजावाद और गरीबी दोनों सोने पे सुहागा का काम करती हैं |

‘सदाबहार’ पौधे के नाम से बढ़िया कटाक्ष हुआ है बेटियों को पालने में होती कोताही पर| लड़कियों के लिए आखिर आदमी इतनी जद्दोजहद कहां करता है फिर भी सदाबहार की तरह पल जाती हैं बेटियां|

‘कबाड़’ में लेखिका ने मुसलमानों के द्वारा लव-जिहाद करके लड़कियों को फांसकर उनका चरित्र हनन की घटना पर प्रकाश डाला  है|

‘हूक’ हमें समझ कम आई | लग रहा है जैसे कुछ ज्यादा ही अनकहा/अनसुलझा रह गया है|
(लेखिका से बात करके पता चला कि माँ के अपराध बोध की कथा निहित है इसमें) बीच में
स्वर्गारोही पात्र द्वारा  वार्ता के कारण थोड़ी उलझ गयी थी |

‘छिन्नमस्ता’ देवी को अपने द्वारा कन्या भ्रूण हत्या करके खुद अपने को उन्हीं की जगह देखना, बहुत कुछ कहती है यह लघुकथा|

‘उफ्फ’ में मरने के बाद क्रियाकर्म के नाम पर खूब भोज्य पदार्थ बर्बाद किया जाता है | जीते जी जिसे प्यासा मार दिया| उसी के मरने के बाद इतनी ज्यादा व्यवस्था करने पर चोट करती कथा|

‘चप्पल के बहाने’ भगवान के नाम पर ब्राह्य आडम्बरों पर चोट करती कथा | ‘ईसुर कहाँ नहीं हैं’ सच्चाई तो इसी एक पंक्ति में ही है |
‘खाई’ के बहाने गर्ल्स हॉस्टल की सच्चाई उजागर की गयी है| हास्टल संस्कृति से दूरस्थ अनजान बच्चे जब इसमें रंगते हैं तो अपने मां-बाप को गंवार समझने लगते हैं| दो पीढ़ी के बीच की खाई 
को दर्शाती हुई लघुकथा|

‘बया और बंदर’ में औरत और मर्द का फर्क बताया गया है| औरत बयां की तरह तिनका तिनका इक्कठा करके घर बनाती रहती है और बंदर घर को उजाड़ता रहता है| प्रतिक के माध्यम से बढ़िया लघुकथा |
‘बिना सिर वाली लड़की’ हर कष्ट सहती रहती है | पंच लाइन मारक बन पड़ी है| कष्ट उसे होता है जिनके सिर उग आते हैं | बिना दिमाग की लड़की आदमी को खुश रखने के लिए वह सब करती है जिसमें दिमाग वाली लड़की नहीं करना चाहेगी |
‘अवधि कितनी होगी’ पुरातन और इतिहास की भटकती आत्माओं के द्वारा आज के मानवों के द्वारा किये पाप को गिनाया गया है | प्रेत का कहना कि हम दोनों का प्रायश्चित इतना तो इन मानव का कितना समय बीतेगा प्रायश्चित में | गहरा सन्नाटा छा जाना घोतक है कि इंसानों की मुक्ति की कोई अवधि तय नहीं है | दिनोदिन उनके द्वारा बढ़ते पाप पर चिंता जताई गयी है |

‘वह’ के जरिए उन लोगों का जिक्र किया गया है जो कष्ट सहते रहते हैं इर्ष्या के वशीभूत होकर, लेकिन इर्ष्या का कारण समाप्त होते ही वह संतुष्टि को प्राप्त होते हैं|
 'कुंठा’ में सब कुछ सहते-सहते प्रतिकार रूप में खुद पर देवता आने के ढोंग करके रुख ही पलट गया है| अब सब उसका सम्मान करने लगे थे, उसका अपमान कर रहे थे जो अब तक | सटीक ऊँगली धरी गयी है इस कुंठा पर|
 ‘कब तक’ में यमराज के द्वारा चित्रगुप्त से प्रश्न किया गया कि कब तक भारतीय सावित्रीओं से हारता रहूंगा| पूरी रचना का सार इसी एक ही लाइन में समेट लिया गया है |
‘आरक्षण’ में कमजोर बूढ़ा बाप बेटे के बहानों से त्रस्त होकर आत्महत्या करके भगवान के घर में आरक्षण करा लेता है|
‘उर्वशी’ में पैसों के आगे बिछती उर्वशी के सामने भिखारी ने रुपए बढ़ाकर 
घंटा मांगा तो उसको अपने सारे श्रृंगार फिजूल लगने लगे | रुपए में ही तो बिक रही थी अब तक| लेकिन अब उसे अपने से घृणा होने लगी थी| थोड़े में बहुत कुछ कहती कथा|
 ‘शेखचिल्ली’ के किस्से तो खूब सुने थे पर उसका उपयोग ऐसे करना बढ़िया लगा | बहु बुजुर्ग ससुर के मरने की चाहत करती है लेकिन वह तो डंडा फटकरते हुए अपशकुनी बिल्ली को मारने दौड़ पड़ा है|
 ‘!!!??’ लघुकथा सच में उतनी ही सवाल और शंका उठाती है जितना की शीर्षक में निशान लगा है|
‘पगली’ कुछ खास नहीं लगी| कथानक सच के साथ नहीं खड़ा है सायास कहने भर का प्रयास है | ऐसा लग रहा है जैसे जज निर्णय सुनाने के लिए झूठ की सीढी पर चढ़ा दिया गया है |
‘बाबू’ में बेटा बेटी का फर्क बखूबी दर्शाया गया है| या यह भी कह सकते हैं कि दूसरा बच्चा होने पर पहले की अनदेखी हो ही जाती है| यदि पहली सन्तान लड़की ह टी और ज्यादा ही|
‘आदमकद आइना’ ऐसा कहाँ कोई मिलता है जो रंग-रूप-गुण में जैसा हो वैसा ही उसे अपना सके आईने की तरह |
‘लाक्षागृह’ में एक स्त्री पुरुष की दोस्ती पर हमेशा से प्रश्न चिन्ह रहा है और रहेगा भी | साहित्य का क्षेत्र भी इस मामले से बाहर नहीं है | इसमें एक स्त्री दूसरी स्त्री के चरित्र पर सवाल उठाती है जो आरोप एक स्त्री को लाक्षागृह जैसी यातना देता है |
‘बेताल प्रश्न’ वैश्विक संस्कृति पर सवाल तो उठाती है पर अपनी संस्कृति का भी सम्मान नहीं कर पाती है यह रचना|
‘खरपतवार’ , बिटिया सच में खरपतवार ही तो होती हैं | बिन सहेजे-संवारे बढ़ती जाती हैं|
‘हरी बत्ती’ में शिक्षा विभाग में फैले भ्रष्टाचार को दिखलाया है|
‘जड़’ में पोते की चाहत लिए नयी बहु में न जाने कितने खोट निकाल देती है सास | जिससे की आगे का रास्ता साफ़ हो |
‘रु..’ में भगवान से ज्यादा लाभ वाली और कौन सी दुकान होगी भला | गहरा तंज कसा गया है इसी बहाने से |
 ‘नीलकंठी’ जातिपाति के इतर जाकर जब कभी लड़का-लड़की के बीच प्यार हुआ है तो परिवार वालों ने जहर ही बोया है | इसका शीर्षक बहुत मारक और नविन-सा लगा |
‘छलावा’ ‘कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना’ कहावत को चरितार्थ करती हुई छलावा लघुकथा| व्यंग्यात्मक शैली में प्रतीकों के माध्यम से लक्ष्य पर निशाना साधती हुई | अब ऐसी कोयलों पर निशाना लगे न लगे यह बाद की बात है|
‘अड्ड’ अड्ड नामक लघुकथा भी व्यंग्यात्मक शैली में इशारों इशारों में बहुत कुछ कहती है |

एक साथ ‘अड्ड’ और ‘छलावा’ पढ़कर मशहूर गाना याद आ गया इशारों इशारों में दिल लेने वाले तू ये बता ये हुनर सीखा कहाँ से ! हा हा हा |

‘फिरताऊ’ का कटाक्ष जो गायों के किस्से के बहाने दर्शाया गया है, बढ़िया है|
‘घुनी हुई औरतें’ शीर्षक ही बहुत तीखा है| लेकिन कथा उतनी मारक हमें नहीं लगी| लग रहा है जैसे लेखिका खुद जो कहना चाह रही है शायद वही अपने पात्रों से कहलवा रही हैं | लेखिका के प्रयास पर ही बढ़ती है यह कथा |
‘मवाली’ में डर शायद इतना हावी था कि उसकी नजरें सामने की पथराही नजरों को भाप ना पाईं |
‘थूंक’ कुछ खास प्रभाव नहीं डाल रही| लेकिन पैसा गुरु और चेला तो बता ही गई | आदमी मदद पैसे वाले की ही करता है, भले खून का रिश्ता हो|
‘आज का तथागत’ कुछ लोग इस दुनिया में रम नहीं पाते हैं |स्मैकिए छोटे बेटे की मौत पर मां के शब्दों के बीच कबीर का भजन का बजना सब कुछ समझा देता है| जैसे था वैसे ही बिन ब्याहे चला गया, माँ के इस रुदन से शीर्षक को बल मिल रहा |
‘रानी बिटिया’ पहले संवाद और दूसरा संवाद किसके हैं कुछ ज्यादा ही संकेतात्मक लघुकथा है| शायद हमारी समझ ही कमजोर हो |
‘कौवा हड़वनी’ में प्रचलित कथा के माध्यम से दूसरे की सेवा पर कैसे दूसरे भांजी मारकर बैठ जाते, इस पर कटाक्ष करती लघुकथा|
‘तंज’ में दिखाया गया है कि जब सरकारी सहायता मिलती है तो स्थिति इतनी खराब क्यों है! मुख्य पात्र द्वारा इतनी शब्द पर जोर देना जाहिर करता है कि अधिक ही मिलता है | इसी एक पंक्ति से लघुकथा अपने मंतव्य तक पहुंच पा रही है, हमें ऐसा लगता है|
‘आधी आबादी’ कथानक अपने कथ्य तक पहुंचने से पहले बड़ी बिखरी-बिखरी-सी लगी |
‘दुकान’ के बहाने बीमार मानसिकता पर कुठाराघात किया गया है | बाजारवाद में सब जायज है जैसे आजकल तो|
‘जय हो’ कथनी खांड- सी ही होती है ज्यादातरों की|
 ‘नियति’ इन्सान का अंत तो होना ही है| फूल से लदे पौधे का प्रतिक लेकर बढ़िया लघुकथा बुनी गयी है |
‘थाप’ के बहाने घर में स्त्री की क्या स्थिति है बयां करती है कथा| छोटे से कलेवर में बहुत कुछ कह देती है|
‘झूला’ आह निकल जाती है यह लघुकथा पढ़ते हुए| क्या-क्या न कर्म किए लोग लड़कियों को मारने के लिए| दुर्घटना नहीं ही होती है लड़कियों के साथ | छोटे से कथन में बहुत बड़ा दर्द छुपा है| बेटी को लेकर लोगों की विकृत मानसिकता का प्रदर्शन करती है कथा| वहीं पुत्र को ऐसे सहेजना कि फूलों से भी चोट न लग जाए कहीं| हाय रे समाज में फैले बीमार लोग |
‘दिठौना’ लघुकथा बेहद जानदार बन पड़ी है| सहजता से बहती हुई अंत में चोट करती है कुत्सिक मानसिकता पर|
‘इस अमेरिका की तो...’ दूसरों पर उंगली उठाना आसान है| लेकिन हम अपने आदर्शों की फजीहत करते फिरते हैं | करारा तमाचा है डबल स्टैंडर्ड वाले मानसिकता रखने वाले लोगों पे |
‘हरी बिल्ली’ शीर्षक गजब का है| हरी बिल्ली यानी हरी करारी पांच सौ की नोट मेधावी छात्र का रास्ता काट जाती है जिससे वो नोट देने वालों से पीछे रह जाते हैं | शिक्षा जगत में फैले भ्रष्टाचार पर कुठाराघात करती लघुकथा|
‘जहन्नुम’ पारिवारिक कलह की बढ़िया तस्वीर उतारती है यह लघुकथा | जहां रोज-रोज लड़ाई झगड़ा मारपीट हो वह घर जहन्नुम ही तो है|
‘द अल्टीमेट फाइटर’ अंग्रेजी शीर्षक लेकिन लघुकथा में वही हमारी घिसी-पिटी बीमार मानसिकता पर कुठाराघात करती है |
‘कविता’ कविता में कविता लिखती हुई पात्र के जरिए घर में सब स्त्री का तो है पर घर के दरवाजे की नेम प्लेट नहीं| वह तो सब कुछ होकर भी महत्वहीन है स्त्री |
‘सपने का दरवाजा’ घाटी के घरों के खुले दरवाजे और उस दरवाजे से दूर हो गए कश्मीरी पंडितों पर अच्छी रचना| अपनी जान बचाने के लिए कसम खाने वाला पंडित भी जान जाने के डर से पीछे हट गया| एक लंबा इंतजार करते हुए, यह सोचकर कि जान है तो जहान है| पत्रकार आज भी वह तस्वीर छापकर पंडितों क उनकी कसम की याद दिलाते रहते ..शायद कोई सपने का दरवाजा खुल ही जाए |
‘मैं तो नाचूंगी गूलर तले’ असहिष्णुता पर अच्छी लघुकथा|
‘ढकोसला’ में अपनी स्वार्थ सिद्धि में सारे पारंपरिक रीति-रिवाज रूढ़िवादी लगने लगते हैं | दोगले लोगों पर बढ़िया तंज कसती हुई लघुकथा|
‘अलजेबरा’ खूबसूरत रूप ही जी का जंजाल बनने की कहानी बताती है| तो इस लघुकथा से क्या समझा जाए कि जो रूपवान नहीं होतीं वो बची रहती हैं?

यह ततः किम पूरे 
72 लघुकथाओं का संग्रह है जो दिल में बहत्तर छेद करने में सक्षम है | कई बार में पढ़ी हमने| एक बार में एक साथ ही सभी लघुकथाएँ पढ़ पाना हम जैसे भावुक लोगों के लिए संभव नहीं है| शुक्र है कि हमारी याददाश्त दुरुस्त नहीं है वरना ऐसी कथाएं पढ़कर याद रह जातीं तो रह-रहकर टीस उठती रहती|  किन्तु फिर भी कुछेक लघु कथाएं बड़ी गहरी तक चुभ गईं हैं |
सांकेतिक शैली में लिखी कथाओं को पढ़ने में हम जैसे सामान्य पाठक को थोड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है | कुल मिलाकर लघुकथाओं की भाषा-शैली सब बढ़िया है| कहीं-कहीं कई लघुकथाओं में प्रवाह बाधित हुआ है | लेखिका से हमें कहना है कि एक ही तरीके से लघुकथा लिखने से बचना चाहिए| साड़ियाँ कितनी भी पसंद आये पर एक डिजाइन, इक ही रंग की साड़ियाँ तो अपनी अलमारी में नहीं रखेंगी न | बहुत सी लघुकथाएं आपने दो घटनाओं को लेकर लिखा है | कहीं पौराणिक तो कहीं लोककथा को लेकर | शायद आप समझ जायेगीं हमारा मंतव्य |
फ़िलहाल हमारे समय की लेकिन हम से कहीं आगे मूर्धन्य, मेधावी, वरिष्ठ लघुकथाकार को हृदय के तल से बधाई | दूसरा, तीसरा फिर अनगिनत एकल संग्रह आता रहे और हम उन्हें पढ़कर उनकी विद्वता पर इठलाते रहें |
इक बात और कहनी  - पुस्तक का नाम भले संस्कृत में है लेकिन अंदर हिंदी के शब्द भी सही नहीं लिखे हैं। व्याकरण के नियमो की तबीयत से धज्जियाँ उड़ाई है प्रकाशक  ने। प्रकाशक की इन गलतियों की आंच स्वाभिक है लेखिका पर भी पड़ेगी ही। अपनी लघुकथाओं का मान रखने के लेखिका को फिर से दूसरी किताब छपवानी चाहिए, इन्हीं कथाओं के साथ। ऐसा लग रहा जैसे प्रकाशक आमादा हो कि पैकिंग भले  शानदार कर लो अंदर का सामान तो क्षत विक्षत  ही मिलेगा। लेखिका द्वारा ही लिखी कहानी बया और बन्दर याद आ रही इस समय | पहली किताब होने के नाते इस किताब ने खुशी भले ही दी हो लेकिन सुकून बिल्कुल भी नहीं दिया होगाक्योंकि गलतियों का पुलिंदा है किताब। अच्छी लघुकथाएँ गलत प्रकाशक यानी गलत हाथो में पड़कर क्या से क्या  हो जाती हैं, इस संग्रह को पढ़कर बखूबी समझा जा सकता है। शुक्र है प्रकाशक ने लेखिका के शब्दों औऱ प्रस्तुति को नहीं छेड़ा है। बस यहीं पर लेखिका पर घोर मेहरबानी की है। इसका अहसानमन्द हुआ जा सकता है कि उसने कम से कम लेखिका के ही कलम से निकले शब्द को पढ़वाया। वहां अपना पाण्डित्य बिखरने से प्रकाशक चूक गया शायद। कुल मिलाकर लघुकथाएँ पाठक के हृदय को चीरती हैं तो प्रकाशक की गलतियां पाठक के मन को भेदती हैं, औऱ मुख से अनायास ही निकल पड़ता है कि ये मूर्धन्य लेखिकाआपने किस ओखली में सिर दे दिया! 

मन की बात
समीक्षक- सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

Sunday, 6 October 2019

सम्पन्न दुनिया

माँ अपनी अटैची में कपड़े ठूँसते हुए बोली -“चल बेटा, अपने पुराने मोहल्ले में। मुझे अब यहां नहीं रहना।”
“क्यों माँ! तुम्हें तो यहां की हरियाली, फलदार पेड़ और उस पर चहकते पक्षी, सुगन्ध बिखराते फूल तो बड़े ही भाये थे।  छोटे से पाण्ड में बत्तखों को देखकर कैसे तुम बच्चों-सी मचल गयी थी।”
“हाँ, लेकिन..”
“जानती हो माँ तुम्हें इस तरह से खुश देखकर पहली बार लगा था कि मैं पापा की जगह खड़ा हूँ, अपनी नौकरी की रकम से इस सोसायटी में  तुम्हारे लिए छोटा-सा फ्लैट लेकर मैंने कोई गलती नहीं की है।”
“नहीं मेरे लाडले, तूने कोई गलती नहीं की। लेकिन...”
“माँ याद है! पवनचक्की को देखकर तुमने कहा था कि चल अच्छा है यहां ये भी है, गर्मी में बिन पंखे के भी नहीं रहना पड़ेगा। फिर आज ऐसा क्या हुआ..?”
“बेटा ! सब कुछ हैं किंतु यहां इंसान नहीं हैं..!”
“हा! हा! हा! क्या माँ! यहां हजारों लोग रहते हैं, बस तुम्हें दिखते नहीं होंगे। पार्क में बैठने की तेरी और उनकी टाइमिंग एक नहीं होगी न!"
“नहीं बेटा! टाइमिंग तो एक ही है परन्तु उनमें इंसानियत नहीं है, सब रोबोटिक्स हैं!
तू लेकर चल मुझे वहीं, जहां एक दूसरे का दुख-दर्द पूछने वाले ढेरों इंसान रहते हैं।”

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा

पेट दर्द

डॉक्टर - “अरे शर्मा जी, आप! आप तो मुहल्ले के स्वस्थ व्यक्तियों में हैं। टहलना/योगा खानपान सब समयानुसार! बताइए, फिर क्या दिक्कत हो गयी आपको?”
शर्मा जी- “डॉक्टर साहब! महीने से पेट में लगातार बेन्तहा दर्द रहने लगा है।”
डॉक्टर - “लीजिए, पाँच दिन की दवा लिख दी है। खाकर फिर आइयेगा दिखाने। इससे नहीं ठीक हुआ तो कुछ टेस्ट करवाना पड़ेगा आपको।”
शर्मा जी- “अरे डॉक्टर साहब, परसो तो पुस्तक मेले में जाना है। आठ-दस दिन उधर ही दिल्ली में मुझे रहना पड़ेगा।”
डॉक्टर - “चार-पांच साल से पुस्तक मेले में दूसरों की खुशियों में शरीक हो रहे हैं। आपकी कोई किताब नहीं आ रही है?”
शर्मा जी - “अरे कहाँ, मेरे साथ के और मेरे बाद के लिखने वाले सभी इस बार भी अपनी-अपनी किताबें लेकर आ रहे हैं । और एक मैं हूँ कि एक भी पाण्डुलिपि अभी तक पूरी नहीं हो सकी।”
डॉक्टर ने अपना लिखा पर्चा उनके हाथ से लेकर फाड़ दिया।
शर्मा जी ने हड़बड़ाकर कहा - “अरे डॉक्टर साहब, दवा! मेरा पेट दर्द !”
डॉक्टर - “आप सिर्फ गर्म दूध के साथ रात में यह लीजिए।”
शर्मा जी पर्ची पढ़ते हुए आश्चर्य से बोले - “हॉर्लिक्स! बादाम!”
मुस्कराते हुए डॉक्टर ने कहा - “हाँ, इसे पीते ही स्फूर्ति के साथ आपका दिमाग ज्यादा तेज काम करने लगेगा और आप अपनी पाण्डुलिपि की सामग्री जल्दी से जल्दी पूरी कर लेंगे। जैसे ही आपकी किताब आने की सम्भावना बनेगी, यकीनन उसी वक्त से आपको पेट दर्द में आराम मिलने लगेगा ।”
शर्मा जी फटी आंखों से डॉक्टर की ओर बस देखते रहे।
--००---
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा , (प्रयागराज) 
2012.savita.mishra@gmail.com
जनवरी २०१९ को लिखी 

Sunday, 29 September 2019

वादा

“तुम्हें गिरते देख मैंने पकड़ लिया है, हाथ मत छोड़ना! कसकर पकड़ के रखो वरना तुम गिरे तो मैं भी नष्ट हो जाऊँगी। तुम्हारे सहारे ही तो मैं जमा हूँ, नदियों में, तालाबों में, नलों से होते हुए तुम्हारे घरों में।”
फिसलती चट्टानों से सम्भलकर वह उठ ही रहा था कि उसके कान फुसफुसाहट सुनकर खड़े हो गए।
“अरे! अरे! देखना छोड़ना नहीं, किसी भी हाल में नहीं। पीने-नहाने के लिए मैं चाहिए तुम्हें कि नहीं ! यदि चाहिए तो फिर कसकर पकड़े ही रहना, वरना उँगली भर रह जाऊँगी मैं।”
झरने के नीचे खड़े होकर पानी से खेलते हुए कानों में कोई आवाज़ दुबारा से गूँजी तो वह चारो तरफ चकरबकर देखने लगा। अपने कल-कल को पीछे छोड़ती हुई वही आवाज़ फिर आयी तो वह पानी की ओर हाथ बढ़ाए हुए स्टेच्यु की स्थिति में आ गया।
“भरा-पूरा शरीर था कभी मेरा लेकिन तुम्हारे दादा-परदादा ने कीमत नहीं समझी मेरी। तुम भी उन्हीं के नक़्शे-क़दम पर चलने लगे हो। अब हाथ भर रह गई हूँ, हो सके तो मेरी कीमत समझो और कसकर थामे रहो मुझे। जैसे तुम्हारे बाद भी तुम्हारे बच्चे मेरी उंगलियों को छू सकें, क्यों थामे रहोगे न!”
मूर्तिवत उसने हाँ में अपनी मुंडी हिला दी।
“यदि तुमने भी छोड़ दिया न तो तुम अपने आँसुओं में ही पाओगें मुझे।”
झरने के नीचे खड़ा वह झरने से आते छटाँग भर पानी को देख सोच में डूब गया।
“सुनो, तुम मुझे जीवन दो बदले में मैं तुम्हें जीवित रखूँगी, वादा है ये मेरा।”
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा
29/9/2019 को

Wednesday, 25 September 2019

माँ अनपढ़

“क्या कह रही बिटिया ! हमने तो तुम्हें खूब पढ़ाया। हमारे खानदान की कोहू बिटिया ने इतना न पढ़ा है।”
“हाँ अम्मा, तुमने पढ़ाया, लेकिन..!
“हम तो पाँचवी तक बस पढ़े रहे, पर तुम्हें पढ़ाया, जैसे कोई ई न कहें कि जैसे माई वैसेही बिटिया। के कहेस तोहके अनपढ़, बतावअ त, बताई ओहके ...!”
“अम्मा, हम पांचवी में आते ही जैसे तुमका कहते थे न कि अम्मा तुम तो न ही पढ़ाओ हमें! तुमको कुछ न आता, वैसे ही अब..!”
हा हा हा...
“अम्मा, बस करो हँसना, हम पर तो गुस्सा जाती थी । अब वही चीज तुम्हारी नातिन हमसे कह रही है तो उस पर तुम्हें लाड़ आ रहा..!”
“बिटिया, अम्मा लोग कितना भी पढ़ी-लिखी जाए अपने बिटियन के आगे अनपढ़े ही रहिए, हर जुग मा।”
 दोनों माँ ही अपनी अगली पीढ़ी से सिखती-सिखाती उसके पीछे-पीछे चलने लगीं।
--००--

सविता मिश्रा अक्षजा
आगरा
2012.savita.mishra@gmail.com

२३/९/२०१९ को लिखी 

Tuesday, 6 August 2019

सुनो पूर्वाग्रही

 370 हटाए जाने के प्रस्ताव एक सदन से पास होने की खुशी में जो हल्के फुल्के हास्य चल रहे हैं शोशल मीडिया पर वह किसी की भवनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है बल्कि अपने अपने ढंग है हंसने बोलने के तरीके हैं उस पर इतनी ज्यादा उथल पुथल उन्हीं के अंदर मच रही जो कि पूर्वग्रह से पीड़ित हैं। 'अक्षजा'
अब इस 370 को लेकर फैलने वाले हास्य को कबड्डी का मैच बताने वाले लेखक को मेरा जवाब---
पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखा गया है यह लेख। भाषायी संयम सिखाने वाले लेखक महोदय दूसरे की आहत भावनाओं से खेलकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
ये भाषा संय
मी तब क्यों नहीं बने रहने की सलाह दी जाती जब हिन्दू देवी देवता पर और त्योहारों के दिन फूहड़ हास्य लिखे जाते हैं और असहाय होकर ह्वाट्सएप ग्रुपों में और फेसबुक पर घूमते रहते हैं। उन फूहड़ हास्य के विरोध में  मसीहा बनकर क्यों नहीं उभरते! तब क्यों नहीं दी जाती जब नारी पर खासकर पत्नियों पर हजारों फूहड़ हास्य चलते हैं । और तब क्यों नहीं दी जाती जब सरदारों को निहायत ही मूर्ख बताने वाले हास्य शोशल मीडिया पर धड़ल्ले से चलते हैं...।
तब तो सभी इन सबका समर्थन करने वाले मर्यादित लोग हास्य है यार ! हास्य में लो, गंभीरता से नहीं, कहकर खींस निपोर देते हैं।
यदि महज हास्य बस कुछ लाइनें इन दो दिनों से चल रहीं तो सभी अपना दिल बड़ा करिए सरदारों की तरह और इन हल्के फुल्के हास्य को चलने देकर महज मुस्कुरा लीजिए । इस तरह से लोगों की भवनाओं को भड़काकर जहर मत बोइए...😊सविता मिश्रा 'अक्षजा'